— डॉ. शुभनीत कौशिक —
प्रख्यात पर्यावरणविद प्रो. माधव गाडगिल का कल 7 जनवरी को निधन हो गया। वे प्रो. यशपाल, जयंत नार्लीकर जैसे समकालीन भारत के उन वैज्ञानिकों की परम्परा में थे, जिन्होंने अपने सामाजिक सरोकारों और प्रतिबद्धताओं के चलते भारत के सार्वजनिक जीवन में अपनी वैज्ञानिक शख़्सियत की मौजूदगी को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से दर्ज कराया था।
विज्ञान और समाज की परस्पर निर्भरता को जिन वैज्ञानिकों ने अपने जीवन में गहरे उतारा, माधव गाडगिल उनमें से एक थे। उन्होंने अपने को वैज्ञानिक संस्थानों की प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रखा बल्कि समाज और प्रकृति की बड़ी प्रयोगशाला में वे निरंतर आवाजाही करते रहे। यही कारण है कि उनका अधिकांश लेखन सामाजिक सरोकारों और गहरी वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है।
माधव गाडगिल के लेखन से मेरा पहली बार परिचय इतिहासकार रामचंद्र गुहा के निबंधों से हुआ था। उल्लेखनीय है कि रामचंद्र गुहा के साथ उन्होंने नब्बे के दशक में ही दो महत्वपूर्ण पुस्तकें भारत की पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर लिखी थी, जो आज भी भारत के पर्यावरणीय इतिहास को जानने और समझने के लिए संदर्भ ग्रंथ हैं। ये पुस्तकें हैं : ‘दिस फ़िसर्ड लैंड’ (1992) और ‘इकॉलॉजी एंड इक्विटी’ (1995)।
प्रख्यात अर्थशास्त्री धनंजय रामचंद्र गाडगिल के बेटे माधव गाडगिल ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी और सत्तर के दशक में वे बेंगलुरू स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस में प्राध्यापक नियुक्त हुए थे। जहां उन्होंने तीन दशक से भी अधिक समय तक अध्यापन और शोध कार्य किया था। अस्सी के दशक में वे प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के सदस्य रहे। इस दौरान नीलगिरी के इलाके में जैव मंडल आरक्षित क्षेत्र विकसित करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल का जब गठन हुआ तो इसकी अध्यक्षता माधव गाडगिल ने ही की थी। और इस पैनल के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट वर्ष 2011 में भारत सरकार को सौंपी थी। पश्चिमी घाट जैसे महत्वपूर्ण और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील इलाके में पर्यावरण का संरक्षण कैसे हो, उसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी कैसे सुनिश्चित की जाए और विकास और पर्यावरण में संतुलन कैसे स्थापित हो – ये सभी मुद्दे उस रिपोर्ट की प्राथमिकताओं में थे।
इस रिपोर्ट में पश्चिमी घाट को एक वैश्विक जैवविविधता हॉटस्पॉट के रूप में विकसित करने और उसके प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने की संकल्पना विकसित की गई थी। पर्यावरणीय संवेदनशीलता के आधार पर उन्होंने पश्चिमी घाट को तीन श्रेणियों में बांटा था। इस रिपोर्ट को तैयार करने के सिलसिले में माधव गाडगिल और समिति के अन्य सदस्यों ने गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के विभिन्न इलाकों में स्थानीय जनता, आदिवासियों, मछुआरों से संवाद किया; ग्राम पंचायतों और जिला परिषद से लेकर विधायक और सांसद जैसे जनप्रतिनिधियों, सरकारी अधिकारियों और विशेषज्ञों से मुलाकातें की और उस व्यापक संवाद के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की।
वर्ष 2013 में हुई उत्तराखंड की त्रासदी के बाद उन्हें तीन मूर्ति लाइब्रेरी में सुनने का अवसर मिला था। मुझे याद है कि तीन मूर्ति का सेमिनार हाल और मल्टीपर्पज़ हाल दोनों ही श्रोताओं की भीड़ से खचाखच भरे हुए थे। शायद ही उतनी तादाद में कभी श्रोता तीन मूर्ति में किसी विशेषज्ञ को सुनने के लिए फिर इकट्ठे हुए हों। वर्ष 2023 में उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘ए वॉक अप द हिल’ प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने आम लोगों और प्रकृति के सान्निध्य में गुजरे अपने जीवन से जुड़ी यादें साझा की हैं।
माधव गाडगिल का काम आने वाले समय में पर्यावरण और प्रकृति के सवाल पर सोचने-समझने वाले लोगों को दिशा दिखाने का काम करता रहेगा। उन्हें श्रद्धांजलि।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

















