ब्राह्मणवाद-सामंतवाद के खिलाफ विद्रोह और आधुनिक संवेदना-चेतना की सृजनात्मक अभिव्यक्तियां
जन्मदिन (3 जनवरी) पर सादर नमन के साथ
अतीत के इन ब्राह्मणों के धर्मग्रंथ फेंक दो
करो ग्रहण शिक्षा, जाति की बेड़ियों को तोड़ दो
उपेक्षा, उत्पीड़न और दीनता का अन्त करो! [1]
– सावित्रीबाई फुले
सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की प्रथम भारतीय महिला शिक्षिका थीं, इस तथ्य से हम सभी वाक़िफ़ हैं। लेकिन बहुत कम लोग हैं, जो इस तथ्य से परिचत होंगे कि वे आधुनिक भारत की पहली विद्रोही महिला कवयित्री और लेखिका थीं। उनकी कविताओं का पहला संग्रह, ‘काव्य फुले’ 1854 में प्रकाशित हुआ था। तब वे महज 23 वर्ष की थीं। इसका अर्थ है कि उन्होंने 19-20 वर्ष की उम्र से ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। उनका दूसरा कविता संग्रह ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ नाम से 1891 में आया। कविता के अलावा उनके तीन पत्र अत्यंत चर्चित हैं, जो उन्होंने जोतीराव फुले को लिखे थे। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर भाषण दिए। इन भाषणों में भी उनका चिंतनशील और लेखक व्यक्तित्व निखरकर सामने आता है। इसके अलावा उन्होंने छात्राओं को शिक्षित करने के लिए संगीत-नाटिका भी तैयार की। इस संगीत-नाटिका में पच्चीस छात्राओं का समूह संवाद करता था।
सावित्रीबाई फुले अपनी रचनाओं में एक ऐसे समाज और जीवन का सपना देखती हैं, जिसमें किसी तरह का कोई अन्याय न हो। हर इंसान मानवीय गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करे। उन्होंने जान लिया कि बेहतर समाज और सबके लिए ख़ूबसूरत ज़िंदगी के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवादी-मनुवादी व्यवस्था और इसके द्वारा रची गई जाति-पाँति की घातक परम्परा तथा स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव है। उन्होंने अपनी कविताओं में सबसे ज़्यादा चोट मनुवाद, जाति-वर्ण के भेदभाव और स्त्री-पुरुष के बीच की असमानता पर की है। ‘शूद्रों का दर्द’ शीर्षक कविता में वे लिखती हैं कि शूद्रों को हज़ारों वर्षों से ब्राह्मणों ने षड्यंत्र रचकर अपने जाल में फंसा रखा है। ब्राह्मणों ने शूद्रों और अतिशूद्रों का शोषण-उत्पीड़न करने और उनके ऊपर अपना वर्चस्व क़ायम रखने के लिए यह सारा षड्यंत्र रचा है। ब्राह्मणों ने शूद्रों और स्त्रियों को ग़ुलाम बनाए रखने के लिए तमाम ग्रंथ रचे, जिसमें मनुस्मृति सबसे कुख्यात है। मनुस्मृति में साफ़तौर पर कहा गया है कि ब्रह्मा ने शूद्र के लिए सिर्फ़ एक कर्म निर्धारित किया है कि वह विनम्र होकर तीन वर्णों– ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करे–
एकम् एव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्।
