शैलेश सिंह जी की कविताएं

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Diwali

बार- बार लौटता हूँ बनारस
या बार-बार लौटाया जाता हूं
काशी!
तुम्हारी गलियों में भटकने के लिए.

बनारस की गलियां , जो कभी थीं,
भेंडियाधसान.
अब निर्जन हैं.
, गाय नहीं,
साड़ नहीं ,
भांड़ नहीं,
करघे को ठांव नहीं,
जुलाहे का ताना नहीं,
जुलाहिन का बाना नहीं ,
यहां अब कोई नहींअपना
कोई नहीं पहचाना- जाना
बस दिख रहे हैं सब बेगाना
सूरते-हाल है यहीं रोजाना।

रैदास -कबीर और तुलसी
सभी परा गए मगहर ,
नहीं- नहीं जनकपुर
जहाँ पाए थे सम्मान अष्टावक्र
और कहा था–
सौंदर्य आवरण में नहीं
बाह्य की दमक में नहीं,
शरीर की चमक में नहीं,
सौंदर्य है बुद्धि के प्रकाश में है।
भाषा के प्रखर संवाद में,
विचार के प्रवाह में।
सुन्दरतम छिपा रहता है
मनुष्य के सद्कर्मों में।
होती है कुरूपता असत्य में,
सबसे अधिक होती है विरूपता
आडम्बर के अम्बर में,
भद्दा होता है सबसे अधिक भय का पथ ।
दौड़ता है बिन पहिए के झूठ का रथ
अपने चरम पर पहुंचती है विद्रूपता
अपात्र की स्तुति में,
अपयश की गाथा में,
अधर्म की अभिव्यक्ति में,
और
मर जाते हैं सौन्दर्य के सारे उपादान
दर्प की भंगिमा में,
अकड़ की कड़क में,
अहम् की संहिता में,
अहंकार के हुंकार में,

गरूर की भाषा में,
मद की माला में।

आकर्षण होता है–
चेतना के आलोक में ,
सौंदर्य बहता है —
करुणा की कृति में,
सुन्दरता है बसती है–
‘स्व’ की आहुति में,
खूबसूरती रमी रहती है–
निर्मल चित्त में,
ठिठका रहता है सौंदर्य
निर्भय की गति में.

रची थी एक
अनुपम गीता
और कहा था ” जीवन भी है एक पदार्थ
और नमक की भांति गलता है
हवा और पानी में घुलता है।
माटी में मिलता है
क्षरित होती रहती है काया
और बढ़ती रहती है माया
मरती नहीं भावनाएं
बढ़तीं हैं कामनाएं।”

बनारस की गलियां हजार बाहों में
उठाए रहतीं हैं अधूरी कामनाएं
जिलाए रहतीं हैं अजन्मी इच्छाएँ
कहाँ कर पाई नियंत्रण
काशी नरेश काश्य की पुत्री ‘अम्बा’
कहाँ रख पाईं संयम
नृपति हरिश्चन्द्र की भार्या शब्या

शिव की नगरी काशी में
अब नहीं बजता डमरू
अब लहराते हैं केवल त्रिशूल

काशी की गलियां अहर्निश, निर्निमेष, अपलक
तकतीं रह तीं हैं, मसान
जहाँ धधक रहे हैं शव के साथ
शब्द,अर्थ और मर्म
पर सो गई
है आत्मा–
जिसे, जगा आए थे
चांडाल के कटु वचन से
आदि शंकराचार्य
हे काशी! कब तक सोएंगी काशी की आत्माएं?
(1)

काशी की गलियों की आंखें
होतीं नहीं कभी उनींदीं
निरंतर करतीं रहतीं हैं जागरण
देखतीं रहतीं है अहर्निश मरण का उत्सव

गंगा के कूल पर खड़े हो जाते हैं
सगर के पुत्र
भगीरथ की आर्त पुकार पर भी
नहीं स्वीकारते मोक्ष

मुहाने मृत्यु के विवश है सलिला
ठिठकी रहती है मानुष की अदम्य कामना
नृत्य करती है जान्हवी की निर्बल तरंगों पर

गलियों के अपलक नेत्र
देखते रहते हैं
जीवन के स्वर्णिम स्वप्न
जैसे -देखते थे जीवन रस ,
जैसे सुनते थे जीवन का राग
जैसे नापते थे जगत का पथ
राजा हरिश्चंद्र

मसान पर खड़े होकर
दहन करते शव
शब्या का विलाप सुनकर अघा गईं हैं
बनारस की गलियां
अब यहाँ विलाप नहीं
गूंजता है , बस अलाप ही अलाप
जिसे रचा था
मानुष; अमानुष- देव- दानव, सुर-असुर, बिरह्मा- बिसनु , महेस ,गनेस और काशी नरेश
भूल गए सब कलावंत द्रुपद के राग
मगर गाए जा रहीं हैं
बनारस की गलियां
जीवन अमर है.
जीवन समर है
जीवन गरल है
जीवन सुधा रस है
यहां सब हैं नीलकंठ
लौटता हूँ बार- बार
देखने नीलकंठ
होने नीलकंठ।

(2)

पिता दिवस पर विशेष

क्या थे पिता ?
महज एक मानुष?
परिवार के मुखिया?

