युवा-संगठन ट्रेड यूनियन से अधिक क्रांतिकारी साबित हो सकते हैं

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किशन पटनायक (30 जून 1930 – 27 सितंबर 2004)


— किशन पटनायक —

र्थिक दृष्टि से युवा-विद्यार्थियों की हालत औद्योगिक मजदूरों से बेहतर नहीं है। औद्योगिक मजदूरों में कम-से-कम रोजगार की सुरक्षा आ गयी है, युवा-समूह के लिए कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं है। जिस अनुपात में औद्योगिक मजदूर को रोजगार और पदोन्नति की सुरक्षा मिल जाती है, जिस अनुपात में उसके पास जमीन या कोई छोटा-मोटा धंधा परिवार के लिए हो जाता है, उस अनुपात में वह सर्वहारा नहीं रह जाता है। निम्नमध्यम वर्ग की श्रेणी में आ जाता है। 

युवा-विद्यार्थी समूह भी परिवार की ओर से निम्नमध्य वर्गीय होता है। लेकिन संयुक्त परिवार के आश्रय को हटाकर देखें तो उसकी आर्थिक सुरक्षा मजदूरों से कम है।

भारत जैसे मुल्क में बेरोजगारी की गणना जान-बूझ कर नहीं की जाती है। शायद किसी भी गरीब औपनिवेशिक समाज में नहीं की जाती है क्योंकि इससे यह भयंकर तथ्य उद्घाटित हो जाएगा कि युवाओं में 75 फीसदी बेरोजगार या अर्ध-बेरोजगार हैं। संयुक्त परिवार, अनावश्यक पढ़ाई, समाजविरोधी कार्य और आंशिक रोजगार के परदे के पीछे यह तथ्य छुपा हुआ है।

इसका मतलब है कि इन औपनिवेशिक समाजों का युवा समूह न सिर्फ एक सामाजिक तबका है, बल्कि एक वर्ग है। यह एक दूसरा सर्वहारा है। उत्पादन व्यवस्था के अंदर भी इसका स्थान नहीं है। यह एक बहिष्कृत समूह है। यह अपनी सेवा और श्रम बेचकर ही मनुष्य की जिंदगी जी सकता है, लेकिन पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था में यह क्षमता नहीं है कि इस विशाल समूह को अपने अंदर ले सके, उसे रोजगार प्रदान कर सके।

मजदूरों के समान युवा-विद्यार्थी समूह भी संगठित हो सकता है। लेकिन उसको संगठित करने के लिए कोई पद्धति या कला विकसित नहीं हुई है। उसकी चेतना को क्रांतिकारी रुझान देने के लिए कोई प्रचार-प्रशिक्षण का साहित्य नहीं है जिससे वह अपनी स्थिति, अपने संख्याबल और व्यवस्था से अपने संबंध के बारे में सचेत हो। मजदूरों को उऩकी अपनी स्थिति के बारे में, उनकी क्रांतिकारी संभावनाओं के बारे में जितने शास्त्र, साहित्य और प्रचार-साधन तैयार मिलते हैं, अगर उतने प्रचार-प्रशिक्षण और संगठन की कोशिश युवाओं के बीच होगी तो युवा संगठन औद्योगिक मजदूर संगठनों से अधिक क्रांतिकारी साबित होंगे। औद्योगिक मजदूर, गरीब किसान, बेरोजगार कारीगर और औरत, इन चारों शोषित समूहों का प्रतिनिधित्व युवा संगठन कर सकता है। ये चार समूह ऐसे हैं जिनकी आर्थिक स्थिति खेतिहर मजदूर और भिखमंगों से बेहतर है। लेकिन औद्योगिक मजदूरों को छोड़कर शेष तीन तबकों की स्थिति बहुत ही शोचनीय है। ये वर्ग उत्पादक श्रम करते हैं। इनको सुरक्षा, रोजगार और बेहतर जीवन पूँजीवादी व्यवस्था के अंदर मिलना असंभव है। जबकि औद्योगिक मजदूर के लिए इनसे अधिक उम्मीद इसी व्यवस्था के अंदर है।

