— परिचय दास —
डॉ. राममनोहर लोहिया को प्रायः असुविधाजनक प्रश्नकर्ता और सत्ता से निरंतर टकराने वाले राजनेता के रूप में याद किया जाता है किंतु उनकी राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि अधिक गहरी, बहुस्तरीय और समयातीत है। लोहिया का चिंतन किसी एक अनुशासन या विचारधारा में सीमित नहीं है; वह इतिहास, भाषा, जाति, स्त्री, अर्थ, नैतिकता और दैनिक जीवन के अनुभवों से लगातार संवाद करता हुआ विकसित होता है। उनका विचार एक बंद संरचना नहीं बल्कि सतत प्रवाह है—जहाँ प्रश्न उत्तर से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं और असहमति स्वयं एक रचनात्मक मूल्य बन जाती है।
लोहिया की राजनीति सत्ता-प्राप्ति की कला नहीं बल्कि समाज की आंतरिक संरचना को बदलने का नैतिक उपक्रम है। वे राजनीति को केवल संसद, सरकार या दलों तक सीमित नहीं मानते। उनके लिए राजनीति खेत, कारख़ाने, रसोई, भाषा, स्त्री की देह, बच्चे की शिक्षा और जाति की स्मृति तक फैली हुई है। यही कारण है कि उनका राजनीतिक विचार अनिवार्यतः सांस्कृतिक हो जाता है और उनकी सांस्कृतिक दृष्टि गहरे अर्थों में राजनीतिक। वे सत्ता के औपचारिक रूप से अधिक उसके अदृश्य संचालन को पहचानते हैं—वह सत्ता जो परंपरा के नाम पर, धर्म के आवरण में, भाषा के मानक के ज़रिये और इतिहास की व्याख्या के माध्यम से समाज को नियंत्रित करती है।
लोहिया की सबसे मौलिक राजनीतिक अवधारणाओं में ‘समता’ केवल आर्थिक बराबरी नहीं है। यह सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक बराबरी की मांग भी है। वे जानते थे कि यदि आर्थिक संसाधन बराबर भी बाँट दिए जाएँ, तब भी जाति, लिंग और भाषा की असमानताएँ समाज को भीतर से खोखला बनाए रखेंगी। इसलिए उनकी राजनीति केवल वितरण की राजनीति नहीं बल्कि पहचान और सम्मान की राजनीति भी है। यह सम्मान किसी दान से नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन से आता है। लोहिया का जोर इस बात पर है कि असमानता केवल बाहर से थोपी गई नहीं होती, वह भीतर तक पैठी हुई आदत बन जाती है। इसी आदत को तोड़ना उनका लक्ष्य है।
जाति के प्रश्न पर लोहिया का दृष्टिकोण विशेष रूप से विचारोत्तेजक है। वे जाति को केवल सामाजिक बुराई कहकर खारिज नहीं करते, बल्कि उसे सत्ता की एक दीर्घकालिक व्यवस्था के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार जाति केवल ऊँच-नीच नहीं बल्कि श्रम-विभाजन का ऐसा रूप है जिसमें श्रम का मूल्य और सम्मान दोनों तय कर दिए गए हैं। इसलिए जाति-विरोध उनके यहाँ नैतिक आग्रह नहीं बल्कि राजनीतिक अनिवार्यता है। वे मानते हैं कि बिना जाति-संरचना को तोड़े कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था वास्तविक नहीं हो सकती। उनका जाति-विरोध भावुक नहीं बल्कि विश्लेषणात्मक है—वे इसके ऐतिहासिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आधारों को एक साथ पकड़ते हैं।
स्त्री के प्रश्न पर लोहिया की दृष्टि अपने समय से आगे की है। वे स्त्री को केवल पीड़ित या सुधार का विषय नहीं मानते बल्कि सामाजिक परिवर्तन की केन्द्रीय शक्ति के रूप में देखते हैं। उनके लिए स्त्री-स्वतंत्रता केवल क़ानूनी अधिकारों का प्रश्न नहीं बल्कि जीवन-शैली, नैतिकता और संबंधों के पुनर्गठन का प्रश्न है। वे यह समझते थे कि समाज में सबसे अधिक नियंत्रण स्त्री की देह, इच्छा और श्रम पर है और यही नियंत्रण सत्ता की सबसे सूक्ष्म लेकिन सबसे मज़बूत शक्ल है। इसलिए स्त्री की मुक्ति उनके लिए किसी एक आंदोलन का मुद्दा नहीं, बल्कि समूची राजनीति की कसौटी है।
