त्रिपुरा में भय का राज – लॉयर्स फॉर डेमोक्रेसी

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3 नवंबर। वकीलों के एक समूह लॉयर्स फॉर डेमोक्रेसी ने हाल ही में त्रिपुरा में मुस्लिम विरोधी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, जांच की और अपनी तथ्य खोज रिपोर्ट जारी की। विभिन्न संगठनों से संबंधित वकीलों का नेतृत्व भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता एहतेशाम हाशमी ने किया और त्रिपुरा में मुस्लिम विरोधी हिंसा से बचे लोगों से मिलने पहुंचे। एक नवंबर को अगरतला और नई दिल्ली में एक साथ रिपोर्ट जारी की गयी।

रिपोर्ट 1947 के बाद के क्षेत्र के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को ट्रैक करती है। यह इस क्षेत्र के इतिहास को याद करती है कि यह 9 सितंबर, 1949 था, कि “त्रिपुरा की रानी ने भारत के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिसके कारण यह C स्टेट के रूप में भारत का एक हिस्सा बन गया। नवंबर 1956 में इसे केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था। त्रिपुरा में एक समृद्ध संस्कृति है और त्रिपुरी, रंग, चकमा, गारो, कुकी, उचौई, मणिपुरी और मिजो जैसी लगभग 19 जनजातियों का घर है। रिपोर्ट के अनुसार, त्रिपुरा में “एक स्वतंत्र देश की असफल मांग को लेकर आदिवासी विद्रोह और सशस्त्र विद्रोह का लंबा इतिहास रहा है और गैर-आदिवासी बंगालियों पर आदिवासी समुदाय को अल्पसंख्यक में बदलने का आरोप लगाकर हमला होता रहा है।”

हालाँकि, त्रिपुरा में कभी भी (1992 में जब बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था तब छिटपुट घटनाओं को छोड़कर) हिंदू-मुस्लिम झगड़े नहीं हुए। लेकिन यह 2019 में बदल गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “बैदादिगीह में एक संगठित भीड़ ने मस्जिदों और मुसलमानों पर हमला किया।” 2018 में भारतीय जनता पार्टी ने सीपीएम के नेतृत्व वाली वाम सरकार को हराया था जो राज्य में 25 वर्षों से सत्ता में थी।

अब मुसलमानों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है?

रिपोर्ट के अनुसार, त्रिपुरा में मुसलमानों की संख्या लगभग 3,60,003 है जो कुल आबादी के दस प्रतिशत से भी कम है। जब विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने बांग्लादेश में दुर्गा पूजा समारोह के दौरान हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के विरोध में राज्य भर में रैलियां आयोजित कीं, तो त्रिपुरा प्रभावित हुआ। कथित तौर पर त्रिपुरा में विश्व हिंदू परिषद, हिंदू जागरण मंच और बजरंगदल द्वारा रैलियों का आयोजन किया गया था। इनमें से कुछ “पुलिस के साथ संघर्ष और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के घरों, दुकानों और मंदिरों में तोड़फोड़” के साथ समाप्त हुए।

फैक्ट फाइंडिंग टीम बनाने वाले वकीलों ने हिंसा से प्रभावित कुछ लोगों से बात की। अमिरुद्दीन मोहम्मद युसूफ रवा बाजार में 20 साल से एक किराना दुकान चलाते थे जिसे जला दिया गया। उन्होंने कहा कि उन्हें छह लाख रुपये का नुकसान हुआ है और भले ही वह आगजनी करने वाले का नाम जानते हों, लेकिन शिकायत करने से हिचक रहे हैं क्योंकि उन्हें और हमलों का डर है।

एक अन्य सर्वाइवर मोहम्मद आमिर हुसैन, जो रवा बाजार, पानीसागर में इलेक्ट्रॉनिक्स बेचने वाली एक दुकान चलाते हैं, ने कहा कि उनके हिंदू पड़ोसी माणिक देबनाथ ने दंगाइयों को तर्क दिया कि अगर हुसैन की दुकान में आग लगा दी गयी तो बगल में उनका अपना घर जल जाएगा। इसलिए दंगाइयों ने दुकान में आग तो नहीं लगायी बल्कि वहां से लैपटॉप, पानी की मोटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान लूट लिया, अंदर तोड़फोड़ की और दुकान के बाहर स्टॉक को जला दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि उनका दावा है कि उन्हें लगभग दस लाख रुपये का नुकसान हुआ है, लेकिन सरकार ने उन्हें केवल 26,800 ₹ मुआवजा दिया है। माणिक देबनाथ का पड़ोसी हिंदू परिवार भी दंगाइयों के खौफ में जी रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नौ दुकानों को निशाना बनाया गया और तीन घर क्षतिग्रस्त हुए। हालांकि, कई लोगों को अभी तक कोई मुआवजा नहीं मिला है, वकीलों ने दावा किया।

रिपोर्ट के मुताबिक 12 मस्जिदों को भी निशाना बनाया गया है। उन्हें कई तरह की हिंसा और अपवित्रता का सामना करना पड़ा है। ये हैं :

1. कलाम चूड़ा मस्जिद

2. बेलवार चार मस्जिद

3. नरवर पूरब टीला मस्जिद

4. चंद्रपुर मस्जिद

5. कृष्णा नगर मस्जिद

6. उदयपुर काकरबन मस्जिद

7. चुम्हानी मस्जिद

8. फोर्ट सिटी जामा मस्जिद

9. कुमार घाट पाल बाजार मस्जिद

10. धर्मनगर मस्जिद

11. पनीसागर सीआरपीएफ मस्जिद

12. मस्जिद रवा चमटीला पानीगढ

वकीलों के समूह ने कहा है कि त्रिपुरा में नवंबर में स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं, और हिंदुओं व मुसलमानों के बीच “राजनीतिक लाभ लेने के लिए” दरार पैदा की गयी है। फैक्ट फाइंडिंग टीम का दावा है कि “अगर पुलिस और प्रशासन ने सख्ती से स्थिति को संभाला होता तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था।” उन्होंने आरोप लगाया कि त्रिपुरा में हिंसा भड़कने से चार दिन पहले, “जमात-ए-उलेमा (हिंद) के सदस्यों ने मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देव से मुलाकात की और उन्हें संभावित अशांति से अवगत कराया जिसकी उन्हें आशंका थी।” वकीलों ने आरोप लगाया कि कोई निवारक कार्रवाई नहीं की गयी।

उन्होंने अन्य बातों के अलावा मांग की है कि सरकार “उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन करे और पूरी घटना की जांच करवाए” और “पीड़ितों की शिकायत पर अलग से प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा है कि अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करनेवाले पुलिस अधिकारियों को “तुरंत उनके पद से हटा दिया जाना चाहिए।” समूह ने यह भी कहा है कि “सरकार को अपने खर्च पर आगजनी और तोड़फोड़ में क्षतिग्रस्त धार्मिक स्थलों का पुनर्निर्माण करना चाहिए” और “झूठे व भड़काऊ संदेश बनाने और उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, और उन व्यक्तियों तथा संगठनों के खिलाफ भी, जो बार-बार लोगों को भड़काते हैं और रैली के लिए हंगामा करते हैं।

(सबरंग हिंदी से साभार)

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