वीरेन्द्र दुबे की सात कविताएं

1
पेंटिंग : कमल कोरिया

1. आजी मां

नाती पोतों
पंती संतियों से भरी लदी
एक एक बाल की गिनती बराबर भीड़ से घिरी बुंदिया दादी
कब से वैसी ही मौज में हैं।
फिर से उग आए दांत
दातून किया करती हैं देर तक
घने हो चले काले चमकीले होते बाल,
उग आयी अक्कल दाढ़।
उनके सामने बहुत बार पड़े
खाने दाने के लाले
भूख प्यास की मार में पंख पखेरू,
दम तोड़ दिए।
इस सब पर भी हंसते गाते
पालती पोसती रहीं अपनी धरोहरें
तोड़ते तोड़ते रही बची सांस
वे तो वे उनके दादे परदादे तक
बनाते रहे चट्टानों पर चित्र विचित्र
सफेद पीले गेरूआ रंगों से।

2. वह तो तुम थीं

जब जिसे जहां जैसे मौके मिले
हाथ साफ किए चलते बने
हाथ नहीं आए अच्छे अच्छों के
उड़ाते रहे धुएं के छल्ले
भुनी मांग तक नहीं पड़ी पल्ले।
वह तो तुम थीं सो सुरक्षित निकल आए हर छल छंद से,
सपनों में गिलहरियों की मदद से
छोटे छोटे पुल
छोटे छोटे बांध बनाये,
जड़ों की रस्सियां बुनीं
पेड़ों पर पहाड़ों पर चढ़ाइयां कीं।
हमें ही पंहुचानी थीं ऊपर तक
अपनी आहें अपनी चीखें
हमें ही पाना था उनका साथ
हम ही चढ़े जहाज हम ही उतरे पार,
तुम थीं वह तो तभी हुआ संभव सब।

3. संयोग की धनी

जैसे तैसे अपनों से बचते बचाते
आंखें झपकाते, मुंह चुराते चले आए यहां तक,
पता नहीं कहां तक?
कौन घाट हाट बाट है।
हाथ पर हाथ धरे बैठे ठाले
इतने मतकमाऊ अलाव खाल हो गये थे कि बहुत बार पांच से अधिक वाक्य नहीं बने
सारी लिखा पढ़ी भाड़ चूल्हे के काम आ रही थी
सहसा तुम आ मिलीं,
किलपती कंगाली निहाल होते होते,
मालामाल हो गयी।

4. अबके दिन

अब नहीं होतीं वे बातें
इत्र फुलेलों की,
छिड़कते ही नहीं गुलाब जल
ना तपाक से मिलाते हैं
गर्मागर्म हाथ, ना दिल ना दिमाग,
अबके दिनों में मिलें जुलें
पान पन्हैंयों की हो जाए तो बहुत है।

पेंटिंग : कमल कोरिया

5. वह घर

सुख उल्टे पांव लौट आए
दूर दूर तक कोई आवभगत करने वाले नहीं थे।
प्रेम के दो झूठे बोल बोलने तक
खाली नहीं थे।
ऐसे ही दिन देखने सांसें लेनी पड़ीं
दुखती रगों पर हाथ रखकर
रीतते रहे बीतते रहे
वो तो तुम्हारी जिद थी
जो जगमगाती खुशहाली हरियाली को,
उगते सूरज के घर तक ले जाकर मानीं।

6. शिलालेख

संभावना में टटोल रही हैं साझेदार
हरा ही हरा सूझ रहा है
जब देखो तब जिसे देखो उसे,
अभी अभी आ धमके मौकों पर
कवच बनकर साक्षात खड़ी हो तुम,
शिलालेख नहीं पढ़े जा सके
तब भी पत्तियों ने देखा
सहसा उनके सिर के बाल हरे होने लगे हैं।

7. जतन

बिना छल छलावों बहकावे में आए,
गौरैया जान रही है
वह कितनी भी महत्त्वाकांक्षी क्यों ना हो जाए
बाज नहीं बन सकती
कल नहीं बन सकती
आज नहीं बन सकती,
पर अपना सुरक्षित घोंसला बना सकती है,
आपस में घरोबा रखकर पाल-पोस सकती है
जतन से घर घराना संवार सकती है और वह वही करेगी।


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