गांधी से हमारे वादे… जो केवल तोड़ने के लिए किए गए थे!

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गांधी

क्या 18 जनवरी 1948 को गांधीजी ने अपना उपवास केवल इसलिए तोड़ा था कि हम उनके जाने के बाद उन वादों को कागजी साबित कर दें? बिड़ला हाउस में जब ‘दिल्ली संकल्प पत्र’ पर हस्ताक्षर हो रहे थे, तब गांधी को शायद आभास था कि उनके अपनों के मन में क्या चल रहा है। आज जब हम मुड़कर देखते हैं, तो सवाल उठता है— क्या वे वादे सिर्फ गांधी की जान बचाने के लिए थे, या उनके सिद्धांतों को हमेशा के लिए दफन करने के लिए?

इतिहास के पन्नों में 13 जनवरी 1948 की तारीख एक गहरे आत्ममंथन का विषय है। उस दिन नई दिल्ली की रक्तरंजित सड़कों पर शांति बहाली के लिए महात्मा गांधी ने अपने जीवन का अंतिम उपवास शुरू किया था। यह अनशन केवल दंगों के खिलाफ नहीं था, बल्कि गांधीजी की अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली और सरदार पटेल जैसे करीबियों से कानून व्यवस्था को लेकर गहरी नाराजगी का परिणाम भी था।

​12 जनवरी 1948 की शाम, बिड़ला हाउस की प्रार्थना सभा में एक 78 वर्षीय वृद्ध ने घोषणा की— “कल सुबह से मेरा अनिश्चितकालीन उपवास शुरू होगा।” यह केवल एक घोषणा नहीं, बल्कि अपनी ही आत्मा की उस ‘नन्ही सी आवाज’ का आदेश था जिसे गांधी अब और अनसुना नहीं कर सकते थे।

​गांधी को एक कड़वा अहसास हो चुका था। उन्हें लगा कि भारत की जिस ‘अहिंसा’ पर उन्हें गर्व था, वह दरअसल अहिंसा नहीं, बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया एक ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ (Passive Resistance) मात्र था। उन्होंने भारी मन से कहा—
​”भारत ने अहिंसा को रणनीति तो बनाया, पर धर्म नहीं। आज जब जनता के हाथ में ताकत आई है, तो उसने दिखा दिया कि उसे पशुता और हिंसा से कोई परहेज नहीं। अगर अहिंसा असफल है, तो शायद उपकरण (औजार) में कमी है, और वह औजार मैं खुद हूँ।”

​गांधी स्वयं को ‘इखरात’ (सूली) पर चढ़ा रहे थे ताकि वे अपने सिद्धांतों की शुद्धता की अंतिम जांच कर सकें।

​18 जनवरी 1948 को जब गांधीजी ने अपना उपवास तोड़ा, तो उनके सामने ‘दिल्ली संकल्पपत्र’ रखा गया। विभिन्न धर्मों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने शपथ ली कि दिल्ली में अब पूर्ण शांति होगी और हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब मिल-जुलकर रहेंगे। दिल्ली की सड़कों पर एकता के जुलूस निकले,विभिन्न समुदाय के लोग एक दूसरे के गले मिले और मिठाइयां बांटी गईं।

​लेकिन गांधीजी की दृष्टि भविष्यद्रष्टा थी। उन्होंने उपवास तोड़ते समय एक अत्यंत मार्मिक बात कही— “मैं आपको वचनबद्ध करना चाहता हूँ कि यह संकल्प केवल मेरा उपवास तुड़वाने के लिए न हो। यह लिखित वादा केवल दिल्ली के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए होना चाहिए। अगर यह वादा टूटा, तो मेरी जिंदगी फिर खतरे में पड़ जाएगी।”

