शिव : एक सुगंध

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शिव

Parichay Das

— परिचय दास —

शिव, वह नाम जिसे लेते ही एक अद्भुत शीतलता और ऊर्जस्विता का अनुभव होता है। उनकी उपस्थिति से ही एक अलौकिक सुगंध हमारे भीतर व्याप्त हो जाती है। यह सुगंध किसी गंध-विज्ञान की परिधि में नहीं आती, यह आत्मा की सुगंध है, जो सांसों से नहीं, भावों से महसूस की जाती है। शिव की गंध हिमालय के उन ऊँचे शिखरों से आती है, जहाँ हिम अपनी श्वेत चादर में ध्यानमग्न बैठा है। यह गंध उन जलधाराओं से आती है, जो गंगा के रूप में उनकी जटाओं से बहकर समस्त संसार को पावन करती है। यह सुगंध उनके मस्तक पर सुशोभित अर्द्धचंद्र से टपकती शीतलता की है, उनके शरीर पर लिपटी भस्म से उठती दिव्यता की है, उनके नटराज रूप में छुपी अनंत लय की है।

शिव कोई एक स्थिर आकृति नहीं, वे तो प्रवाह हैं, अनवरत, अविराम। वे कभी गहन ध्यान में लीन समाधिस्थ हैं तो कभी विकराल तांडव में समूचे ब्रह्मांड को गति दे रहे हैं। उनके कमल सदृश नेत्र बंद होते हैं तो सृजन की कल्पना जन्म लेती है, और जब वे आँखें खोलते हैं तो प्रलय की आहट सुनाई देने लगती है। इसी लय में, इसी नर्तन में एक अनोखी सुगंध समाई हुई है। शिव के स्पर्श मात्र से कैलाश के पत्थर भी सुवासित हो उठते हैं, उनके चरणों की धूल भी किसी चंदन की तरह महक उठती है।

वे अकल्पनीय हैं, किंतु कल्पनाओं के आदिगुरु भी। उनकी ध्वनि मौन से जन्म लेती है और अनहद में विलीन हो जाती है। कोई उन्हें सगुण रूप में देखता है—गले में नाग, मस्तक पर गंगा, हाथ में त्रिशूल—तो कोई उन्हें निराकार ऊर्जा के रूप में। वे योगियों के लिए ध्यान हैं, कवियों के लिए अलंकार, संगीतकारों के लिए राग, और भक्तों के लिए समर्पण। उनकी उपस्थिति मात्र से ही वातावरण में एक दिव्य सुगंध फैल जाती है—एक ऐसी सुगंध जिसे कोई इन्द्रियों से नहीं, बल्कि अंतर्मन से महसूस कर सकता है।

यह कैसी सुगंध है? यह चंपा, चमेली, गुलाब, या केवड़े की गंध नहीं है। यह किसी पुष्प से निकली सुवास भी नहीं, न ही किसी इत्र का छिड़काव। यह तो तप का सुवास है, भस्म की महक है, योग की सुगंध है। यह सुगंध वहाँ बसती है, जहाँ कोई अपने भीतर शिव को पा लेता है। यह उस साधक के चारों ओर बसी रहती है, जो अपने अहंकार को शिव के चरणों में समर्पित कर देता है। यह गंध वटवृक्ष के नीचे तपस्यारत योगियों के आसपास मंडराती है, यह गंध उस मन में बसती है जो अपने संकल्पों में अडिग है, अपने सत्य पर स्थिर है।

शिव की इस सुगंध में एक विशेष आकर्षण है। यह मोहक नहीं, किंतु सम्मोहक है। यह खींचती नहीं, बल्कि डुबो देती है। यह आकाश में उड़ने का आह्वान नहीं करती, बल्कि धरती से जोड़ती है। यह वह गंध है, जो किसी वन की गहराइयों में नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की गहराइयों में बसती है। यह हमारे भीतर की निस्तब्धता से जन्म लेती है और एक अलौकिक शांति का प्रसार करती है।

शिव के ध्यानी रूप को देखो—गंगाजल उनके अंगों से टकराकर एक विशेष गंध छोड़ता है। उनके केशों में उलझी हवा जब मुक्त होती है, तो उसमें एक विचित्र सोंधापन समा जाता है। उनके माथे की तीसरी आँख जब खुलती है, तो अग्नि के साथ एक तेजस्वी सुगंध फैलती है। वे जो भस्म रमाते हैं, वह कोई साधारण भस्म नहीं; वह कामना की अग्नि में जले हुए विकारों की राख है। उसमें सांसारिकता की गंध नहीं, बल्कि त्याग की सुगंध है।