एतेषां एव वर्णानां शुश्रूषां अनसूयया।। [2]
सावित्रीबाई फुले ब्राह्मणवादी धर्मग्रंथों के इन षड्यंत्रों को अच्छी तरह समझती थीं। उन्होंने अपनी कविता शूद्रों का दर्द में लिखा है कि–
दो हज़ार वर्ष से भी पुराना है
शूद्रों का दर्द
ब्राह्मणों के षड्यंत्रों के जाल में
फंसी रही उनकी ‘सेवा’ [3]
उनकी कविताएं इस बात की साक्षी हैं कि उन्हें इस बात का गहरा अहसास था कि शूद्रों की पराधीनता, दुर्दशा और ग़रीबी के लिए उनकी अज्ञानता, रूढ़िवादिता और परम्पराओं की बेड़ियां जिम्मेदार हैं। इस स्थिति ने उन्हें इस हालत में पहुंचा दिया है कि वे ग़रीबी के तेजाब से झुलस रहे हैं। वे लिखती हैं–
शूद्रों-अतिशूद्रों की दरिद्रता के लिए
अज्ञानता व रूढ़िवादी
रीति-रिवाज़ हैं जिम्मेदार
परम्परागत बेड़ियों में बंधे-बंधे सब
पिछड़ गए हैं सबसे देखो
जिसका यह परिणाम है कि हम
झुलस गए तेज़ाब में ग़रीबी के [4]
जोतीराव फुले, डॉ. आंबेडकर और पेरियार की तरह सावित्रीबाई फुले को भी इस बात का बहुत दुःख होता था कि शूद्रों-अतिशूद्रों को बेहतर जीवन के सारे सपने मर गए हैं। उनके भीतर जीवन जीने का उत्साह और उमंग नहीं बचा है। उन्होंने मान लिया है कि दुःख, अपमान और पराधीनता ही उनकी नियति है। उन्होंने ब्राह्मणों की इस बात को मान लिया है कि बिना किसी इच्छा के कर्म करते जाओ, चाहे तुम्हें इसका फल मिले या न मिले। वे अच्छी तरह समझती थीं कि शूद्रों-अतिशूद्रों के कर्मों का सारा फल ब्राह्मण हड़प लेते हैं और बिना फल की चिंता किए खटते रहने का उपदेश देते हैं–
शूद्रों-अतिशूद्रों की दरिद्रता के लिए
अज्ञानता व रूढ़िवादी
रीति-रिवाज़ हैं जिम्मेदार
परम्परागत बेड़ियों में बंधे-बंधे सब
पिछड़ गए हैं सबसे देखो
जिसका यह परिणाम है कि हम
झुलस गए तेज़ाब में ग़रीबी के
नहीं रहा अहसास कोई भी
सुख-सम्मान, अधिकार का
न कोई आशा और इच्छा
आत्मसात कर दु्ःखों को
समझा सुखी ही अपने को
पोंगा पंडित, साधु-संत सब
मांगें भीख बिना मेहनत कर
घूमें गली-गली, जग को दें उपदेश
बिना काम के चाहें फल यह
लालच दिखा स्वर्ग-पुण्य का
डॉ. आंबेडकर ने शूद्रों-अतिशूद्रों की पशुवत ज़िंदगी के लिए दुःख प्रकट किया है और धिक्कारा भी है। सावित्रीबाई फुले भी अज्ञानतावश पशुवत ज़िंदगी जीने के लिए शूद्रों-अतिशूद्रों को धिक्कारती हैं–
जीवन स्वीकारते पशु समान
पशुवत जीने को सुख समझें
है न यह घोर अज्ञान! [5]