औद्योगिक मजदूरों को आदर्श या नमूना मानकर ये सारे समूह अपनी मौजूदा स्थिति को इसी व्यवस्था के अंदर बेहतर बनाने की कल्पना करते हैं और अपनी माँगें पेश करते हैं। देहात का किसान अपने अनाज का दाम बढ़ाना चाहता है, उसके बच्चे विश्वविद्यालय में राहत और आरक्षण की माँग करते हैं। आंदोलन यहाँ से शुरू हो जाता है। लेकिन यह समझदारी उसको कोई देता नहीं है कि उसका कोई भविष्य इस व्यवस्था में नहीं है। कम्युनिस्ट भी उसको कहते हैं कि वह बुर्जुआ है। बुर्जुआ का मतलब है कि इस व्यवस्था में उसका भविष्य है।

अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि :

(1) हमारा देश एक गरीब औपनिवेशिक समाज है, जहाँ साम्राज्यवादियों के इशारे से एक पूँजीवादी व्यवस्था चल रही है। इसका वर्ग विभाजन संपन्न पूँजीवादी देशों के वर्ग विभाजन से भिन्न है।

(2) इस समाज में सबसे असहाय तबका भिगमंगों, चोर-डाकुओं और वेश्याओं का है जिनको क्रांति के लिए संगठित नहीं किया जा सकता है।        

(3) हरिजन, आदिवासी, खेत-मजदूर समूह ही यहाँ का सर्वहारा वर्ग है जो अपना श्रम बेचता है, लेकिन जिसको रोजगार या न्यूनतम मजदूरी की सुरक्षा नहीं मिलती।

(4) छोटा किसान और छोटा कारीगर, खेत-मजदूरों से बेहतर स्थिति में हैं। छोटी संपत्ति के मालिक भी हैं, लेकिन रोजगार या निम्नतम मजदूरी की सुरक्षा नहीं है। उनकी औरतों की हालत बदतर है।

(5) औद्योगिक मजदूर की स्थिति इन सबसे बेहतर है, लेकिन तानाशाही और पूँजीवादी व्यवस्था के पूर्णरूप से स्थापित होने पर हड़ताल–आंदोलन पर पूरी पाबंदी हो जाने के बाद इनकी आर्थिक स्थिति में सुधार पूरी तरह रुक जाएगा।

(6) अतः उपर्युक्त तीन प्रकार के समूह व्यवस्था-परिवर्तन के लिए प्रासंगिक हैं। युवा-विद्यार्थी समूह का मतलब है हरिजन-आदिवासी, खेत-मजदूर, औरत, गरीब किसान, गरीब कारीगर और औद्योगिक मजदूर, इन सारे समूहों के युवा। 

मौजूदा व्यवस्था को यानी औपनिवेशिक समाज और उत्पादन के पूँजीवादी ढाँचे को उखाड़ फेंकने के लिए इन सारे तबकों का संगठित विद्रोह जरूरी है। अगर इन अलग-अलग तबकों का आंदोलन सही दिशा में संचालित होने लगेगा तो युवा-विद्यार्थी एकता अपने आप आ जाएगी।

दूसरी ओर, अगर संगठन के दायरे में युवा-विद्यार्थी एकता स्थापित हो जाती है और उनकी समझदारी बढ़ने लगती है उनके द्वारा उपर्युक्त वर्ग-आंदोलनों को संयोजित करना, सही दिशा में संचालित करना सहज हो जाएगा; क्योंकि युवा-विद्यार्थी भी उन्हीं वर्गों के हैं। युवा संगठन के इस वर्ग-संबंध को न समझने के कारण दक्षिणपंथी दलों के अनुरूप वामपंथी राजनैतिक दल भी युवा-विद्यार्थी संगठनों को अपने-अपने राजनैतिक पिछलग्गू के रूप में देखते हैं।

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