भारत की आवाज़: सर मार्क टली की स्मृति में

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Sir Mark Tully

Parichay Das

— परिचय दास —

।। एक ।।

भारत की मिट्टी में लंबे समय तक जड़ें जमाने वाला विदेशी पत्रकार, सर मार्क टली, आज हमारे बीच नहीं रहे। उनका जाना केवल एक पत्रकार के निधन का समाचार नहीं है; यह एक पूरी पत्रकारिता की संवेदनशील दृष्टि का शून्य छोड़ने जैसा है। दिल्ली के गलियारों में, जहाँ सत्ता, इतिहास और आम आदमी की कहानियाँ एक साथ बहती हैं, उनकी अनुपस्थिति की खामोशी महसूस की जा सकती है।

मार्क टली केवल खबरों के संकलक नहीं थे; वह भारत की आत्मा को समझने और उसे दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाले एक पुल थे। बीबीसी के पूर्व ब्यूरो चीफ के रूप में उन्होंने दशकों तक भारतीय समाज, राजनीति और संस्कृति की गहन समझ दुनिया के लिए उजागर की। पर उनकी महानता केवल तथ्य पेश करने में नहीं थी बल्कि उन तथ्यों के पीछे छिपी मानवीय संवेदनाओं को पकड़ने और उन्हें शब्दों में ढालने की कला में थी।

उनका दृष्टिकोण सदैव मानवीय रहा। गाँव की गलियों में उनकी पैदल यात्राएँ, शहर की व्यस्त सड़कों पर लंबी निगाहें और संसद की अटके हुए निर्णयों पर गहरी टिप्पणियाँ—सबने उन्हें एक संवेदनशील और सूक्ष्म दृष्टि का पत्रकार बनाया। उनका लेखन कभी केवल आलोचना नहीं करता; वह सवाल पूछता, सोचने के लिए मजबूर करता, और पाठक को एक अनुभव की ओर ले जाता।

मार्क टली के शब्दों में भारत की राजनीति की गूँज, सामाजिक संघर्षों की संवेदना, त्योहारों और रिवाज़ों की रंगीनता, और आम आदमी की चुप्पी की गहरी आवाज़—सबका समागम होता। वह आंकड़ों के बीच नहीं, उनके पीछे छिपी मानवीय कहानियों के बीच रहते थे।

उनके लिए भारत केवल एक देश नहीं, एक जीवंत अनुभव था, जो हर रिपोर्ट में झलकता। उनकी लेखनी में कभी गाँव की मिट्टी की खुशबू, कभी शहर की भीड़ की आवाज़, और कभी संसद की गूँजती दीवारों की सन्नाटा—सबके रंग मिलते। वह खुद अपने लेखन का हिस्सा बन जाते, और पाठक उनके शब्दों में खुद को महसूस करता। यही वजह है कि विश्व के पाठक उन्हें ‘भारत की आवाज़’ के रूप में जानते थे, पर उनके साथ रहे लोग जानते थे कि वह कितने बड़े प्रेम और संवेदनशीलता के साथ भारत को महसूस करते थे।

।। दो ।।

मार्क टली का भारत केवल राजनीतिक खबरों या सामाजिक आंकड़ों तक सीमित नहीं था। उनके लिए भारत एक जीवंत अनुभव था, जिसमें हर गाँव की मिट्टी, हर गलियों की हल्की-सी गंध और हर पर्व के उत्सव की रंगीनता शामिल थी। उन्होंने दशकों तक देश के हर कोने का दौरा किया—हिमालय की तलहटी से लेकर केरल के कन्नड़ किनारों तक, राजस्थान की रेतीली धूप से लेकर बिहार के छोटे गाँवों तक। इस यात्राओं में वह केवल पर्यटक नहीं थे; वह एक शोधकर्ता, कहानीकार और संवेदनशील पर्यवेक्षक थे।

उनकी पत्रकारिता का सबसे बड़ा गुण यह था कि वह केवल घटनाओं का विवरण नहीं करते थे। वह घटनाओं के भीतर छिपी मानव कहानी को खोजते थे। एक चुनावी रैली की भीड़ में वे केवल मतदाताओं की संख्या नहीं देखते थे, बल्कि उनकी आशाएँ, डर और उम्मीद की गूँज महसूस करते थे। एक किसानों के संघर्ष की रिपोर्ट में केवल कृषि उत्पादन का डेटा नहीं बल्कि मिट्टी की महक, हाथों की कठोरता और चेहरे पर झुर्रियों में दबा संघर्ष—सबको उनके शब्दों में जीवंत कर देते थे।