गाँव के मानिंद
विवाह – बरात की शोभा
भवदीय ,दर्शनाभिलाषी,
कृपाकांक्षी,.विनय में नत
शिष्टाचार में बंधे हाथ
सत्कार में जुड़े हाथ
विरोध में खड़े हाथ
क्रोध में झटकते हाथ
प्रेम में गहे हाथ
, सहयोग में सने हाथ
आशीष में सिर पर रखे हाथ
क्या यही थे पिता?
नहीं, जी हां,
इन सब में कहीं नहीं थे पिता
पिता थे मान में
पिता थे अपमान में
पिता थे निराशा की गठरी में
पिता थे अभाव की ठठरी में
पिता थे-
दूसरों की डांट- फटकार में
पिता थे अवमानना रव में
पिता थे , मुश्किल भंवर में ।
पिता थे श्रम के पारावार में
पिता थे समय के विपरीत धार में।
पिता थे, मां की कातर आंखों के भरोसे में
पिता थे बच्चों की आधी-पूरी इच्छाओं में।
पिता थे दादा के थकान में
पिता थे हर मुश्किल ठांव में
पिता थे पूस की रात में
पिता थे बिटिया के बाट में
पिता थे बेटे के ठाठ में
पिता थे कुल की मर्यादा में
पिता थे कुटुम्ब की छान
पिता थे चाचाओं के गुमान
पिता थे सबके कौल ।

पिता का मन एक विलुप्त हो गई
लिपि में लिखा था
जिसे कभी किसी ने न देखा न पढ़ा
पिता रहते थे घर- परिवार औ समाज में
थे वे एक साधारण से इंसान
था उनमें असाधारण पौरुष
अथक, अविराम
करते थे काम
उनकी आंखें पढ़ लेतीं थीं
हम सबकी ज़रूरत
हम सब होते रहे व्यक्त
पर वे रहे सदा अव्यक्त
कभी थके नहीं
कभी हुए नहीं अशक्त।
कभी खत्म न होनेवाली
छांव थे पिता
अंगद के पांव थे पिता

(3)

स्त्रियों का अपना कोई घर नहीं होता

जैसे चिड़ियों का ,
जैसे तम का,
जेैसे उजास का,
जैसे हवा का –
वैसे ही “स्त्रियों” का ।
देखते ही उनको , सौंप देता है स्वयं को (घर)
और लगभग हकलाते हुए अस्फुट स्वर में कहता है “लो ,संभालो इसे “।
और वह (घर ) छिप जाता है फटी हुई दीवार की दरार में,
चींटियों की मानिन्द।
जहां भी जातीं हैं स्त्रियां,
वहां अपने श्रम के स्वेद लवण को छिड़क देतीं हैं चतुर्दिक हो सके पावन घर का कोना-कोना ,
और सहसा सारे अपरिचित हो जाते हैं
बे हद आत्मीय ।
बांध लेतीं हैं स्त्रियां
अपने वात्सल्य से
अपने ममत्व से ,
अपने श्रम से,
अपनी सुश्रुषा से –
और लाख जतन के बाद भी ,
कोई बचा रहता है इन सभी भाव बन्धनों से
बावजूद इनके छिटका रहता है
कोई अपनी अना के रूखर ओनचन सरीखा
उसे भी वे बांधतीं हैं
अपनी मनुहार की सुघर सुजनी से,
काम के कमान से,
और प्रेम के स्निग्ध स्पर्श से ।
और बन जातीं हैं स्वामिनी
बिना किसी लिखत के।
पातीं हैं यह कला ,
विरासत में, – परनानियों से,
परदादियों से
और दुनियां की तमाम स्त्रियों की आंखों से।
।।इति।

( 4)

महिला दिवस के निमित्त

स्त्रियां देतीं है–
प्रेम,
करुणा,
स्नेह
और अपना हिया- जिया।
और पातीं हैं एवज में
हिकारत,
गाली,
हिंसा
और गृहस्थी का अदृश्य बोझ।
बोझ इतना कि
गुम जाए सुध- बुध और सोच।
बोझ हर दिन बढ़ता जाता है —
जैसे पावस में नदी जल,
जैसे शीत में ठिठुरन,
जैसे ग्रीष्म में तपन।
निसदिन बारह मास
लदा रहता है नामालूम – सा बोझ
मानो गर्भ से ही ले आईं हों इतनी बड़ी गठरी।

