किसान आंदोलन को अपनी राजनीति तय करनी पड़ेगी

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— योगेन्द्र यादव —

पिछले सप्ताह किसान राजनीति के भविष्य के लिए दो महत्त्वपूर्ण संकेत सामने आए। पहला, संयुक्त किसान मोर्चा ने 19 नवंबर को देश भर में ‘फतेह दिवस’ मनाया और किसान आंदोलन के आगामी कार्यक्रमों की घोषणा की। दूसरा, एक आरटीआई के जरिए सरकार की बहुप्रचारित ‘किसान सम्मान निधि’ की असलियत का भंडाफोड़ हुआ। एक तरफ किसानों के प्रति सरकार की निष्क्रियता और असंवेदनशीलता तो दूसरी तरफ किसान आंदोलन की सक्रियता और संकल्प, आने वाले साल में एक नई किसान राजनीति की ओर इशारा करते हैं।

इस सप्ताह एक आरटीआई के जरिए यह खुलासा हुआ कि गाजे-बाजे के साथ पिछले लोकसभा चुनाव से पहले शुरू की गई किसान सम्मान निधि योजना के लाभार्थियों की संख्या में आश्चर्यजनक कमी हुई है। ‘द हिंदू’ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा चुनाव से पहले इस योजना की शुरुआती किस्त में 11.84 करोड़ किसानों के अकाउंट में पैसा पहुंचाया गया था। सरकार ने कहा था कि इसे सभी 14 करोड़ किसान परिवारों तक पहुंचाया जाएगा। लेकिन इस साल 11वीं किस्त आते आते लाभार्थियों की संख्या घटकर 3.87 करोड़ ही रह गई। यह गिरावट अचानक किसी एक किस्त में नहीं हुई, बल्कि छठी किस्त के बाद से लगातार सम्मान निधि प्राप्त करने वाले किसानों की संख्या गिरती जा रही है।

छठी किस्त में 9.87 करोड़ किसानों को निधि मिली, सातवीं में 9.30 करोड़ को, आठवीं किस्त में 8.59 करोड़ को, नौवीं किस्त में 7.66  करोड़, दसवीं किस्त में 6.34 करोड़ किसानों और इस साल अप्रैल-जून में ग्याहरवीं किस्त में सिर्फ 3.87 करोड़ किसान परिवारों को 2,000 रुपए की चौमाही किस्त वितरित की गई।

अगर इस आरटीआई पर यकीन किया जाए तो प्रधानमंत्री की सबसे प्रतिष्ठित योजना में से किसान गायब होते रहे लेकिन सरकार सोती रही।

जब ‘द हिंदू’ ने सरकार से इसके कारणों का खुलासा करने को कहा तो सरकार ने जवाब नहीं दिया। लेकिन रिपोर्ट छपने से हुए हंगामे के बाद सरकार ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कुछ अलग आंकड़े दिए हैं और सारा दोष राज्य सरकारों पर डाल दिया गया है। यहां सवाल उठता है कि अगर ये आंकड़े गलत हैं तो सरकार ने ही आरटीआई में ऐसे आंकड़े क्यों दिए थे। सरकार इशारा कर रही है कि ये आंकड़े केवल उन किसानों के हैं जिन्हें लगातार सारी किस्तें मिलीं। ऐसा है तब भी यह इस योजना की गंभीर विफलता को दर्शाता है।

अगर गलती राज्य सरकारों की है तब भी प्रधानमंत्री इससे पल्ला नहीं झाड़ सकते क्योंकि जिन राज्यों में लाभार्थियों की संख्या में सबसे भारी गिरावट हुई है (जैसे मध्यप्रदेश, गुजरात, बिहार और महाराष्ट्र) वहां अधिकांश समय बीजेपी की ही सरकार थी।

मामला केवल एक योजना का नहीं है। कमोबेश ऐसी ही स्थिति सरकार की दूसरी बहुप्रचारित कृषि मुहिम ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ की है l वर्ष 2016 में इस योजना की घोषणा होने से पहले पुरानी फसल बीमा योजना के तहत 4.86 करोड़ किसानों की 5.23 करोड़ हेक्टेयर जमीन का फसल बीमा हुआ था। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू होने के बाद पहले एक दो वर्ष यह संख्या बढ़ी, लेकिन उसके बाद लगातार गिरती रही है। सन 2021 के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक पिछले वर्ष केवल 2.49 करोड़ किसानों की 3.87 करोड़ हेक्टेयर जमीन का फसल बीमा हुआ। मतलब कि इतने शोरगुल के साथ शुरू की गई इस फसल बीमा योजना के परिणामस्वरूप बीमा कंपनियों की आमदनी जरूर बढ़ गई है, लेकिन फसल बीमा का फायदा उठाने वाले किसानों की संख्या आधी रह गई है।

