दिवालिया समय में दीवाली

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— उमेश प्रसाद सिंह —

जीवन केवल बाहर-बाहर ही नहीं है। जीवन केवल भीतर-भीतर भी नहीं है। भीतर और बाहर की समन्विति में ही जीवन का प्रसार है। बाहर-बाहर का जीवन भी खण्डित है। भीतर-भीतर का जीवन भी खण्डित है। हमारी विडम्बना यह है कि हम खण्डित जीवन की विरासत का वारिस बनकर गर्व के गुमान में अकड़े पड़े हैं। डा. शम्भुनाथ सिंह के शब्दों में हम जिस सभ्यता के अनुचर बनकर इतरा रहे हैं उसकी वेदना यह है कि- जो बाहर था भीतर न हुआ, जो भीतर था बाहर न हुआ।

हम जाने कब से अपनी आँखें भीतर से फेरकर बाहर देखने में भूले हुए हैं। हम बाहर सबकुछ भरते आ रहे हैं, भीतर खाली होता जा रहा है। बाहर उल्लास के उत्सव का नृत्य रचा रहे हैं, भीतर उदासी का संगीत बज रहा है। बाहर-बाहर सामाजिकता का शंख फूँक रहे हैं, भीतर-भीतर स्वार्थ का अभिसार चल रहा है। बाहर सहिष्णुता के नारे लगा रहे हैं, भीतर असहिष्णुता की आरती उतार रहे हैं।

हमने अपनी राष्ट्रीय आजादी के बाद अपने देश के व्यापक जन-जीवन में उत्कर्ष की मंगलमय दीवाली के अनुष्ठान के लिए कई-कई तरह के दीप जलाये मगर पता नहीं हमारा कैसा दुर्भाग्य है कि उन दीपों से रोशनी हमें बहुत कम मिली, कालिख बहुत ज्यादा मिली। आज देखते हैं तो देखते हैं कि हमारा मुँह अपने ही जलाये दीपों की कालिख से काला है। लम्बी गुलामी के बाद हमने आजादी पायी। हमारे दिलों में हुलास की हिलकोर मचल उठी। हमने समूचे देश को परिवार बनाने की उत्कण्ठा में लोकतंत्र की व्यवस्था में स्थापना की। उधर हमारी व्यवस्था में लोकतंत्र स्थापित हुआ, इधर लोकतंत्र की अपने सबसे निकट इकाई संयुक्त परिवार से हमारा नाता टूट गया। हम परिवार से वंचित हो गये। हम पारिवारिकता से विलग हो गये। हम सहिष्णुता से विमुख हो गये।

पेंटिंग : श्रीकांत भट्ट

सहिष्णुता केवल हमारे देश में हिंदू और मुसलमान के बीच के संबंध के स्वरूप को देखने का शब्द नहीं है। यह तो सिर्फ स्वार्थी राजनीति का फैलाया हुआ भ्रम है। दरअसल सहिष्णुता के अभाव की कालिख हर कहीं, हर किसी के चेहरे को काला कर डालने में कामयाब हुई है। सहिष्णुता हिंदू-हिंदू के बीच भी नहीं है। सहिष्णुता मुसलमान-मुसलमान के बीच भी नहीं है। सहिष्णुता पिता-पुत्र के बीच, भाई-भाई के बीच, पति-पत्नी के बीच, गाँव-गाँव के बीच भी नहीं है। क्या यह हमारे लोकतंत्र के प्रज्वलित दीप की कालिख नहीं है, जिससे हमारा मुँह काला है।

ऐसा क्यों है? क्या पारिवारिकता का विघटन और सहिष्णुता का विलोप हमारे लोकतंत्र का मूल्य है? आदर्श है? नहीं, कत्तई नहीं। भला ऐसा कौन कह सकता है। किस मुँह से कह सकता है। फिर लोकतंत्र का ऐसा परिणाम हमें क्यों प्राप्त है? रोशनी न जाने कहाँ गुम है, कालिख हमारे आगे खड़ी है। मगर नहीं, यह हमारी चिंता का विषय नहीं है। हमारी चर्चा का विषय नहीं है। इस चिंता का रास्ता, इस चर्चा का रास्ता सत्ता के सिंहासन की ओर नहीं जाता है, इसलिए बेकार है। बेकार की बातों में कौन सर खपाए। दीवाली हो, न हो, सत्ता हाथ में होनी चाहिए। हमारे देश में जो कुछ भी होता है, सिर्फ सत्ता के लिए होता है। बाकी कुछ नहीं होना है। सो मुँह बन्द रखना ही बेहतर है।