महाराष्ट्र में ब्राह्मणवादी पेशवाई शासन में मनु की संहिता का कठोरतापूर्वक पालन होता था। जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले द्वारा खोले गए एक स्कूल में पढ़ने वाली एक ‘अछूत’ लड़की ने एक निबंध में लिखा कि पेशवा के शासन में ‘अछूतों’ के साथ कैसा निर्मम और क्रूर व्यवहार होता था। किस तरह पेशवा के शासन की समाप्ति और ब्रिटिश राज क़ायम होने के बाद एक हद तक मुक्ति मिली। उस ‘अछूत लड़की’ ने लिखा “इसके पूर्व (ब्रिटिश शासन से पहले) हमें इमारतों की नींव में जीवित गाड़ दिया जाता था। …हमें पढ़ने-लिखने की अनुमति नहीं थी। …ईश्वर ने अंग्रेजों के राज को दान के रूप में दिया है और हमारी शिकायतों का निवारण हुआ है। कोई भी हमें उत्पीड़ित नहीं करता। कोई भी फाँसी पर नहीं लटकाता। कोई भी हमें जीवित नहीं गाड़ता। हमारी संतान अब जीवित रह सकती है। हम कपड़े पहन सकते हैं, अपने तन को कपड़ों से ढक सकते हैं। हर एक को अपनी आय के अनुसार जीने की स्वतंत्रता है। कोई रुकावट नहीं, कोई प्रतिबंध नहीं। यहां तक कि गुलटेकाडी का बाज़ार भी हमारे लिए खुला है।”[6]
फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर का भी मानना था कि शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की दुर्दशा का कारण अज्ञानता है। डॉ. आंबेडकर शिक्षित बनो का नारा देते हैं। सावित्रीबाई फुले भी अपनी कविताओं में मनुवादी बेडि़यों को तोड़ने और शिक्षित बनने का आह्वान करती हैं। वे कहती हैं कि सदियों से शिक्षा से वंचित अज्ञानता के शिकार शूद्रों, इतिहास ने तुम्हें बड़ा अच्छा अवसर प्रदान किया है। अंग्रेजों ने ब्राह्मण पेशवाओं का अंत कर दिया है, जिन्होंने तुम्हारी शिक्षा पर प्रतिबंध लगा रखा था। वे कहती हैं, उठो पेशवाओं का अंत हो चुका है। यह अच्छा अवसर है जब तुम्हारे पास अपनी ग़ुलामी की परम्परा तोड़ने का। लेकिन इसके साथ ही वे इस बात के लिए भी चेताती हैं कि तुम मनुवादी शिक्षा मत लेना–
उठो, अरे अतिशूद्र उठो तुम
मर-मिट गए मनुवादी पेशवा
ख़बरदार अब मत अपनाना
मनु-अविद्या की…
रची ग़ुलामी-परम्परा को [7]
अंग्रजों के कारण शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं को शिक्षा का अवसर मिला था। इस शिक्षा ने इन तबकों के लिए मुक्ति का द्वार खोला था। क्योंकि, मनुवादी-ब्राह्मणवादी शिक्षा नहीं थी, जो ऊंच-नीच की शिक्षा देती है। अंग्रेजी शिक्षा समानता, तर्क और न्याय की शिक्षा देती थी। इसी शिक्षा के चलते जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे महान समाज सुधारक पैदा हुए थे। अंग्रेजी शिक्षा ने डॉ. आंबेडकर जैसे महान व्यक्तित्व का निर्माण किया था। सावित्रीबाई फुले अंग्रेजी शिक्षा के महत्व को ख़ूब अच्छी तरह समझती थीं। उन्होंने अपनी कई कविताओं में अंग्रेजी शिक्षा की तारीफ़ की है। वे अंग्रेजों को ज्ञानदाता के रूप में संबोधित करती हैं। हम सभी जानते हैं कि शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए शिक्षा का द्वार अंग्रेजों ने खोला था। अपनी एक कविता में सावित्रीबाई कहती हैं –
ज्ञानदाता अंग्रेज जो आए
अवसर पहले यह नहिं पाया
जागृत हो, अब उठो भाइयों!
