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गुरु-शिष्य परम्परा और आनंदमय जीवन की जरूरतें

by Rajendra Rajan
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— आनंद कुमार —

भारतीय सांस्कृतिक आदर्शों में गुरु की सर्वोच्च महत्ता है। सफल जीवन के मूलाधार के रूप में गुरु को तलाशना और शिष्य की भूमिका ग्रहण करना वयस्क जीवन की महत्त्वपूर्ण जरूरत समझा  गया है। क्यों? वृहदारणयकोपनिषद के पवमान मन्त्र की प्रार्थना है कि हमें अपने जीवन को तीन महा भयों- असत्य, अन्धकार और मृत्यु- से बचानेवाला मार्ग चाहिए :

ऊँ असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय

ऊँ शांति शांति शांति: II (१.३.२८)

हर स्त्री-पुरुष की जीवनयात्रा असत्य, अन्धकार और मरण से घिरी हुई होती है। इसमें गुरु अपने तेज (‘रु’) से हमें ‘गु’ (अन्धकार) से बचाते हैं। तमस से रक्षा करते हैं। मरण का भय दूर होता है। वीरता और अमृतत्व देते हैं। गुरुकृपा से हममें उचित और अनुचित के विवेक का विकास होता है। शुभ और अशुभ का भेद मालूम होता है। पाप और पुण्य की समझ आती है।

इसीलिए शास्त्रों से लेकर लोकाचार तक में गुरु की महिमा का गान है। हमारी वैदिक प्रार्थनाओं में से गुरुस्तुति का निम्नलिखित श्लोक बहु-प्रचारित है :

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:

गुरु साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नाम:।

कबीर ने भी कहा :

‘गुर-गोविंद दोउ खड़े काको लागूं पायं.

बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय।

 

गुरु-शिष्य परंपरा का विमर्श

गुरु-शिष्य परम्परा की महत्ता के विमर्श में दो बातें ध्यान में रखना उपयोगी है। एक तो, हर प्राणी अपनी दिनचर्या से लेकर भविष्य की योजनाओं तक में अपनी ‘अस्तित्व-रक्षा’ को सर्वोच्च महत्त्व देता है। दूसरे, अगर हमारा अस्तित्व ‘आनंदमय’ हो सके तो जीवन सार्थक लगता है। इसीलिए हम सभी सदैव अपने जीवन को अशुभ से शुभ की ओर ले जाने के लिए सचेष्ट रहते हैं। पाप से बचते हैं। पुण्य का अर्जन करते हैं। अन्यथा असंतोष, अफ़सोस और निरर्थकता का अन्धकार आजीवन घेरे रहता है।

पराधीनता, अपमान, अन्याय, अभाव, लोभ, द्वेष, इर्ष्या, भय और पाप जीवन को अलग-अलग तरीकों से विषादमय बनाते हैं। बुद्ध की परंपरा के हमारे दौर के श्रेष्ठतम शिक्षक दलाई लामा इसी सच को अपनी सरल शैली में बताते नहीं थकते कि हर प्राणी आनंद की तलाश में है। हमारे जीवन में आनंद के अनुपात में ही संतोष पैदा होता है। जीवन को आनंदमय बनाने का मार्ग ही सबका अभीष्ट है। इस मार्ग को जानने और अपनाने के लिए गुरु-शिष्य परम्परा का व्यापक महत्त्व भारतीय संस्कृति की विशिष्ट विरासत है।

गुरु-शिष्य परंपरा के अवरोधक 

प्रेरणा देनेवाले, ज्ञान देनेवाले, सच बतानेवाले, रास्ता दिखानेवाले और बोध करानेवाले– ये सभी गुरु समान हैं :

प्रेरक: सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तयतु

शिक्षको बोधकश्चैव षडेतु गुरव:स्मृता:।

लेकिन ज्ञान की सत्ता के समानांतर ही सत्ता की ज्ञान-व्यवस्था होती है। सत्ता के प्रति समर्पण भाव को प्रबल रखने के लिए ज्ञानीजनों का दुरुपयोग हर देश-काल का एक कटु सत्य रहा है। परिवार से लेकर धर्म प्रतिष्ठान के प्रति आज्ञाकारिता के लिए भी ज्ञान-व्यवस्था के अंतर्गत आश्रम, मदरसा, सेमीनरी आदि समेत सभी प्रकार के विद्यालयों के माध्यम से हमारा सामाजीकरण किया जाता है। यह हर देश-काल का सच है। महाभारत के गुरु शिरोमणि  द्रोणाचार्य इस प्रवृत्ति के उल्लेखनीय प्रतीक थे। उनका राजपुत्र अर्जुन को श्रेष्ठतम धनुर्धर बनाने के लिए वनवासी एकलव्य से ‘गुरु-दक्षिणा’ में अंगूठा मांगना और बाद में महाभारत में दुर्योधन की तरफ से युद्ध में उतरना बहुचर्चित है। वह महाज्ञानी आचार्य जरूर थे लेकिन अपने जीवन में आदर्श गुरु का आचरण नहीं कर सके।

