— परिचय दास —
ज्ञान रंजन के न रहने की सूचना किसी एक व्यक्ति के जाने की सूचना नहीं है, यह उस बेचैन चेतना के ठहर जाने की ख़बर है जो हिंदी कथा-साहित्य में लगातार प्रश्न करती हुई चलती रही। यह जाना एक देह का जाना है पर देह के साथ जो दृष्टि , जो असुविधाजनक सच्चाई, जो चुप्पी को चीरती हुई भाषा थी—वह कहीं नहीं गई। वह हमारे समय की नसों में, हमारे पढ़ने की आदतों में और हमारे भीतर की बेचैनी में रह गई है।
ज्ञान रंजन की कहानियाँ कभी हमें सहज नहीं करतीं। वे हमें कुर्सी पर टिककर बैठने नहीं देतीं। वे पूछती हैं—तुम जिस समाज में साँस ले रहे हो, वह वास्तव में कैसा है? वहाँ प्रेम कैसे घायल होता है, राजनीति कैसे रोज़मर्रा की भाषा में उतर आती है और मनुष्य कैसे धीरे-धीरे अपने ही भीतर से विस्थापित हो जाता है। उनकी कथा-भाषा किसी प्रदर्शन का शोर नहीं करती; वह एक ऐसी धीमी आँच है, जिस पर सच पकता है—और पकते-पकते जलन पैदा करता है।
ज्ञान रंजन का गद्य काव्यात्मक है, पर वह सौंदर्य के लिए काव्यात्मक नहीं है। उसमें काव्य इसीलिए आता है क्योंकि यथार्थ को सीधे-सीधे कह पाना कभी-कभी संभव नहीं होता। उनकी भाषा में जो टूटन है, जो विराम हैं जो अधूरे वाक्य हैं—वे किसी शिल्प-प्रयोग की चालाकी नहीं बल्कि उस समय की वास्तविक श्वास-प्रश्वास हैं, जिसमें आदमी पूरा बोल ही नहीं पाता। वह कहना चाहता है, पर शब्द बीच में ही रुक जाते हैं। ज्ञान रंजन ने उस रुकावट को साहित्य बना दिया।
उनकी कहानियों में पात्र अक्सर ऐसे लगते हैं जैसे वे बोलते हुए भी अकेले हैं। वे भीड़ में खड़े हैं, परिवार में हैं, दफ़्तर में हैं, राजनीतिक हलचलों के बीच हैं—फिर भी उनके भीतर एक सन्नाटा है। यह सन्नाटा निष्क्रिय नहीं है; यह सन्नाटा प्रश्नों से भरा है। ज्ञान रंजन के यहाँ मौन भी एक कथन है। कई बार तो सबसे ज़रूरी बात वही होती है, जो कहा नहीं गया।
वे उस पीढ़ी के कथाकार थे, जिसने आज़ादी के बाद के सपनों के टूटने को बहुत नज़दीक से देखा। उनके साहित्य में कोई रोमानी निराशा नहीं है बल्कि एक ठंडी, स्पष्ट, लगभग निर्मम समझ है—कि सत्ता कैसे काम करती है, विचारधाराएँ कैसे मनुष्य को भी एक औज़ार बना लेती हैं, और परिवर्तन का नारा कैसे कई बार केवल भाषा का खेल बनकर रह जाता है। फिर भी, उनके लेखन में पूरी तरह से निराशा नहीं है। वहाँ एक अजीब-सी ज़िद है—कि सच को देखा जाए, चाहे वह कितना ही असुविधाजनक क्यों न हो।
ज्ञान रंजन के पात्र आदर्श नहीं हैं। वे कमजोर हैं, कभी-कभी थके हुए हैं, कभी भ्रमित हैं लेकिन यही उनकी सच्चाई है। वे किसी महान कथा के नायक नहीं बल्कि समय की धूल में चलते हुए साधारण लोग हैं, जिनके भीतर इतिहास चुपचाप काम कर रहा है। ज्ञान रंजन ने बड़े-बड़े घोषणापत्रों के बजाय इन्हीं साधारण जीवन-स्थितियों में राजनीति, नैतिकता और संवेदना की जटिल गाँठों को पहचाना।
उनकी भाषा में एक तरह की ईमानदार कठोरता है। वह पाठक को खुश करने के लिए नहीं लिखती। वह पाठक से समझौता नहीं करती। कई बार तो ऐसा लगता है कि वह जान-बूझकर हमें असहज कर रही है, ताकि हम अपनी आरामदेह नैतिकताओं से बाहर निकलें। ज्ञान रंजन के यहाँ करुणा है पर वह आँसू बहाने वाली करुणा नहीं है। वह ऐसी करुणा है, जो मनुष्य को उसकी ज़िम्मेदारी का एहसास कराती है।
