अहिल्याबाई द्वारा कराए गए सफल करार के प्रति द्रोह

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— अफ़लातून —

हारानी अहिल्याबाई ने काशी के मंदिर-मस्जिद विवाद का दोनों पक्षों के बीच समाधान कराया – काशी की विद्वत परिषद तथा मस्जिद इंतजामिया समिति के बीच। इस समाधान के तहत विश्वनाथ मंदिर बना- करोड़ों लोगों की आस्था, पूजा , अर्चना का निर्विवाद केंद्र।

महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर को स्वर्ण मंडित करने के लिए साढ़े बाईस मन सोना दान दिया। कहा जाता है कि हरमंदर साहब को स्वर्ण मंडित करने के लिए तथा लाहौर के एक मदरसे के लिए भी महाराजा रणजीत सिंह ने सोना दिया था।

इस विश्वनाथ मंदिर के नौबतखाने में बाबा की शान में बिस्मिल्लाह खां साहब के पुरखे शहनाई बजाते थे। अवध के नवाब राजा-बनारस के जरिए इन शहनाईनवाजों को धन देते थे।

बाद के वर्षों में नौबतखाने से ही विदेशी पर्यटकों को दर्शन कराया जाता था। काशी के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अहिल्याबाई होलकर के समय स्पष्ट सहमति बन गयी थी कि मंदिर में दर्शनार्थी किधर से जाएंगे और मस्जिद में नमाज अता करने के लिए किधर से जाएंगे। इस समाधान का सम्मान तब से अब तक किया गया है। मुष्टिमेय लोग साल में एक दिन ‘श्रृंगारगौरी’ की पूजा के नाम पर गिरफ्तारी देते हैं। मौजूदा स्वर्ण मंडित शिखर वाले विश्वनाथ मंदिर की बाबत अहिल्याबाई ने विचार नहीं किया। क्या काशी की जनता अशांति, विवाद में फॅंसना चाहती है? इसका साफ उत्तर है, नहीं।

राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवादी मानते हैं कि करोड़ों लोगों की आस्था, पूजा के केंद्र की जगह वहॉं हो जाए जहॉं मंदिर-मस्जिद हैं।अशोक सिंघल ने विहिप की पत्रिका ‘वंदेमातरम’ में कहा कि इससे ‘बाबा का प्रताप बढ़ जाएगा’। इस पत्रिका के प्रकाशन से जुड़ा संघ का एक सदस्य रामप्रसाद सिंह ज्ञानवापी की बाबत दायर एक मुकदमे का वादी है। फेसबुक पर रामप्रसाद की एक हालिया पोस्ट से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आपराधिक मंशा स्पष्ट है, “जानकारी के लिए बता दूं कि श्रृंगारगौरी की पूजा शुरू कराने, आदि विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा, संरक्षण, तहखाने के ताले खुलवाने, वहाँ से औरंगजेबी अतिक्रमण को हटाने आदि आदि का एक विस्तृत और सम्पूर्ण मांगों को लेकर सबसे पहला एवं मुख्य केस काशी की सिविल जज की अदालत में दिनाँक 18 फरवरी 2021(से) श्री हरिशंकर जैन जी के मार्गदर्शन में और उनकी अथक मेहनत से फ़ाइल किया गया जिसमें मुख्य वादी के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री जी एवं जन उदघोष सेवा संस्थान, द्वारा संस्थापक अध्यक्ष श्री कुलदीप तिवारी जी व अन्य के द्वारा किया गया था। यही एक मात्र मुख्य एवं पहला केस है। जिसका मुकदमा संख्या 350/2021 है।” काशी विश्वविद्यालय के जन सम्पर्क केंद्र में काम करते वक्त रामप्रसाद पर विश्वविद्यालय का कैमरा चुराने का आरोप लगा था। बैरिस्टर सिंह नामक छात्रनेता ने दबाव डालकर मामला रफा-दफा कराया था।

इस प्रकार ‘तीन नहीं अब तीस हजार, बचे न एक कब्र मजार’ का सूत्र प्रचारित करनेवालों की सोच महारानी अहिल्याबाई तथा महाराजा रणजीत सिंह का विलोम है। काशी के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अहिल्याबाई द्वारा कराए गए सफल करार के प्रति द्रोह है।

विश्वनाथ मंदिर की बाबत ‘हिन्दू बनाम हिन्दू’ (डॉ लोहिया का प्रसिद्ध व्याख्यान) का मामला मंदिर में दलित प्रवेश के वक्त भी उठा था। लोकबंधु राजनारायण ने इसके लिए सफल सत्याग्रह भी किया था और पंडों की लाठियों से सिर फुड़वाया था। दलित प्रवेश को आम जनता ने स्वीकार किया लेकिन ‘धर्म सम्राट’ करपात्रीजी तथा काशी नरेश ने इसके बाद मंदिर जाना बंद कर दिया।

‘ताजमहल मंदिर भवन है’, ‘कुतुब मीनार हिन्दू स्थापत्य का नमूना है’, ‘संघर्षरत इस्राएल’, ‘कौन कहता है अकबर महान है?’, जैसे शीर्षक वाली किताबें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों के समय स्टॉल लगाकर बेची जाती हैं। इन किताबों के शीर्षकों से अनुमान लगाया जा सकता कि इनके लेखकों की बुद्धि कहॉं होगी।

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