दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ का चुनाव : नये नेतृत्व की चुनौतियाँ

0

— शशि शेखर प्रसाद सिंह —

भारत के सबसे प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ (डूटा) का द्विवार्षिक चुनाव अगस्त के अंतिम सप्ताह में होने के बजाय महामारी के कारण तीन महीने विलंब के बाद संविधान दिवस पर 26 नवंबर को होने जा रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ देश के सबसे शक्तिशाली शिक्षक संगठनों में एक है। इसके निर्वाचन की विशेषता यह है कि शिक्षक संघ विश्वविद्यालय के 86 विभागों और 91 महाविद्यालयों के अपने सदस्यों से प्राप्त द्विवार्षिक सदस्यता शुल्क से चुनाव आयोजित करता है और चुनाव के स्वतंत्र तथा निष्पक्ष संचालन के लिए विश्वविद्यालय के ही किसी सम्मानित प्रोफेसर को सर्व सहमति से निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करता है जो इस द्विवर्षीय निर्वाचन का स्वतंत्र रूप से संचालन करते हैं।

इस बार विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर उज्ज्वल सिंह को पुन: निर्वाचन अधिकारी बनाया गया है। प्रो सिंह लगातार दो बार निर्वाचन अधिकारी रह चुके हैं। इस निर्वाचन में भाग लेने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी विभागों के शिक्षक तथा सभी कॉलेजों के शिक्षक से लेकर प्रिंसिपल तक स्वैच्छिक रूप से सदस्यता ग्रहण करते हैं और निर्वाचन में हिस्सेदारी करते हैं।

इस निर्वाचन में शिक्षक संघ के अध्यक्ष सहित कार्यकारिणी के 15 सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन होता है। अध्यक्ष का चुनाव शिक्षक मतदाताओं के ‘एक शिक्षक एक मत’ के आधार पर होता है और सभी उम्मीदवारों को प्राप्त मतों में से अधिक मत प्राप्त करनेवाला निर्वाचित घोषित होता है। कार्यकारिणी के 15 सदस्यों के निर्वाचन के लिए प्रत्येक शिक्षक मतदाता को कुल 15 मत होते हैं। शिक्षक मतदाता के द्वारा 15 मतों का उम्मीदवारों में विभाजन किया जा सकता है या किसी एक उम्मीदवार को एकमुश्त 15 मत दिया जा सकता है। मतगणना के पश्चात ऊपर के 15 अधिकतम मत प्राप्त उम्मीदवारों को कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। सामान्यतः 9 से 10 हजार शिक्षकों में तदर्थ, अस्थायी तथा स्थायी, सभी शिक्षक मतदाता होते हैं। निर्वाचन दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर के कला संकाय भवन में होता है।

इस वर्ष का निर्वाचन कोरोना महामारी के महासंकट के कारण तीन महीने विलंब से हो रहा है। कोरोना वैश्विक महामारी के कारण देश के साथ-साथ दिल्ली विश्वविद्यालय को भी अभूतपूर्व मानवीय नुकसान सहना पड़ा है। विगत वर्ष 2020 के 16 मार्च के बाद अब तक विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के लिए प्रत्यक्ष क्लासरूम शिक्षण कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया है और किसी प्रकार आभासी माध्यम से शिक्षण कार्य हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय और संबंधित महाविद्यालयों में शिक्षकों की अनुपस्थिति में निर्वाचन में उम्मीदवारों के द्वारा प्रचार कार्य करना सर्वथा मुश्किल कार्य होने जा रहा है। महामारी की तीसरी लहर की आशंका और संबंधित सुरक्षा कारणों से निर्वाचन में कम मतदान होने की आशंका भी व्यक्त की जा रही है।

