वंचितों, शोषितों के शैक्षिक उत्थान में डॉ. आंबेडकर का योगदान

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— अंकित कुमार निगम —

तीत में हिंदुत्ववादी व्यवस्था द्वारा भारत के शोषितों, वंचितों पर अगणित शास्त्रीय नियोग्यताएँ थोप दी गयीं। इनमें से प्रमुख थीं शिक्षा, संपत्ति और शस्त्र के अधिकार से वंचित किया जाना। सदियों से अशिक्षा के घोर अंधकार में रहने के बाद दलित, शोषित और वंचित समाज की मानसिक क्षमता क्षीण हो गयी। जिससे वे सभी मान-सम्मान और स्वाभिमान के प्रति संवेदनहीन हो गए। संपत्ति के अभाव में सवर्णों की गुलामी करने के लिए मजबूर हो गए, शस्त्र संचालन के अभाव के कारण दमन और शोषण के विरुद्ध विद्रोह नहीं कर पाये। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि विद्या बिना मति गयी, मति बिना नीति गयी, नीति बिना गति गयी, गति बिना वित्त चला गया अर्थात इतने सब अनर्थ सिर्फ अशिक्षा के कारण हुए।

शिक्षा के अभाव में हुई इस दुर्दशा पर सर्वप्रथम 19वीं शताब्दी के महान समाज सुधारक ज्योतिराव गोविंदराव फुले का ध्यान गया। उन्होंने दलितों, शोषितों, महिलाओं की शिक्षा के लिए जीवन भर अथक एवं क्रांतिकारी प्रयास किये। ज्योतिबा राव के बाद शैक्षिक उत्थान का कार्यक्रम आरक्षण के जनक छत्रपति शाहूजी महाराज ने आगे बढ़ाया; उन्होंने शोषितों के लिए स्कूल, छात्रावास अधिक खोले तथा सवर्णों के स्कूलों में अस्पृश्य समाज को प्रवेश दिलाया।

इसके बाद डॉ. आंबेडकर ने शैक्षिक उत्थान का जिम्मा अपने हाथों में ले लिया। डॉ. आंबेडकर को यह बात भलीभांति पता हो गयी थी कि जब तक वंचित वर्गों में शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं होगा, तब तक उनकी मुक्ति और उन्नति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति में तार्किक क्षमता का विकास होता है, जिससे व्यक्ति अच्छे-बुरे की पहचान कर पाने में सक्षम होता है। परंतु हिंदुत्ववादी व्यवस्था यह नहीं चाहती थी कि अस्पृश्य समाज पढ़-लिख सके। इसीलिए उन्होंने इस समाज को अशिक्षा के गर्त में सदियों पहले धकेल दिया था।

विदेशों से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात डॉ. आंबेडकर अपने समाज को अशिक्षा के गर्त से निकालने के लिए अति उत्सुक थे। अपने ज्ञान और विद्वत्ता की अपार शक्ति की बदौलत वह अपने समाज उद्धार करना चाहते थे। अपनी इन्हीं आकांक्षाओं के वशीभूत होकर सर्वप्रथम उन्होंने 20 जुलाई 1924 ई. को ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य था दलितों में शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार करना; स्कूल, पुस्तकालय, वाचनालय तथा छात्रावास की स्थापना करना। 1928 में डॉ. आंबेडकर ने ‘दलित जाति शिक्षा समिति’ की स्थापना की। इसके द्वारा भी शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ। मैट्रिक के छात्रों के आवास की स्थिति को सुधारने के लिए ₹2000 स्वीकृत कराए। उन्होंने यह भी महसूस किया कि सामाजिक समानता पाने के लिए उच्च शिक्षा तथा विदेशी शिक्षा बहुत कारगर साबित हो सकती है। उन्होंने श्रम मंत्री रहते हुए वायसराय लार्ड लिनलिथगो से दस दलित छात्रों को विदेशी शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति स्वीकृत करायी।