बीबीसी में अपने कार्यकाल के दौरान, टली ने भारतीय राजनीति की गहरी परतों को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया। संसद की बहसें, पार्टियों की आंतरिक लड़ाइयाँ, और नेताओं के बयान उनके लेखन में कभी मात्र सूचना नहीं थे; वे हमेशा एक कथा के रूप में पेश होते थे, जिसमें पाठक को भी महसूस होता कि वह घटनास्थल पर उपस्थित है। यही वजह है कि उन्होंने पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, बल्कि अनुभव और संवेदनाओं की कला बना दिया।

उनकी लेखनी में एक सौंदर्य भी था, जो अन्य पत्रकारों में दुर्लभ था। शब्दों का चयन, वाक्यों की लंबाई, और भावनाओं का प्रवाह—सब कुछ पाठक को भीतर तक खींच लेता। वह कभी शब्दों को अधूरा या अधिभारित नहीं छोड़ते थे; हर वाक्य में अर्थ, गंध और जीवन का स्पर्श होता। उनके लेखों और रिपोर्टों में पश्चिमी और भारतीय दृष्टिकोण का संतुलन साफ़ दिखता था—जहाँ तथ्य और तर्क मौजूद थे, वहीं संवेदना और मानवता भी उभरकर आती थी।

मार्क टली की पत्रकारिता ने यह भी दिखाया कि देश को केवल बाहर से देखना पर्याप्त नहीं है। उसके लिए देश को भीतर से समझना ज़रूरी था। यही कारण है कि उन्होंने पत्रकारिता के साथ-साथ शोध और संवाद को भी महत्व दिया। उन्होंने भारतीय पत्रकारों के साथ संवाद किया, उनके अनुभवों को समझा और कई बार अपने लेखों में स्थानीय आवाज़ों को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया।

उनकी शैली में यह खूबसूरती थी कि हर रिपोर्ट, चाहे वह हिंसा, राजनीति, संस्कृति या त्योहार के बारे में हो, पाठक के लिए केवल सूचना नहीं, बल्कि अनुभव बन जाती थी। यही कारण है कि दुनिया के पाठक उन्हें ‘भारत की आवाज़’ कहते थे।

।। तीन।।

मार्क टली ने भारत में दशकों तक पत्रकारिता करते हुए ऐसे अनुभव संजोए, जो केवल रिपोर्टिंग से कहीं अधिक थे। उनका प्रत्येक दौरा, प्रत्येक मुलाकात, और प्रत्येक संवाद, उनके लेखन में एक जीवंत दस्तावेज़ बन जाता। वह केवल किसी समाचार की सतह तक नहीं जाते थे; वह हमेशा उसके भीतर की वास्तविकता को पकड़ते थे।

उनकी प्रमुख रिपोर्टिंग में भारत की राजनीतिक हलचल हमेशा केंद्र में रही। चाहे वह चुनाव की रिपोर्ट हो, संसद की बहस हो या किसी राज्य सरकार की नीति का विश्लेषण—टली ने हर घटना को एक कथा की तरह पेश किया। 1980 और 1990 के दशक की उनके कई आलेखों में, भारत की बदलती राजनीति, दलों की उठापटक और आम नागरिक की आशाएँ, चिंता और निराशा स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। उन्होंने केवल राजनीतिक घटनाओं की रिपोर्ट नहीं की बल्कि उनके प्रभावों को आम लोगों की जिंदगी में महसूस किया।

सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि सामाजिक घटनाओं और सांस्कृतिक उत्सवों पर उनकी रिपोर्टिंग भी अनोखी थी। कर्नाटक के छोटे गाँव में हो रहे त्योहार, बिहार के छोटे गाँवों में किसान की फसल कटाई, केरल की तटीय मछली पकड़ने की कहानी—हर विवरण उनके लेखन में मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत हुआ। उनके आलेखों में पाठक केवल पढ़ते नहीं बल्कि महसूस करते थे कि वह खुद वहाँ मौजूद है।

उनकी कुछ यादगार भारत यात्रा रिपोर्टिंग में आपदा और संघर्ष की कहानियाँ भी शामिल थीं। 2001 की भूकंप राहत कवरेज, 1999–2000 के कारगिल युद्ध के दौरान आम नागरिक की परेशानियाँ, और 1984 के सिख विरोधी दंगों की संवेदनशील रिपोर्टिंग—टली ने हर बार तथ्यों के साथ मानवीय अनुभव को भी उकेरा। उनकी रिपोर्टिंग में हिंसा के दृश्य भी थे, पर उन्होंने हमेशा पीड़ित की आवाज़ को प्राथमिकता दी।