घर का हर परानी
गाहे बगाहे देता है नशीहत
मानो लोग चढ़ा रहे हों
तुलसी के चौरा पर जल।
उम्र के अस्सी साल बाद
आती है एक दूसरी स्त्री
और दौड़कर उठा लेती है उसका बोझ
जहां नहीं होतीं स्त्रियां
वहां सामान की तरह बिखरे ,
टूटे , गिरू और धूसर रहते हैं
घर के लोग।
इति।।

( 5)

मृत्यु श्रृंखला की कविताएं

जतन से रखा था सब कुछ
बहुत इत्मीनान से लिखा था
बधाई संदेश,
बहुत तन्मय हो कर लिखा था
पत्र
कितने लगन से उतारी थी
तुम्हारे लिए कोफ्ता की रेसिपी
बहुत चाव व चाह से बनाई थी
तुम्हारे स्वाद का लजीज खीर
खीरीदा था पूरी तरह से नापकर
तुम्हारी मनपसंद का
सैंडल,
ठीक
उसी दिन ठीक कराई थी तुम्हारी
स्कूटी.
तुम्हारे ऊपर
फबने वाली ली थी साडी
तुम्हे बिना बताए
ठीक वही रंग
जिसे तुमने पहली बार पहना था
ठीक -ठीक वही पहलीबार
जिसे पहनकर
बनी थी तुम दुलहिन

जो तुम्हें रुचता था तभी से सबसे अधिक
सबकुछ किया बिना तुमसे पूछे
पर, यह क्या
पूछने का वक्त जब आया
तुम
हो गई मौन
बदल
दी ठौर

घुल गई पानी में
उड गई हवा में
हो गई कपास

गई बन बतास
चली गई
नदी के उस पार
चाँद के पार
आसमान के पीछे
तारों के बीच
यह अलग बात है कि तुम
तारों की तरह चमकने से
शरमा रही हो
तुम्हारे वास्ते लाई गई
टिकुली अब भी चमक रही है
तुम्हारे जाने के बाद
साडी का चटख रंग वैसे ही है
चूडियोँ मे खनक बनी हुई है
बस तुम्हारी कँचन – सी काया
होगई है माटी, धुआँ,राख, और पानी
खतम भई जीवन की कहानी
सब जतन झूठ, सब कुछ फानी
करती रहती है कुदरत ऐसे ही मनमानी

(6)

हवाएं आईं बड़ी प्रतीक्षा के बाद
बादल आए बड़ी प्रतीक्षा के बाद
लोग आए बोलते हुए बड़ी प्रतीक्षा के बाद
सब्र का बांध टूटा बड़ी प्रतीक्षा के बाद
नारे गूंजे , पहुंचे दिगन्त तक बड़ी प्रतीक्षा के बाद
आवाजें पहुंची, बातें पहुंची , चाहत पहुंची बड़ी प्रतीक्षा के बाद
रातें बीतीं , घातें बीतीं, सांसें धड़कीं बहुत दिनों के बाद
बातों का एक रिश्ता जुड़ा ,पैगामों का मतलब समझा बहुत दिनों के बाद
लाठी बरसीं, आंसूं बरसे, बिन बादल पानी भी बरसे अभी-
अभी की बात
भूखे रहकर, प्यासे रहकर गुजरी रातें अभी अभी की बात
बिन रोटी के , बिन दाना गुजारे दिन अभी अभी की बात
नज़रें झुक गईं, टोपी गिर गई , रूतबा की सब शेखी लुट गई अभी- अभी की बात
महाबली की ताक़त रिस/ झर गई अभी- अभी की बात
दांव – पेंच में माहिर – अव्वल होते सब लाचार ,
कहता यह इतिहास सदा – सदा की बात
उफनताते दरिया में डूबे सभी कुशल तैराक
देता सीख समाज सदा – सदा की बात
टूटा दर्प ब्रह्मा का भी,
टूटा गर्व हिरणा का भी
नारद का भी धूर हुआ अभिमान
हार गए अदना किसान से
टूटा घमंड जलधि का भाई
शर के आगे करै दुहाई
हार गया शिव का अनुरागी गर्वीला लंकेश
भस्म कर गई वानर सेना,
हारी पुतना , हारा कंस
ग्वाल बाल ने ऐसे कुचला
गरलपति को
बचा न कोई फन शेष
देते पोथी यह संदेश
कह गए महा कवि करंदीकर —-

जनता अमर है,
जनता अजर है,
जनता अकथ है
जनता सबल है,
जनता प्रबल है
जनता सरल है
जनता अक्षय है
ऊर्जा अक्षय है
प्रगति की चाह अमर है
बदलाव की राह कठिन
गहो बांह इस राह की
करो प्रयाण इस राह की
पता है राह है अग्नि की
बन प्रमथ्यु धरो पांव
करो प्रणाम इस राह को ।


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