गणतंत्र और उसकी परंपरा – राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी

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Republic

Rajendra Ranjan Chaudhary

ण समूह को कहते हैं। गण वैदिक शब्द है। वहाँ ‘गणपति’ और ‘गणानां’ शब्द हैं। गण शब्द का सामान्य अर्थ समूह है। देवगण, ऋषिगण, पितृगण आदि। गणों के स्वामी गणेश हैं। शिव के अनंत गण हैं। शिव की बारात में इन अप्राकृतिक रूपधारी गणों [कबीलों] का विशेष महत्व माना जाता था। गणों का अपना जीवन-विधान था। महाभारत-युग में मथुरा गणराज्य था। महाभारत युग में अंधकवृष्णियों का संघ गणतंत्रात्मक था। यद्यपि मगध का जरासंध निरंकुश था। कृष्ण ने महाभारत की राजनीति को दिशा दी थी, निरंकुश शासन से गणशासन की दिशा में संघर्ष किया।

साम्राज्य, राजतन्त्र, एकतन्त्र होता है, निरंकुश होता है। राजतन्त्र में सत्ताधारी उस एक व्यक्ति की इच्छा ही कानून होती है, उस एक व्यक्ति की इच्छा ही न्याय होती है। जबकि गण-शासन में प्रत्येक परिवार में एक एक प्रतिनिधि [राजा] होता है। गणशासन में प्रजा का कल्याण अभीष्ट होता है। गण में सबको साथ लेकर चलने की भावना होती है। गण-शासन के लिए ही पारमेष्ठ्य कहा जाता था। गणसभा में गण के समस्त प्रतिनिधि सम्मिलित हो सकते थे –

गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रियंकराः।
न च साम्राज्यमाप्तास्ते सम्राट्शब्दो हि कृत्स्नभाक्।, [महाभारत14,2]

महात्मा बुद्ध के समय भी भारत में गणराज्य थे। स्वयं बुद्ध का जन्म शाक्यगण में हुआ था। लिच्छवियों का गणराज्य बहुत शक्तिशाली था और बज्जिसंघ के नाम से विख्यात था। उसकी राजधानी वैशाली थी। मगध के राजा बिंबसार का बेटा अजातशत्रु महत्वाकांक्षी सम्राट था। वह मन ही मन लिच्छवियों के प्रति कठोर था। उनका दमन करने का मौका तलाश कर रहा था। उसका मन्त्री वर्षकार भगवान बुद्ध की सेवा में गया। उसने भगवान बुद्ध से पूछा कि -वैशाली को कैसे परास्त किया जा सकता है?? भगवान बुद्ध ने आनन्द से पूछा – “आनन्द! मैंने सुना है कि -बज्जिय-जन कोई भी काम करने से पूर्व बार-बार सभा करते हैं?” आनन्द ने उत्तर दिया – हां, भन्ते! बज्जी-जन बार-बार सभा करके बहुमत से निर्णय करके कोई भी काम करते हैं! भगवान बुद्ध ने आनन्द से पूछा – आनन्द! मैंने सुना है कि बज्जी-जन धर्म-विरुद्ध कोई काम नहीं करते! आनन्द ने उत्तर दिया – हां, भन्ते! यह सच है कि बज्जी-जन एक राय से काम करते हैं, वे वृद्धों का सम्मान करते हैं, उनकी बात का आदर करते हैं। उनके यहां स्त्रियों पर अत्याचार नहीं होता! कन्याओं से जबर्दस्ती नहीं होती।