इस चुनाव में डूटा के समक्ष शिक्षक हित तथा उच्चतर शिक्षा से संबंधित विभिन्न मांगें और चुनौतियां हैं। विगत 11 वर्षों में शिक्षकों की जो पदोन्नति रुकी हुई थी वह डूटा के निरंतर सामूहिक संघर्ष और अथक प्रयास तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के सहयोगात्मक रुख के कारण पिछले वर्ष अगस्त के बाद प्रारंभ हुई और बहुत तेजी से वर्षों से लंबित पदोन्नतियां हुईं, हो रही हैं, किंतु बची हुई पदोन्नति को तेजी से करवाने की जिम्मेदारी डूटा के नये नेतृत्व की होगी। डूटा के नेतृत्व में शिक्षकों के लंबे संघर्ष के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के महाविद्यालयों में शिक्षकों के प्रमोशन में प्रोफेसर की व्यवस्था सातवें वेतन आयोग के आधार पर निर्मित यूजीसी की 2018 की सेवा शर्तों के आधार पर लागू हुई है। यद्यपि पांचवें वेतन आयोग में भी डूटा की मांग के कारण महाविद्यालयों में पदोन्नति के लिए प्रोफेसर की व्यवस्था थी और रामजस कॉलेज में एक शिक्षक पदोन्नत होकर प्रोफेसर भी बना दिये गये थे किंतु उसके बाद महाविद्यालयों में प्रोफेसर के रूप में पदोन्नति यूजीसी और सरकार के फैसले के कारण रुक गयी।

छठे वेतन आयोग में प्रोफेसर की पदोन्नति की व्यवस्था तो थी किंतु प्रोफेसर की नियुक्ति में कई प्रतिबंधों के कारण डूटा ने इसे स्वीकार नहीं किया। परिणामतः एक भी नियुक्ति नहीं हो पायी लेकिन सातवें वेतन आयोग पर आधारित यूजीसी की सेवा शर्तों में बिना किसी कोटा के पदोन्नति का प्रावधान आया और आखिरकार अगस्त 2020 में विश्वविद्यालय के द्वारा अधिसूचना जारी होने के बाद प्रोफेसर की पदोन्नति तेजी से प्रारंभ हो गयी।

तदर्थ शिक्षकों के लिए समायोजन

इस वर्ष डूटा के नये नेतृत्व के समक्ष जो सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौती होगी वह है 5000 से अधिक तदर्थ तथा अस्थायी शिक्षकों को स्थायी कराना। वर्षों से दिल्ली विश्वविद्यालय के महाविद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों पर नियमित स्थायी नियुक्ति न होने से पांच हजार से अधिक पद रिक्त पड़ें हैं। 2015 में लगभग 800 स्थायी नियुक्तियां हुईं और अभी इसी वर्ष कुछ महीने पहले कुछ विभागों में कुछ स्थायी नियुक्तियां हुईं किंतु लगातार शिक्षकों के सेवा से अवकाश ग्रहण करने और वर्कलोड बढ़ने के कारण तदर्थ शिक्षकों की संख्या में तेजी से वृद्धि होती जा रही है। इसीलिए डूटा ने इसका एकमुश्त समाधानन निकालने के लिए तदर्थ तथा अस्थायी शिक्षकों को एक विशेष प्रावधान के तहत आरक्षित पदों के रोस्टर का पालन करते ही एकमुश्त स्थायी रूप में समायोजित करने का प्रस्ताव सरकार के समक्ष दे रखा है।

यदि तदर्थ व्याख्याताओं की हजारों की संख्या देखी जाए और दिल्ली विश्वविद्यालय के 86 विभागों और 91 महाविद्यालयों के विभागों की संख्या देखी जाए और उसके लिए स्थायी नियुक्तियां करने की सामान्य प्रक्रिया का पालन किया जाए तो निसंदेह वर्षों लग जाएंगे। ऐसी स्थिति में विगत 10 साल से अधिक, और कई जगह उससे भी अधिक समय से जो नियुक्तियां नहीं हो पायीं उसके कारण पहले ही दिल्ली विश्वविद्यालय में तदर्थ व्याख्याताओं की समस्या एक गंभीर समस्या बन चुकी है। ऐसे में यथाशीघ्र इन तदर्थ शिक्षकों को स्थायी करने के लिए समायोजन की प्रक्रिया ही एक तात्कालिक व्यावहारिक समाधान है।

महाविद्यालयों में स्थायी प्राचार्य के खाली पद

दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या विभिन्न महाविद्यालयों में वर्षों से प्राचार्यों के पदों की रिक्तियां हैं और प्राचार्यों की स्थायी नियुक्ति न होने से कॉलेज के प्रशासन और शैक्षणिक कार्यों में स्थिरता और उसकी गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती है। यूजीसी और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रावधानों के अनुसार स्थायी प्राचार्य का एक बार में निर्धारित कार्यकाल 5 वर्ष है किंतु कई महाविद्यालयों में अस्थायी प्राचार्य मजे से 5 वर्ष से अधिक कार्यकाल पूरा करके अभी भी पदासीन हैं और मनमानी भी कर रहे हैं। विवेकानंद महिला कॉलेज की प्राचार्या इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। इसलिए स्थायी प्राचार्य की नियुक्तियां कराना डूटा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष तथा कार्यकारिणी सदस्यों के समक्ष एक विकट चुनौती होगी।