लोहिया की सांस्कृतिक दृष्टि भाषा के प्रश्न से गहराई से जुड़ी हुई है। वे भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता का उपकरण मानते हैं। उनके अनुसार जिस भाषा को ज्ञान, प्रशासन और प्रतिष्ठा की भाषा बना दिया जाता है, वही भाषा समाज के बड़े हिस्से को मौन में धकेल देती है। इसीलिए उनका आग्रह मातृभाषाओं पर है—केवल भावनात्मक कारणों से नहीं, बल्कि इसलिए कि मातृभाषा में सोचने वाला व्यक्ति ही अपने अनुभव को पूरी तीव्रता से समझ सकता है। लोहिया की भाषा-चेतना सांस्कृतिक आत्मसम्मान की चेतना है। वे जानते थे कि जब तक सोच पर बाहरी भाषा का वर्चस्व रहेगा, तब तक समाज अपनी समस्याओं को अपने शब्दों में परिभाषित नहीं कर पाएगा।
इतिहास के प्रति लोहिया का दृष्टिकोण भी आलोचनात्मक है। वे इतिहास को गौरवगान या आत्मग्लानि का उपकरण नहीं बनने देते। उनके लिए इतिहास प्रश्न करने की भूमि है—किसका इतिहास लिखा गया, किसे भुला दिया गया, और क्यों। वे भारत के अतीत को न तो पूरी तरह उज्ज्वल मानते हैं, न ही पूरी तरह अंधकारमय। वे उसमें संघर्ष, रचनात्मकता, अन्याय और प्रतिरोध—सभी को एक साथ देखते हैं। उनकी सांस्कृतिक राजनीति इसी संतुलन से जन्म लेती है, जहाँ अतीत से प्रेरणा ली जाती है, लेकिन उसे वर्तमान पर थोपा नहीं जाता।
लोहिया की राजनीति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है—अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की सरल रेखा को तोड़ना। वे जानते थे कि संख्या अपने आप में न्याय की गारंटी नहीं होती। बहुसंख्यक भी शोषित हो सकता है और अल्पसंख्यक भी शासक वर्ग का हिस्सा बन सकता है। इसलिए वे सत्ता के प्रश्न को संख्या से अधिक संरचना के स्तर पर देखते हैं। उनकी दृष्टि में असली संघर्ष उन लोगों के बीच है जिनके पास निर्णय की शक्ति है और जिनके पास केवल पालन की भूमिका। यह विचार उन्हें भीड़-आधारित राजनीति से अलग करता है।
लोहिया का नैतिक आग्रह उनके राजनीतिक चिंतन का केंद्रीय तत्व है। वे राजनीति को मूल्य-निरपेक्ष मानने से इनकार करते हैं। उनके लिए साधन और लक्ष्य के बीच कोई दीवार नहीं है। जो साधन अमानवीय हैं, वे लक्ष्य को भी अमानवीय बना देंगे—यह उनकी मूल मान्यता है। इसी कारण वे सत्ता के साथ समझौते करने से अधिक असहमति को महत्व देते हैं। उनके यहाँ हार भी एक तरह की नैतिक विजय हो सकती है, यदि वह अन्याय के विरुद्ध खड़ी होकर मिली हो।
आज के संदर्भ में लोहिया की प्रासंगिकता इस बात में है कि उन्होंने राजनीति को केवल तात्कालिक लाभ की गणना से बाहर निकालकर दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा। उनकी दृष्टि हमें यह सिखाती नहीं, बल्कि चुनौती देती है कि हम लोकतंत्र को केवल मतदान की प्रक्रिया न मानें बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी और सम्मान की तलाश के रूप में देखें। वे हमें यह सोचने को मजबूर करते हैं कि क्या हमारी संस्कृति सचमुच सबको जगह देती है, या केवल कुछ चुने हुए अनुभवों को ही ‘राष्ट्रीय’ कहकर प्रतिष्ठित करती है।
लोहिया का चिंतन किसी तैयार नुस्खे की तरह नहीं मिलता। वह प्रश्नों, विरोधाभासों और जोखिमों से भरा हुआ है। शायद यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। वे हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि एक बेचैनी में छोड़ते हैं—ऐसी बेचैनी जो सोचने को मजबूर करती है जो आत्मसंतोष को तोड़ती है, और जो राजनीति को फिर से नैतिक साहस से जोड़ने की माँग करती है। इसी अर्थ में लोहिया केवल अतीत के नेता नहीं बल्कि भविष्य के लिए छोड़ा गया एक अधूरा प्रश्न हैं—जिसका उत्तर हर पीढ़ी को अपने समय में ढूँढ़ना होगा।