धर्माचरण की रक्षा होती है। भगवान बुद्ध ने कहा – तो फिर बज्जीगण को परास्त भी नहीं किया जा सकता। भगवान बुद्ध के इस उपदेश में लोकतन्त्र की महिमा छिपी हुई है। गणों या संघों के ही आदर्श पर ही बुद्ध ने बौद्ध-संघ के लिए नियम बनाए थे। पाणिनि (ईसा पूर्व पाँचवीं-सातवीं सदी) के समय सारा वाहीक पंजाब और सिंध में गणराज्य थे। विदेह, शाक्य, मल्ल, कोलिय, मोरिय, यौधेय गणराज्य के संबंध की कुछ प्रमाणिक सामग्री मिली है। अनेकानेक गणराज्य आयुधजीवी थे। पाणिनि ने गण को संघ का पर्याय कहा है (संघोद्धौ गणप्रशंसयो :, अष्टाध्यायी 3,3,86)। मालव गणतंत्र के प्रमुख विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त कर के शकारि उपाधि धारण की और शक संवत् चलाया। कठ, अस्सक, यौधेय, मालव, क्षुद्रक, अग्रश्रेणी क्षत्रिय, सौभूति, मुचुकर्ण और अंबष्ठ आदि अनेक गणों ने सिकंदर से लोहा लिया था। सिकंदर ने भारतीय गणराज्यों को छिन्न-विच्छिन्न कर दिया था। उसके पिता फिलिप ने भी ग्रीक- गणराज्यों को समाप्त किया था। उन दोनों की साम्राज्यलिप्सा दोनों ही देशों के नगरराज्यों को डकार गयी। समय बदला तब संघ आपस में ही लड़ने लगे और राजतंत्र का पुन: उदय होने लगा।

समष्टि-चेतना और समष्टि-विवेक का प्राचीन भारत में बहुत मान था। पुराने समय में गाँवो की पंचायत चुनाव से गठित की जाती थी। उसे न्याय और व्यवस्था, दोनों ही क्षेत्रों में खूब अधिकार मिले हुए थे। कई ग्राम-पंचायतों के ऊपर एक बड़ी पंचायत भी होती थी। गो. तुलसीदास हैं तो सामन्ती-युग में किन्तु लोकतन्त्र उनके मन में उद्दीप्त हो रहा है, उनके राम अयोध्यावासियों से सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि – राजा की नीति अपनी इच्छा से नहीं बनेगी। साधुमत और लोकमत मिल कर के राजनीति की रचना करेंगे। इसलिये मैं यदि कोई अनीति की बात करूं, तो आप निर्भय हो कर वर्जना करिये, निषेध करिये, निर्भय हो कर मुझे बतलाइये, मैं उस पर विचार करूंगा “-जो अनीति कछ भाखों भाई। तो मोहि बरजहु भय बिसराई।”

आधुनिक विश्व में लोकतंत्र का मंगलाचरण फ़्रांस की राज्य- क्रान्ति में हुआ था। यह बात ध्यान देने की है कि संसार में फ़ोकलोर और लोकतन्त्र के विचार का जन्म एक साथ ही हुआ था और उसकी पृष्ठभूमि में थी फ़्रांस की राज्यक्रान्ति [1789 से 1799], यही वह समय था, जब रोटी माँग रही भीड़ के प्रति फ्रांस की साम्राज्ञी, ‘मेरी आन्तोन’ ने कहा था कि – रोटी नहीं है तो ये लोग केक क्यों नहीं खा लेते? फ्रांस के अयोग्य शासक, सामन्तों और कुलीन वर्ग को प्राप्त विशेषाधिकारों के प्रति लोगों में आक्रोश था और मध्यम वर्ग में मॉन्टेस्क्यू (Montesquieu.1689 ई. -1755 ई.]) वाल्टेयर और रूसो के विचारों से बौद्धिक जागरण हो रहा था। मॉन्टेस्क्यू फ्रांस का एक राजनैतिक विचारक और न्यायविद था। उसने 1748 ई. में कानून की आत्मा (The Spirit of Low) नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। इसमें उसने फ्रांस के राजाओं के दैवी अधिकार के सिद्धांत की कटु आलोचना की। उसने वैधानिक शासन, शक्ति-पार्थक्य के सिद्धांत तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतिपादन किया। उसका विचार था कि निरंकुश शासन को समाप्त करने के लिये शासन के तीनों अंगों कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका के क्षेत्रों को पृथक-पृथक करना आवश्यक है। वॉल्टेयर की रचनाओं से फ्रांस में राज्य क्रांति का जन्म हुआ माना जाता है। उस समय देश में धर्म के नाम पर पादरियों की मनमानी चल रही थी। वॉल्टेयर ने इन लोगों के खिलाफ खुलकर कलम चलाई। उनका विरोध रोमन कैथोलिक चर्च के कठमुल्लापन को लेकर था। वॉल्टेयर को जेल जाना पड़ा।