ज्ञान रंजन का जाना इसलिए भी दुखद है क्योंकि वे ऐसे समय में लिखते रहे जब लेखन का मतलब केवल लिखना नहीं था—बल्कि एक नैतिक जोखिम लेना था। वे जानते थे कि लिखना एक हस्तक्षेप है। उनकी कहानियाँ किसी शांत साहित्यिक संसार में नहीं, बल्कि टकरावों से भरे सामाजिक यथार्थ में खड़ी हैं। वे सत्ता के सामने विनम्र नहीं होतीं और न ही वे विद्रोह को किसी रोमांटिक मुद्रा में बदलती हैं। उनका प्रतिरोध भी उतना ही जटिल है, जितना समय स्वयं।
उनके गद्य में जो काव्य है, वह अक्सर टूटे हुए वाक्यों में चमकता है—जैसे अँधेरे कमरे में अचानक जलती हुई तीली। वह पूरी रोशनी नहीं देती, पर इतना ज़रूर दिखा देती है कि कमरे में क्या-क्या रखा है। ज्ञान रंजन ने हमें हमेशा पूरी तस्वीर नहीं दी; उन्होंने हमें देखने की ज़िम्मेदारी दी। शायद यही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक नैतिकता है।
आज जब वे नहीं हैं तो लगता है जैसे हिंदी कथा-साहित्य की एक बेचैन आँख बंद हो गई है। वह आँख जो हर चमकदार सतह के पीछे की दरारों को देखती थी। वह आँख जो यह मानने से इनकार करती थी कि समय अपने आप बेहतर हो जाता है। ज्ञान रंजन का लेखन हमें याद दिलाता है कि बेहतर होने के लिए समय को लगातार सवालों के कटघरे में खड़ा करना पड़ता है।
उनकी अनुपस्थिति में उनकी कहानियाँ और अधिक बोलेंगी। वे नई पीढ़ी को असहज करेंगी, नाराज़ करेंगी —और शायद इसी प्रक्रिया में उन्हें संवेदनशील और सजग भी बनाएँगी। ज्ञान रंजन का साहित्य किसी स्मारक की तरह नहीं, बल्कि एक चलती हुई बेचैनी की तरह है, जो हमारे साथ रहेगी।
आज उन्हें याद करते हुए मन किसी शोक-सभा की औपचारिक भाषा में नहीं जाना चाहता। मन चाहता है कि बस चुपचाप उनकी एक कहानी खोली जाए, किसी वाक्य पर ठहरकर साँस रोकी जाए और यह महसूस किया जाए कि साहित्य अभी भी हमें परेशान कर सकता है—और यही उसका सबसे बड़ा जीवित होना है। ज्ञान रंजन चले गए, पर वह असुविधाजनक सच, वह प्रश्नाकुल दृष्टि, वह काव्यात्मक कठोरता—हमारे समय में बनी रहेगी। यही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि है।
उनकी स्मृति में रुकना भी एक तरह की यात्रा है। ज्ञान रंजन को याद करना किसी स्थिर बिंदु पर खड़े होकर पुष्प अर्पित करना नहीं बल्कि चलते हुए रास्ते में बार-बार ठिठक जाना है। उनकी रचनाएँ हमें रोकती हैं—जैसे कोई अदृश्य हाथ कंधे पर रखकर कहता हो: ज़रा देखो, यहाँ कुछ छूट गया है और जब हम देखते हैं तो पाते हैं कि छूटा हुआ कोई दृश्य नहीं बल्कि हमारी अपनी अनदेखी है।
ज्ञान रंजन का समय केवल कैलेंडर का समय नहीं था। वह मानसिक समय था—जहाँ विचार थकते हैं और भाषा अपने ही बोझ से लड़ती है। उन्होंने इसी मानसिक समय को अपनी कहानियों का असली पात्र बनाया। इसलिए उनके यहाँ घटनाएँ कम, स्थितियाँ अधिक हैं। कुछ घटता नहीं फिर भी सब कुछ घट रहा होता है। जैसे जीवन अपने भीतर ही अपने विरुद्ध घटित हो रहा हो।
उनके गद्य में जो तनाव है, वह कथानक का नहीं, चेतना का तनाव है। एक ऐसी चेतना जो किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले ही रुक जाती है क्योंकि निष्कर्ष अक्सर झूठे होते हैं। ज्ञान रंजन इस झूठ से सावधान थे। वे जानते थे कि जल्दबाज़ी में लिया गया निष्कर्ष सत्ता का सबसे प्रिय औज़ार होता है। इसलिए वे अपने पाठक को अधर में छोड़ देते हैं—अधूरी समझ के साथ, असुविधा के साथ।
उनकी भाषा में कहीं भी सजावट का आग्रह नहीं है। शब्द वहाँ इसलिए हैं क्योंकि उनके बिना बात कही नहीं जा सकती। कई बार लगता है कि शब्द भी मजबूरी में वहाँ आए हैं। वे अपनी उपस्थिति से इतर कुछ साबित नहीं करना चाहते। इसीलिए ज्ञान रंजन का गद्य पढ़ते हुए हमें भाषा नहीं दिखती, स्थिति दिखती है—और वही स्थिति धीरे-धीरे भाषा बन जाती है।