तदर्थ तथा अस्थायी शिक्षक का अनुभव

तीसरी समस्या लगातार तदर्थ शिक्षकों के लंबे कार्यकाल के कारण पदोन्नति में उनके तदर्थ तथा अस्थायी शिक्षक के अनुभव का पहले प्रमोशन के बाद नहीं जुड़ना है। यद्यपि तदर्थ तथा अस्थायी शिक्षकों के अनुभव सातवें वेतन आयोग के बाद यूजीसी रेगुलेशंस 2018 में शिक्षक सेवा की प्रथम पदोन्नति में तदर्थ और अस्थायी शिक्षकों के अनुभव को शामिल किया गया है किंतु हजारों तदर्थ शिक्षक और कई अस्थायी शिक्षक जो काफी लंबे समय से पढ़ा रहे हैं और उनका अनुभव तदर्थ तथा अस्थायी व्याख्याता के रूप में काफी लंबा है उन्हें इस प्रावधान से पदोन्नति में उचित लाभ नहीं मिल पाएगा। इसलिए आवश्यक है कि कम से कम द्वितीय पदोन्नति में अर्थात 8000 एजीपी तक तदर्थ और अस्थायी शिक्षकों के अनुभव को पदोन्नति में शामिल किया जाए और उन्हें इसका लाभ मिले। यह जानकारी मिली है कि डूटा के पदाधिकारी यूजीसी के अधिकारियों से मिले थे और उन्होंने पूरी संजीदगी से इस मुद्दे को यूजीसी के अधिकारियों के सामने रखा और यूजीसी अधिकारियों ने इसपर विचार करने का आश्वासन दिया।

महिला तदर्थ शिक्षक के लिए मैटरनिटी अवकाश

चौथी महत्त्वपूर्ण चुनौती यह होगी कि महिला तदर्थ शिक्षकों के लिए लंबे समय से‌ चली आ रही मैटरनिटी अवकाश की मांग को पूरा कराया जाए। डूटा के द्वारा लंबे समय से यह मांग हो रही है किंतु आजतक यूजीसी और दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन इस अति जरूरी मांग की अनदेखी कर रहे हैं। परिणामतः सैकड़ों विवाहिता तदर्थ शिक्षिकाओं के सामने यही चारा रह जाता है कि या तो वो तदर्थ शिक्षिका बनी रहें और मातृसुख के नैसर्गिक अधिकार से वंचित रहें या तदर्थ शिक्षिका की नौकरी खोकर मातृसुख के अधिकार को पाएँ।

विभागों में पीएच.डी की अनिवार्यता से छूट

पांचवीं समस्या यूजीसी रेगुलेशंस 2018 में विश्वविद्यालय के विभागों में तीन वर्ष के बाद यानी 2021 के जुलाई के बाद असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए पीएच.डी की डिग्री की अनिवार्यता के कारण कई तदर्थ शिक्षक जो वर्षों से बिना पीएच.डी के पढ़ा रहे हैं उनके लिए स्थायी नियुक्ति में आवेदन भरना संभव नहीं हो पाएगा। इसके परिणामस्वरूप कई तदर्थ शिक्षक विश्वविद्यालय के विभागों में तदर्थ व्याख्याता पद से हटा दिए जाएंगे। इसका दुष्परिणाम अभी से दिखाई देने लगा है। इसलिए डूटा के नये नेतृत्व को यूजीसी से किसी भी स्थिति में 2021जुलाई के बाद के पीएच.डी डिग्री की बाध्यता को कुछ वर्षो के लिए आगे बढ़ाना जरूरी है ताकि विभागों में तदर्थ शिक्षक के रूप में कार्य करनेवाले शिक्षकों को स्थायी नियुक्ति में आवेदन करने का अधिकार मिल सके और उन्हें भी समायोजन होने पर लाभ मिल सके।