जब उसे शासक के सामने लाया गया, तब उसने शासन को उसकी जिम्मेदारी का अहसास दिलाया। तब शासक ने कहा कि सच्चा लेखक वही है जो शासक के मुंह पर भी सच बोलने से ना डरे।’ रूसो महान दार्शनिक था। उसने बतलाया कि गरीबी पूर्वजन्म के कर्मों का फ़ल नहीं है। रूसो के अनुसार राज्य की सामूहिक चेतना ही व्यक्ति की नैतिकता और स्वतंत्रता का स्रोत है। रूसो के विचारों ने फ़्रांस की राज्यक्रान्ति की पृष्ठभूमि तैयार की। रूसो ने कहा कि जिन लोगों को कार्यपालिका शक्ति सौपीं गई है वे जनता के स्वामी नहीं, उसके कार्यकारी है और उनका कर्तव्य जनता की आज्ञा का पालन करना है। इस तरह उसका दृढ़ विश्वास था कि सर्वोपरि सत्ता जनता के हाथ में होनी चाहिए, किसी एक व्यक्ति या संस्था के हाथ में नहीं। सार्वभौम सत्ता जनता की इच्छा में निहित है, जिसे “सामान्य इच्छा” (General Will) कहा गया। राज्य के कानून को इसी सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति होना चाहिए। प्रजा में जोश आया, एकता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के नारे लगे, प्रजा आगे बढ़ी और राजतंत्र ढह गया, प्रजातंत्र की स्थापना हुई। यूरोप के अन्यान्य देशों में स्वातंत्र्य-भावनाओं का समुद्र उमड़ पड़ा। 19वीं सदी के मध्य से क्रांतियों का युग पुन: प्रारंभ हुआ और राजतंत्रों को समाप्त कर गणतंत्रों की स्थापना होने लगी.

फ्रांसीसी क्रांति [१७९२] ने लोकतंत्र और समानता के आदर्शों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। क्रांति के दौरान फ्रांसीसी संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए, चाहे उनकी सामाजिक स्थिति या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो। फ्रांसीसी क्रांति ने राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की भावना को भी प्रोत्साहित किया। इस क्रांति ने फ्रांसीसी लोगों को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट किया और उन्हें अपनी स्वतंत्रता और समानता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

फ्रांसीसी क्रांति ने लोकतंत्र के विचार को सुदृढ़ किया। यह सिद्धांत प्रतिष्ठित हुआ कि राष्ट्र सामन्त से नहीं बनता, बल्कि जनसाधारण या लोक से बनता है। शासन में चर्च के हस्तक्षेप और उसके अधिकार को वर्जित मान लिया गया। यही वह समय था, जब साहित्य में रोमांटिसिज़्म [स्वच्छन्दतावाद] का उभार हुआ और लोकवार्ता के विचार ने अभिजात वर्ग के स्थान पर सामान्य जन की प्रतिष्ठा को स्थापित किया। इसी विचार से प्रेरित होकर जर्मनी में ग्रिम बंधुओं ने सामान्य जनता के गहन संपर्क के लिए यात्राएँ कीं और जर्मन संस्कृति के सूत्रों की खोज की। उन्होंने लोककथाएँ, आख्यान, मिथक और जर्मन शब्द एकत्र किए। ग्रिम बंधुओं को ‘फ़ादर ऑफ़ फ़ोकलोर’ कहा जाता है।

