पर्यावरण आंदोलन की अम्मा – मायलम्मा

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— मेधा —

ल छह जनवरी को मायलम्मा की चौदहवीं पुण्य तिथि थी। उन्हें उनकी पुण्यतिथि पर देश, समाज और मीडिया याद करे इसकी संभावना कम ही थी। वैसा ही हुआ। कुछ यादें तो खुद धुँधला जाती हैं, लेकिन कुछ को धुँधलाने में सत्ता प्रतिष्ठान के फायदे जुड़े होते हैं। मायलम्मा को ऐसे लोग क्यों याद करें? आखिर कारपोरेटी अपराध के विरोध में चली दुनिया की एक अनूठी लड़ाई की अगुवाई की थी आदिवासी अम्मा मायलम्मा ने। मध्यवर्गीय यादों में चाहे मायलम्मा धुँधला जाएँ, मगर जो लड़ाई कोका कोला संयंत्र के खिलाफ उन्होंने शुरू की थी, वह आज भी उनके गाँव प्लाचीमाड़ा में जारी है। जिन्हें याद रखना है, वह हर हाल में यादों को सहेज लेते हैं।

मायलम्मा यानी एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने दुनिया के जाने कितने देशों पर राज करनेवाली कंपनी कोका कोला को सत्याग्रह के बूते अपने यहाँ से खदेड़ भगाया। मायलम्मा कोई पढ़ी-लिखी महिला नहीं थीं। न ही उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के बारे में कहीं से पेशेवर डिग्री हासिल की थी। लेकिन जीवन और प्रकृति के सहज संबंध को बतौर आदिवासी स्त्री वह बेहतर पहचानती थीं। इसीलिए जब उनके गाँव के कुएँ सूखने लगे तो उन्हें लगा कि कुछ गड़बड़ है। और उस गड़बड़ के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोला।

हुआ यह कि मुनाफाखोर अमरीकी कम्पनी कोका कोला बेवेरेज ने अपने नाम में हिन्दुस्तान जोड़कर केरला के पालक्कड़ जिले के प्लाचीमाड़ा गाँव में तीन जून 2000 को एक संयंत्र लगाया। तब गाँववालों को पता नहीं था कि यह संयंत्र गाँव की जिंदगी के लिए क्या गुल खिलाने जा रहा है। दो साल के भीतर ही गाँव के पानी के स्रोत सूख गये। कुंएँ जहरीले हो गये। और जिसने पानी पिया वही खाट पकड़ने लगा। प्लाचीमाड़ा की महिलाओं को पानी के लिए कई मील पैदल चक्कर काटना पड़ने लगा। लोग जान गये कि यह सब कोका कोला प्लांट लगने के कारण हुआ है। कंपनी प्रतिदिन भूजल से दस लाख लीटर पानी खींच रही थी।

मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- ‘‘तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।’’ उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर ‘‘कोका कोला विरुद्ध समर समिति’’ का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

22 अप्रैल 2002 को केरला की आदिवासी नेता सीके जानू ने आंदोलन का शुभारंभ किया। तब किसी भी राजनीतिक संगठन या सामाजिक संगठन ने इस छोटे से गाँव के लोगों को समर्थन नहीं दिया। लेकिन निरक्षर और ठेठ देहाती इस आदिवासी महिला ने ठान लिया था कि या तो हमारी जान जाएगी या कंपनी को अपने कनात, तंबू और आशियाने उखाड़ने होंगे।

पालक्कड़ जिले के इस छोटे से गाँव के लोग खेतीबाड़ी करते हैं। मायलम्मा के साथ पूरा गाँव उठ खड़ा हुआ। लेकिन कारपोरेटी दैत्यों और उनको पोसनेवाली व्यवस्था गाँव की आवाज को कहाँ बर्दाश्त करनेवाली थी! आंदोलन का दमन शुरू हुआ। आंदोलन के पचासवें दिन कारखाने के सामने सत्याग्रह पर बैठी आदिवासी महिला आंदोलनकारियों पर हमला कर दिया गया। इस हमले में सात औरतें बुरी तरह घायल हो गयीं। कइयों को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन इससे आदिवासी स्त्रियों का हौसला कहाँ पस्त होनेवाला था! धीरे-धीरे कोका कोला विरोधी आंदोलन ने जोर पकड़ लिया और देश भर के आंदोलनकारियों ने इसका समर्थन करना शुरू किय।

एनएपीएम की नेता मेधा पाटकर भी आंदोलन के समर्थन में प्लाचीमाड़ा पहुँचीं। आंदोलन को राष्ट्रीय फलक पर लाने के मकसद से मेधा पाटकर ने 26 जनवरी 2013 से प्लाचीमाड़ा से ‘अयोध्या मार्च’ शुरू किया। अब कोका कोला विरोधी आंदोलन को नजरअंदाज करना संभव नहीं था। ऐसे में ग्राम पंचायत ने कंपनी का लाइसेंस रद्द करने का फैसला किया। पंचायत हारी लेकिन राज्य सरकार कहाँ हारनेवाली थी। पंचायत ने लाइसेंस रद्द कर दिया तो राज्य सरकार ने लाइसेंस बहाल कर दिया और पंचायत के फैसले पर स्टे लगा दिया।

