— अम्बेदकर कुमार साहु —
प्रस्तुत आलेख में ‘वेलेंटाइन डे’ का समाजशास्त्रीय नजरिए से विश्लेषण किया गया है। लेख यह तर्क देता है कि वेलेंटाइन डे किस प्रकार से भारतीय परंपरागत मूल्यों को चुनौती दिया है। साथ ही ग्रामीण भारत में वेलेंटाइन डे का सामाजिक अर्थ को समझने का प्रयास किया गया है। वर्ष 1960 के दशक के ‘मुगल-ए-आज़म’ फ़िल्म का एक आइकॉनिक गीत है ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ जो मधुबाला (अनारकली) पर फिल्माया गया है। लेकिन इस गीत के तकरीबन छह दशक से भी अधिक वर्षों के बाद आज भी प्रेम प्रसंगयुक्त घटना पारिवारिक और सामाजिक जीवन में डर एवं कलंक का विषय बना हुआ है। शायद यही एक प्रमुख कारण है कि लोग आज भी अंतर्जातीय विवाह का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। ऐसे में एक तरफ युवा वर्ग के लिए वेलेंटाइन डे एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पुनर्जागरण बनकर उभरा है तो दूसरी ओर यह परंपरागत वैवाहिक जीवन को भी चुनौती दिया है।
क्या है वेलेंटाइन डे?
‘वेलेंटाइन डे’ जिसे संत वेलेंटाइन दिवस या संत वेलेंटाइन का पर्व भी कहा जाता है प्रतिवर्ष 14 फरवरी को मनाया जाता है। वेलेंटाइन डे की उत्पत्ति एक ईसाई पर्व के रूप में हुई थी जो वेलेंटाइन नामक एक शहीद को सम्मानित करता था। बाद में चलकर वेलेंटाइन डे लोक परंपराओं के माध्यम से यह दुनिया के कई क्षेत्रों में रोमांस और प्रेम का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक, धार्मिक और वाणिज्यिक उत्सव बनकर उभरा है। किंतु बढ़ते वैश्वीकरण और आधुनिकता के साथ, वैलेंटाइन डे मनाने की प्रथा जापान, चीन, सिंगापुर, कोरिया, फिलीपींस, थाईलैंड, मिस्र, ईरान, इज़राइल, पाकिस्तान और पश्चिम एशिया जैसे एशियाई देशों में फैल गई है। भारत में भी उदार अर्थव्यवस्था के उदय के साथ, वैलेंटाइन डे एक लोकप्रिय त्योहार बनकर उभरा है।
वेलेंटाइन डे मुख्य रूप से शहरी भारत के युवाओं के लिए अपने प्यार और स्नेह की भावनाओं को व्यक्त करने का एक अवसर बन गया है। आमतौर पर फरवरी को साल का सबसे छोटा महीना माना जाता है, जिसमें 28 दिन (लीप वर्ष को छोड़कर) होते हैं। यद्यपि यह महीना प्रेम उत्सव विशेष रूप से वैलेंटाइन डे (14 फरवरी) के तौर पर मनाया जाता है। समकालीन भारत में वैलेंटाइन का उत्सव एक नियमित दिनचर्या बन गया है जिसमें प्रेमी-प्रेमिका आपस में कार्ड और उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं और जिसमें पूरा वातावरण लाल गुलाब, प्रेम, रोमांस और उत्सवों से जगमगा उठता है। इस तरीके से भारत जैसे स्तरीकृत समाज में वेलेंटाइन डे एक एजेंसी के तौर पर स्थापित हुआ है जिसके सहारे युवा वर्ग प्यार को खुलकर व्यक्त कर रहे हैं, जो अक्सर पारंपरिक भारतीय धारणाओं द्वारा प्रतिबंधित था। जाहिर तौर पर, शहरी भारत के युवा उत्साहपूर्वक अपने प्यार की भावनाओं को व्यक्त करते हैं। विशेष रूप से भारतीय शैक्षणिक परिसरों को ताजे गुलाबों और चमकते कार्डों से सजाना। इस प्रक्रिया में बाजार उन्मुख इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, फलते-फूलते कार्ड व्यवसाय और बढ़ते आतिथ्य उद्योग द्वारा समर्थित विभिन्न प्रचार कार्यक्रमों ने न केवल इसे वैधता प्रदान की है, बल्कि इसे गति भी दी है।