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान गांधीजी ने अपने अनुभव से पाया था कि हमारे देश में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से पश्चिम से आयातित की जा रही शिक्षा-व्यवस्था से आधुनिक जीवन की सुविधाएं दिलानेवाली नौकरियों के लिए उपयोगी डिग्री मिलती है लेकिन मनुष्य के चरित्र-निर्माण पर कोई बल नहीं है। ब्रिटिश राज की  शिक्षा-परीक्षा पद्धति से मानवीय गुणों के संवर्धन की बहुत कम गुंजाइश है। सरकारी नौकरियों और भौतिक सुख-सुविधाओं के लोभ का बाहुल्य है। यह अन्धकार से प्रकाश की तरफ ले जानेवाली न होकर आत्मकेंद्रित पशु जैसे व्यक्तित्व का पोषण करती है। भारतीयता और भारतीय राष्ट्र-निर्माण के लिए राष्ट्रीय शिक्षा देनेवाले देशज विद्यालयों की जरूरत होगी।

इसीलिए असहयोग आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश राज पोषित शिक्षा के बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रसार पर बल दिया गया। इसी क्रम में काका कालेलकर और आचार्य कृपालानी ने गुजरात विद्यापीठ, डॉ. भगवानदास और आचार्य नरेंद्रदेव ने काशी विद्यापीठ, डॉ. जाकिर हुसैन ने जामिया मिलिया इस्लामिया (अलीगढ़/दिल्ली) और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने बिहार विद्यापीठ (पटना) की स्थापना का नेतृत्व किया। गांधी के आह्वान के पहले भी स्वामी श्रद्धानंद, डॉ. एनी बेसेंट, तथा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा देशज संस्कृति  और मानवीय मूल्यों पर आधारित शिक्षाकेंद्र स्थापित किये जा चुके थे। दार्शनिक जद्दू कृष्णमूर्ति ने भी शिक्षा के जरिये मनुष्य निर्माण की प्रक्रिया की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए कई आवासीय विद्यालय स्थापित किये। लेकिन यह दुख की बात है कि ब्रिटिश राज से मुक्ति के बाद भारत ने शिक्षा को शुद्ध बनाने की जरूरत की अनदेखी की।

वैश्वीकरण की आड़ में शिक्षा के व्यवसायीकरण की बाढ़ के पिछले तीन दशकों के बाद  हमारे शिक्षा केंद्रों में सत्य का प्रवाह और ज्ञान का प्रकाश और कम हुआ है। आज शिक्षा व्यवस्था से जुड़े शिक्षक-शिक्षिकाओं में भी अपने विद्यार्थियों के जीवन मार्ग को सुगम बनाने के प्रति सरोकार की बजाय अपनी नौकरी की सुरक्षा की ज्यादा चिंता होती है। इनको आदर्श मानकर विद्यार्थियों में  स्वस्थ मनुष्यत्व का विकास कठिन है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के आदेश पर समकालीन शिक्षाकेंद्रों में जातीय और धार्मिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त शिक्षकों से विद्यार्थियों की रक्षा के लिए सतर्कता की समितियों की अनिवार्यता हो गयी है। हमारी छात्राओं, अध्यापिकाओं और महिला कर्मचारियों को यौन-शोषण से बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने हर सहशिक्षा केंद्र में स्त्री-पुरुषों की संयुक्त समितियों का गठन करवाया है। दूसरे शब्दों में, हमारी शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक और आध्यात्मिक स्वराज के लिए सचेष्ट व्यक्तियों के विकास में सहयोग की कोई प्रेरणा नहीं है। फिर गुरु-शिष्य परम्परा का प्रवाह कैसे बचे? कैसे बने?