हमारे देश में बड़ा अजीब हाल है। जिन्हें बोलना चाहिए वे चुप हैं। जिन्हें चुप रहना चाहिए वे बोल रहे हैं। बोल रहे हैं तो बोलते ही जा रहे हैं। पता नहीं क्यों? बोल रहे हैं, गला फाड़-फाड़कर बोल रहे हैं। ताल ठोंक-ठोंककर बोल रहे हैं। सीना फुला-फुलाकर बोल रहे हैं। आँख चढ़ा-चढ़ाकर बोल रहे हैं। किसलिए बोल रहे हैं, भाई? देश की दुर्दशा से दुखी होकर? असहाय और निरीह जनता की गुहार से उन्मथित होकर? नहीं, नहीं केवल अपनी हेकड़ी दिखाने के लिए। जब समूचे देश की साँसें ठठरियाये सीने में शुद्ध हवा की कमी के कारण फूल रही हों, आपका सीना छप्पन इंच का भी हो तो क्या?मगर नहीं, अपना सीना दिखाना है तो दिखाना है।

एक दीप हमने और जलाया बड़ी उम्मीद से। हमने शिक्षा का दीप जलाया। ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान के अंधकार को, अंधविश्वास के अंधकार को, संकीर्णता के अंधकार को, कुसंस्कारों के अंधकार को मिटाने के लिए। हमारी शिक्षा का प्रकाश नहीं फैला। शिक्षा की कालिख फैली। हमारी शिक्षा ने बड़े-बड़े डॉक्टर, बड़े-बड़े इंजीनियर, वकील, लेखक, पत्रकार तैयार किये। मगर वे देश के काम के नहीं निकले।

शिक्षा के कारण तो हमारे गाँव उजड़ ही गये। जिसने भी पढ़ा-लिखा गाँव को राम-राम बोलकर गाँव से निकल गया। जिसने भी पढ़ा अपने को बनाने में लग गया। अपना घर बनाने में लग गया। जो जितना पढ़ा, उसका दहेज उतना बढ़ गया। जो जितना पढ़ा उसका रोब उतना बढ़ गया। जो जितना पढ़ा उसका अंधविश्वास उतना बढ़ गया। हमारी शिक्षा ने हमारी आँखों में सिर्फ  ऐसी रोशनी भरी कि उससे केवल एक ही चीज हमें दिखाई पड़ी– अपनी तरक्की की सीढ़ी। देश अँधेरे में गुम हो गया। समाज, परिवार, पड़ोस सब अँधेरे में अदृश्य हो गया।

शिक्षा के प्रकाश ने हमारी आँखों को चौंधिया दिया। चौधियायी आँखों से केवल एक ही चीज दिखाई दे रही है- स्वार्थ के आकाश में ऊँची उठती मीनार। कौन कहता है आदमी केवल अंधकार के कारण अंधा होता है। नहीं, नहीं, आदमी प्रकाश के कारण भी अंधा होता है। प्रकाश के कारण अंधा आदमी, आँख के रहते अंधा आदमी बिना आँख के अंधे आदमी से अधिक दयनीय है। अधिक अनुपयोगी है। अधिक खतरनाक है। आज हमारे देश में, देश को, समाज को अपने स्वार्थ और अपने भ्रष्टाचार से पतन के गर्त में ढकेलने वाले सारे के सारे महान लोग शिक्षित हैं, सुशिक्षित हैं। हमारे विकास की राह में जो शिक्षा की बाधा खड़ी है, उससे पार पाने का रास्ता क्या है?

पेंटिंग : शशिकांत परिदा

हमारे शिक्षा के दीप ने इतनी कालिख उगली कि वह अपनी ही कालिख में छिप गया है। बाप रे बाप! इतनी तरह की शिक्षा, इतनी महँगी शिक्षा कि उधर देखते ही कलेजा काँप उठता है। पाँव थरथराने लगते हैं। कमर झुक जाती है। साँस उखड़ने लग जाती है। फिर भी हमारा दीवाली मनाने का हौसला पस्त नहीं हुआ है। कितना साहस है। कितना धर्य है, देश के आमजन में। इस साहस और धैर्य की अभ्यर्थना ही हमारी दीवाली की मूल पूँजी है।

हमारी सभ्यता में एक दैत्य ने बड़ा आतंक मचा रखा था, वह दहेज का दैत्य था। हमने संकल्प लिया था कि शिक्षा के प्रकाश के प्रसार में इसे हम विवेक के अस्त्र से मार डालेंगे। मगर नहीं हुआ, जो हुआ वह बिलकुल उसका उलटा हुआ। हर शिक्षित आदमी दहेज का सेवक बन गया। वह और अधिक बलवान हो उठा। हम मारने चले थे दहेज को, हम मारने लगे अपनी बेटियों को। अपनी बेटियों को मारकर हम अपनी समझदारी के लिए अपनी पीठ ठोंक रहे हैं। हमारा समय अपने वात्सल्य के हत्यारे बापों का अपराधी समय बन गया है। अब बात केवल लड़कियों की नहीं है, अब तो असमर्थ और निरीह बाप अपने लड़कों की परवरिश में असहाय क्रूरता के अभियुक्त बनने को अभिशप्त हैं। हमारे समय में  बाप बनना भी इतना मुश्किल क्यों हो उठा है? फिर भी…..। फिर भी दीवाली हमको मनानी है। हम मनाएंगे।