दिल्ली सरकार के 12 महाविद्यालयों में वित्तीय संकट

छठी चुनौती भी बहुत गंभीर है। दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत दिल्ली सरकार के द्वारा शत-प्रतिशत वित्तपोषित 12 कॉलेजों में लगातार शिक्षक तथा गैर-शिक्षक कर्मचारियों को नियमित वेतन नहीं मिल पा रहा है। इसके परिणामस्वरूप कोरोना महामारी के बीच भी शिक्षकों तथा गैर-शिक्षक कर्मचारियों को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। डूटा के लगातार संघर्ष के बावजूद इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। इसलिए डूटा के नए नेतृत्व के सामने यह गंभीर चुनौती होगी कि इन 12 कॉलेजों को या तो नियमित वित्तीय अनुदान दिल्ली सरकार से मिलना सुनिश्चित कराए या इन 12 कॉलेजों को दिल्ली विश्वविद्यालय अपने अधीन लेकर यूजीसी द्वारा शत-प्रतिशत वित्तपोषित बनाए।

नयी शिक्षा नीति का विरोध

डूटा के चुनाव में मोदी सरकार की नयी शिक्षा नीति का विरोध एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। दिल्ली विश्वविद्यालय नयी शिक्षा नीति को लागू करने के लिए आमादा है और इसके अंतर्गत अगले वर्ष से दिल्ली विश्वविद्यालय में एक और प्रयोग करने जा रहा है – स्नातक स्तर तक 4 वर्षीय कोर्स लागू करने का निर्णय। डूटा के नेतृत्व में, अपवादों को छोड़ कर, शिक्षक लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। नयी शिक्षा नीति के अंतर्गत इस 4 वर्षीय कोर्स का शिक्षा, शिक्षार्थी तथा शिक्षक हित पर बुरा प्रभाव होनेवाला है, खासकर वंचित समाज के लिए 4 वर्षीय कोर्स समय और पैसा दोनों दृष्टि से नुकसानदेह सिद्ध होनेवाला है। याद रहे कि प्रो दिनेश सिंह के कुलपति-काल में दिल्ली विश्वविद्यालय में 4 वर्षीय स्नातक कोर्स लागू कर दिया गया था और केंद्र में 2014 में एनडीए सरकार आने के बाद डूटा के विरोध के कारण मोदी सरकार को बीच में ही इसे वापस लेना पड़ा था। लेकिन अब मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में नयी शिक्षा नीति के नाम पर वही 4 वर्षीय स्नातक कोर्स पुन: दिल्ली विश्वविद्यालय पर थोप रही है। शिक्षक की दृष्टि से महाविद्यालयों में 4 वर्षीय स्नातक कोर्स में स्टूडेंट्स के दो और तीन वर्ष के बाद अध्ययन को छोड़ने से शिक्षण वर्कलोड में स्थिरता का अभाव होगा और नियुक्तियाँ प्रभावित होंगी।

डूटा के नये नेतृत्व के समक्ष इन गंभीर चुनौतियों के अतिरिक्त कुछ अन्य चुनौतियां भी हैं जिसकी ओर डूटा के नए नेतृत्व को गंभीरता से ध्यान देना होगा और उसके लिए संगठित होकर संघर्ष करना होगा। इसमें महामारी के दौर में मारे गए तदर्थ तथा स्थायी शिक्षकों के परिवारों के लिए परिवार के किसी एक व्यक्ति को नौकरी दिलाना, जिससे परिवार को आर्थिक सहायता मिल सके तथा नयी पेंशन नीति के शिक्षकों को भी सेवा अवकाश के बाद भविष्य निधि दिलाने में रुकावटों को दूर करना।

यद्यपि डूटा के नये नेतृत्व के लिए इन गंभीर चुनौतियों से पार पाना आसान नहीं होगा किंतु दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ का लंबा इतिहास संघर्ष का इतिहास रहा है, शिक्षक हितों के लिए संगठित होकर लड़ने का इतिहास रहा है। इसलिए उम्मीद है डूटा का नया नेतृत्व संघर्ष की राह पर चलकर, और आवश्यक होने पर संवाद के द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के हित के लिए निरंतर कार्य करता रहेगा। अभी अभी दिल्ली विश्वविद्यालय के नए कुलपति के रूप में प्रो योगेश सिंह नियुक्त हुए हैं! उम्मीद है नये कुलपति के नेतृत्व में दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) के साथ मिलकर सभी समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने की सार्थक कोशिश करेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here