वन अधिकार कानून पर मंडराता नया खतरा – कुलभूषण उपमन्यु

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A new threat looming over the Forest Rights Act

 

भारत वर्ष में वन हमेशा आदिवासी समुदार्यों और कृषि पशुपालन-दस्तकारी व्यवसाय से जुड़े समार्जा के लिए आजीविका के आधार रहे हैं, जिसमें चारागाह भूमियों का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इन्हें चारागाह दरख्तान, चारागाह बिला दरख्तान, गोचर भूमि आदि नामों से जाना जाता था। अंग्रेजों ने जब सन् 1860 के आसपास वन भूमिर्यो पर कब्जा करके वनों को वन विभाग के हवाले करने का कार्य आरंभ किया तब वनों का चरित्र और प्रबंधन पूरी तरह से बदल गया। अब वनों का मालिक वन विभाग हो गया और स्थानीय समुदाय कुछ सीमित स्तर के मालिक मात्र बना दिए गए, जिन्हें वन विभाग की दया पर निर्भर कर दिया गया।

आदिवासी इलाकों में इस स्थिति के खिलाफ कई आंदोलन और लड़ाइयां हुई, किंतु अंततोगत्वा ब्रिटिश वन प्रबंधन का युग शुरु हुआ, जिसमें वन विभाग का लक्ष्य वनों के व्यापार से अधिक-से-अधिक कमाई करके ब्रिटिश सरकार के हवाले करना था। इस वजह से वनों के स्वरूप को भी बदलने का काम शुरु हुआ। मिश्रित बहु-उपयोगी वनों को एकल प्रजाति के व्यापारिक प्रजाति के वनों में बदला जाने लगा, जिससे स्थानीय समाज की वनों पर आधारित आजीविकाएं नष्ट होती चली गई। यह क्रम ‘चिपको आंदोलन’ ‌द्वारा, इस व्यापारिक वन प्रबंधन के खिलाफ 70-80 के दशक में किए गए लंबे संघर्ष तक आजादी के बाद भी जारी रहा।

हालांकि, 1986 की वन नीति के बाद से वन रोपण नीतियों में बदलाव आने लगा, किंतु आदिवासियों और अन्य वन निर्भर समुदार्यो को डेढ़ सदी तक हुई हानि को देखते हुए 2006 में ‘वन अधिकार कानून बनाकर इस ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने का प्रयास हुआ। इसके अनुसार वन भूमि में खेती करने वाले आदिवासी और अन्य वन पर निर्भर समुदायों को खेती योग्य भूमि कानूनी तौर पर देने, वनों में उनके अधिकारों को कानूनी

अधिकार में बदलने और वन क्षेत्रों को इन समुदायों को अपनी जरूरतों के अनुसार प्रबंधित करने के प्रावधान किए गए।

इस कानून को विशेष कानून का दर्जा दिया गया, ताकि यह अन्य सभी वन कानूनों की परवाह किए बिना लागू किया जा सके। वन भूमि पर इस तरह समुदायों के बढ़ते दखल और अधिकारों के म‌द्देनजर वन विभाग शुरु से ही इसके विरोध में बना रहा। इसी खतरे को भांपते हुए इस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी आदिवासी या जनजातीय मंत्रालय को सौंपी गई। अन्य प्रशासनिक स्तरों के परोक्ष विरोध और राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में 2008 में अधिसूचित हो जाने के बाबजूद यह कानून कछुआ चाल से ही लागू किया जा रहा है। धीरे-धीरे वन अधिकार कानून’ के अंतर्गत बनाई गई ग्रामसभाओं की शक्तियां ‘जिला स्तरीय अनुश्रवण समितियों’ को ‘सामुदायिक वन प्रबंधन में व्यापक भूमिका देकर कम की जा रही हैं। सामुदायिक वनों पर सामूहिक स्वामित्व आधारित व्यवस्था को ‘साझे वन प्रबंधन’ (जेएफएम) की दिशा में मोड़ा जा रहा है।

‘साझा वन प्रबंधन’ अपनी सीमाओं के चलते कोई प्रभावी सफलता दिखाने में पहले ही असफल हो चुका है क्योंकि उसमें समुदाय की भूमिका नाम मात्र की थी। जब तक समुदाय को यह विश्वास नहीं हो जाता कि यह वन हमारा है और हमें मिलकर इसकी रक्षा और संवर्धन करना है और इसके लाभ भी प्राप्त करने हैं तब तक समुदाय को सक्रिय प्रबंधक नहीं बनाया जा सकता। इसी कमी को ‘वन अधिकार कानून’ ध्यान में रखता है और अधिकार आधारित व्यवस्था बनाता है।
27 जुलाई, 2026 को ‘पर्यावरण और वन मंत्रालय’ और ‘आदिवासी मंत्रालय’ ने एक साझा पत्र जारी किया है, जिसमें ‘साझा वन प्रबंधन’ की बात की गई है और 2023 के ‘वर्किंग प्लान कोड’ के अनुसार सामुदायिक वनों के प्रबंधन की कार्य योजना बनाने का निर्देश दिया गया है। वन विभाग के सहयोग से यह योजना बनाई जाएगी। जाहिर है कि इसमें समुदायों की बात तो हाशिए पर ही रहेगी। यह कोड इतना पेचीदा है कि कोई भी ‘सामुदायिक वन प्रबंधन समिति इस आधार पर योजना बना ही नहीं सकती है। गोचर भूमियों के बारे में तो कोई स्पष्ट जिक्र तक इस कोड में नहीं है।

लोगों की नजर में वन विभाग की भूमिका हमेशा अधिकार हड़पने की रही है तो इस प्रक्रिया में उनका विश्वास करना थोड़ा कठिन हो रहा है। जैसे अन्य विभागों में होता है कि जमीन तो लोगों की है, कृषि विभाग उसमें जरूरी सहयोग करता है, उ‌द्योग तो उ‌द्योपति का है, उ‌द्योग विभाग उसमें जरूरी आर्थिक सुविधाएं और सहयोग देता है। इसी तरह सामुदायिक वन जो वन अधिकार कानून के तहत समुदाय को दिया गया उसका मालिक तो समुदाय है, वन विभाग को उसमें केवल जरूरत पड़ने पर मांगा गया सहयोग देने तक सीमित रखना चाहिए। तभी अधिकार आधारित व्यवस्था कायम हो सकेगी।

हालांकि इस पूरी व्यवस्था को ‘वन अधिकार कानून’ की धारणा के अनुसार विकसित होने में कुछ समय लगेगा। इसमें करते हुए सीखने की प्रक्रिया को अपनाना होगा, किंतु सबसे जरूरी बात जो ध्यान में रखनी होगी वह है कि कही भी समुदाय को यह नहीं लगना चाहिए कि हमारी स्थिति इस व्यवस्था में भी बाहरी तमाशाई से ज्यादा नहीं है। इससे ‘वन अधिकार कानून’ की आत्मा पर ही आघात लगेगा और वांछित प्रतिफल भी प्राप्त नहीं हो सकेगा।
श्री कुलभूषण उपमन्यु स्वतंत्र लेखक हैं और हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष हैं।

आभार – sarvoday Press service


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