 गुरु-शिष्य परम्परा की गौतम-गांधी धारा 

संभवत: महात्मा बुद्ध ने ‘गुरु-शिष्य परम्परा’ में निहित इस जटिल संभावना को पहचानकर ही अपनी जीवन के संध्या-काल में कुछ सावधानियां सुझायी थीं। बुद्ध के बाद के बौद्ध आचार्यों ने त्रि-शरण का सन्देश दिया है– बुद्ध की शरण, धर्म की शरण और संघ की शरण। लेकिन स्वयं महात्मा बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद की शंका के समाधान में आत्म-प्रकाश की जरूरत बतायी– ‘अप्प दीपो भव’। श्रेष्ठ जीवन मूल्यों, उच्च आदर्शों और सुकर्मों के जरिए अपना प्रकाश स्वयं बनो। क्योंकि सबका प्रकाश और अन्धकार अपना अपना होता है। दूसरों से मिलनेवाले प्रकाश की अपनी सीमा होती है। इस प्रबोधन में जैन परम्परा के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर की शिक्षा की गूँज भी सुनी जा सकती है।

बुद्ध और महावीर से शुरू यह धारा पिछले ढाई हजार वर्षों में गुरु नानक, संत कबीर, संत तुलसीदास जैसे संत-सुधारक गुरुओं से होती हुई गांधीजी के मार्गदर्शन और प्रशिक्षण में ‘एकादश व्रत आधारित चरित्र-निर्माण और जीवन-निर्वाह पद्धति’ के रूप में भारत और दुनिया में प्रवहमान हुई है। इसके लिए किसी व्यक्तिविशेष या ग्रन्थ-विशेष को आधार बनाये हुए भी अन्धकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की जरूरत पूरी की जा सकती है। यह भी याद रखने लायक तथ्य है कि गांधीजी ने अपने चिन्तन-दर्शन की बुनियाद में जैन तत्वचिंतक श्रीमद् राजचंद्र, आधुनिक  ऋषि लिओ ताल्स्ताय, सर्वोदय के प्रणेता रस्किन और सत्याग्रह के सिद्धांतकार हेनरी डेविड थोरो के योगदान को बराबर याद कराया है।

गुरु-शिष्य परम्परा से उत्पन्न सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक का  अपनी सिखावन को अनुयायियों की दिनचर्या में उतारकर जीवन-यात्रा को दूसरों के काम आने पर बल था। दसवें गुरु गोविन्द सिंह ने तो ग्रन्थ को ही गुरु माना। उनका निर्देश था कि आनेवाले समय में सिख धर्म के अनुयायी को ‘गुरु ग्रन्थ साहब’ के प्रकाश में जीवन निर्वाह करना चाहिए। सिख धर्म के उद्भव से शताब्दियों पहले से चले आ रहे यहूदी, ईसाई और इस्लाम के अनुयायियों में तो एक निश्चित ‘पवित्र किताब’ ही जीवन की धुरी रही है।

कबीर ने सभी मनुष्यों को ‘व्यक्ति/गुरु’ और ‘किताब’ से भी आगे जाकर परस्पर प्रेम के जरिये सहज बनाने की सीख दी। ‘पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोई, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’ के सच के साक्षात्कार और व्यवहार पर वे बल देते हैं। न व्यक्ति न किताब बल्कि हमारा सदाचार। यदि हम जीवन रूपी ‘चादर’ को अपनी उम्र भर जतन से ओढ़ेंगे तभी महाप्रस्थान के मौके पर ‘जस की तस धर दीनी चदरिया’ का सुख मिलेगा।

संत तुलसीदास को देशज लोगों का मार्गदर्शक का दर्जा दिया जाता है। उन्हें रामकथा वर्णन के बहाने आदर्श जीवन की  व्यवस्था का प्रस्तुतीकरण करनेवाला माना जाता है। तुलसी की चौपाइयों में पिता, माता, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन, पति, पत्नी, राजा, प्रजा, मित्र, शत्रु जैसी भूमिकाओं का सजीव चित्रण है। उन्होंने ‘रामचरित मानस’ में धर्म-अधर्म; नैतिक-अनैतिक; उचित-अनुचित का रहस्य राम–भरत संवाद के बहाने कुल दो कालजयी पंक्तियों में खोल दिया है : ‘परहित सरिस धरम नहीं भाईI पर-पीड़ा सम नहीं अधमाईI’

इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए महात्मा गांधी ने अपने जीवन में सत्य और अहिंसा की साधना के उद्देश्य से सत्संग और प्रयोगों के लम्बे सिलसिले के बाद एक आदर्श जीवन के लिए एकादश व्रत का महामंत्र अपनाया। हर जीवन को प्रकाशमान बनाने के लिए ग्यारह अटल निश्चय की जरूरत को प्रचारित किया। यह बुद्ध के ‘अप्पदीपो भव!’ के सूत्र का नवीनतम प्रस्तुतीकरण था।