हमारी समस्या यह नहीं है कि दीवाली के प्रति मन में किसी तरह की उदासीनता भर आयी है। नहीं, ऐसा कत्तई नहीं है। दीवाली के प्रति हमारी आस्था तनिक भी मलिन नहीं हुई है। हमारा उत्साह तनिक भी मंद नहीं पड़ा है। प्रकाश के प्रति, प्रकाश पर्व के प्रति हमारी निष्ठा तनिक भी विचलित नहीं हुई है। होगी भी नहीं। उजाले की उपासना तो हमारी अचूक विरासत है। इसे हम छोड़ेंगे नहीं। इसे छोड़कर हमारा होना हो ही नहीं सकता।

हम और कुछ बचा पाएँ न बचा पाएँ कोई हर्ज नहीं। मगर हमें अपने सीने में थोड़ी आग और आँख में थोड़ा पानी बचाये रखना ही होगा। इसे बचाये रखे बिना हमारा बचे रह पाना संभव नहीं है। पारस्परिकता की गरमाहट और आत्मीयता की ठंडक के बिना मनुष्य अपदार्थ है। अपदार्थ आदमी विध्वंस का चाहे जितना भीषण विस्फोटक गढ़ ले, सृजन का दीप कभी नहीं जला सकता।

हमारी पारस्परिकता इस कदर ढह गयी है कि हमारे गाँव में भी मुर्दा ढोनेवाले आदमी नहीं बचे। मुर्दा, मुर्दा क्या ढोएगा। हमारी आत्मीयता इस कदर सूख गयी है कि हमारी आँखों में आशंका के अलावा कुछ है ही नहीं। हमारी आँखें केवल दूसरों को आँख दिखाने को रह गयी हैं। हमारे पैर केवल किसी को रौंदने के लिए रह गये हैं। हमारे हाथ केवल कुछ हथियाने के काम के रह गये हैं। सच कितना खौफनाक है। हर आदमी, दूसरे आदमी को दुहने की फिराक में पागल है।

हमारे समय में सभ्यता के वेश में पाशविकता हमारे भीतर पैठकर हमारे हृदय के सिंहासन पर विराजमान है। हमारे पंजे हमारे अनजाने ही हिंसक और खूनी बन गये हैं। शिक्षा की शक्ल में स्वार्थ ने हमारी आन्तरिकता की सारी जगह हथिया ली है। सेवा का बाना धारण कर भोग की बुभुक्षा द्वार-द्वार अलख जगा रही है। लोकतंत्र के देश में लोभ और लूट का नंगा नाच हर कहीं अपने रंग में है। नहीं, नहीं, हमारे समय में कोई भी अपने वेश में नहीं है। हर जगह किसी और के वेश में कोई और बैठा है। दिन-दोपहरी के उजाले में भी कुछ भी पहचान पाना मुश्किल है। राजा की शक्ल में कोई बैठ जाय कोई फर्क नहीं, साम्राज्य तो केवल पाखण्ड का है।

हमारे पाखण्ड ने हमारे समय को दिवालिया बना दिया है। पाखण्ड के राज्य ने हमारे समय के सारे सत्त्व को चूसकर दिवालिया बना दिया है। सब कुछ है मगर कुछ भी नहीं है। सब भरा-भरा है मगर सब खाली है। हमारे पास कुछ था, जो खो गया है। हमारी दीवाली लोभ और लाभ की दीवाली नहीं है। यह पर्व शुभ और लाभ की आराधना का पर्व है। अंतर और बाहर को साथ आलोकित करने की उपासना का पर्व है।

हमें दीवाली मनाने के लिए अपने दीपों की जाँच ठीक से करनी होगी। हमें अपने दीपों की बाती को सुधार कर ठीक करना होगा। पवित्र घृत से भरना होगा। दीये ठीक होंगे, बाती ठीक होगी, घृत ठीक होगा तो कालिख नहीं बनेगी। रोशनी उठेगी और हमारे अंदर-बाहर को आलोकित करेगी।

हमारे जले हुए दीप झुककर अनजले दीप को गले लगें तो वे भी जल उठेंगे। दीप से दीप जलाने से हमारी दीवाली जगमगा उठेगी। जले हुए दीपों के साथ-साथ होने से ही, पंक्तिबद्ध होने से ही, समूहबद्ध होने से ही दीवाली का होना सार्थक होता है।

हमारी जाति अलग-अलग हो कोई हर्ज नहीं। हमारा धर्म अलग-अलग हो कोई हर्ज नहीं। हमारी भाषा अलग-अलग हो कोई हर्ज नहीं। बस हम प्रकाशित हों, अपने देश की जमीन पर पंक्तिबद्ध हों, समूहबद्ध हों, हमारी दीवाली का गौरव अक्षुण्ण रहेगा।

हमारी विरासत दिवालिया विरासत नहीं है। हमारी विरासत दीवाली की विरासत है। हमारी विरासत उजाले की जगमग विरासत है। हमें अपने दिवालिया समय के माथे पर दीवाली की विरासत लिखनी है।

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