सिंगरौली की सुमित्री जिन्हें लोहिया ने राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया था

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— जयराम शुक्ल —

चुनावी लोकतंत्र में यूँ तो महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत श्रीलंका और बांग्लादेश (संसद में 12 व मप्र.विधानसभा में 11प्रतिशत) से भी पीछे है फिर भी यदि किसी ने इसकी सबसे ज्यादा चिंता की तो वे डॉ राममनोहर लोहिया थे। वे लोकतंत्र में नर-नारी समानता को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाना चाहते थे। उनकी सप्तक्रांति का पहला सूत्र यही था।

नई पीढ़ी को यह शायद ही पता हो कि सिंगरौली विधानसभा से पहला चुनाव जीतनेवाली सुमित्री देवी को सोशलिस्ट पार्टी ने प्रथम राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया था। मध्यप्रदेश की उपमुख्यमंत्री व नेता-प्रतिपक्ष रहीं जमुना देवी भी समाजवादी नवाचार का प्रतिफल थीं। 1962 में ग्वालियर लोकसभा चुनाव में “रानी बनाम मेहतरानी” की बहस खड़ी करनेवाले डॉ लोहिया ही थे।

चुनाव में महिलाओं की भागीदारी को लेकर दो किस्से और डॉ लोहिया को याद करते हुए। शुरू करते हैं सुमित्री देवी से। सुमित्री देवी सिंगरौली क्षेत्र की वनवासी अति पिछड़ी जनजाति खैरवार समुदाय से थीं। बात तब की है जब विंध्यक्षेत्र समाजवाद की प्रयोगशाला के रूप में देश और दुनिया में स्थापित हो चुका था। 1948 में बघेलखंड और बुंदेलखंड छोटी रियासतों को मिलाकर विंध्यप्रदेश का गठन किया गया था। 1952 में विधानसभा के लिए पहला चुनाव होना था। विंध्यप्रदेश की विधानसभा 60 सदस्यों की थी। 12 विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे जहां से दो सदस्य चुने जाते थे। सिंगरौली ऐसा ही क्षेत्र था। सोशलिस्ट पार्टी ने सामान्य वर्ग से श्यामकार्तिक को उम्मीदवार बनाया और अजजा वर्ग से सुमित्री देवी को। सोशलिस्ट पार्टी के दोनों उम्मीदवार चुन लिये गए। 60 में से 11विधायक सोशलिस्ट के थे पर खास बात यह कि सीधी जिले से काँग्रेस का खाता तक नहीं खुला था।

विंध्यप्रदेश में सोशलिस्ट पार्टी के नेता जगदीश जोशी बताते थे कि डॉ लोहिया चुनाव परिणामों से इतने उत्साहित हुए कि देश के राष्ट्रपति चुनाव के लिए सुमित्री देवी को सोशलिस्ट पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर दिया। रघु ठाकुर इस संदर्भ की चर्चा करते बताते हैं कि यह घटना विश्वभर के मीडिया की सुर्खियां बनी थी। यद्दपि राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपेक्षित सदस्य संख्या न होने की वजह से सुमित्री देवी अर्हता पूरी नहीं कर पायीं लेकिन चुनावी लोकतंत्र में देश के सर्वाधिक पिछड़े इलाके से एक वनवासी महिला को सामने लाकर लोहिया ने भारत के भविष्य के लोकतंत्र का जो खाका देश के सामने पेश किया था वो आज भी धुंध में है।

1957 में मध्यप्रदेश के लिए हुए चुनाव में सिंगरौली की सीट सामान्य घोषित हो गई। सुमित्री देवी निर्दलीय लड़ीं और जीत नहीं पाईं। वे खैराही गाँव की थीं आज जहाँ एस्सार के ताप बिजलीघर की ऊँची चिमनियां गुगुआ रही हैं। सुमित्री देवी का परिवार सिंगरौली की विस्थापन त्रासदी में फँसकर आज गुमनाम सा हो गया। पूँजीवाद लोहिया के समाजवाद को साक्षात लील गया लेकिन एक गौरवशाली किस्सा तो उससे जुड़ा ही हुआ है।