डॉ. राममनोहर लोहिया के राजनीतिक चिंतन में परिवारवाद एक नैतिक विचलन नहीं बल्कि लोकतंत्र के भीतर पनपी हुई सत्ता-रणनीति के रूप में सामने आता है। वे इसे केवल रिश्तों के आधार पर पद बाँटने की प्रवृत्ति नहीं मानते, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को भीतर से खोखला करने वाली संस्कृति के रूप में देखते हैं। लोहिया के लिए परिवारवाद सत्ता के उस स्वभाव का संकेत है, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र निजी विरासत में बदल जाता है।
लोहिया मानते थे कि परिवारवाद योग्यता के विरुद्ध नहीं, अवसर की समानता के विरुद्ध है। जब राजनीतिक पद वंश परंपरा से मिलने लगते हैं तब संघर्ष, विचार और जनसंपर्क का मूल्य घट जाता है। राजनीति सेवा और विचार से हटकर उत्तराधिकार की व्यवस्था बन जाती है। इससे लोकतंत्र में भागीदारी का रास्ता संकरा होता है और आम नागरिक सत्ता को दूर, अपारदर्शी और अपने से असंबद्ध अनुभव करने लगता है।
उनकी दृष्टि में परिवारवाद केवल बड़े दलों या राष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है; यह पंचायत से लेकर संगठन तक फैला हुआ है। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे राजनीति को एक बंद क्लब में बदल देती है जहाँ नए लोगों का प्रवेश कठिन और असुविधाजनक हो जाता है। लोहिया इसे सामाजिक जड़ता से जोड़ते हैं—वही जड़ता जो जाति, परंपरा और वर्चस्व के पुराने ढाँचों को बार-बार पुनर्जीवित करती है।
लोहिया के अनुसार परिवारवाद विचारों की हत्या करता है। जब नेतृत्व जन्म से तय होने लगे, तब वैचारिक संघर्ष अनावश्यक हो जाता है। असहमति अपराध बन जाती है और प्रश्न पूछने की संस्कृति समाप्त होने लगती है। इस स्थिति में राजनीति साहस का क्षेत्र नहीं रह जाती, बल्कि निष्ठा और चापलूसी का अभ्यास बन जाती है।
परिवारवाद के विरुद्ध लोहिया का आग्रह किसी व्यक्ति-विरोध से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता की रक्षा से जुड़ा है। वे मानते थे कि यदि राजनीति में बराबरी का सपना जीवित रखना है, तो सत्ता को विरासत नहीं, ज़िम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके लिए सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ नेतृत्व जन्म से नहीं, संघर्ष, विचार और जनता के विश्वास से निर्मित होता है।
डॉ. राममनोहर लोहिया का चिंतन मार्क्स के अर्थशास्त्र के प्रति पूर्ण अस्वीकृति नहीं बल्कि एक सघन और मौलिक असहमति है। वे आर्थिक अन्याय की पहचान और पूँजी-संचय की आलोचना से सहमत होते हुए भी मार्क्स की अर्थव्यवस्था-केंद्रित दृष्टि को अपर्याप्त मानते हैं। लोहिया के अनुसार समाज को केवल उत्पादन और वर्ग के ढाँचे से समझना मानवीय यथार्थ को संकुचित कर देता है।
लोहिया की पहली आपत्ति यह है कि मार्क्स का आर्थिक ढाँचा मनुष्य को मूलतः उत्पादन-इकाई के रूप में देखता है। श्रम, वर्ग और उत्पादन संबंधों के बीच मनुष्य की सांस्कृतिक, नैतिक और भावनात्मक उपस्थिति धुँधली हो जाती है। लोहिया मानते थे कि भूख जितनी वास्तविक है, उतनी ही वास्तविक अपमान, भाषा-वंचना, जातिगत तिरस्कार और लैंगिक असमानता भी है। यदि अर्थशास्त्र इन अनुभवों को द्वितीयक मानता है, तो वह समाज की पूरी संरचना को नहीं समझ सकता।
दूसरी आपत्ति इतिहास की गति को लेकर है। मार्क्स के यहाँ इतिहास एक अनिवार्य क्रम में आगे बढ़ता दिखाई देता है, जहाँ आर्थिक अंतर्विरोध अंततः नई व्यवस्था को जन्म देते हैं।