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों में यूरोप के वे देश, जो अपनी सीमाओं के भीतर जनवादी हो चुके थे, एशिया और अफ्रीका में साम्राज्यवाद का नग्न तांडव कर रहे थे। 1917 ई. में मार्क्सवाद से प्रभावित होकर रूस में राज्यक्रांति हुई और ज़ारशाही समाप्त कर दी गई। 1948 ई. में चीन में भी कम्युनिस्ट सरकार का शासन प्रारंभ हुआ। ये दोनों देश अपने को गणतंत्र कहते हैं और वहाँ शासन जनता के नाम पर ही किया जाता है, यह बात दूसरी है कि वहाँ जनवाद के सूत्र किसी प्रच्छन्न अधिनायकवाद के हाथों में रहे। इंग्लैंड में राजा है, किंतु वह जनता का कृपापात्र मात्र एक शोभा के रूप में है।

हमारा देश जनतंत्रात्मक गणराज्य है। जनतंत्र का अर्थ है—जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता का शासन। निश्चित रूप से संप्रभुता का स्रोत जनता है और शासन में जनता की भागीदारी सुनिश्चित है। जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही लोकसभा में पहुँचते हैं, किंतु सरकार का स्वरूप गणराज्य का है और संविधान से मर्यादित है। लोकसभा के लिए चुने गए सदस्य जनता की इच्छा के नाम पर मनमर्जी से कानून नहीं बना सकते। वे संविधान की मर्यादा में रहकर ही कानून बनाएँगे।

यह लोकतंत्र सामान्य इच्छा पर केंद्रित है, इसलिए यह लोकतंत्र और संविधान द्वारा निर्देशित है और इसी कारण यह गणतंत्र है। राज्य की विधानसभाओं के सदस्य तथा संसद के सभी सदस्य राष्ट्रपति का निर्वाचन करते हैं। लोकसभा है, किंतु राज्यसभा भी है। लोकसभा प्रत्येक पाँच वर्ष में जनता द्वारा निर्वाचित होती है और पाँच वर्षों के बाद भंग हो जाती है, जबकि राज्यसभा कभी भंग नहीं होती। उसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष बदलते हैं। उनका निर्वाचन राज्यों की विधानसभाओं द्वारा होता है और राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इस प्रकार यह एक संघात्मक गणराज्य है।

राज्यों की विधानसभाएँ अपने राज्य के लिए कानून बना सकती हैं, लेकिन केवल राज्य सूची में अधिसूचित विषयों तथा समवर्ती सूची के उन विषयों पर, जिन पर संघ का कोई कानून न हो। संसद संघ सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बना सकती है, किंतु राज्य सूची के विषयों पर तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जब तक उस विषय को संविधान संशोधन द्वारा संघ सूची में सम्मिलित न किया जाए। संविधान ने देश के सभी नागरिकों को छह मूल अधिकार प्रदान किए हैं। कोई भी विधानसभा या संसद इन मूल अधिकारों का अतिक्रमण करके कानून नहीं बना सकती। सर्वोच्च न्यायालय इन मूल अधिकारों और संवैधानिक प्रक्रिया का संरक्षक है। इस प्रकार भारत के संविधान ने सत्ता के केंद्रीकरण का निषेध किया है।

देव और असुरों के युद्धों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक इस धरती पर असंख्य युद्ध और लड़ाइयाँ लड़ी गई हैं। बड़े-बड़े क्रूर और निरंकुश शासकों तथा दुर्दांत दस्युओं के अन्याय, अत्याचार, लूट-खसोट और दुराचार हमारे पूर्वजों ने सहे हैं। नई पीढ़ी के कुछ लोगों को कभी-कभी यह लगता है कि लोकतंत्र उन्हें मुफ्त में मिल गया है, पर वे उसकी पृष्ठभूमि में हुए निरंतर संघर्ष का मूल्यांकन नहीं कर पाते। युगों-युगों के अंधकार से निकलकर यह रोशनी हमें प्राप्त हुई है।

लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक प्रणाली नहीं है और न ही उसका अंतिम लक्ष्य केवल मतदान तक सीमित है। लोकतंत्र वास्तव में एक समग्र जीवन-दर्शन है, एक संपूर्ण जीवन-प्रणाली है। राजतंत्र [एकतंत्र] में पूरा तंत्र अंततः एक व्यक्ति के प्रति उत्तरदायी होता है, जबकि जनतंत्र में प्रत्येक स्तर पर पूरा तंत्र जनता के प्रति उत्तरदायित्व स्वीकार करता है। राष्ट्रीय जीवन की अविच्छिन्न परंपरा ने हमें सबसे बड़ी विरासत दी है—लोकतंत्र। इस विरासत की रक्षा करना हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय कर्तव्य है। लोकतंत्र को आगे बढ़ाना हमारा सबसे बड़ा दायित्व है।

हम शिक्षा के क्षेत्र में हों या साहित्य के, न्याय के क्षेत्र में हों या उद्योग-व्यापार के, प्रशासन में हों या राजनीति में, अथवा पत्रकारिता में—लोकतंत्र के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के लिए हमें आगे बढ़ना ही होगा। विकास किसके लिए? लोकतंत्र के लिए। विकास की कसौटी क्या है? लोकतंत्र। साहित्य और संस्कृति की कसौटी क्या है? लोकतंत्र। लोकतंत्र हमारा धर्म है। लोकतंत्र से बड़ा और कौन-सा धर्म हो सकता है?

संविधान में आस्था का अर्थ है—समष्टि-चेतना में आस्था, सर्वजन-चेतना में आस्था, सामान्यजन-चेतना में आस्था और भारत के लोकजीवन की निरंतरता में आस्था। संविधान में आस्था किसी व्यक्ति में आस्था नहीं है, क्योंकि कोई भी संविधान व्यक्ति-रचना नहीं होता। संविधान समष्टि-रचना है, संविधान सभा की अनेक बैठकों और विमर्शों का परिणाम है। उसका महत्व इसी समष्टि के कारण है। यही गणतंत्र का संदेश है।

रामधारी सिंह दिनकर की पहले गणतंत्र दिवस पर लिखी गई कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है—

आरती लिए तू किसे ढूँढ़ता है मूरख,
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।
फावड़े और हल राजदंड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

छब्बीस जनवरी सन्‌ १९५० । यही दिन था ,जिस दिन भारतवर्ष ” जनतंत्रात्मक गणराज्य” बन गया था और इसी दिन युगकवि रामधारीसिंह दिनकर ने उस “जनतंत्रात्मक गणराज्य” की संकल्पना को अपनी एक कविता के रूप में प्रत्यक्ष किया था । रामधारी सिंह दिनकर की वाणी में उस दिन मानो स्वयं जनतंत्र ही हुंकार उठा था -युग बदल चुका है । समय के रथ पर बैठा हुआ जनतंत्र आ रहा है, रास्ता छोड़ दो , जनता का विजयघोष गूँज रहा है – सिंहासन खाली कर दो । वह कविता मानो आज भी समझा रही है कि जब कभी तुम्हारे मन में “जनतन्त्रात्मक-गणराज्य” के संबंध में कोई शंका पैदा हो , उस दिन इस कविता के अर्थ की गहराई में उतर जाना । रामधारी सिंह दिनकर ने उस दिन इस कविता में आह्वान किया था कि आज किसी राजा के राज्याभिषेक का दिन नहीं है , आज तेतीस करोड़ जनता के सिर पर राजमुकुट सुशोभित किया जाना है । आज से श्रमिक के फ़ावड़े और किसान के हल राजदंड के रूप में प्रतिष्ठित होंगे । आज से सोने-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं की चमक नहीं ,धरती की धूसरता का सौन्दर्य जगमगायेगा । रे मूरख , आज से राजमहलों में राजा को मत ढूँढना ,जो खेतों-खलिहानों में कार्य कर रहा है , जो सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहा है , वही आज भारत का राजा बन चुका है । आज संसार का सबसे बड़ा जनतंत्र प्रतिष्ठित हो रहा है। हजारों बरस का अँधेरा बीत चुका , आज यह सत्य समस्त संसार में प्रकाशित हो चुका है कि संप्रभुता का स्रोत राजमुकुट नहीं , सामान्य जन है । यह सच है कि जनता शिव की तरह विष पान करती है , किन्तु उसी के साथ दूसरा उतना ही बड़ा सच यह है कि जब उसकी भोँहें तन जाती हैं , जब वह कोप करती है तो तूफ़ान आता है , क्रान्ति होती है, महलों की नींव हिल जाती है, भूकंप आ जाता है।