आंदोलन में नया मोड़ तब आया जब कोका कोला कंपनी के उत्पाद की रासायनिक जाँच प्रयोगशाला में हुई। बीबीसी की रिपोर्ट थी कि प्लाचीमाड़ा के पानी का प्रदूषण प्लांट से निकलने वाले रसायनों के कारण हुआ है। इन रसायनों में भारी मात्रा में कैडमियम और लेड पाया गया। बाद में कंपनी के उत्पाद में मिलाये जानेवाले कीटनाशक तथा सुरक्षा माँगों को लेकर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) बनी तो इस समिति ने भी कैडमियम और लेड वाली बात मानी। समिति ने 2004 के जनवरी में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

रिपोर्ट में कहा गया था कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस समिति को लिखित तौर पर बताया कि पालक्कड़ स्थित हिंदुस्तान कोका कोला लिमिटेड के संयत्र से निकलने वाले अपशिष्ट नुकसानदेह हैं। इसमें कैल्शियम की मात्रा प्रति किलो 50 मिलीग्राम से भी ज्यादा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इसी आधार पर केरला राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कहा था कि कोका कोला संयंत्र के अपशिष्ट का निस्तारण 1989 के एक खास कानून (हजार वेस्ट मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग रूल्स 1989) के तहत किया जाए क्योंकि संयंत्र के अपशिष्टों में भारी धातुओं की मौजूदगी सीमा से ज्यादा है।

इसी वक्त केरला उच्च न्यायालय में प्रदूषण और जल संसाधन के बारे में एक फैसला आया। इस फैसले में केरला उच्च न्यायालय ने भूजल का प्रयोग व्यावसायिक उद्देश्य करने पर रोक रोक लगा दी थी। अपने ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने कहा- ‘‘पुख्ता तौर पर कहा जा सकता है कि भूजल पर जनसामान्य का हक है, राज्य और उसकी संस्थाओं को इस बड़ी संपदा के न्यासी के रूप में काम करना चाहिए। राज्य का कर्तव्य है कि वह भूजल का अत्यधिक दोहन ना होने दे। यदि राज्य इस मामले में हाथ-पैर नहीं हिलाता तो इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदान किये गये ‘जीवन के अधिकार’ का उल्लंघन माना जाएगा।’’

जेपीसी और उच्चतम न्यायालय की फटकार के बाद केरला सरकार ने 17फरवरी 2004 को कंपनी से कहा कि वह व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए पानी का इस्तेमाल ना करे। 2004 की गर्मी में पूरा जनपद सूखा प्रभावित घोषित कर दिया गया और वहाँ के दो संयंत्रों में मार्च से काम बंद हो गया। कायदे से प्लाचीमाड़ा के आंदोलन को तभी बंद हो जाना चाहिए था। लेकिन प्रतिरोध की आवाज लंबे समय तक जारी रही, इस डर से कि कारखाना कहीं फिर से न खोल दे कंपनी। सालों कारखाने के बाहर आंदोलनकारी सत्याग्रह करते रहे। इस लंबे सत्याग्रह का ही नतीजा है कि प्लाचीमाड़ा की हृदयस्थली में 34 एकड़ में स्थित इस कारखाने को पिछले दिनों 600 बिस्तर वाले कोविड अस्पताल में तब्दील कर दिया गया है।

एक निरक्षर आदिवासी महिला के नेतृत्व में चला यह दुनिया का सबसे अनूठा और लंबा सत्याग्रह था। मायलम्मा की कहानी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रकृति-पर्यावरण पर संकट आए तो और कोई निकले या ना निकले, स्त्री उसकी सुरक्षा के लिए जरूर आगे आती है- चाहे वह सत्तर के दशक का उत्तराखंड का ‘चिपको आंदोलन’ हो या ‘नदी बचाओ आंदोलन’। सेज के चंगुल से रायगढ़ की धरती को बचाने का आंदोलन हो या ओड़िशा के काशीपुर की धरती के भीतर पल रही प्राकृतिक संपदा को बेपरवाह औद्योगीकरण से बचाने का।

मायलम्मा अब हमारे बीच नहीं रहीं। लेकिन उन्होंने विकास के विमर्श को नये सवाल दिये हैं। प्राकृतिक संपदा पर आखिर हक किसका हो? सदियों से प्रकृति के साथ रचे-बसे स्थानीय समुदाय का या कारपोरेटी दानवों का? अपने हक की लड़ाई का नेता कौन हो? मायलम्मा और पालक्कड़ की आदिवासी महिलाओं ने दुनिया को अच्छी तरह समझा दिया है कि प्राकृतिक संपदा पर स्थानीय समुदाय का हक है और इस हक की लड़ाई भी स्थानीय समुदाय को ही लड़ना आता है।

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