युवा नेतृत्व का वादा और सत्ता की राजनीति : परिचय दास

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युवा

पार्टी संगठन में यदि युवा नेतृत्व की माँग की जाती है तो वह केवल पीढ़ी परिवर्तन का संकेत नहीं होती बल्कि सत्ता के पुनर्विन्यास का दावा भी होती है। यह वाक्य सुनते ही एक सहज-सा उत्साह पैदा होता है—मानो राजनीति में नई हवा प्रवेश कर रही हो परंतु राजनीति में कोई भी वाक्य अपने सीधे अर्थ में नहीं चलता; हर कथन के साथ एक छाया चलती है, हर घोषणा के साथ एक मौन रणनीति जुड़ी होती है।

युवा नेतृत्व की बात सबसे पहले संगठन तक सीमित रखी जाती है। संगठन, जो सत्ता की प्रयोगशाला है, वहाँ युवाओं को आगे किया जाता है~जुलूस, सोशल मीडिया, भाषण, प्रबंधन, अनुशासन और भीड़ की ऊर्जा सँभालने के लिए।

यहाँ युवा नेतृत्व भविष्य का प्रतीक बनता है, वर्तमान का निर्णायक नहीं। कहा जाता है—अभी सीखो, अभी तैयार हो, अभी समय आएगा। यह ‘अभी’ राजनीति का सबसे लंबा काल होता है।

यहीं पहला “अगर” जन्म लेता है। अगर युवा नेतृत्व वास्तव में चाहिए, तो क्या उसे निर्णय की शक्ति भी चाहिए? अगर युवा केवल संगठन में सक्रिय है और सरकार में निष्क्रिय, तो यह नेतृत्व नहीं, श्रम-विभाजन है। युवा को ऊर्जा का स्रोत माना जाता है, बुद्धि का नहीं। यह राजनीति का पुराना शिल्प है—उम्र को जोश से जोड़ देना और अनुभव को सत्ता से।

फिर “लेकिन” आता है। लेकिन सरकार अनुभव से चलती है। लेकिन देश प्रयोगशाला नहीं है। लेकिन प्रशासनिक निरंतरता ज़रूरी है। ये सारे “लेकिन” एक साथ मिलकर एक सुरक्षा-कवच बनाते हैं, जिसके भीतर वरिष्ठ नेतृत्व आराम से बैठा रहता है। युवा नेतृत्व बाहर खड़ा होकर ताली बजाता है, समर्थन करता है, और प्रतीक्षा करता है। यह प्रतीक्षा ही असल राजनीति है।

इस पूरे सूत्र की कूटनीति यही है कि संगठन और सरकार को अलग-अलग नैतिकताओं में बाँट दिया जाए। संगठन परिवर्तन का क्षेत्र बने, सरकार स्थिरता का। संगठन में लोकतंत्र की भाषा चले, सरकार में नियंत्रण की। इससे सत्ता का केंद्र सुरक्षित रहता है और असंतोष को भविष्य की ओर धकेल दिया जाता है। युवा नेतृत्व एक वादा बन जाता है—जो हर चुनाव में दोहराया जाता है, पर पूरा नहीं होता।

इसका एक गहरा राजनीतिक लाभ भी है। जब युवा नेतृत्व संगठन में व्यस्त रहता है, तो सरकार की आलोचना करने का नैतिक अधिकार भी धीरे-धीरे उससे छिन जाता है। वह सत्ता का हिस्सा तो लगता है, पर निर्णय का नहीं। इस बीच वरिष्ठ नेतृत्व यह कहने में सफल रहता है कि युवाओं को मौका दिया जा रहा है। यह प्रतीकात्मक समावेशन है—वास्तविक नहीं।

कई बार इस सूत्र का गुह्य एजेंडा यही होता है कि सत्ता का हस्तांतरण न हो, केवल उसका प्रदर्शन हो। युवा नेतृत्व को भविष्य में टालना दरअसल वर्तमान को सुरक्षित करना है। यह एक तरह का राजनीतिक टाइम-मैनेजमेंट है—जहाँ समय युवाओं को दिया जाता है, सत्ता नहीं। युवा नेतृत्व एक आशा बनकर रखा जाता है ताकि असंतोष विद्रोह न बने।

पर इस खेल का एक जोखिम भी है। यदि युवा लंबे समय तक प्रतीक्षा में रखे जाते हैं, तो वे या तो निष्क्रिय हो जाते हैं या वैकल्पिक राजनीति की ओर मुड़ते हैं। इतिहास बताता है कि जब संगठन और सरकार के बीच यह दूरी बहुत बढ़ जाती है, तो नेतृत्व का संकट पैदा होता है। तब युवा केवल नेतृत्व नहीं चाहते, सत्ता की भाषा बदलना चाहते हैं।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि संगठन में युवा नेतृत्व चाहिए या सरकार में। प्रश्न यह है कि क्या राजनीति भविष्य को केवल पोस्टर में रखना चाहती है, या निर्णय की मेज़ पर भी। यदि युवा नेतृत्व को सरकार से अलग रखा गया, तो यह युवाओं का नहीं, राजनीति का वृद्ध होना है। और वृद्ध राजनीति अंततः अपने ही वादों का बोझ नहीं उठा पाती।

