भारतीय राजनीति के दधीचि थे सुरेन्द्र मोहन : दूसरी किस्त

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— डॉ सुनीलम —

(दूसरी किस्त)

बाद में 10 साल विधायक रहते हुए भी जब भी दिल्ली जाता उनसे जरूर मिलता, सभी बातें बतलाता, मार्गदर्शन लेता। वे भारतीय समाजवादी आंदोलन के एनसायक्लोपिडिया थे। याददाश्त जबरदस्त थी। जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। शायद ही कोई सुरेंद्र मोहन जी के स्तर का नेता देश में होगा जो डीटीसी बस में चलता हो। दोनों पति-पत्नी आम लोगों की तरह धक्का खाते हुए बस में चला करते थे। बाद में उनके मित्रों ने उन्हें मिलकर एक कार भेंट की थी। बाद में वह कार भी चोरी हो गयी। सुरेंद्र मोहन जी के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 17 लाख रुपये इकट्ठा करके दिये तो उन्होंने जनता वीकलीपत्रिका (यूसुफ मेहेर अली सेंटर) को सौंप दिये। जनता सप्ताहिक पत्रिका 1946 से चलती थी, उसके लिए वे नियमित तौर पर लिखा करते थे, उसके संपादक भी थे। अखबारों में भी कॉलम लिखा करते थे। यही उनकी रोजी-रोटी का साधन था।

सुरेंद्र मोहन जी के लेखों के माध्यम से देश भर के कार्यकर्ताओं को राजनीतिक समाजवादी लाइन पता चलती थी।  धैर्य तो अद्वितीय था। सुनने की क्षमता बहुत अधिक थी। सबको समय देते थे, चिट्ठी देते थे, जरूरत हो तो मंत्री के पास भी जाने का काम करते थे। मैं वीपी हाउस में देखता था कि एक वैद्य जी बाल्मीकि समाज के नेता दूसरे सूरदास जी वे लगभग रोज सुरेन्द्र मोहन जी के कार्यालय में आते थे। मैंने उन्हें कई सालों तक धैर्यपूर्वक सुनते हुए देखा।

सुरेंद्र मोहन जी का सभी पार्टियों और राजनीतिक दलों और नेताओं के साथ संबंध था। वे सभी पार्टियों के नेताओं से सेंट्रल हॉल में लगातार मिलते थे। देश भर के जन संगठनों को सुरेंद्र मोहन जी लगातार समर्थन करते थे। वे न केवल जनसंगठनों के आंदोलनों, प्रदर्शनों में शामिल होते थे, साथ ही मंत्रियों से मुलाकात कराते थे, सिफारिशी  पत्र भी लिखते थे और उनके इलाकों में जाते भी थे। लगातार दौरा करने का काम किया करते थे। एक व्यक्ति कैसे सबकुछ एकसाथ कर सकता है यह आश्चर्य का विषय होता था। साधनहीनता तथा अस्वस्थ होने के बावजूद वे लगभग सभी कार्यक्रमों में उपस्थित रहते थे। कश्मीर के पृथकतावादी नेता हों या देश के मुस्लिम नेता,उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल या पूर्वोत्तर के असम के नेता हों या मणिपुर के नगालैंड के नेता हों, सभी से संपर्क में रहना सभी मुद्दों पर सक्रिय रहना किसी के लिए भी संभव नहीं था, लेकिन यह असंभव कार्य वे  करते थे। यह काम उन्होंने कई दशकों तक किया।

सुरेंद्र मोहन जी कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश भी लगातार  कार्यक्रमों में भाग लेने जाते थे। अंबाला के थे इस कारण पंजाब के लोगों से उनका विशेष रिश्ता था। भारत-पाकिस्तान के बीच शांतिपूर्ण संबंध बने इसका प्रयास सक्रिय तौर पर वे लगातार करते रहे। दिल्ली में जस्टिस राजिन्दर सच्चर, कुलदीप नैयर, अर्थशास्त्री एसपी शुक्ला, प्रभाष जोशी जैसे दिग्गज बराबर सुरेन्द्र मोहन जी का साथ दिया करते थे। स्वामी अग्निवेश जी सदा तैयार रहते थे किसी की भी मदद करने के लिए जो कोई सुरेंद्र मोहन जी का संदर्भ संपर्क लेकर पहुँच जाता था। दिन-रात पढ़ना और लिखना सुरेंद्र मोहन जी का मुख्य कार्य था। जॉर्ज फर्नांडिस की तरह सुरेंद्र मोहन जी भी यह चाहते थे कि सोशलिस्ट पार्टी रिवाईव हो अर्थात फिर से बने।