लोहिया इस अनिवार्यता को ख़तरनाक मानते हैं। उनके अनुसार इतिहास किसी स्वचालित नियम से नहीं चलता; वह मानवीय निर्णय, नैतिक साहस और राजनीतिक हस्तक्षेप से दिशा बदलता है। अन्यथा अन्याय को “ऐतिहासिक अनिवार्यता” कहकर स्वीकार करना आसान हो जाता है।
तीसरा विरोध केंद्रीकरण से जुड़ा है। मार्क्सवादी ढाँचे में उत्पादन के साधनों का सामूहिक स्वामित्व व्यवहार में अक्सर सत्ता के केंद्रीकरण में बदल जाता है। लोहिया को आशंका थी कि यह केंद्रीकरण नई तरह की प्रभुता पैदा करेगा, जहाँ राज्य पुराने शोषक की जगह ले लेगा। इसलिए वे विकेंद्रीकृत अर्थ-व्यवस्था और छोटे स्तर की स्वायत्तता पर ज़ोर देते हैं।
लोहिया का विरोध इस बात पर है कि मार्क्स का अर्थशास्त्र नैतिक प्रश्नों को आर्थिक समाधान में समाहित कर देता है। लोहिया के लिए अर्थ केवल व्यवस्था नहीं, मनुष्य की गरिमा से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए वे ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ आर्थिक समानता सांस्कृतिक और नैतिक समानता से अलग नहीं हो सकती।
डॉ. राममनोहर लोहिया के चिंतन में राम, कृष्ण और शिव धार्मिक आस्था के देवता नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के जीवित प्रतीक हैं। वे इन्हें पूजा-पद्धति या कर्मकांड के दायरे में नहीं बाँधते, बल्कि समाज के नैतिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक अनुभवों से जोड़कर पढ़ते हैं। लोहिया के लिए ये तीनों चरित्र सत्ता, संघर्ष और मुक्ति के भिन्न-भिन्न बोध रूप हैं।
राम लोहिया के यहाँ आज्ञाकारिता या आदर्श-राजा के स्थिर प्रतीक नहीं हैं। वे राम को अनुशासन, मर्यादा और आत्मसंयम की संस्कृति के रूप में देखते हैं। किंतु वे राम-कथा के उस पक्ष पर प्रश्न भी उठाते हैं जहाँ मर्यादा अन्याय के साथ समझौता करती दिखती है। लोहिया मानते थे कि मर्यादा तभी सार्थक है जब वह करुणा और न्याय से जुड़ी हो; अन्यथा वह सत्ता के संरक्षण का औज़ार बन जाती है। इस तरह राम उनके लिए आदर्श नहीं, बल्कि सतत नैतिक कसौटी हैं।
कृष्ण लोहिया के चिंतन में अधिक गतिशील और द्वंद्वात्मक उपस्थिति रखते हैं। वे कृष्ण को चतुर रणनीतिकार, संवादकर्ता और संकट में निर्णय लेने वाले व्यक्तित्व के रूप में देखते हैं। कृष्ण के भीतर नैतिकता स्थिर नियम नहीं, बल्कि परिस्थिति से जूझती हुई विवेकशीलता है। लोहिया को कृष्ण इसलिए आकर्षित करते हैं कि वे सत्ता के केंद्र में रहते हुए भी उसकी सीमाओं को जानते हैं और कभी उसे अंतिम सत्य नहीं मानते।
शिव लोहिया के लिए प्रतिरोध और अस्वीकार के प्रतीक हैं। वे शिव को त्याग और संन्यास की निष्क्रियता से अलग करते हैं। उनके शिव व्यवस्था के बाहर खड़े होकर उसे आईना दिखाते हैं। वे सामाजिक स्वीकृति की लालसा नहीं रखते और इसी कारण सबसे अधिक स्वतंत्र हैं। लोहिया के अनुसार शिव उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सत्ता, संपत्ति और प्रतिष्ठा से दूरी बनाकर समाज को संतुलन देती है।
इन तीनों को साथ रखकर लोहिया भारतीय संस्कृति को किसी एक मूल्य में नहीं बाँधते। उनके यहाँ संस्कृति बहुवचन है—जहाँ अनुशासन, रणनीति और प्रतिरोध एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि समाज को जीवंत रखने वाली शक्तियाँ हैं।
डॉ. राममनोहर लोहिया ने राम को देवता या आदर्श राजा से पहले “पुरखा” कहा, क्योंकि वे राम को धार्मिक आस्था की वस्तु नहीं, बल्कि भारतीय समाज की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्मृति के मूल स्रोत के रूप में समझते थे। “पुरखा” शब्द उनके लिए वंश नहीं, बल्कि अनुभव, स्मृति और नैतिक बोध की निरंतरता का संकेत है। लोहिया राम को उस सामूहिक चेतना का रूप मानते हैं, जिसने सदियों तक समाज के आचरण, भाषा और संबंधों को दिशा दी है।