उठो, तोड़ दो रूढ़ परम्परा
शिक्षा पाने उठो भाइयों!! [8]
वे धिक्कारती हुई, समझाती हुई कहती हैं–
बिना ज्ञान के व्यर्थ सभी कुछ हो जाता
बुद्धि बिना तो इंसान भी पशु कहलाता
वे अंग्रेजों द्वारा शिक्षा का द्वार सबके लिए खोलने को एक सुनहरे अवसर के रूप में देखती हैं और कहती हैं कि इस शिक्षा को ग्रहण करके अपनी दुर्दशा का अंत करो–
अब निठल्ले मत बैठो
जाओ, शिक्षा पाओ
पीड़ित और बहिष्कृतों की
दुर्दशा का अंत करो
सीखने का मिल गया है यह तुम्हें
अवसर सुनहरा, सीख लो
और तोड़ दो ज़ंजीरें ये
जाति-व्यवस्था की मत सुनो
फेंक डालो शीघ्र भाई
ब्राह्मणों के धर्मग्रंथों को [9]
आधुनिक अंग्रेजी ज्ञान को सावित्रीबाई फुले माता का दर्जा देती हैं। उनकी एक कविता का शीर्षक है– ‘स्नेहमयी माँ’। इसमें इसके पहले के ज्ञान को मूर्खों का ज्ञान कहती हैं। आधुनिक ज्ञान सत्य से अवगत कराता है–
अंग्रेजी माँ! अंग्रेजी माँ!!
शूद्रों का उद्धार करे तू, मनोभावना से
अंग्रेजी माँ! नहीं रहा अब मुगली शासन
न मूर्खों और पेशवाओं का भी शासन
स्नेहमयी हे अंग्रेजी माँ! देती सत्-सत् ज्ञान हमें तू
शूद्रों का भी जीवन है तू
अंग्रेजी माँ! तोड़ी तूने पशु-भावना
माँ! तू ही देती मनुष्यता
हम जैसे सब शूद्र जनों को [10]
शूद्रों-अतिशूद्रों की ग़ुलामी और दुर्दशा के साथ सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं में महिला की स्थिति का अत्यन्त मार्मिक वर्णन किया है। वे लिखती हैं कि महिलाएं सुबह से शाम तक खटती हैं, जबकि बहुत सारे पुरुष मुफ़्तख़ोर की तरह बैठे रहते हैं। वे प्रकृति से उदाहरण देकर बताती हैं कि पशु-पक्षियों में भी नर-मादा मिलकर काम करते हैं, तो स्त्री-पुरुष एक साथ मिलकर काम क्यों नहीं करते? वे ऐसे निकम्मे पुरुषों को धिक्कारती हुई कहती हैं– ‘क्या इन निकम्मों को मनुष्य कहा जाए?’ शीर्षक कविता में उन्होंने इस स्थिति का इस प्रकार वर्णन किया है–
पौ फटने से गोधूलि तक, महिला करती श्रम
मुफ़्तख़ोर पुरुष जीता है उसकी मेहनत पर
पक्षी और जानवर भी सब मिलकर करते कर्म
कैसे फिर हम कहें मनुष्य, कहो निकम्मों को? [11]
स्त्री-पुरुष संबंधों और पुरुष के व्यभिचारी और धोख़ेबाज़ चरित्र को सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविता ‘भौंरा और कली’ के माध्यम से प्रस्तुत किया है। भौंरे को पुरुष के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है और स्त्री को फूल के रूप में। यह कविता ब्राह्मणवादी-सामंती मानसिकता के अधिकांश पुरुषों के चरित्र को उजागर करके रख देती है–
मसल डालता है वह निर्लज
उसका सुंदर रूप
आता है तूफां के जैसा
