यह प्रसंग केवल महात्मा गांधी की उदारता का नहीं, बल्कि उनके गहरे धर्म-बोध, नैतिक साहस और वैश्विक मानवीय दृष्टि का जीवंत प्रमाण है। यह कहानी बताती है कि गांधी के लिए धर्म कोई दीवार नहीं था, बल्कि मनुष्य को बेहतर बनाने की एक सतत प्रक्रिया था।
एक ईसाई युवती मोरियल लिस्टर जब सेवाग्राम आश्रम पहुँचीं, उसी दिन गांधीजी को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया। जाते समय उन्होंने आश्रमवासियों से बस इतना कहा “इस लड़की पर आश्रम के नियम और अनुशासन मत थोपना। यह जैसे चाहे, वैसे रहे।” यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि गांधीजी स्वयं अनुशासित थे पर उनके अनुसार अनुशासन अपने आप में कोई गुण है। बल्कि अनुशासन किसलिए यह महत्वपूर्ण है। जब तक हम किसलिए को स्पष्ट नहीं करते तब तक अनुशासन का कोई मतलब नहीं।
इस एक वाक्य में गांधी का संपूर्ण धर्म-दर्शन समाया हुआ है। उनके लिए धर्म का अर्थ अनुशासन थोपना नहीं था, बल्कि अंतरात्मा को स्वतंत्र करना था। गांधी मानते थे कि धर्म परिवर्तन की नहीं, धर्म में परिवर्तन की ज़रूरत होती है। समय बदलता है, समाज बदलता है, मनुष्य की आकांक्षाएँ बदलती हैं—लेकिन यदि धर्म जड़ हो जाए, तो वह जीवन को संकीर्ण बना देता है।
गांधी का प्रसिद्ध रूपक था—“टोपी के नाप का सिर बनाने से बेहतर है, सिर के नाप की टोपी बनाना।” दुर्भाग्य से अधिकांश धर्म संस्थाएँ टोपी के नाप का सिर बनाती हैं; गांधी मनुष्य के सिर के अनुसार टोपी गढ़ना चाहते थे।
छह महीने बाद, जब मोरियल लिस्टर आश्रम से विदा लेने लगीं, उन्हें गांधीजी का एक पत्र मिला। उसमें लिखा था “मैं यह नहीं जानता कि मेरे आश्रम ने तुम्हें क्या दिया, लेकिन मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि तुम यहाँ से एक अच्छी ईसाई और एक इंसान बनकर जाओगी।”
यह कथन किसी धर्म-प्रचारक का नहीं, बल्कि उस साधक का है जो जानता था कि धर्म की सच्चाई पूजा-पद्धति में नहीं, चरित्र में प्रकट होती है।
मोरियल लिस्टर ने अपने अनुभवों को पुस्तक Gandhi Remembered में दर्ज किया। वे लिखती हैं कि इंग्लैंड लौटने पर अख़बारों ने उन्हें अपार धन का लालच दिया—इतना कि वे चालीस मकान खरीद सकती थीं। लेकिन उन्होंने सब ठुकरा दिया, क्योंकि सेवाग्राम में उन्होंने सत्य, निर्भयता और ईमानदारी को केवल सीखा नहीं, जिया था।
गांधी के आश्रम में रहकर कोई व्यक्ति—चाहे वह किसी भी धर्म का हो—एक बेहतर इंसान बनकर निकलता था: बेहतर हिंदू, बेहतर मुसलमान, बेहतर ईसाई। गांधी का विश्वास था कि जो अपने धर्म में अधिक करुणामय, अधिक सत्यनिष्ठ और अधिक नैतिक बनता है, वही सच्चे अर्थों में धार्मिक है।
मोरियल लिस्टर भी गांधीजी के आश्रम में रहकर अंततः एक बेहतर इंसान बनकर लौटीं—और यही गांधी का सबसे बड़ा धर्म था।
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