​कलकत्ता की पूर्वपीठिका और नेताओं का असमंजस

​गांधीजी के साथ किए गए इन वादों की गंभीरता को समझने के लिए कलकत्ता के अनशन को याद करना जरूरी है। वहां राजगोपालाचारी और सुहरावर्दी ने जब शांति का दावा किया, तो गांधी ने एक कठिन शर्त रख दी थी— “यदि शांति भंग हुई, तो तुम नेताओं को खुद दंगों के बीच उतरना होगा, भले ही शांति स्थापना के लिए तुम्हें मरना क्यों न पड़ जाए।”

​सुहरावर्दी जैसे मंझे हुए वकील और राजगोपालाचारी जैसे कूटनीतिज्ञ इस शर्त से सकपका गए थे। उन्हें लगा कि ‘बुड्ढा’ उंगली पकड़कर हाथ पकड़ रहा है। वे तो सिर्फ गांधी की जान बचाने आए थे, खुद को मुसीबत में डालने नहीं। अंततः बंद कमरे में क्या कूटनीति हुई, कोई नहीं जानता, लेकिन राजाजी ने गांधी से कह दिया कि जैसा आप चाहते हो वैसा ही होगा,और गांधी ने मौलाना आजाद के हाथों जूस पीकर अनशन खत्म किया।

​क्या दिल्ली संकल्प पत्र एक तरह का छलावा था ?

​दिल्ली के अनशन के समय सभी पक्षों ने जो संकल्प दिया था वे खुद आश्वस्त नहीं थे कि वे अपनी कही हुई बात पर कितना टिक पाएंगे। वे एक तरह से गांधीजी को ‘धोखा’ देने के लिए तैयार होकर आए थे। वे जानते थे कि गांधीजी को केवल बातों से नहीं जीता जा सकता, इसलिए उन्होंने वे वादे किए जिन्हें निभाने का उनका कभी इरादा ही नहीं था।

गांधी से भय तो पाकिस्तान को भी था क्योंकि गांधी तो पंजाब (पाकिस्तान) जाने के लिए ही दिल्ली आए थे। उनका इरादा था कि वे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से उन लोगों को वापस पाकिस्तान ले जाएंगे जिन्हें पाकिस्तान ने जबरन भगा दिया था और वहां से उन लोगों को वापस भारत लाएंगे जिन्हें यहां से जबरन भगा दिया था।

जिस दिन गांधी अपना अनशन तोड़ रहे थे तो उसके पहले जब प्रार्थना सभा हुई तो उस प्रार्थना सभा में पाकिस्तान के उच्चायुक्त भी आये हुए थे। जब उच्चायुक्त वापस पाकिस्तान जा रहे थे तो गांधीजी ने प्यारेलाल से कहा कि इनसे कहो कि मैं पाकिस्तान आने की सोच रहा हूँ। बाद में जब गांधी ने प्यारेलाल से पूछा कि उच्चायुक्त ने क्या कहा तो प्यारेलाल ने कहा कि पाक उच्चायुक्त ने कहा है कि अभी वक्त ठीक नहीं है। सुहरावर्दी तो एक बार हार चुके हैं गांधीजी से, अब हम दुबारा नहीं हारना चाहते हैं।

​इतिहास गवाह है कि हमने गांधी से किए वादे निभाने के लिए नहीं, बल्कि तोड़ने के लिए किए थे। हमने अहिंसा का चोला तो ओढ़ा, लेकिन भीतर से हम वही हिंसक और सांप्रदायिक बने रहे जिसे गांधी खत्म करना चाहते थे। 1948 का वह अंतिम उपवास और हमारे वे टूटे हुए वादे! क्या हमने गांधी को एक ऐसा वचन दिया था जिसे निभाने का हमारा कभी इरादा ही नहीं था? आखिर क्यों गांधी ने कहा था कि ‘अगर तुम्हारा वादा टूटा, तो मेरी जिंदगी फिर खतरे में पड़ जाएगी’? यह इतिहास के उस धुंधले पन्ने का विश्लेषण है, जो आज के भारत के लिए एक कड़वा आईना है।


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