1942 ई. में गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दिए गए नारे ‘करो या मरो’ के समानांतर डॉ. आंबेडकर ने ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ का नारा दिया। इस नारे का मुख्य उद्देश्य दलित वर्गों में जोश भरना था, जो सदियों से गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए थे। इस नारे ने दलितों में जबरदस्त चेतना संचार किया।

शिक्षा के चौमुखी विकास तथा लोक कल्याण के लिए डॉ. आंबेडकर ने 20 जून 1946 को मुंबई में ‘सिद्धार्थ कॉलेज’ की स्थापना की। साथ ही औरंगाबाद में एक ‘मिलिंद कॉलेज’ की भी स्थापना की।

जब बाबासाहेब के हाथों में स्वतंत्र भारत का संविधान लिखने का काम आया तो उन्होंने शोषितों, वंचितों के शैक्षिक विकास के लिए ढेर सारे प्रावधान किये। संविधान के अनुच्छेद-45 एवं 46 में वंचित वर्ग के प्रत्येक बालक, बालिका के लिए शिक्षा अनिवार्य कर प्राथमिक शिक्षा की नींव मजबूत की। अनुच्छेद 45 में प्रावधान है कि राज्य सभी बच्चों के छह वर्ष की आयु पूरी करने तक प्रारम्भिक बाल्यावस्था की देखरेख और शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 46 से दलित एवं अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि।

प्राथमिक शिक्षा विकास की पहली सीढ़ी है। डा. आंबेडकर का मानना था कि जब तक प्राथमिक शिक्षा सर्वसुलभ नहीं की जाती है, तब तक वंचित वर्गों के लिए उच्च शिक्षा का प्रावधान व्यर्थ है। उनका मानना था कि प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए तथा बच्चों के नामांकन को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए तभी पिछड़े वर्गों की शैक्षिक स्थिति में सुधार और विकास होगा। शिक्षा को इतना सस्ता और सुगम बनाना होगा कि वह आम आदमी की पहुँच के बाहर न हो। शिक्षित होने के बाद वंचित वर्ग के छात्रों के लिए सरकारी सेवा नियुक्ति को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। डॉ. आंबेडकर की दृष्टि में प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य यह है कि प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश पानेवाला प्रत्येक बच्चा तभी स्कूल छोड़े जब वह साक्षर हो जाए। सरकार को प्राथमिक शिक्षा पर अधिक से अधिक खर्च करना चाहिए।

डॉ. आंबेडकर का मानना था कि सभी सामाजिक वर्गों के लिए समान स्तर पर शिक्षा दी जानी चाहिए। अर्थात् शिक्षा व्यवस्था में समानता होनी चाहिए। वह सार्वभौमिक और समान शिक्षा प्रणाली के समर्थक थे।

वर्तमान संदर्भ में सरकारी स्कूलों में 90 प्रतिशत बच्चे दलित समाज से हैं। बाबासाहब का मानना था कि दलित वर्ग के बच्चों की शैक्षणिक देखभाल के लिए विशेष निरीक्षण की आवश्यकता है। ‘बोम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल’ के सदस्य के रूप में डॉ. आंबेडकर ने शिक्षा के लिए अनुदान बिल पर बहस करते हुए कहा था कि वर्तमान प्राथमिक शिक्षा अधिनियम बहुत गलत है। दलित वर्गों की शिक्षा में उपेक्षा न हो, इसके लिए सरकार किसी निरीक्षक एजेन्सी को अपने सीधे नियंत्रण में नियुक्त करे। इस प्रकार डॉ. साहब की राय है कि दलित-पिछड़े वर्गों में शिक्षा का जोरदार प्रचार हो, विकास हो। इसके लिए प्राथमिक स्तर की शिक्षा को सस्ता और सुलभ बनाया जाना चाहिए।