ग्रामीण भारत में वेलेंटाइन डे का अर्थ
वस्तुत: वैलेंटाइन डे उत्सव में भाग लेने वाले अधिकांश युवक-युवती पश्चिमी त्योहार एवं संस्कृति से प्रभावित होते हैं जो कि महज भारत के मुख्य शहरी क्षेत्रों तक सीमित है जिसे समाजशास्त्रीय भाषा में ‘मेट्रोपॉलिटन सिटी’ भी कहा जाता है। क्योंकि उत्तर आधुनिकता के दौर में ग्रामीण भारत के बड़े हिस्से वैलेंटाइन डे से अनभिज्ञ हैं। चूँकि हमारे देश की बड़ी आबादी गाँव में निवास करता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, ग्रामीण भारत में कुल जनसंख्या का 68।84% लोग निवास करते हैं जबकि बिहार राज्य की कुल संख्या का 88।71% आबादी गाँव में रहते हैं। इस प्रकार बिहार जैसे कम शहरीकृत वाले राज्य के अधिकांश लोगों में वेलेंटाइन डे के बारे में कोई जानकारी नहीं है। जैसा कि बिहार के दरभंगा जनपद के पाँच ग्रामीण गाँवों के प्राथमिक अध्ययन में हमने पाया कि 40 से 60 वर्ष के महिला-पुरुषों के पास (90 प्रतिशत) वेलेंटाइन डे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी जबकि दस प्रतिशत लोगों को मालूम था कि वेलेंटाइन डे का अर्थ ‘लड़का-लड़की के प्रेम’ होता है।
हालाँकि ग्रामीण बिहार में वैलेंटाइन डे जानने वाले वृहद समूह युवक-युवती का हैं (15 से 30 वर्ष), जिन्हें प्राय: सोशल मीडिया के माध्यम से जानकरी मिली है। ध्यातव्य है कि वेलेंटाइन डे जानने वाले वृहद युवक-युवतियां ग्रामीण बिहार में तीन प्रमुख वजहों से वैलेंटाइन डे नहीं मनाते हैं। प्रथम, बिहार में ग्रामीण युवाओं के पास प्रेमी-प्रेमिकाओं से मिलने और अवसर का अभाव है। दूसरा, जीवनसाथी या दोस्त के स्वतंत्र चुनाव में अक्सर परिवार प्रतिबंध लगाते हैं और तीसरा, व्यापक लोगों के मस्तिष्क में यह धारणा मौजूद है कि वेलेंटाइन डे फिजूल खर्चे का त्योहार है। इस प्रकार शोध से पता चलता है कि वैलेंटाइन डे भारत में अभी तक मेट्रोपॉलिटन केन्द्रित महोत्सव के रूप में सीमित है।
परंपरागत भारतीय मूल्य एवं वेलेंटाइन डे
परंपरागत रूप से, भारतीय गाँव में नातेदारी अधिक मजबूत थी। यह नातेदारी प्राय: जाति पर आधारित था जिसके तहत विवाह संबंध भी अपने ही जाति में निर्धारित की जाती थी जो कि आंशिक सुधार के बाद आज भी प्रचलन में है। आमतौर पर गाँव के बुजुर्ग, स्कूल शिक्षक, वरिष्ठ रिश्तेदार, नाई और ब्राह्मण गाँव के वयस्क बच्चों के लिए उपयुक्त वर खोजते थे। ऐसे विवाह अधिकतर जातिगत मानदंडों द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही संपन्न होते थे। तथापि भारत में विवाह एक सामाजिक और धार्मिक प्रथा रही है। यद्यपि हिन्दू विवाह का अर्थ जन्म-जन्मांतर का संबंध और मुस्लिम विवाह को एक समझौता माना जाता हैं। लेकिन आधुनिकता के साथ विवाह संबंध प्रेम-संबंधों में तब्दील हो चुकी हैं जिसे वेलेंटाइन डे के माध्यम से देखा जा सकता हैं।
