भाषा, सिनेमा और तकनीक यानी फिल्म शास्त्र का भाषान्तरण

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— डॉ. अनुपम ओझा —

ह सही है कि सिनेमा अपने आप में एक भाषा है जो शाब्दिक भाषा के बिना सिर्फ ध्वनि और दृश्य के माध्यम से अपना कथन संप्रेषित कर लेता है। लेकिन सिनेमा का निर्माण कर रहे लोग किसी एक खास भाषा का प्रयोग करते हैं और सिनेमा में चित्रित परिवेश और संस्कृति किसी एक भाषा के अंग होते हैं। इस तरह हम भाषाई सिनेमा को पहचानते हैं। जैसे हिन्दी सिनेमा, बांग्ला सिनेमा, तमिल सिनेमा आदि।

जबतक तकनीकी शब्दों को भाषान्तरित न कर लिया जाए, किसी भी भाषा के सिनेमा का ठीक-ठीक विकास नहीं हो पाता है। पिछले बीस साल में ईरानी सिनेमा ने अपनी अलग पहचान बनायी तो उसके पीछे भी यही कारण है। उन लोगों ने सभी तकनीकी पदों का ईरानीकरण कर दिया। जैसे कैमरे के लिए वे दूरबी शब्द का प्रयोग करते हैं। इस बात को ठीक से समझने के लिए ‘अन्डर द ओलिव ट्रीज’ नामक ईरानी फिल्म को देखना चाहिए जिसे अब्बास किरोस्तामी ने निर्देशित किया है। वह फिल्म भूकम्प के बाद एक स्वतंत्र फिल्मकार के फिल्म निर्माण को केन्द्र में रखकर बनायी गयी है।

आजादी के बाद के भारतीय सिनेमा का प्रतिनिधित्व अगर बांग्ला सिनेमा ने किया तो इसका भी वही कारण है। बंगाल के फिल्म मनीषियों ने सिनेमा शास्त्र को ही बांग्ला भाषा में भाषान्तरित कर लिया।

लेकिन हिन्दी में यह काम अभी तक व्यवस्थित तरीके से नहीं हुआ। हिन्दी के भीतर इतनी भाषाएँ और संस्कृतियाँ हैं कि अंग्रेजी पदों के प्रयोग को ही सहज मान लिया गया। परिणाम ये है कि सौ साल बाद हिन्दी सिनेमा का ही हिन्गलीशकरण हो गया है। सन दो हजार के बाद छिटपुट काम हुए हैं जिनमें मनोहर श्याम जोशी की किताब ‘पटकथा लेखन’ और डाॅ.अनुपम ओझा की किताब ‘भारतीय सिने सिद्धांत’ की मुख्य भूमिका है। इन पुस्तकों में तकनीकी शब्दों का हिन्दीकरण करने के सार्थक प्रयत्न हुए हैं।

किन्तु जरूरी ये है कि सिनेमा शास्त्र को हिन्दी में उपलब्ध करवाया जाए। यह काम किसी संस्थान की मदद से ही संभव है।

सिनेमा के पुरोधा धुन्डिराज गोविंद फालके भी यही चाहते थे जैसा कि टी रंगाचारियार कमेटी के सामने दिये अपने साक्षात्कार में भी उन्होंने इस बात को बल दिया है। वे बनारस को फिल्म उद्यम का केन्द्र बनाना चाहते थे। इसके पीछे भी उनकी यही सोच रही होगी।

किसी भी सिनेमा समृद्ध भाषा में सिनेमा सीखकर आप अपनी भाषा में सिनेमा बना सकते हैं। इस रास्ते से सीखने की कुछ कठिनाइयाँ और दुष्परिणाम हैं। जैसे आप अंग्रेजी भाषा के माध्यम से जब सिनेमा शास्त्र का अध्ययन करते हैं तो मुख्य समस्या ये होती है कि जिन फिल्मों का उद्धरण दिया जाता है वे आपके परिचित भाषाई परिवेश की नहीं होती हैं। उनको देख लेने के बाद भी तथ्यगत ग्रहणशीलता की कठिनाई बनी रहती है। यदि आपने पूर्णतया ग्रहण भी कर लिया तो आप उसे अपनी भाषा संस्कृति से नहीं जोड़ पाते हैं।

नया सिनेमा दौर के कुछ महत्त्वपूर्ण फिल्म निर्देशक विदेशी सिनेमा के प्रभाव से कभी नहीं निकल पाये और यही हाल मुख्य धारा की मनोरंजन प्रधान फिल्मों का भी रहा है। आज हमारा हिन्दी से हिंगलीश सिनेमा में बदल जाना उसका ज्वलंत उदाहरण है।

मेरा मानना है कि सिनेमा शास्त्र का हिन्दीकरण बहुत जरूरी है, साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं में भी सिनेमा शास्त्र उपलब्ध होना चाहिए। जिन भारतीय भाषाओं ने विश्व सिनेमा में अपनी पहचान बनायी है उन्होंने सिनेमा शास्त्र को भी अपनी भाषा के अनुरूप गढ़ने का उपक्रम किया है। जिन भाषाओं में नहीं हुआ हो या कम हुआ हो उन्हें इसपर काम करना चाहिए।

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