डॉ. आंबेडकर का मानना था कि विश्वविद्यालय का मुख्य काम है अध्ययन और शोध। अतः विश्वविद्यालय को मात्र परीक्षा को ही अपने अस्तित्व का अंतिम उद्देश्य नहीं मानना चाहिए। शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने के नाम पर वे परीक्षा के स्तर को इतना असम्भव और कठोर न बनाएँ कि वंचितों, पिछड़ों को विश्वविद्यालय प्रवेश का मौका ही न मिले।

महान शिक्षाविद डॉ. आंबेडकर के अनुसार विश्वविद्यालय का काम सिर्फ परीक्षाएँ आयोजित करना और उपाधियाँ बाँटना नहीं है। विश्वविद्यालय को शिक्षा का समाजीकरण भी करना है। इसे लोकतांत्रिक भी बनाना है। इसके मूलभूत कार्यों में से एक कार्य है जरूरतमंद और गरीबों को उच्चतम शिक्षा की सुविधाएँ प्रदान करना।

अतीत का अनुभव बताता है कि सवर्ण लोग दलित-पिछड़े वर्गों के विकास के प्रति काफी अनिच्छुक रहे हैं। वे चाहते तो दलितों के स्तर को उठाकर समान सामाजिक स्तर पर ला सकते थे, परन्तु इन्होंने ऐसा नहीं किया। आगे डॉ. साहब ने दहाड़ते हुए कहा कि दलितों को अब एहसास हो गया है कि शिक्षा के बिना उनका अस्तित्व सुरक्षित नहीं है। शिक्षा ही उन्नति का द्वार खोल सकती है, गुलामी की जंजीर तोड़ सकती है और अशिक्षा रूपी उस घनघोर अंधकार से निकाल सकती है। अतः दलित-पिछड़ों में उच्चशिक्षा का फैलाव हो, इसके प्रति डॉ. आंबेडकर काफी गम्भीर थे।

शिक्षा का उद्देश्य लोगों में नैतिकता और सामाजिकता विकसित करना है। इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य रोटी कमाकर सिर्फ पेट भरना नहीं बल्कि स्वाभिमानी और सुसंस्कारित होना है। शिक्षा का उद्देश्य है लोक कल्याण।

बुद्धिमान सिर्फ उसी को कहा जाता है जो अपने अर्जित ज्ञान का उपयोग समाज सेवा के कार्य में करता है। जो शिक्षित व्यक्ति सिर्फ अपने लिए कमाते हैं, खाते हैं और मर जाते हैं; उनमें और पशुओं में कोई फर्क नहीं होता।

डॉ. साहब कहते है कि शिक्षा एक द्विधारी तलवार है, इसका उपयोग बहुत सावधानी से करना होता है। शिक्षा के साथ आचरण भी जरूरी है। आचरण और मानवता के बिना शिक्षा एक दानव से भी खतरनाक है। यदि किसी शिक्षित व्यक्ति से गरीबों के कल्याण में बाधा होती है तो वह शिक्षित व्यक्ति समाज के लिए अभिशाप है। इस प्रकार शिक्षा से ज्यादा आचरण का महत्त्व है। आचरण विहीन व्यक्ति समाज के लिए घातक होता है।

अच्छी शिक्षा शेरनी का दूध है, जो इसे पीयेगा वही दहाड़ेगा, वही समाज में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकता है। वंचित छात्रों को संदेश देते हुए डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि अवसर मिलने पर वंचित विद्यार्थियों में दूसरों से आगे निकलकर बेहतर करने की क्षमता होनी चाहिए। उन्हें हरसम्भव समाजसेवा की खातिर त्याग और संघर्ष करने के लिए तत्पर रहना चाहिए और समय आने पर समाज को कुशल नेतृत्व प्रदान करना चाहिए। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि डा. आंबेडकर ने शोषितों, वंचितों, पिछड़ों और महिलाओं के शैक्षिक उत्थान के लिए इतने कार्य किये, जो एक सामान्य व्यक्ति द्वारा एक जीवन में संभव ही नहीं हैं।

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