जमुना देवी, स्वाभिमानी राजनीति के 53 साल

अब जमुना देवी की बात। विधानसभा में बुआजी के नाम से चर्चित रहीं जमुना देवी भी समाजवाद के नवाचार का प्रतिफल थीं। धार-झाबुआ क्षेत्र में वे समाजवादी संत मामा बालेश्वर दयाल के सान्निध्य में आयीं। मध्यभारत प्रांत के लिए जब 1952 में पहला चुनाव हुआ तो वे कुच्छी विधानसभा सीट से सोशलिस्ट पार्टी की उम्मीदवार बनीं और अच्छे बहुमत से चुनी गईं। उनकी दबंग व जुझारू छवि से पंडित नेहरू इतने प्रभावित हुए कि काँग्रेस में शामिल करके सन् 62 में धार झाबुआ लोकसभा सीट से अपनी पार्टी का उम्मीदवार बना दिया। वे चुनाव चुनाव जीतकर लोकसभा पहुँचीं। 78 में इंदिरा जी ने उन्हें उच्चसदन राज्यसभा भेजा। इसके बाद 85 से 90 और 93 से 2010 तक विधानसभा सदस्य रहीं। विभिन्न विभागों की मंत्री रहते हुए 1998 से 2003 तक प्रदेश की उपमुख्यमंत्री रहीं। 2010 में जब उनका निधन हुआ तब वे नेता-प्रतिपक्ष थीं।

सुमित्री देवी को वक्त ने साथ नहीं दिया पर जमुना देवी महिला जनप्रतिनिधियों के लिए मिसाल साबित हुईं। 1957 से लेकर 2010 यानी कि 53 वर्ष तक उनकी अनवरत राजनीतिक सक्रियता एक मिसाल है चुनावी लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी और संघर्ष शक्ति की।

क्या थी लोहिया की सप्तक्रांति

समाज परिवर्तन को लेकर डॉ. राममनोहर लोहिया के सात स्वप्न थे, जिसे सप्तक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। वे सभी अन्यायों के विरुद्ध एकसाथ संघर्ष छेड़ने के पक्षधर थे। उन्होंने एकसाथ सात क्रांतियों का आह्वान किया। वे सात क्रान्तियाँ थीं –

1. नर-नारी की समानता के लिए।
2. चमड़ी के रंग पर रची राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता के विरुद्ध।
3. संस्कारगत, जन्मजात जातिप्रथा के खिलाफ और पिछड़ों को विशेष अवसर के लिए।
4. परदेसी गुलामी के खिलाफ और स्वतन्त्रता तथा विश्व लोक-राज के लिए।
5. निजी पूँजी की विषमताओं के खिलाफ और आर्थिक समानता के लिए तथा योजना द्वारा पैदावार बढ़ाने के लिए।
6. निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप के खिलाफ और लोकतंत्री पद्धति के लिए।
7. अस्त्र-शस्त्र के खिलाफ और सत्याग्रह के लिए।

इन सात क्रांतियों के सम्बन्ध में लोहिया ने कहा –

“मोटे तौर से ये हैं सात क्रांन्तियाँ। सातों क्रांतियाँ संसार में एकसाथ चल रही हैं। अपने देश में भी उनको एकसाथ चलाने की कोशिश करना चाहिए। जितने लोगों को भी क्रांति पकड़ में आयी हो उसके पीछे पड़ जाना चाहिए और बढ़ाना चाहिए। बढ़ाते-बढ़ाते शायद ऐसा संयोग हो जाए कि आज का इन्सान सब नाइन्साफियों के खिलाफ लड़ता-जूझता ऐसे समाज और ऐसी दुनिया को बना पाये कि जिसमें आन्तरिक शांति और बाहरी या भौतिक भरा-पूरा समाज बन पाये।”

सप्त-क्रांति का उनका सपना अभी भी अधूरा है। जाति-भेद, रंग-भेद, लिंग-भेद, वर्ग-भेद, भाषा-भेद और शस्त्र-भेद रहित समाज का निर्माण करनेवाले नेता अब ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते।

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