यह प्रश्न जितना दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक गहरे स्तर पर काम करता है। संगठन और सरकार के बीच युवा नेतृत्व का यह विभाजन दरअसल केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि सत्ता के संरक्षण की एक सुविचारित संरचना है। यहाँ उम्र एक जैविक तथ्य नहीं रहती; वह एक राजनीतिक उपकरण बन जाती है। युवावस्था को उत्साह, जोखिम और प्रयोग के साथ जोड़ा जाता है, जबकि सत्ता को संयम, परिपक्वता और “राष्ट्रीय हित” जैसे भारी शब्दों से बाँध दिया जाता है। यह भाषिक विभाजन ही सत्ता के असली बँटवारे को वैध बनाता है।

गम्भीरता से देखें तो संगठन और सरकार की यह द्वैत संरचना लोकतंत्र के भीतर एक प्रकार की इनर पार्टी और आउटर पार्टी रचती है। संगठन वह स्थान है जहाँ आकांक्षाएँ पैदा होती हैं, सरकार वह स्थान है जहाँ आकांक्षाओं को नियंत्रित किया जाता है। युवा नेतृत्व को पहले हिस्से में रखना दरअसल उसे नियंत्रित करने की रणनीति है। युवा जो प्रश्न पूछ सकता है, वह संगठनात्मक अनुशासन में बदल दिया जाता है; उसका असंतोष “अभी समय नहीं है” कहकर स्थगित कर दिया जाता है।

यहाँ एक और “अगर” उभरता है। अगर सरकार वास्तव में अनुभव से ही चलती है, तो क्या अनुभव केवल उम्र से आता है? और अगर युवा अनुभवहीन है, तो उसे अनुभव पाने से रोका क्यों जाता है? राजनीति इस प्रश्न से बचती है, क्योंकि इसका उत्तर सत्ता के केंद्रीकरण को चुनौती देता है। अनुभव का तर्क अक्सर चयनात्मक होता है—कुछ युवाओं के लिए रास्ते अचानक खुल जाते हैं, कुछ के लिए जीवन भर बंद रहते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या उम्र नहीं, नियंत्रण है।

सोच यह रहती है कि नेतृत्व को जैविक उत्तराधिकार के बजाय संरचनात्मक उत्तराधिकार में बदल दिया जाए। यानी व्यक्ति बदल सकते हैं, ढाँचा नहीं। युवा नेतृत्व यदि उसी ढाँचे में प्रशिक्षित किया जा रहा है तो वह परिवर्तन का वाहक नहीं, निरंतरता का एजेंट बनता है। इसीलिए संगठन में युवाओं को जिस भाषा में तैयार किया जाता है, वही भाषा बाद में सरकार में प्रवेश की शर्त बन जाती है। यह राजनीतिक समाजीकरण है, परिवर्तन नहीं।

इस सूत्र का एक और छिपा हुआ पक्ष यह है कि यह असफलताओं की जिम्मेदारी को भी बाँट देता है। संगठन में युवा चेहरे आगे रखे जाते हैं, ताकि हार या असंतोष का नैतिक बोझ उन्हीं पर आए। सरकार स्वयं को स्थिर, जिम्मेदार और अपरिहार्य घोषित कर लेती है। यदि नीतियाँ विफल होती हैं, तो कहा जाता है—युवाओं में परिपक्वता नहीं थी; यदि सफल होती हैं, तो श्रेय अनुभव को मिलता है। यह एकतरफा लेखांकन है।

इससे राजनीति में एक स्थायी संक्रमणकाल पैदा होता है—जहाँ युवा हमेशा “आने वाला नेता” होता है, और वरिष्ठ हमेशा “अभी ज़रूरी नेता”। यह संक्रमण कभी पूरा नहीं होता। लोकतंत्र के भीतर यह स्थगन खतरनाक है, क्योंकि यह भविष्य को लगातार टालता रहता है। और टला हुआ भविष्य अंततः अविश्वास में बदल जाता है।

सबसे गम्भीर प्रश्न यह है कि क्या यह मॉडल नागरिक को भी उसी मानसिकता में ढालता है। जब जनता देखती है कि युवाओं को केवल प्रतीक के रूप में स्वीकार किया जा रहा है, तो वह स्वयं भी राजनीति को प्रतीकों में समझने लगती है। नीति, जवाबदेही और निर्णय की जगह छवि, उम्र और वंश लेने लगते हैं। लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रदर्शनकारी लोकतंत्र बन जाता है।

यह सूत्र युवा बनाम वरिष्ठ का नहीं, सत्ता बनाम उत्तरदायित्व का प्रश्न है। यदि युवा नेतृत्व को सरकार में वास्तविक हिस्सेदारी नहीं दी जाती, तो यह केवल पीढ़ीगत अन्याय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आत्मविश्वास का क्षरण है। ऐसी राजनीति लंबे समय तक चल तो सकती है, पर वह भविष्य पैदा नहीं कर सकती—केवल उसे स्थगित करती रहती है।

