प्रोफेसर रामचंद्र प्रधान का देहावसान देशज ज्ञान परंपरा के एक असाधारण मर्मज्ञ का महाप्रस्थान है। राष्ट्रीय आंदोलन की बनावट और उसकी प्रमुख धाराओं पर उनका गहरा अध्ययन उन्हें इतिहासकारों के बीच विशिष्ट पहचान प्रदान करता था। सन् 1966 से 2026 तक के लगभग सात दशकों में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर गांधी विचार परिषद, वर्धा तक देश-विदेश के असंख्य युवक-युवतियों को ज्ञान-संस्कार प्रदान किए।
भारतीय बौद्धिक समुदाय में वे गांधी–लोहिया–जयप्रकाश धारा के यशस्वी प्रतिनिधि के रूप में परिवर्तनकारी राजनीति को प्रेरित करते रहे। उनके रचना-संसार में गांधी विमर्श का केंद्रीय स्थान था। डॉ. लोहिया के प्रति उनका विशेष अनुराग था, किंतु इसके साथ ही उन्होंने किसानों के मसीहा स्वामी सहजानंद और समाजवादी स्वतंत्रता सेनानी रामानंदन मिश्र की रचनाओं की महत्ता से भी नई पीढ़ी को परिचित कराया। बढ़ती आयु के साथ उनकी सृजनशीलता और अधिक गतिशील होती गई।
बिहार के एक संपन्न ग्रामीण परिवार में जन्मे और पले-बढ़े डॉ. प्रधान ने अपना शिक्षक जीवन दिल्ली के रामजस कॉलेज से प्रारंभ किया। वे शिक्षकों के बीच अपने समाजवादी रुझान के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी निडरता, सरलता और न्यायप्रियता ने उन्हें विशिष्ट बनाया। उनके जैसी लोकप्रियता विरले शिक्षकों को ही प्राप्त होती है।
वे बहुतों की स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहेंगे।
हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।
— आनंद कुमार
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