और टूट पड़ता है उस पर
उसके मधु को सोख-साख कर
उसके उस निष्प्राण क्लांत-से
जिस्म को ठुकरा देता है
कली कौन-सी? पूछे है फिर…
और भूल करके उसको वह
नई कली को ढूंढे है फिर
है उसका यह काम
उसकी फितरत धोखे वाली
उसकी दुनिया है स्वच्छंद
कहे सावित्री, यही देखकर
हूँ भौचक्की और दुःखी [12]
सावित्रीबाई फुले अपनी कविताओं में इतिहास की ब्राह्मणवादी व्याख्या को चुनौती देती हैं। वे कहती हैं कि शूद्र ही इस देश के मूलनिवासी और वीर योद्धा थे और यहां के शासक थे। उनका समाज अत्यन्त समृद्ध समाज था। बाद में आक्रामणकारियों ने शूद्र शब्द को अपमानजनक बना दिया। वे ‘शूद्र शब्द का अर्थ’ कविता में लिखती हैं कि–
शूद्र का असली मतलब मूलनिवासी था
लेकिन सूर विजेताओं ने
बना दिया ‘शूद्र’ को गाली
ईरानी हों या हों ब्राह्मण
ब्राह्मण हों या हों अंग्रेज
सब पर अंतिम विजय प्राप्त की
शूद्रों ने ही
क्योंकि वे ही क्रांतिकारी थे
मूलनिवासी थे, समृद्ध थे
वही ‘भारतीय’ कहलाते थे
ऐसे वीर थे अपने पूर्वज
हम हैं उन लोगों के वंशज
वे साफ़ शब्दों में कहती हैं कि यह भारत देश, यहाँ के मूल निवासियों का देश है। वही इस धरती के असली हकदार हैं–
नहीं है भारत और किसी का
न ईरानी लोगों का यह
न यूरोपीय लोगों का
न तातारों, न हूणों का
इसकी नसों में रुधिर बह रहा
मूलनिवासी शूद्रों का
अपनी कविताओं में सावित्रीबाई फुले इतिहास और मिथकों की ब्राह्मणवादी व्याख्याओं को चुनौती देती हैं। वे ‘राजा बलि की स्तुति’ शीर्षक कविता में बताती हैं कि ब्राह्मणवादी शूद्रों-अतिशूद्रों के उदार और महान् राजा बलि के साथ छल करने वाले और धोखे से उनके राज्य छीन लेने वाले वामन का गुणगान करते हैं। दलित-बहुजन परम्परा राजा बलि को महान् राजा के रूप में याद करती है। सावित्रीबाई फुले भी उनकी महानता और उदारता को याद करती हैं और बताती हैं कि उनका राज्य कितना समृद्धशाली था। उनके लिए सारी प्रजा एक समान थी। कोई अन्याय नहीं था, कोई दुःख नहीं था। राजा बलि को याद करने के साथ ही उनकी पत्नी को भी याद करती हुई कहती हैं कि पति-पत्नी दोनों एक साथ सुख से रहते थे–
बलि शासक था पुण्यात्मा
दानव-राज बलि धर्मात्मा
बली एक उदार चरित था
उसकी प्रजा ख़ुश थी सारी
किसी चीज़ की कमी नहीं थी
राज में उसके सब संतुष्ट थे
तीनों लोक उसके गुण गाते
उसका अपना स्वतंत्र देश था
विमर्श जहां वैज्ञानिक करते
पवित्र यज्ञ की ज्वाला हरदम
वहां रहा करती प्रकाशित
दान दिया जाता था सोना
रत्न जड़ित मुकुटों को पहनकर
शाही युगल दान करता था
उनकी पत्नी विन्ध्यावली भी
साथ हमेशा उनके रहतीं
आओ, हम सब याद करें मिल
उस युगल शासक को फिर से