गुरु-शिष्य परंपरा का ‘आत्म-निर्भर’ संस्करण  

अगर आज गांधीजी को देश-दुनिया में अनगिनत स्त्री-पुरुष अपना पथप्रदर्शक मानते हैं तो उसमें उनके द्वारा सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह को जीवन आधार बनाने की आत्म-आधारित सर्वोदयी सिखावन का बड़ा योगदान है। इसीलिए गांधी को अपना गुरुतुल्य मार्गदर्शक माननेवालों की लम्बी सूची में आचार्य विनोबा, ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला, दलाई लामा से लेकर जयप्रकाश नारायण, डॉ. लोहिया और आंग सान सू की के नाम शामिल हैं।

गांधीजी द्वारा प्रवर्तित ग्यारह व्रतों में परम्परा और परिवर्तन का समन्वय है। प्राचीन और अर्वाचीन का संगम है। इसके पालन में गुरु और शिष्य दोनों भूमिकाओं का ‘व्यक्ति’ में विलय हो गया है। गांधीजी की मदद से भारतीय समाज को इसका बोध हुआ कि हमारा जीवन अपने आप में एक रणभूमि है। इसकी सुंदर व्याख्या करते हुए गांधी ने गीता और महाभारत का ‘अनासक्ति योग’ के रूप में पुनर्पाठ प्रस्तुत किया। हमें कृष्ण और अर्जुन को सिर्फ महाभारत की कथा में पहचानने की आदत छोड़कर अपने अंदर तलाशने की जरूरत है। गीता के ज्ञान के प्रकाश से अपने जीवन मार्ग को पहचानने का कौशल विकसित करना ही हमारे पुरुषार्थ की कसौटी है। गीता को अपनी ‘माता’ बताने के पीछे यही मंतव्य था। आखिर अनादिकाल से हर स्त्री-पुरुष के लिए हमारी माता ही पहली ‘गुरु’ होती हैं।

गांधी की सूची में से पांच व्रत तो महर्षि पातंजलि के ‘योगसूत्र’ के पांच महाव्रत हैं – 1. सत्य, 2. अहिंसा, 3. ब्रह्मचर्य, 4. अस्तेय और 5. अपरिग्रह। इसके साथ जोड़े गए दो अन्य व्रतों – 6. अस्वाद और 7. अभय की जरूरत को भारतीय नीतिशास्त्र में बारम्बार रेखांकित किया गया है। गांधीजी ने इन सात पारंपरिक आदर्शों को चार समकालीन व्रतों के साथ जोड़कर नयी धारावाहिकता पैदा की– 8. शरीर श्रम, 9. सर्वधर्म समभाव, 10. स्वदेशी और 11. अस्पृश्यता निवारण। कालान्तर में गांधीजी ने इसमें ‘विनम्रता’ को भी जोड़ने की सलाह दी।

मानव मात्र के पूर्ण स्वराज की सिद्धि के लिए समर्पित गांधीजी ने इन ग्यारह व्रतों के आधार पर जीवन पद्धति का प्रशिक्षण देने के लिए पुरातन आश्रम परम्परा को पुनर्जीवित किया। इससे गुरु-शिष्य परम्परा को भी नवजीवन मिला। पहले दक्षिण अफ्रीका के डरबन का एक ग्रामीण क्षेत्र उनकी प्रयोग भूमि बना। फिर भारत लौटने पर अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे पहला आश्रम बनाया। गांधीजी का दूसरा आश्रम वर्धा के सेवाग्राम में स्थापित हुआ। उनके आश्रमों की देखादेखी अनेकों आश्रमों की देश-विदेश में एक श्रृंखला बन गयी।

इन आश्रमों से सुशिक्षित होकर निकले स्त्री-पुरुषों ने अपनी जीवन साधना से दिखाया कि एकादश व्रतों से सुसज्जित हर व्यक्ति में स्वराज-साधक के रूप में एक नया व्यक्तित्व निर्मित हो सकता है। एकादश व्रतों की सिद्धि से सत्याग्रही समाज का शिल्पकार बनने की क्षमता का अंकुरण सहज संभव हो जाता है। इन व्रतों को जीवन आधार बनाने वाले स्त्री-पुरुष सहज ही लिंग, नस्ल, जाति, वर्ग, धर्म, भाषा, आयु, व्यवसाय जैसे सर्वव्यापी दायरों से उपर उठते हुए मानव परिवार के आदर्श प्रतीक बन जाते हैं।

दूसरे शब्दों में, गांधीजी ने अपनी जीवन साधना के जरिये गुरु-शिष्य परम्परा को नयी आधारभूमि दी है। क्योंकि उनकी शिक्षा और आचरण से मनुष्य मात्र को इस सच का साक्षात्कार हो सका है कि : कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे बन मांहि!

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