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कोरोना और लाकडाउन के चलते हजारों बच्चे मजदूरी करने को मजबूर

by Rajendra Rajan
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19 जून। कोरोना और लॉकडाउन का सबसे अधिक असर मजदूर वर्ग पर पड़ा है। अब रोजी-रोटी के संकट से जूझ रहे हजारों बच्चे बालमजदूरी के दलदल में फंस चुके हैं।

कोरोना काल में बड़ी तादाद में बच्चों ने अपने मां या बाप में से किसी एक या दोनों को ही खो दिया है। जिसके चलते उनपर घर चलाने की जिम्मेदारी आ गई है। वहीं कोरोना के चलते बंद पड़े स्कूलों की वजह से रोजगार के लिए बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं।

इसके फलस्वरूप हजारों बच्चे बाल मजदूर बनने को मजबूर हैं। भयावह तथ्य यह है कि अगर इस सिलसिले को यहीं नहीं रोका गया और हालात में सुधार नहीं होता है तो बाल मजदूर बनने वाले बच्चों और बढ़ जाएगी और यह यहां तक बढ़ जा सकती है जिसका किसी को भी अनुमान नहीं होगा।

कुछ दिनों पहले यूनिसेफ ने एक आंकड़ा जारी किया था। इस आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में 2016 में 9 करोड़ 40 लाख बाल मजदूर थे। यह संख्या अब बढ़ कर 16 करोड़ हो चुकी है।

यूनिसेफ के अनुमान के मुताबिक भारत में वास्तविक स्थिति भयावह होने की आंशका है। पिछले साल भर स्कूल बंद रहे, इस साल भी आधा साल खत्म हो गया, स्कूल खुलने के फिलहाल आसार नहीं दिखते।

ऐसे में 6 से 14 साल के बच्चे अपने माता-पिता की मदद करने के लिए स्कूल छोड़ कर खेती और घरेलू कामों में लग चुके हैं। ऐसे बच्चों में से ज्यादातर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के हैं।

महाराष्ट्र में बाहर से आए परिवारों की बात करें तो ऐसे परिवार 30 लाख से ज्यादा हैं। जबकि राज्य में बाहर से आनेवाले परिवारों की संख्या 90 लाख है। उनके साथ उनके बच्चे हैं। इन बच्चों के बाल मजदूर बनने की संभावनाएं ज्यादा हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार एक राज्य से दूसरे राज्यों में पलायन करने वाले मजदूर परिवारों के साथ 5 से 9 साल की उम्र के कुल बच्चे और बच्चियों की संख्या 61.14 लाख है। यह कुल स्थानांतरित हुए मजदूर परिवारों के सदस्यों की संख्या का 9.57 प्रतिशत है।

इसी तरह 10 से 14 साल की उम्र वाले ऐसे बच्चों की संख्या 34.20 लाख है जो कुल स्थानांतरित हुए मजदूर परिवारों के सदस्यों की संख्या का 5.36 प्रतिशत है। 15 से 20 साल की उम्र के बच्चों की संख्या 80.64 लाख है। बात अगर उत्तर प्रदेश की करें तो राज्य में 21,76,706 बाल मजदूर हैं। इनमें से करीब 60 फीसदी सीमान्त मजदूर थे। शेष 9 लाख बच्चे मुख्य मजदूर थे जो कि 6 महीने से ज्यादा समय के लिए मजदूरी कर रहे थे।

यूपी के साथ ही अन्य प्रदेशों की बात करें तो बाल मजदूरों की संख्या पिछले दो दशक में बढ़कर 16 करोड़ हो गई है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, बाल मजदूरी को रोकने की दिशा में प्रगति 20 साल में पहली बार रुकी है। 2000 से 2016 के बीच बाल श्रम में बच्चों की संख्या 9.4 करोड़ कम हुई थी। मगर 2016 के बाद से बाल मजदूरों की संख्या में 84 लाख का इजाफा हुआ है।

वहीं आरटीआई की जानकारी के अनुसार, 6 से 14 साल की उम्र के 1.75 लाख बच्चे और बच्चियां स्थानांतरित होने की वजह से शिक्षा से वंचित रहे हैं। इन बच्चों की जगह स्कूल में है लेकिन स्कूल बंद होने और आर्थिक तंगी की वजह से कई बच्चे कामों में व्यस्त हो गए, जिसे बाल मजदूरी कहते हैं।

बाल श्रम विभाग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 2017 से 2020 के बीच 637 बाल मजदूरों को मुक्त करवाया गया है। 228 लोगों पर केस दर्ज किया गया।

(workersunity.com से साभार )

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