यही हाल प्रधानमंत्री द्वारा किसानों की आमदनी डबल करने की घोषणा का है। सच तो है यह है कि यह घोषणा कभी भी योजना का रूप ले ही नहीं पायी। छह साल तक प्रधानमंत्री और उनके दरबारी दिन-रात डबल आमदनी का डमरू बजाते रहे, लेकिन जब इस वर्ष फरवरी में छह साल की मियाद पूरी हुई, तब से सरकार को सांप सूंघ गया है।

किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी के बारे में एक भी आंकड़ा पेश नहीं किया गया है। अन्य आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाएं तो यह सच निकलता है कि किसान परिवारों को खेतीबाड़ी से होने वाली आमदनी दरअसल घट गई है। प्रधानमंत्री द्वारा कृषि के लिए एक लाख करोड़ रुपए के फंड की घोषणा भी अभी कागज पर है।

पिछले साल 9 दिसंबर को दिल्ली मोर्चा उठाते वक्त संयुक्त किसान मोर्चा से केन्द्र सरकार ने जो लिखित वादे किए थे उनसे वह पूरी तरह मुकर चुकी है। खुद केंद्र सरकार ने आंदोलन के दौरान किसानों पर जो मुकदमे किए थे उन्हें वापस नहीं लिया है। बिजली बिल संसद में पेश करने से पहले संयुक्त किसान मोर्चा से चर्चा करने के लिखित वादे के बावजूद सरकार ने बिना किसी चर्चा के इसे संसद में पेश कर दिया है। वादे के 9 महीने बाद एमएसपी पर कमेटी बनाई गई लेकिन एमएसपी को कानूनी गारंटी बनाने के मुद्दे को कमेटी के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं रखा गया। किसानों के लिए जलियांवाला बाग कांड जैसे लखीमपुर खीरी हत्याकांड के आरोपी अजय मिश्र टेनी आज भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में बने हुए हैं और सरकार उनके बेटे को जेल से बाहर निकालने की कोशिश लगातार कर रही है।

इस सब से यह स्पष्ट है यह सरकार ना तो किसानों को किए अपने वादों के प्रति गंभीर है, न ही अपने दावों में सच्ची है, ना तो अपनी घोषणा की पक्की है, और ना ही अपने लिखित आश्वासन पर टिकती है। जाहिर है ऐसे में किसानों के पास अपना संघर्ष दोबारा शुरू करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है।

हाल ही में संयुक्त किसान मोर्चा ने दोबारा अपनी एकजुटता प्रदर्शित करते हुए किसानों के सामने एक नया कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। इस योजना के तहत 19 नवंबर को प्रधानमंत्री द्वारा काले कानूनों को वापस लेने की वर्षगांठ पर देशभर में किसानों ने ‘फतेह दिवस’ का आयोजन किया। दिल्ली कूच करने वाले दिन यानी 26 नवंबर की दूसरी वर्षगांठ पर किसान हर प्रदेश में राजभवन मार्च आयोजित कर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन देंगे जिसमें सरकार की वादाखिलाफी की ओर ध्यान दिलाया जाएगा। उसके बाद 1 दिसंबर से 11 दिसंबर तक देशभर में जनप्रतिनिधियों के पास जाकर उन्हें आगामी लोकसभा और विधानसभा सत्रों में किसानों के मुद्दों को उठाने की हिदायत दी जाएगी। आशा करनी चाहिए कि दिल्ली मोर्चे के बाद संयुक्त किसान मोर्चा से अलग हुए कुछ किसान समूह भी इन कार्यक्रमों का समर्थन करेंगे और एक बड़ी लड़ाई के लिए बड़ा दिल दिखाएंगे।

किसानों की यह निर्णायक लड़ाई अब केवल धरने-प्रदर्शन और मोर्चों तक सीमित नहीं रह सकती। अब किसान आंदोलन को अपनी राजनीति साफ तौर पर निर्धारित करनी पड़ेगी। यह तो तय है कि आरएसएस और बीजेपी के जेबी किसान संगठनों को छोड़कर बाकी सभी इस बात पर सहमत हैं कि मोदी सरकार देश के इतिहास में सबसे किसान विरोधी सरकार साबित हुई है। अब किसानों को इस सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से पलटने के लिए अपनी रणनीति बनानी होगी।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसान आंख मूंदकर बीजेपी के विरोधियों का समर्थन करें। किसान आंदोलन को विपक्षी दलों पर दबाव बनाना पड़ेगा कि वे 2024 में किसानों के लिए एक न्यूनतम एजेंडा को स्वीकार कर उसे लागू करने का सार्वजनिक संकल्प लें। आज हमारे लोकतंत्र, संविधान और सभ्यता की विरासत पर जो संकट है उससे देश को बचाने के लिए किसानों को अग्रिम दस्ते की भूमिका निभानी होगी। यह ऐतिहासिक जिम्मेवारी संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व के कंधे पर है।

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