सदियों की ठंडी -बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है।
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
जनता? हां, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली।
जब अंग-अंग में लगे साँप हों चूस रहे
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली।
लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।
अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता, गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं,
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।
सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुँचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तैयार करो
अभिषेक आज राजा का नहीं प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

समझने की बात है कि यह “जनतन्त्र” आसमान से नहीं बरसा था , यह जनतन्त्र किसी बादशाह या सम्राट ने बख्शीश में भी नहीं दिया था । यदि यह लोकतन्त्र राजसिंहासन ने बख्शीश में दिया होता , तो जनता को मताधिकार देने की कृपा नहीं होती । लोकतन्त्र किसी की मेहरबानी नहीं है , लोकतन्त्र लोकजीवन के संघर्ष और समायोजन की युगयुगीन- प्रक्रिया का फल है । उस दिन विश्व ने देखा था और पहचाना था कि संप्रभुता राजसिंहासन या राजमुकुट में से नहीं निकलती , संप्रभुता का स्रोत तो लोकचेतना ही है, लोकमानस की स्वीकार्यता। क्रूर राजाओं आक्रान्ताओं , दस्युओं , बादशाहों , सामन्तों , जमीन्दारों ने कुछ कम जुल्म नहीं ढाये थे । लोकजीवन-लोकसंस्कृति, लोक-आस्था-लोकविश्वास को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी । बार-बार निर्मम प्रहार किया परन्तु वे प्रहार करने वाले इतिहास के मलबे में दब कर खाद बन गये और विजयिनी लोकसंस्कृति का विटप आज मँहक रहा है ।

ध्यान रखने की बात है कि १५ अगस्त सन्‌ १९४७ को आजादी मिल गयी थी , लेकिन जनतंत्र की प्रतिष्ठा के लिए अपने संविधान की जरूरत थी , कि किस प्रकार से जनता अपना राज चलायेगी , किस प्रकार से शासन में जनता की भागीदारी होगी । संविधानसभा ने संविधान-निर्माण के लिए ११४ दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की आजादी थी। अनेक सुधारों और बदलावों के बाद सभा के २८४ सदस्यों ने २४ जनवरी १९५० को संविधान की दो हस्तलिखित प्रतियों पर हस्ताक्षर कर दिये। इसके दो दिन बाद २६ जनवरी को यह संविधान देश भर में लागू हो गया। ” हम भारत के लोगों” ने संविधान को आत्मार्पित किया , अपने ऊपर लागू किया । लोकतन्त्रात्मक- गणराज्य घोषणा की , भारत के प्रत्येक नागरिक को शासन में भागीदारी का अधिकार प्राप्त हो गया । तब से स्वतंत्रता-प्राप्ति के दिन [१५अगस्त ] को भारत के स्वतंत्रता-दिवस के रूप में स्वीकार किया गया और संविधान को आत्मार्पित करने वाले दिन [२६ जनवरी] को गणतंत्र-दिवस की मान्यता मिली ।

छब्बीस जनवरी की इस तारीख का अपना एक इतिहास भी है । सन्‌ १९२९ के लाहौर-अधिवेशन में कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में रावी- नदी के तट पर पूर्ण-स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया था। उस प्रस्ताव में कहीं-न-कहीं फ्रांस की क्रांति की गूँज भी थी। २६ जनवरी १९३० को स्वतंत्रतादिवस मनाने की घोषणा की गयी और उस दिन प्रथम स्वतंत्रता- दिवस मनाया गया । देश जब तक स्वतंत्र नहीं हुआ था , तब तक २६ जनवरी का जुलूस स्वाधीनता-दिवस के रूप में सड़कों पर निकलता था, उस दिन तिरंगा फहराया जाता था, ब्रिटिश सरकार बंदिशें लगाती थीं, तब भी तिरंगा लहरा ही जाता था।