सरकार में युवा चेहरों को प्रमुखता न दिए जाने का कारण किसी एक तर्क, व्यक्ति या परिस्थिति में नहीं है। यह एक बहुस्तरीय, सुविचारित और संरचनात्मक निर्णय है, जिसे सार्वजनिक भाषा में कभी स्वीकार नहीं किया जाता। इसका खुलासा तभी सम्भव है, जब हम राजनीति की घोषित नैतिकता के नीचे काम कर रही उसकी अघोषित तर्क-प्रणाली को देखें।

पहला कारण सत्ता का जोखिम-बोध है। सरकार निर्णयों की जगह है, और निर्णयों के साथ विफलता का जोखिम जुड़ा होता है। युवा चेहरों को आगे लाना सत्ता के लिए अनिश्चितता पैदा करता है—वे प्रश्न पूछ सकते हैं, पूर्व सहमतियों को चुनौती दे सकते हैं, और कभी-कभी अनुशासन से बाहर भी जा सकते हैं। वरिष्ठ नेतृत्व के लिए यह जोखिम असहज है, क्योंकि सरकार में स्थिरता को सबसे बड़ा मूल्य मान लिया गया है। इसलिए युवा ऊर्जा को संगठन में सुरक्षित रूप से व्यस्त रखा जाता है, जहाँ विफलता का सीधा दायित्व सत्ता के केंद्र पर नहीं आता।

दूसरा कारण अनुभव का राजनीतिक मिथक है। अनुभव को अक्सर उम्र का पर्याय बना दिया जाता है, जबकि वास्तविक अनुभव शासन, निर्णय और उत्तरदायित्व से पैदा होता है। युवा को सरकार से दूर रखकर फिर यह कहा जाता है कि उसमें अनुभव नहीं है—यह एक स्वयं-पूर्ण तर्क है। यह मिथक सत्ता को नैतिक वैधता देता है और युवाओं को प्रतीक्षा की मनोवस्था में बाँधे रखता है।

तीसरा कारण नियंत्रण की राजनीति है। युवा चेहरा तब तक स्वीकार्य है, जब तक वह नेतृत्व की भाषा दोहराता है। जैसे ही उसमें स्वतंत्र निर्णय-क्षमता या वैकल्पिक दृष्टि उभरती है, वह असुविधाजनक हो जाता है। सरकार में प्रमुखता का अर्थ है—फाइल, बजट, नीति और संसाधनों पर अधिकार। यह अधिकार सत्ता के पुराने केंद्र आसानी से साझा नहीं करते। संगठन में युवा को स्थान देना, पर सरकार में नहीं—यह सत्ता बाँटने से बचने की एक परिष्कृत तकनीक है।

चौथा कारण उत्तराधिकार की रणनीति है। वरिष्ठ नेतृत्व जानता है कि स्पष्ट युवा विकल्प उभरते ही उसकी अपरिहार्यता समाप्त होने लगती है। इसलिए उत्तराधिकार को धुंधला रखा जाता है। कई युवा चेहरों को समानांतर आगे बढ़ाया जाता है, ताकि कोई एक स्वाभाविक नेता न बन सके। यह प्रतिस्पर्धा नहीं, प्रबंधन है। सरकार में किसी एक युवा को प्रमुखता देना इस संतुलन को तोड़ सकता है।

पाँचवाँ कारण असफलता का स्थानांतरण है। सरकार में युवा चेहरों को सीमित भूमिका देकर संगठनात्मक मोर्चे पर आगे किया जाता है, ताकि जन-असंतोष का पहला आघात उन्हीं पर पड़े। यदि प्रतिक्रिया नकारात्मक होती है, तो युवा की अपरिपक्वता को दोष दिया जा सकता है; यदि सकारात्मक होती है, तो नीति-निर्माताओं का अनुभव सामने आ जाता है। यह एक सुरक्षित राजनीतिक बीमा है।

छठा और सबसे छिपा कारण यह है कि युवा नेतृत्व अक्सर समय की नैतिकता लेकर आता है। वह सवाल पूछता है—पारदर्शिता, जवाबदेही, विकेंद्रीकरण, सहभागिता। ये सवाल सरकार के मौजूदा शक्ति-संतुलन को असहज करते हैं। इसलिए युवाओं को प्रतीकात्मक सम्मान दिया जाता है, वास्तविक सत्ता नहीं।

सरकार में युवा चेहरों की अनुपस्थिति किसी कमी का परिणाम नहीं बल्कि एक सचेत राजनीतिक चुनाव है। यह चुनाव सत्ता को सुरक्षित रखता है। युवा चेहरा यदि केवल पोस्टर, मंच और भाषण तक सीमित है तो वह नेतृत्व नहीं, लोकतांत्रिक सजावट है और सजावट से सरकार चल सकती है, भविष्य नहीं।


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