उन्होंने भारतीय मीडिया के साथ सहयोग किया और युवा पत्रकारों को भी सिखाया कि पत्रकारिता केवल खबर देने का नाम नहीं बल्कि देश और समाज को समझने और उसे संवेदनशील दृष्टि से पेश करने का काम है।

उनके संवाद और लेखन में यह स्पष्ट था कि वह भारतीय समाज के भीतर की जटिलताओं को समझते थे—जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति और राजनीति के हर पहलू को।

मार्क टली के लिए भारत केवल स्थान नहीं था; वह एक अनुभव था, एक जीवंत कहानी थी। उनकी प्रत्येक रिपोर्ट, चाहे राजनीति, संस्कृति या समाज पर आधारित हो, पाठक के भीतर भारत की वास्तविक धड़कनों को महसूस कराती। उनके शब्दों में वह भारत था जिसे केवल आंकड़ों और तथ्यों से नहीं समझा जा सकता।

उनकी यात्रा और रिपोर्टिंग ने यह भी सिद्ध किया कि पत्रकारिता केवल सूचना देने का नाम नहीं है। वह संवेदनाओं का पुल है, जो एक देश के अंदर की सच्चाई को विश्व के सामने लाता है। उनकी लेखनी में पत्रकारिता और साहित्य की सीमा गायब हो जाती है—जहाँ तथ्य और अनुभव, दृश्य और संवेदना, सूचना और मानवता का मेल होता है।

।। चार ।।

सर मार्क टली केवल एक पत्रकार नहीं थे; वह एक दृष्टि, एक संवेदनशील दृष्टिकोण और एक प्रतिबद्धता थे। उनके लिए पत्रकारिता केवल सूचना का संकलन नहीं थी, बल्कि यह एक कला और जिम्मेदारी थी—सत्य को समझने, महसूस करने और उसे दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी। उनकी लेखनी में यही प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती थी।

उनका जीवन दर्शन सरल था—सत्य और संवेदना का संगम। वह मानवीय कहानियों को हमेशा प्राथमिकता देते थे, चाहे वह राजनीति के गलियारों में छुपी हो या गाँव के किसी छोटे घर में। उनके लिए हर व्यक्ति की आवाज़ महत्वपूर्ण थी, हर अनुभव मूल्यवान था। यही कारण है कि उनके आलेखों में केवल तथ्यों का वर्णन नहीं होता; वह पाठक को उस घटना में उपस्थित कर देते थे।

टली का पत्रकारिता का दृष्टिकोण गहरा और समग्र था। वह केवल समाचारों के पीछे छुपे आंकड़े नहीं देखते थे, बल्कि उन आंकड़ों के पीछे की मानव कहानी को खोजते थे। एक चुनावी रिपोर्ट में मतदाता की संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं थी; यह उसकी आशाएँ, डर और भविष्य की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब थी। एक सामाजिक घटना में केवल सूचना नहीं, बल्कि लोगों की संवेदनाएँ, संघर्ष और जिद्द झलकती थीं।

भारत के प्रति उनकी संवेदनशीलता अद्वितीय थी। वह देश को केवल रिपोर्टिंग की दृष्टि से नहीं देखते थे; वह उसे महसूस करते थे। भारतीय समाज की जटिलताओं—जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, और राजनीति—को समझने में उन्होंने वर्षों लगाया। वह कभी बाहर से देखने वाले विदेशी दृष्टिकोण पर भरोसा नहीं करते थे; वह हमेशा भीतर जाकर, आम लोगों के जीवन और संघर्ष को महसूस करके ही अपनी रिपोर्ट तैयार करते थे।

उनकी संवेदनशीलता केवल समाज तक सीमित नहीं थी; वह राजनीति, संस्कृति और इतिहास के प्रति भी गहरी थी। उन्होंने संसद की दीवारों में गूँजते शब्दों से लेकर गाँव के मैदान में हल्की हवा की सरसराहट तक सब कुछ अपने आलेखों में समेटा। उनके लिए हर विवरण महत्वपूर्ण था—एक चेहरे की अभिव्यक्ति, एक हाथ की मुद्रा, एक गाँव की धूप या सर्दी—सब उनकी रिपोर्टिंग का हिस्सा था।