और करें प्रशंसा, मिलकर गाएं गीत
हे पावन नेक आत्मा, राजा बलि
हरदिन करते लोग स्तुति सुनो तुम्हारी [13]
वे अपनी कविताओं में कबीर की तरह हिन्दू धर्म के ढोंग-पाखंड को भी उजागर करती हैं। वे कहती हैं कि जिस पत्थर को सिन्दूर लगाकर भगवान बना दिया गया है; वास्तव में वह पत्थर है। वे विभिन्न देवी-देवताओं पर आस्था और विश्वास को नकारती हैं। वे कबीर की तरह तर्क करती हैं कि यदि मनौती मानने से, चढ़ावा चढ़ाने से और पत्थर पूजने से बच्चे पैदा होते; तो फिर स्त्री और पुरुष को शादी करने की क्या ज़रूरत पड़ती। सावित्रीबाई पूरी तरह से वैज्ञानिक चेतना से लैस थीं। वे ऐसी किसी भी चीज़ को स्वीकार करने को तैयार न थीं, जो तर्क पर आधारित न हो और विज्ञान जिसका समर्थन न करता हो। ‘मन्नत’ शीर्षक कविता में कबीर की तरह उन्होंने ढोंग-पाखंड की धज्जियां उड़ा दीं–
पत्थर को सिन्दूर लगाकर
बना दिया है उसे देवता
वह तो वास्तव में पत्थर है
इसी कविता में वे आगे लिखती हैं–
मन्नत कर बकरा कटवाए
और चढ़ावें भेंट-चढ़ावा
पत्थर के इन देवताओं पर
करें मनौती पुत्र जन्म की
पत्थर पूजे से जो होते बच्चे
सोचो! फिर क्यों
शादी करते हैं नर-नारी? [14]
सावित्रीबाई फुले भारतीय पुनर्जागरण की कवयित्री हैं। यूरोपीय पुनर्जागरण के दार्शनिकों ने यह सवाल उठाया था कि मानवीय गरिमायुक्त जीवन किसे कहें? किस जीवन को मानवीय जीवन कहें? किसे पशुवत् जीवन कहते हैं? भारत में ब्राह्मणवाद-सामंतवाद ने अधिकांश लोगों के जीवन को पशुवत् जीवन बना दिया था। सावित्रीबाई फुले की कविताएं ‘इंसान कौन और कौन नहीं है।’ इसका विस्तृत विमर्श प्रस्तुत करती हैं। ‘उसे इंसान कहें क्यों?’ शीर्षक कविता में कौन इंसान है, कौन नहीं? किसका जीवन इंसानी है; किसका पशुवत्? इस पर प्रश्न उठाती हैं। वे कहती हैं कि जिसके पास ज्ञान नहीं है; शिक्षा नहीं है; उसका जीवन पशुवत् है। लेकिन, इसके साथ वे यह भी कहती हैं कि यदि कोई व्यक्ति ये दोनों चीज़ें प्राप्त कर लें, लेकिन उसके आधार पर अपना जीवन न जिए; तो उस व्यक्ति का भी जीवन पशुवत् है–
नहीं ज्ञान, न ही है विद्या
न इच्छा पढ़ने-लिखने की
बुद्धि होकर चले न उस पर
ऐसे बुद्धिहीन व्यक्ति को
कैसे कहो, कहें इंसान?
रविदास और कबीर की तरह सावित्रीबाई फुले भी श्रम न करने वाले व्यक्ति को इंसान मानने को तैयार नहीं थीं। वे बिना श्रम किए बैठकर खाने वाले निठल्ले व्यक्ति के जीवन की तुलना पशु से करती हैं–
जो न करता श्रम ज़रा-सा
और ज्योतिष पर करे भरोसा
स्वर्ग-नरक के चक्कर में जो
फिरे रात-दिन लिए हताशा
यूं तो करे न पशु भी कोई
फिर ऐसे आलसी जनों को
कैसे हम इंसान कहें…?
