किस मुंह से इन बच्चों को बाल दिवस की शुभकामनाएं दें?

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— अंकित त्यागी —

देश हर साल 14 नवंबर को धूमधाम से बाल दिवस मनाता है। भारत में पहली बार बाल दिवस 1956 में मनाया गया था। 14 नवंबर की तारीख को पहली बार बाल दिवस 1965 में मनाया गया। 1964 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के देहांत के बाद उनके जन्मदिन 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में स्वीकार किया गया।

बाल दिवस मनाने के अनेक रूप हम अपने आसपास देखते हैं। स्कूल-कॉलेज में रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं, शिक्षक बच्चों के लिए हर वो कार्यक्रम खुद पेश करते हैं जो बाल्यावस्था में शायद खुद भी नहीं किए होंगे। गैरसरकारी संस्थाएं झोपड़पट्टी आदि में जाकर वहां के बच्चों में मिष्टान्न आदि वितरण करती हैं। नेता भी अपने स्तर पर कार्यक्रम करके बच्चों को बाल दिवस की शुभकामनाएं देते हैं।

हो सकता है यह सब अपनी अपनी जगह ठीक हो लेकिन इस दिन हमें चर्चा करनी चाहिए कि हमारे बच्चे किन-किन समस्याओं से आज जूझ रहे हैं और उनका निवारण क्या है? पिछले साल बाल दिवस पर सरकारों द्वारा क्या किया गया और वह योजना कितनी कामयाब रही?

आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि बच्चों के लिए कोई ठोस कदम हमारी सरकारों और समाज द्वारा नहीं उठाया जा रहा है। बाल दिवस पर की जानेवाली तमाम घोषणाएं और वादे सब खोखले हैं।

आंकड़े बताते है कि भारत में 33 लाख से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जिनमे से 17.7 लाख अत्यंत कुपोषित हैं। इन आंकड़ों से प्रतीत होता है कि ये परिवार घोर गरीबी से जूझ रहे हैं जो दो जून की पोषणयुक्त रोटी जुटा पाने में असमर्थ हैं।

इसी 12 नवंबर को हमने निमोनिया दिवस मनाया है। दुर्भाग्य है कि दुनिया में निमोनिया से होने वाली मौतों में से पचास फीसदी मौत अकेले भारत में होती हैं। भारत में सालाना लगभग 3 लाख बच्चे निमोनिया से मरते हैं। भारत में 5 साल से कम उम्र में मरनेवालों की संख्या पाकिस्तान, कांगो, नाइजीरिया में हुई मौतों से अधिक है।

बात चाहे कांग्रेस शासित राज्य की हो या बीजेपी शासित राज्य की, हाल सबका एक जैसा है। राजस्थान में निमोनिया के सबसे ज्यादा 1,08,427 केस मिले है। उत्तरप्रदेश में 84,428; मध्यप्रदेश में 70 हजार 28 केस मिले हैं।

क्या कोई बता सकता है कि इन बच्चों को बाल दिवस की शुभकामनाएं कैसे दी जाएं जो अकाल ही मौत का शिकार हो जाते हैं?

स्कूल न जाने वाले बच्चों का कैसा बाल दिवस?

कश्मीर से जब धारा 370 हटाई गई तो न जाने कितने बुद्धिजीवियों ने कहा कि अब कश्मीर का चौतरफा विकास होगा।

‘समग्र शिक्षा’ द्वारा हाल ही में प्रदेश भर में एक सर्वे ‘तलाश’ करवाया गया उससे जानकारी मिली कि प्रदेश में 93 हजार 480 बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। इनमें 40 हजार के करीब बच्चों ने तो दाखिला तक नहीं लिया है, जबकि 45 हजार के करीब बच्चों ने कक्षा पांचवीं और छठी के बाद स्कूल छोड़ दिया।

वहीं मध्यप्रदेश के शिक्षा विभाग की 2021-22 की रिपोर्ट की मानें तो मप्र में 13 लाख 78 हजार 520 बच्चों ने पाठशाला त्याग दी। इनमें सर्वाधिक बच्चे कक्षा आठवीं के बाद स्कूल छोड़ चुके हैं।

यूनिसेफ के अनुसार तो भारत में 6-13 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 60 लाख बच्‍चे स्‍कूल ही नहीं जाते।

क्या फिर से कोई बताएगा कि इन बच्चों के लिए कौन रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत करेगा? कौन इन्हें बाल दिवस की शुभकामनाएं देगा?

यह सब देखकर मुझे 2018 में लिखी अपनी पंक्तियां याद आ रही हैं –

आँखें खोली उठाया बोझ,कि जिन्दगी की शुरुआत।
कैसे दू मैं उन परिंदों को बाल दिवस की मुबारकबाद।

हाथों में है जिनके बर्तन, और परेशानियों की बारात।
कैसे दूं मै उन परिंदों को बाल दिवस की मुबारकबाद।

नहीं है मां बाप का साया, और किताबों का साथ।
कैसे दूं मै उन परिंदों को बाल दिवस की मुबारकबाद।

सुबह है होती नील गगन में, खुले आसमां में कटती रात।
कैसे दूं मै उन परिंदों को बाल दिवस की मुबारकबाद।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक में झलकती भारत के बच्चों की बदहाली

वैश्विक भुखमरी सूचकांक 4 बिंदुओं पर निकाला जाता है। बाल मृत्यु दर, अल्पपोषण, आयु के अनुरूप कद, वजन के अनुरूप कद। इन आधारों पर बने वैश्विक सूचकांक में भारत की स्थिति अत्यंत खराब है।

2021 में भारत 116 देशों में 101वें स्थान पर था। 2022 में हम 121 देशों में से 107वें स्थान पर हैं। यानी भुखमरी बढ़ गई और हम 6 स्थान नीचे खिसक गए।

आखिर हम किस मुंह से इन बच्चों को बाल दिवस की शुभकामनाएं दें?

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