पंडित विद्यानिवास मिश्र ने संस्मरण लिखा है कि “२६ जनवरी, १९४२ को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह होनेवाला था। तिथि पहले से पक्की थी, पर तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर ने कुलपति पं. अमरनाथ झा के पास पत्र लिखा कि इस समारोह में तभी उपस्थित हो सकूँगा, जब उस दिन छात्र संघ के भवन पर छात्र तिरंगा न फहराएँ। झा साहब वैसे तो थे बड़ी ठसक के साहब, पर भीतर से वे देश के लिए स्वाभिमान रखनेवाले व्यक्ति थे। उन्होंने शिष्टतापूर्वक लिख दिया कि विश्वविद्यालय छात्रों का है और वे अगर एक दिन अपनी आकांक्षा का उत्सव करते हैं और शालीनता के साथ, तो उसे मैं रोकूँगा नहीं। आपने पहले तिथि दी थी, दीक्षांत समारोह होगा और दीक्षांत समारोह हुआ। दीक्षांत भाषण महामना पं. मदनमोहन मालवीय ने दिया। उन्हें कुर्सी पर उठाकर लाया गया था। उन्होंने बैठे-बैठे अंग्रेजी में भाषण दिया, पर अंत में छात्रों ने जो काम २६ जनवरी को किया, उसे उन्होंने दो पंक्तियों में क्षीण स्वर में, पर दृढ़ पुकार के साथ दोहराकर किया-

“सब मिल बोलो एक आवाज, अपने देश में अपना राज।”

२६ जनवरी के दिन जहाँ-जहाँ बंदीगृह में स्वाधीनता के सिपाही अवरुद्ध होते थे वहाँ-वहाँ इनकलाब जिंदाबाद जाग उठता था। मुझे स्वयं अपने हाई स्कूल और इंटर कॉलेज के दिन याद हैं, जब समस्त स्कूलों के लड़के २६ जनवरी को प्रभात-फेरी के लिए निकल जाते थे। ”

भारत में गणतन्त्र की एक प्राचीन परंपरा रही है। वैदिक -युग की अनेक जनतांत्रिक -संस्थाओं में सभा थी। सभा के साथ ही एक दूसरी संस्था थी, समिति और सामवेद में उन दोनों को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है। अथर्ववेद में ‘सभा’ और ‘समिति’ का उल्लेख है। सभा के सदस्यों को ‘सभासद’, अध्यक्ष को ‘सभापति’ और द्वाररक्षक को ‘सभापाल’ कहते थे। सभासदों की बड़ी प्रतिष्ठा थी। बौद्ध जातक में एक श्लोक है-“न सा सभा यत्थ न संति संतो, न ते संतों ये न भणन्ति धम्मं। रागं च दोषं च पहाय मोहं धम्म भणन्ता व भवन्ति संते।” अर्थात्‌ वह सभा सभा नहीं, जहाँ संत लोग न हों और वे संत नहीं , जो धर्म का भाषण न करते हों। पुन: वे ही लोग संत कहलाने के अधिकारी थे, जो राग, द्वेष और मोह को छोड़कर धर्म का भाषण करते हों। ‘वाल्मीकि रामायण’ में भी सभा का उल्लेख है। महाभारत’ में सभा और सभासद के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि-
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मं।

नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम् ।[महाभारत, उद्योग पर्व, अध्याय३५, श्लोक ५८ ]

अर्थात्‌ वह सभा वास्तव में सभा ही नहीं है, जहां वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्ध नहीं हैं। और वे वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्ध भी वृद्ध नहीं हैं, जो किसी लालच अथवा भय से धर्म का प्रतिपादन नहीं करते। वह धर्म भी धर्म नहीं है, जहां सत्य प्रतिष्ठित नहीं है। तथा वह सत्य भी सत्य नहीं है, जिसमें छलकपट बिंधा हुआ है।


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