गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल, मुस्लिम के आँगन में हुई हिंदू लड़की की शादी

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26 अप्रैल। “सात संदूकों में भर कर दफ्न कर दो नफरतें, आज इंसाँ को मोहब्बत की जरूरत है बहुत।”
बशीर बद्र का ये शेर एकता की मिसाल पेश करनेवाला है। ऐसी ही एक मिसाल पेश की है, उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के एक मुस्लिम परिवार ने, जहाँ एक हिंदू लड़की के विवाह समारोह का आयोजन करने के लिए मुस्लिम परिवार ने अपना घर दे दिया। लड़की के पिता की कोविड से मौत हो गयी थी। इस परिवार ने बारात का अपने घर पर स्वागत किया, और दुल्हन के रिश्तेदारों के साथ समारोह में भाग लिया। लड़की के परिवार ने 22 अप्रैल को उसकी शादी तय की थी, और आखिरी समय में मदद के लिए मुस्लिम पड़ोसियों के पास पहुँचे।

जिले के अलवाल मोहल्ले में छोटे से घर में रहनेवाले राजेश चौरसिया ने कहा, “पैसे की कमी के कारण हम अपनी भतीजी पूजा की शादी के लिए कोई मैरिज हॉल बुक नहीं कर पाये और हमारे घर में इस तरह के समारोह को आयोजित करने के लिए जगह नहीं थी। जब मैंने अपने पड़ोसी परवेज को इस बारे में बताया तो उसने बिना किसी झिझक के अपने घर के आँगन में शादी करने के लिए कहा।”

इसके बाद राजेश और उनके परिवार ने तनावमुक्त होकर अन्य व्यवस्था करने पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि परवेज और उनके परिवार ने मंडप बनाने का काम किया।

बता दें, कि रमजान का महीना चल रहा है, जिसमें मुस्लिम समाज के लोग दिन भर रोजा रखते हैं। रमजान के बीच मुस्लिम परिवार ने पड़ोसी बेटी की शादी के लिए अपना आँगन खाली कर दिया। जहाँ शादी का मंडप बना था, उस जगह को अच्छे से सजाया गया और मेहमानों के बैठने की व्यवस्थ्या की गई। शादी के दिन परवेज ने अपनी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ शादी में आए मेहमानों का स्वागत किया। जहाँ परिवार के पुरुष सदस्य मेहमानों की देखभाल में लगे थे, वहीं परवेज के घर की महिलाओं ने अन्य महिलाओं के साथ शादी के गीत गाए।

परिवार ने पारंपरिक भोजन की भी मेजबानी की, और शादी के बाद मेहमानों को गिफ्ट दिया। चौरसिया ने कहा, “बारात लौटने से पहले परवेज ने दूल्हे को सोने की चेन भेंट की। उन्होंने मेहमानों के साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसे पूजा उनकी अपनी बेटी है।” परवेज की पत्नी नादिरा ने कहा, कि पूजा और उनकी माँ अक्सर उनके घर आते थे और उनके साथ परिवार के सदस्य जैसा व्यवहार किया जाता था।

नादिरा ने कहा, “पूजा मेरी बेटी की तरह है। इसलिए जब हमें उसकी शादी के बारे में पता चला, तो हमने परिवार के सदस्यों के रूप में जो कुछ भी हो सकता था, करने की कोशिश की। यह रमजान का पवित्र महीना भी है, और बेटी की शादी के आयोजन से बेहतर क्या हो सकता है? नादिरा ने कहा, “हम अलग-अलग धर्मों के हैं, लेकिन इंसानों के रूप में यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी बेटियों की खुशी सुनिश्चित करें।”

(Jantaserishta.com से साभार)

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