दरअसल प्रेम की व्यक्तिगत भावनाओं के इस अचानक सार्वजनिक प्रदर्शन ने भारतीय समाज के कुछ वर्गों को झकझोर दिया है जिसमें एक ओर वामपंथी कट्टरपंथी और दूसरी ओर रूढ़िवादी धर्मांध वर्ग प्रमुखता से शामिल हैं। जहाँ रूढ़िवादी धर्मांध वर्ग ने वेलेंटाइन डे की निंदा करते हुए इसे पश्चिमीकरण और वैश्वीकरण का अवांछनीय प्रभाव बताया है, वहीं वामपंथियों को इस नए ‘प्रेम उत्सव’ के पीछे एक छिपे एजेंडे का संदेह है। वामपंथी उभरते भारतीय मध्यम वर्ग को लक्षित करके खुलेआम व्यवसायीकरण को बढ़ावा देने के लिए पश्चिम के नव-साम्राज्यवाद को दोषी ठहराते हैं। हालाँकि रूढ़िवादी इस प्रेम उत्सव के पीछे पश्चिम की ‘षड्यंत्र सिद्धांत’ के संबंध में कट्टरपंथियों से सहमत हैं, लेकिन उनके आरोप अलग हैं। ऐसे में कई प्रकार्यवादी विद्वानों का तर्क है कि वेलेंटाइन डे कथित तौर पर पारंपरिक भारतीय संस्कृति को नष्ट करने और भारतीय युवाओं को नैतिक रूप से भ्रष्ट करने वाली बाहरी ताकतों द्वारा फैलाई जा रही सांस्कृतिक प्रदूषण हैं।
इसके अलावा, वेलेंटाइन डे पर जन समुदाय में भी अलग-अलग राय है। इस संदर्भ में दरभंगा के एक 55 वर्षीय बुजुर्ग ने हमें बताया कि “वेलेंटाइन डे से हमारे बच्चे बिगड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि बच्चे अपनी मर्जी से आजकल शादी-विवाह तो कर लेते हैं लेकिन बाद में बूढ़े मां-बाप को छोड़कर घर से बाहर दिल्ली, मुंम्बई चले जाते हैं, ऐसे में हमलोगों का देखभाल कौन करेगा।” इसी तरह एक अन्य 26 वर्षीय महिला ने बताया कि “वेलेंटाइन डे तो सबसे अच्छी चीज है क्योंकि व्यक्ति अपने पसंद से शादी करते हैं। वे बताती है कि प्रेम करना अच्छी बात है और सबसे अच्छी बात यह है कि प्रेम विवाह में दहेज भी नहीं देना पड़ता है।” इस प्रकार वेलेंटाइन डे जैसे पश्चिम के संस्कृतियों के प्रभाव से संयुक्त परिवार की संरचना और जाति व्यवस्था जैसी पारंपरिक भारतीय संस्थाएँ आंशिक तौर पर कमजोर हुई है। इसके अतिरिक्त सेवा भाव पर आधारित परंपरागत भारतीय मूल्यों में भी व्यावहारिक परिवर्तन हुआ है।
आगे की राह
वैश्विकरण के दौर में वैवाहिक जीवन बदल रहा है। बिन ब्याही औरत माँ बन रही है। वैवाहिक उम्मीदवारों का संक्षिप्त परिचय सोशल मीडिया में वैवाहिक विज्ञापन, और विवाह संबंधी वेबसाइटें जैसे उभरते वैकल्पिक सामाजिक नवाचार पारंपरिक विवाह प्रणाली को चुनौती दे रही हैं। हालाँकि, आधुनिक भारत में युवक-युवती जीवनसाथी के चुनाव जैसे अत्यंत निजी मामलों में व्यक्तिगत स्थान की चाह रखती है। इसके साथ ही पश्चिम के तर्ज पर भारतीय समाज में भी डेटिंग की विविधता आरंभ हो चुका है। शायद इसलिए, युवक-युवती वैलेंटाइन डे, मित्रता दिवस, गुलाब दिवस जैसे अवसरों पर दोस्त और जीवनसाथी खोजने के लिए उपयुक्त मानते हैं। यद्यपि जीवनसाथी के चुनाव में शहर अधिक आगे है जबकि ग्रामीण भारत में अभी भी संरचनात्मक एवं व्यावहारिक परिवर्तन की गुंजाइश है।
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