जब देवेगौड़ा जी ने भाजपा के साथ कर्नाटक में सरकार बना ली तो वे पार्टी से अलग हो गये। उन्होंने वीरेंद्र कुमार, केरल के साथ मिलकर अलग पार्टी का गठन किया लेकिन उस पार्टी से  अधिक समाजवादी नहीं जुड़े।  इसका उन्होंने कभी बुरा नहीं माना। देश के समाजवादी उनसे मिलने आते थे लेकिन वे किसी से भी पार्टी में शामिल होने को नहीं कहते थे। समाजवादियों की एकता बने इसका प्रयास वे लगातार करते  रहे। विशेष तौर पर जब डॉ लोहिया की जन्म शताब्दी का कार्यक्रम  बना तथा उन्हें सभी ने जिम्मेदारी दी, तब भी उन्होंने बहुत प्रयास किया। कैप्टन अब्बास अली जी की किताब  का जब विमोचन हुआ उसमें मुलायम सिंह यादव जी, रामविलास पासवान जी, रघुवंश जी, शरद यादव जी भी आए। सभी ने कहा कि सुरेंद्र मोहन जी ही एकजुटता बनाने का कार्य कर सकते हैं। उन्होंने बहुत प्रयास किया। सभी को एकसाथ बिठाने की कोशिश की, सोचा कि जन्मशताब्दी में कम से कम एक रैली एकसाथ हो जाए लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ। फिर भी जीवन के अंतिम समय तक उनका प्रयास जारी रहा।

मैंने जब डॉ लोहिया के जन्म शताब्दी वर्ष में देश भर की यात्रा का कार्यक्रम तय किया तो उन्होंने भरपूर सहयोग किया, सही कहा जाए तो जी.जी. परीख जी के बाद सर्वाधिक। जब मैंने उन्हें कार्यक्रम का रूट दिखाया, उसे देखकर उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर को क्या भारत का हिस्सा नहीं मानते, क्यों छोड़ दिया? मैंने कहा कि साधन और समय का अभाव है। उन्होंने कहा कि यदि यह राष्ट्रीय यात्रा है तो फिर उसमें पूर्वोत्तर को जोड़ा ही जाना चाहिए। उसे  छोड़कर  यह यात्रा नहीं की जा सकती। उन्हीं के आग्रह के बाद मैंने पूर्वोत्तर की दो सप्ताह की यात्रा की थी। पूरी यात्रा में  यूसुफ मेहर अली सेंटर और राष्ट्र सेवा दल के 30 युवा साथी जुड़े थे।

जब हम नगालैंड पहुँचे तब वहाँ एक पुराने समाजवादी नेता अचूमी जी मिले। उन्होंने कहा कि वे सुरेंद्र मोहन जी के कमांडर है। उनके घर में उसी दिन किसी परिवारजन की मृत्यु हो गयी उसके बावजूद उन्होंने कार्यक्रम में समय दिया। देश में यात्रा के दौरान 350 कार्यक्रम हुए। उद्घाटन से लेकर समापन तक हर  कार्यक्रम में सुरेंद्र मोहन जी ने दिलचस्पी ली। उन्होंने काफी पैसा कार्यक्रम के लिए इकट्ठा कराया।

सुरेंद्र मोहन जी के साथ मिलकर मैंने एचएमकेपी और एचएमएस के  विलय का प्रयास किया था। मैं हिंद मजदूर किसान पंचायत का राष्ट्रीय उप महामंत्री था। शरदरावउमरावमल पुरोहित जी के बीच में बार-बार बात करवाना, गिरीश पांडे जी, नागपाल जी से लगातार बात करते रहना, यह प्रयास लगातार सुरेंद्र मोहन जी ने किया। उसी का परिणाम था कि कई बार विभाजित हो चुके समाजवादियों की मजदूर आंदोलन में एक बार फिर से एकजुटता स्थापित हो गयी थी।

सुरेंद्र मोहन जी ने कई दशकों तक एचएमएस को खड़ा करने और ताकत देने की कोशिश की थी। जब जमुना प्रसाद शास्त्री एचएमएस के नेता थे, समरेंद्र कुंडू, कमला सिन्हा, मधु दंडवते जी के माध्यम से उनका यह प्रयास रहा कि मैं डब्लूसीएल (कोल माइंस) के इलाके में हिंद मजदूर सभा की जिम्मेदारी लूँ, लेकिन अपने सतत प्रयासों के बावजूद वे मुझे हिंद मजदूर सभा में शामिल नहीं करवा सके। लेकिन जाते-जाते वे मजदूर आंदोलन को एकजुट करने का ऐसा काम कर गये जो भारतीय समाजवादी आंदोलन के लिए मील का पत्थर साबित होगा। 92 लाख की सदस्यता वाली यूनियन समाजवादी विचार के साथ जुड़ी हुई हो तो उसका भविष्य अंधकारमय हो ही नहीं सकता।

इसी तरह सुरेंद्र मोहन जी ने राष्ट्र सेवा दल में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। लगातार उनका प्रयास रहता था कि नियमित रूप से राष्ट्र सेवा दल के कार्यक्रमों में हिस्सेदारी करें। राष्ट्र सेवा दल ने भी सुरेंद्र मोहन जी को परिवार के मुखिया के तौर पर सदा माना। यही भूमिका हिंद मजदूर सभा में सुरेंद्र मोहन जी की रही।

(जारी)

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