शिव की यह सुगंध हमें किस ओर ले जाती है? यह हमें भीतर की यात्रा पर ले जाती है। यह हमें बाहरी चमक-दमक से हटाकर उस मौन में ले जाती है, जहाँ शिव विराजते हैं। यह हमें शोर से हटाकर उस नाद में ले जाती है, जहाँ शिव का डमरू गूँजता है। यह हमें सांसारिक आसक्ति से हटाकर उस विरक्ति में ले जाती है, जहाँ शिव की समाधि लगती है।

जब कोई शिव के इस सुगंधमय स्वरूप को अनुभव कर लेता है, तो उसकी दृष्टि बदल जाती है। उसे संसार के हर कोने में शिव की छवि दिखाई देने लगती है। उसे हर बहती हवा में, हर नदी की धारा में, हर पर्वत की ऊँचाई में, हर हृदय की धड़कन में शिव की सुगंध अनुभव होने लगती है। यह सुगंध किसी विशेष स्थान की नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है—कभी ध्यान में, कभी भजन में, कभी तांडव में, कभी मौन में।

शिव की इस सुगंध का कोई अंत नहीं, क्योंकि शिव स्वयं अनंत हैं। वे काल के भी पार हैं, संहार के भी पार। वे मृत्यु में भी अमृत हैं, और अमृत में भी विरक्ति। वे योगियों के योग हैं, वे कवियों की कविता। वे संगीतकारों की ताल हैं, और नर्तकों की गति। वे शब्दों में सीमित नहीं, लेकिन हर शब्द उन्हीं की ओर संकेत करता है। वे रूप में नहीं बंधते, लेकिन हर रूप उन्हीं का विस्तार है।

शिव की इस अनोखी सुगंध में जो रम गया, वह स्वयं सुवासित हो गया। फिर वह स्वयं दीपक बनकर जलने लगा, स्वयं स्रोत बनकर बहने लगा, स्वयं ओंकार बनकर गूंजने लगा। शिव की यह सुगंध स्थूल नहीं, बल्कि सूक्ष्मतम अनुभूति है—एक ऐसी अनुभूति, जिसे बस महसूस किया जा सकता है, परंतु जिसे शब्दों में बाँध पाना असंभव है।

शिव की सुगंध केवल धूप, चंदन, गंगा जल और विल्व पत्र की नहीं है। यह सुगंध अनहद नाद की है, जो कहीं सुनाई नहीं देता, फिर भी हर जगह विद्यमान है। यह उस मौन की सुगंध है, जो ध्यानस्थ योगियों के चारों ओर व्याप्त रहती है। यह उस नर्तन की सुगंध है, जिसमें सृष्टि का संगीत समाया हुआ है। शिव की यह सुगंध किसी एक जगह सीमित नहीं है—वह कैलाश के शिखरों पर भी बहती है और किसी एकाकी संन्यासी के हृदय में भी बसती है। वह श्मशान की राख में भी महकती है और भक्त के आँसुओं में भी घुल जाती है।

क्या यह सुगंध सांसों से महसूस की जा सकती है? नहीं। यह सुगंध तो आत्मा से आती है। जब कोई शिव को भीतर स्वीकार करता है, जब कोई अपने विकारों को उनके चरणों में अर्पित कर देता है, तब यह सुगंध उसके चारों ओर व्याप्त हो जाती है। यह केवल साधना का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयं साधना का मार्ग भी है। यह सुगंध उन शब्दों में भी समाई हुई है, जो शिव की महिमा गाते हैं। यह सुगंध ‘हर-हर महादेव’ के उस उद्घोष में है, जो भक्तों की जुबान से निकलकर अनंत में विलीन हो जाता है।

शिव की यह सुगंध विरक्ति भी है और अनासक्ति भी। यह मोह से मुक्ति की सुगंध है, परंतु प्रेम से भरी हुई है। यह तपस्या की सुगंध है, परंतु आनंद से सराबोर है। यह भस्म की गंध है, परंतु इसमें समस्त जीवन की दिव्यता समाई हुई है। यह सुगंध किसी सीमाओं में नहीं बंधती, यह तो उसी की अनुभूति में आती है, जो अपने भीतर के शिव को जाग्रत कर लेता है।


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