उनकी कहानियों में समय अक्सर रुका हुआ लगता है। पात्र आगे नहीं बढ़ते, पीछे भी नहीं लौटते। वे एक तरह के नैतिक चौराहे पर खड़े रहते हैं, जहाँ हर दिशा संदिग्ध है। यही वह बिंदु है, जहाँ ज्ञान रंजन का साहित्य हमें सबसे अधिक परेशान करता है। क्योंकि यहाँ कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है। कोई ऐसा विकल्प नहीं, जिसे चुनकर हम स्वयं को निर्दोष घोषित कर सकें।
ज्ञान रंजन के यहाँ प्रेम भी सरल नहीं है। वह किसी मुक्ति का आश्वासन नहीं देता। प्रेम भी यहाँ सामाजिक संरचनाओं से टकराता है, राजनीतिक दबावों से घायल होता है, और कई बार अपनी ही असमर्थता से टूट जाता है। उनके पात्र प्रेम करते हुए भी अकेले हैं। शायद इसलिए कि प्रेम भी एक सामाजिक क्रिया है और समाज यहाँ कभी निर्दोष नहीं है।
उनकी दृष्टि में मनुष्य कोई पूर्ण इकाई नहीं है। वह लगातार बनता-बिगड़ता हुआ, टूटता-जुड़ता हुआ प्राणी है। इसलिए उनके पात्र कभी एक जैसे नहीं रहते। वे अपने ही भीतर बदलते रहते हैं—कभी डर से, कभी समझौते से, कभी थकान से। ज्ञान रंजन ने इस परिवर्तन को न तो नायकत्व दिया, न ही खलनायकी। उन्होंने बस उसे दर्ज किया—जैसा वह है।
उनकी कहानियाँ हमें यह भी सिखाती हैं कि साहित्य का नैतिक दायित्व उपदेश देना नहीं, बल्कि दृश्य को साफ़ करना है। ताकि पाठक स्वयं देख सके—और स्वयं तय कर सके कि वह जो देख रहा है, उसके साथ क्या करना है। ज्ञान रंजन ने पाठक को कभी बचाया नहीं। वे उसे सुरक्षित नहीं रखते। वे उसे जिम्मेदार बनाते हैं।
आज जब हम उनके न रहने की बात करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत शोक नहीं है। यह एक तरह की सामूहिक रिक्ति है। एक ऐसी आवाज़ की कमी, जो बहुत ऊँची नहीं थी, पर लगातार थी। जो चिल्लाती नहीं थी, पर काटती थी। जो हमें बार-बार यह याद दिलाती थी कि साहित्य कोई आरामदेह कुर्सी नहीं, बल्कि एक अस्थिर ज़मीन है।
ज्ञान रंजन का जाना हमें यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि हम किस तरह के लेखन के आदी होते जा रहे हैं। क्या हम अब भी उस असुविधा को झेलने के लिए तैयार हैं जो उनका साहित्य पैदा करता है? या हम केवल वही पढ़ना चाहते हैं जो हमारी पहले से बनी धारणाओं की पुष्टि करे? ज्ञान रंजन का साहित्य पुष्टि नहीं करता; वह विघटित करता है।
उनकी रचनाओं में जो राजनीतिक चेतना है, वह किसी नारे में सीमित नहीं है। वह रोज़मर्रा के व्यवहार में, छोटे-छोटे निर्णयों में, और चुप्पियों में छिपी हुई है। वे हमें बताते हैं कि राजनीति केवल संसद या सड़कों पर नहीं होती; वह घर के भीतर, रिश्तों के बीच, और भाषा के चुनाव में भी होती है। यह समझ उनके साहित्य को और भी प्रासंगिक बनाती है।
ज्ञान रंजन के जाने के बाद उनकी कहानियाँ शायद और अधिक कठोर लगेंगी। क्योंकि अब उनके साथ वह जीवित संवाद संभव नहीं, जिसमें हम उनसे असहमति जता सकें, या सवाल कर सकें। अब सवाल केवल पाठ के भीतर ही रहेंगे—और शायद यही उनका स्थायी निवास है।
उनकी स्मृति में कोई अंतिम वाक्य लिखना संभव नहीं क्योंकि उनके साहित्य ने हमें अंतिमता से सावधान रहना सिखाया है। फिर भी, यदि कुछ कहा जा सकता है तो बस इतना—कि ज्ञान रंजन ने हिंदी साहित्य को सजाया नहीं, उसे ज़िम्मेदार बनाया। उन्होंने हमें यह एहसास दिलाया कि लिखना एक नैतिक कर्म है और पढ़ना उससे भी बड़ा जोखिम।
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