लोहिया के अनुसार देवता आस्था के क्षेत्र में सीमित रहते हैं, जबकि पुरखा जीवन के हर स्तर पर मौजूद होता है—घर, खेत, राजनीति, लोककथा और रोज़मर्रा के निर्णयों में। राम इस अर्थ में पुरखा हैं कि वे भारतीय समाज के व्यवहार में रचे-बसे हैं। लोग राम को केवल पूजते नहीं, बल्कि उनके नाम से संबंधों को परखते हैं—सत्य, वचन, त्याग, संकोच और करुणा के संदर्भ में। यह उपस्थिति धार्मिक से अधिक सामाजिक है।
राम को पुरखा कहने का एक अर्थ यह भी है कि लोहिया उन्हें आलोचना से मुक्त नहीं करते। देवता पर प्रश्न करना अपमान माना जाता है, जबकि पुरखा से संवाद किया जा सकता है, असहमति भी रखी जा सकती है। लोहिया चाहते थे कि राम को सत्ता या नैतिक दंड के औज़ार में बदलने के बजाय एक ऐसे पूर्वज की तरह देखा जाए, जिसके अनुभव से सीखा जाए और जिसकी सीमाओं पर प्रश्न भी उठाए जाएँ। इससे संस्कृति जड़ नहीं होती, बल्कि जीवित रहती है।
इसके अलावा “पुरखा” की अवधारणा राम को किसी एक वर्ग, पंथ या राजनीतिक एजेंडे से मुक्त करती है। देवता अक्सर अधिकार के दावे में बदल जाते हैं, जबकि पुरखा साझा स्मृति होते हैं। लोहिया राम को इसी साझा विरासत के रूप में स्थापित करना चाहते थे—जहाँ राम किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि समाज के आत्मसंवाद के केंद्र में हों।
इस प्रकार राम को पुरखा कहना लोहिया की सांस्कृतिक राजनीति का हिस्सा है, जिसमें आस्था को सत्ता से अलग कर दिया जाता है और परंपरा को प्रश्नों के साथ आगे बढ़ने दिया जाता है।
लोहिया का समूचा चिंतन किसी बंद विचार-प्रणाली का निष्कर्ष नहीं बल्कि एक खुली बेचैनी का नाम है। उनके लिए राजनीति, संस्कृति और इतिहास अलग-अलग क्षेत्र नहीं, बल्कि एक ही जीवन-यथार्थ के विभिन्न आयाम हैं। यही कारण है कि वे देवता को पुरखा, आस्था को स्मृति और सत्ता को नैतिक प्रश्न में बदल देते हैं। उनका विचार किसी अंतिम सत्य की घोषणा नहीं करता, बल्कि समाज को आत्मपरीक्षण की अवस्था में रखता है।
लोहिया हमें यह मानने से रोकते हैं कि समानता केवल आर्थिक पुनर्वितरण से आ जाएगी या लोकतंत्र केवल चुनावों से पूर्ण हो जाएगा। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि संस्कृति अगर प्रश्नविहीन हो जाए, तो वह सत्ता की सहयोगी बन जाती है। इसलिए उनका आग्रह असहमति, आलोचना और नैतिक साहस पर है। उनके यहाँ परंपरा बचाने की वस्तु नहीं, बल्कि संवाद की प्रक्रिया है।
राम को पुरखा कहने से लेकर परिवारवाद, जाति और केंद्रीकरण के विरोध तक, लोहिया हर जगह एक ही बात दोहराते दिखाई देते हैं—सत्ता को स्वाभाविक न मानो। चाहे वह धर्म के रूप में हो, इतिहास के रूप में या विकास के नाम पर। उनका चिंतन हमें सिखाता नहीं, बल्कि असुविधा में डालता है, क्योंकि वही असुविधा परिवर्तन की पहली शर्त है।
आज जब राजनीति त्वरित लाभ, भावनात्मक ध्रुवीकरण और स्मृति-प्रबंधन का क्षेत्र बनती जा रही है, लोहिया की दृष्टि हमें धीमे, गहरे और ईमानदार प्रश्नों की ओर लौटने का आग्रह करती है। वे याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल शासन-पद्धति नहीं, बल्कि आत्मसंयम, आलोचना और साझा उत्तरदायित्व की संस्कृति है। इस अर्थ में लोहिया कोई समाप्त अध्याय नहीं, बल्कि निरंतर खुला हुआ पाठ हैं—जिसे हर समय, हर पीढ़ी को नए संदर्भों में पढ़ते रहना होगा।
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