ब्राह्मणवाद-सामंतवाद-दासता और ग़ुलामी पर टिका समाज था। आधुनिक समाज का सबसे बड़ा मूल्य आज़ादी है। आधुनिक युग का इतिहास ही आज़ादी के संघर्ष का इतिहास है। हर व्यक्ति की स्वतंत्रता ही आधुनिकता का सबसे बड़ा मूल्य है। फुले, आंबेडकर और पेरियार की तरह सावित्रीबाई के लिए भी आज़ादी सबसे बड़ा मूल्य थी– शूद्रों-अतिशूद्रों की ब्राह्मणशाही से आज़ादी। स्त्रियों की पुरुषों के वर्चस्व से आज़ादी। वे बार-बार अपनी कविताओं में इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि जिस व्यक्ति को ग़ुलामी का दुःख न हो और न हो आज़ादी की चाहत, उस व्यक्ति को इंसान नहीं कहा जा सकता है–
जिसे ग़ुलामी का दुःख न हो
न ही अपनी आज़ादी के
छिन जाने का रहे मलाल
नहीं समझ आवे जिसको कुछ
इंसानियत का भी जज़्बा
उसे कहें कैसे हम बोलो जी, इंसान? [15]
सावित्रीबाई फुले की कविताएं आधुनिक चेतना से लैस हैं। आज भी जहां स्त्रियां आभूषणों-गहनों के पीछे भागती रहती हैं। उन्हें अपनी सुंदरता बढ़ाने का साधन समझती हैं। इन आभूषणों को पहनकर सुन्दर दिखना चाहती हैं। इसके उलट उनकी कविताएं स्त्री का सबसे बड़ा और सुंदर गहना शिक्षा को मानती हैं। वे कहती हैं कि स्वाभिमान की ज़िंदगी जीने के लिए एक लड़की के लिए शिक्षा सबसे आवश्यक चीज़ है। वे लड़कियों का आह्वान करती हैं कि पाठशाला जाओ और ख़ूब पढ़ो-लिखो–
स्वाभिमान से जीने हेतु
अरी बेटियों पढ़़ो-लिखो
हर दिन पाठशाला में जाकर
अपना ज्ञान बढ़ाओ सुनो
हर इंसान का सच्चा आभूषण है शिक्षा
हर स्त्री पहने शिक्षा का यह गहना
जाओ पाठशाला में ज्ञान की शिक्षा लो [16]
दुर्भाग्य है इस देश का, उनके इस आह्वान के शताधिक वर्षों बाद भी महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा निरक्षर है और ग़ुलामी की स्थिति में है। आज भी यह हिस्सा पशुवत् ज़िंदगी ही जी रहा है। उसके जीवन को किसी भी तरह से मानवीय गरिमायुक्त जीवन नहीं कहा जा सकता है।
सावित्रीबाई महिलाओं को आह्वान करती हैं कि चलो चलकर शिक्षा ग्रहण करें। शिक्षा ही अज्ञानता और ग़रीबी की ज़ंजीरों को तोड़ सकती है। सदियों के दुःख और संताप को ख़त्म कर सकती है। पिछड़ेपन को दूर कर सकती है। वे कहती हैं कि सभी लड़कियों को शिक्षा पाना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेना चाहिए। अपनी इस बात को लड़कियों के दिलो-दिमाग़ में उतार देने के लिए वे रोज़ सामूहिक तौर पर लड़कियों से अपने द्वारा रचे गए इस गीत का गान कराती थीं–
विद्या माँ के दर पर
चलो चलें शिक्षा पाने
विद्या की देवी की वंदना
करें चलो, उनसे मांगें
शुभ आशीष ज्ञान का
और ग़रीबी-अज्ञानता की
सब ज़ंजीरें तोड़ें
जिनमें हम जकड़े हैं, मिलकर
वो ज़ंजीरें तोड़ें
सदियों से है व्याप्त यहां जो
अनपढ़ता, अज्ञान सुनो
पिछड़ेपन की चादर फेकें
और उन्नति करें चलो [17]
सभी आधुनिक दार्शनिकों ने कहा है कि अज्ञानता ही अंधकार है। सावित्रीबाई ‘अज्ञानता’ शीर्षक से अपनी कविता में यह प्रश्न उठाती हैं कि आख़िर इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है?
एक ही दुश्मन है हम सबका
मिलकर उसे खदेड़ दें
उससे ज़्यादा ख़तरनाक तो कोई नहीं है
खोजो, खोजो…
मन के भीतर झांको देखो
वे ख़ुद ही बताती हैं कि इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन उसकी अज्ञानता है। हम सभी जानते हैं कि ब्राह्मणों और उनके धर्मग्रंथों ने शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया था। क्योंकि, वे जानते थे कि अज्ञानी और अशिक्षित व्यक्ति को ही ग़ुलाम बनाकर रखा जा सकता है। सदियों तक उसका शोषण-उत्पीड़न किया जा सकता है। इसी कारण से सावित्रीबाई अज्ञानता को सबसे ख़तरनाक दुश्मन घोषित करती हैं–
चलो तुम्हें मैं बतलाती हूं अब पहचान
ख़तरनाक उस खल-दुश्मन की
सुनो ध्यान से उस दुश्मन का
नाम सुनो अब….
