राजनारायण को डराया नहीं जा सकता! – नौवीं किस्त

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— प्रोफेसर राजकुमार जैन —

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को हराने, कांग्रेस को धूल चटाने तथा जनता पार्टी बनाने में राजनारायण जी सबसे आगे थे। परंतु सत्ता पर काबिज होते ही जिनका कोई वजूद नहीं, संघर्षों में कोई मुकाबला नहीं, वे राजनारायण जी को धमकी दें तो फिर वही हुआ। राजनारायण अगर सरकार बनवा सकता है तो सत्ताधारियों को सबक भी सिखा सकता है।

23 जून 1979 को राजनारायण जी ने एक वक्तव्य में कहा कि मैं जनता पार्टी जो आरएसएस की सांप्रदायिकता के वर्चस्व, मोरारजी देसाई के व्यक्तित्ववाद, निरकुंशवाद तथा चंद्रशेखर के अनिर्णय की राजनीति के कारण जनता पार्टी को छोड़ रहा हूं।

हक़ीक़त में आज देश में कोई सरकार नहीं है। लगभग सभी संवेदनशील विभागों में विभ्रम तथा अनिर्णय है। कोयला, पावर, स्टील, सीमेंट, रेलवे, एयरवेज, संपूर्ण रूप से रुक जाने के कगार पर हैं। सामान्य प्रशासन भी लगभग समाप्ति पर है, जिसका उदाहरण सी.आर.पी. का पुलिस विद्रोह है। सांप्रदायिक दंगे नियंत्रण से बाहर हैं। धार्मिक स्वतंत्रता बिल, भगवाध्वज राष्ट्रीयता तथा सरकारी विभागों में सभी स्तर पर आरएसएस की घुसपैठ के कारण वातावरण ज़हरीला तथा भारतीय समाज की एकता तथा समन्वय को नष्ट कर रहा है।

उत्तर-पूर्व समाज में प्रधानमंत्री की कार्यशैली के कारण अलगाववाद उभर रहा है। धार्मिक स्वतंत्रता बिल के कारण वहां का संघर्ष उग्र रूप धारण कर रहा है।

सिक्किम के संबंध में नागरिकता संबंधी नीतियां, गोवा भाषाई अल्पसंख्यक में नकारात्मकता है। प्रधानमंत्री जो कि सभी महत्त्वपूर्ण नीतियों के बारे में अपने साथियों से परामर्श किये बिना करते हैं, उत्पन्न हो रही हैं।

राजनारायण जी ने यह भी कहा कि उन्होंने चौ.चरणसिंह से परामर्श करने के बाद पार्टी छोड़ी है, जिसके कारण चौ. चरणसिंह की स्थिति विकट हो गई। चौ. चरणसिंह ने इससे इनकार करते हुए कहा कि यह राजनारायण जी का अपना निर्णय है। मैंने तो उन्हें ऐसा करने से मना किया था।

23 जून 1979 को राजनारायण जी ने खत लिखकर मोरारजी देसाई से प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने की मांग की।

चौ. देवीलाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद राजनारायण जी ने औपचारिक रूप से जनता पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया। अब राजनारायण जी, चौ. देवीलाल, कर्पूरी ठाकुर की जनता पार्टी की एकता में कोई इच्छा नहीं रही, क्योंकि उनको साजिश करके हटाया गया। इसके बाद इन सबका एकमात्र उद्देश्य मोरारजी देसाई की सरकार को ख़त्म करना हो गया।

जनता पार्टी से राजनारायण जी के इस्तीफ़ा देने पर जनसंघ घटक खुशियां मना रहा था।

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