उनकी लेखनी का सौंदर्य भी इस संवेदनशील दृष्टि का परिणाम था। शब्दों का चयन, भावों का प्रवाह, विवरणों की जीवंतता—सब कुछ पाठक को घटनास्थल तक ले जाता था। टली ने दिखाया कि पत्रकारिता केवल तथ्य पेश करने का माध्यम नहीं, बल्कि मानवता को समझने, अनुभव करने और उसे शब्दों के माध्यम से साझा करने का एक साधन भी हो सकती है।

मार्क टली ने यह सिखाया कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता है। यह सत्य को समझने, समाज को जानने और उसे दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की प्रतिबद्धता है। उनके जाने के बाद भी उनकी लेखनी, उनके आलेख और उनके शब्द हमें यही याद दिलाते रहेंगे—कि पत्रकारिता केवल समाचार नहीं, यह संवेदनाओं और अनुभवों का पुल है।

।। पांच ।।

आज जब सर मार्क टली हमारे बीच नहीं रहे, उनके जाने से केवल एक पत्रकार का नहीं, बल्कि एक दृष्टि और संवेदनशीलता का भी अंत हुआ। पर उनके शब्द, उनके आलेख और उनका दृष्टिकोण हमारे बीच हमेशा जीवित रहेंगे।

दिल्ली की गलियों में उनकी अनुपस्थिति महसूस होती है, बीबीसी के कमरे में उनकी कुर्सी खाली है लेकिन उनके द्वारा बनाये गए पुल—भारत और विश्व, सूचना और अनुभव, मानवता और पत्रकारिता के बीच—अब भी अडिग हैं।

उनकी स्मृति हमें यह याद दिलाती है कि पत्रकारिता केवल खबर देने का काम नहीं है। यह अनुभव को समझने, संवेदनाओं को महसूस करने और समाज की जटिलताओं को शब्दों के माध्यम से दुनिया के सामने पेश करने की कला है। उन्होंने दिखाया कि सच्ची पत्रकारिता वह है जो केवल आंखों से नहीं, बल्कि हृदय से देखे।

मार्क टली ने भारत को अपने शब्दों में जीया, महसूस किया और दुनिया को दिखाया। उनके लेखन में कभी राजनीतिक हलचल की तीव्रता, कभी सामाजिक संघर्ष की गंभीरता, और कभी संस्कृति के रंगों की कोमलता झलकती थी। उनका लेखन पाठक को घटनास्थल तक ले जाता, उन्हें वहां की हवा, वहां की धूप और वहां की चुप्पी महसूस कराता। यही वजह है कि उन्हें ‘भारत की आवाज़’ कहा गया—एक ऐसा विदेशी, जिसने भारत की आत्मा को न केवल देखा बल्कि उसे संवेदनाओं और शब्दों में उतारा।

उनका जाना केवल एक जीवन का अंत नहीं बल्कि एक प्रेरणा का आरंभ है। उनके आलेख, उनके अनुभव और उनका दृष्टिकोण नए पत्रकारों, पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए हमेशा मार्गदर्शक रहेंगे। वह हमें यह सिखाते हैं कि पत्रकारिता केवल तथ्य नहीं बल्कि अनुभव, संवेदना और मानवता का संगम है।

आज, उनके जाने के बाद, जब हम उनकी स्मृति में सिर झुकाते हैं, उनके शब्दों का सम्मान करते हैं और उनके दृष्टिकोण को याद करते हैं, तो यही महसूस होता है कि उनका प्रभाव केवल वर्तमान में नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों में भी जीवित रहेगा।

उनके लेखन और दृष्टि ने दुनिया को यह दिखाया कि भारत को समझना केवल आंकड़ों या घटनाओं से नहीं, बल्कि उसकी गहराई, उसकी संवेदनाओं और उसकी विविधता से संभव है।

सर मार्क टली ने हमें यह सिखाया कि सच्ची पत्रकारिता वह है जो देश और समाज को केवल देखने का काम नहीं करती बल्कि उसे महसूस करती है, समझती है और दुनिया के सामने प्रस्तुत करती है। उनकी स्मृति में हम न केवल एक पत्रकार को याद करते हैं बल्कि एक दृष्टि, एक अनुभव और एक संवेदनशील पुल को भी याद करते हैं जो हमेशा हमारे बीच जीवित रहेगा।


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