वह दुश्मन है यह ‘अज्ञान’ [18]
आधुनिक भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति का द्वार आधुनिक शिक्षा ने खोला। जोतीराव फुले, शाहूजी महाराज, डॉ. आंबेडकर और पेरियार जैसी महान् विभूतियां भी इसी आधुनिक शिक्षा की देन थीं। महाराष्ट्र में सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई जैसी महान् विदुषी महिलाएं इसी आधुनिक शिक्षा से पैदा हुईं; जिन्होंने वर्ण-जाति व्यवस्था और महिलाओं की दासता के ख़िलाफ़ अथक संघर्ष किया। सावित्रीबाई आधुनिक शिक्षा को सूरज की रोशनी की तरह मानती थीं। उनका कहना था कि इस शिक्षा ने अछूत कहे जाने वाले महारों की ज़िंदगी में भी रोशनी ला दी। हम सभी जानते हैं कि डॉ. आंबेडकर इसी अछूत कही जाने वाली महार जाति में पैदा हुए थे। लेकिन, आधुनिक शिक्षा ने उन्हें विश्व के सर्वश्रेष्ठ महामानवों में से एक बना दिया। ‘जोतिबा से संवाद’ शीर्षक से अपनी कविता में वे शिक्षा और ज्ञान की तुलना सूरज की रोशनी से करते हुए कहती हैं–
जोतिबा! सुनिए, देखिए ज़रा
अस्त हुआ चन्द्र तो सूर्य उगा
फैल गया प्रातः का अद्भुत उजियारा
कहें जोतिबा सावित्री से
कहा सत्य तुमने है बिलकुल
पीछे हटा अंधेरा देखो
ज्ञान के इस उजियारे से
जाग गए हैं सचमुच देखो
शूद्र-अतिशूद्र, महार जगे [19]
सावित्रीबाई फुले की कविताएं आधुनिक जागरण की कविताएं हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में ब्राह्मणवाद-मनुवाद को चुनौती दी। शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति का आह्वान किया है। उनकी कविताएं इस बात की प्रमाण हैं कि वे आधुनिक भारत की प्रथम विद्रोही कवयित्री हैं।
………………………………
[1] सावित्रीबाई फुले, रचना समग्र, संपादक : रजनी तिलक
[2] मनुस्मृति
[3] सावित्रीबाई फुले रचना समग्र, संपादक : रजनी तिलक, पृ. 59
[4] वही, परनिर्भर शूद्र, पृ. 64
[5] वही, पृ. 65
[6] एक बिसरी समाज सुधारक, सावित्रीबाई फुले का जीवन और संघर्ष, सम्पादक : ब्रजरंजन मणि, पैमिला सरदार, गेल ओमवेट, एक अध्यापिका और अधिनायिका, पृ. 36, 37
[7] एक भूली-बिसरी समाज सुधारक, सावित्रीबाई फुले का जीवन और संघर्ष, सम्पादक : ब्रजरंजन मणि और पैमिला सरदार, पृ. 73
[8] वही
[9] वही
[10] वही, पृ. 75, 76
[11] फारवर्ड प्रेस; प्रेम, स्त्रीवाद और सामाजिक क्रांति की कवि सावित्रीबाई फुले, ललिता धारा
[12] वही
[13] सावित्रीबाई फुले रचना समग्र, संपादक : रजनी तिलक, पृ. 60
[14] वही, पृ. 57
[15] वही, पृ. 69, 70
[16] वही, पृ. 74
[17] वही, पृ. 76
[18] वही, पृ. 77
[19] वही, पृ. 79, 80
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
















