भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद! – परिचय दास 

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Dr. Rajendra Prasad

Parichay Das

भारतीय संविधान के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जो स्वयं ग्रंथ नहीं लिखते पर उनके मौन में एक महाग्रंथ की गूंज रहती है। राजेंद्र प्रसाद का नाम उसी तरह लिया जाता है—एक ऐसे मनुष्य के रूप में, जिसने संविधान को केवल विधिक दस्तावेज़ नहीं बल्कि एक नैतिक प्रतिज्ञा की तरह जिया। वे न तो वाक्पटुता के चकाचौंध में विश्वास रखते थे, न सत्ता के नाटकीय प्रदर्शन में; पर उनके संयमित हस्ताक्षर में उस युग की धड़कन दर्ज थी, जब भारत अपने को नए रूप में गढ़ रहा था।

संविधान-सभा की अध्यक्षता करते समय उनका स्वर कभी ऊँचा नहीं हुआ पर उनकी उपस्थिति ऊँची थी। वे बहसों के बीच एक तटस्थ दीपक की तरह रहे—जिसकी लौ स्थिर हो पर प्रकाश सर्वत्र फैले। जब-जब सभा में मतभेद तीखे हुए, तब-तब उनका शांत आचरण एक अदृश्य अनुशासन बन गया। संविधान-निर्माण की प्रक्रिया केवल विधि-निर्माण नहीं थी; वह स्मृतियों, संघर्षों और आशाओं की जटिल बुनावट थी। उस बुनावट में राजेंद्र प्रसाद ने धैर्य का सूत जोड़ा।

संविधान-निर्माण में बौद्धिक प्रारूप-रचना की केंद्रीय भूमिका डॉ. भीमराव अम्बेडकर की थी। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने विधिक संरचना, मौलिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और संघीय व्यवस्था को सुविचारित रूप दिया। उनके अध्ययन और तर्कशीलता ने संविधान को आधुनिक विश्व की संवैधानिक परंपराओं से संवाद में रखा।

किसी भी प्रारूप का अंतिम रूप राष्ट्रीय सहमति से ही बनता है। यहाँ राजेंद्र प्रसाद का योगदान निर्णायक था। वे उस व्यापक विमर्श के अध्यक्ष थे, जिसमें विभिन्न राजनीतिक धाराएँ, सांस्कृतिक दृष्टियाँ और क्षेत्रीय आकांक्षाएँ उपस्थित थीं। संघीय ढाँचे पर मतभेद, भाषा का प्रश्न, अल्पसंख्यक अधिकार, केंद्र और राज्यों की शक्तियाँ—ये सब विषय केवल तकनीकी नहीं, भावनात्मक भी थे। ऐसे समय में अध्यक्ष का संतुलन ही सभा की विश्वसनीयता बनता है। राजेंद्र प्रसाद ने उस विश्वसनीयता को अक्षुण्ण रखा।

26 जनवरी , 1950 का दिन केवल एक तिथि नहीं, एक रूपांतरण था। उसी दिन भारत ने गणतंत्र के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त किया और राजेंद्र प्रसाद ने प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति पद उनके लिए शक्ति का शिखर नहीं, उत्तरदायित्व का शिखर था। वे जानते थे कि संसदीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति की भूमिका सीमित और परामर्श-आधारित है, पर उसकी गरिमा अनंत है। उन्होंने इस गरिमा को अलंकार से नहीं, मर्यादा से प्रतिष्ठित किया।

उनकी संवैधानिक भूमिका का सबसे सूक्ष्म पक्ष था—मर्यादित हस्तक्षेप। वे मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे थे, परंतु विवेक से रिक्त नहीं। कभी वे अपनी शंकाएँ व्यक्त करते, प्रश्न उठाते, पर अंततः लोकतांत्रिक परंपरा का सम्मान करते। यह संतुलन ही उनकी विशिष्टता था—न कठपुतली, न प्रतिद्वंद्वी। उन्होंने यह दिखाया कि संविधान की आत्मा केवल धाराओं में नहीं, आचरण में बसती है।
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ उनके संबंध भी इसी संतुलन के उदाहरण हैं। विचारों में भिन्नता थी—आधुनिकता और परंपरा के प्रश्न पर, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के स्वरूप पर—पर संवाद में कटुता नहीं थी। राष्ट्रपति भवन में धार्मिक अनुष्ठानों में उनकी सहभागिता को लेकर बहसें हुईं पर उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी आस्था निजी है, राज्य-नीति नहीं। इस प्रकार उन्होंने भारतीय धर्मनिरपेक्षता को एक व्यवहारिक रूप दिया—जहाँ राज्य निरपेक्ष है पर व्यक्ति की आस्था का सम्मान बना रहता है।

संविधान पर हस्ताक्षर करते समय उनका चेहरा किसी विजेता का नहीं, साधक का प्रतीत होता है। उन्होंने कहा था कि संविधान कितना भी श्रेष्ठ क्यों न हो, यदि उसे संचालित करने वाले लोग श्रेष्ठ नहीं होंगे तो वह निष्प्राण हो जाएगा। यह कथन केवल भाषण नहीं, उनकी संवैधानिक दृष्टि का सार है। वे जानते थे कि संविधान की सफलता अंततः नैतिक अनुशासन पर निर्भर है।

यह भी सत्य है कि समय के साथ डॉ. अम्बेडकर सामाजिक न्याय और वंचित समुदायों की आकांक्षाओं के प्रतीक के रूप में अधिक व्यापक जन-चेतना में प्रतिष्ठित हुए। उनका सम्मान संविधान-निर्माण से आगे बढ़कर सामाजिक पुनर्निर्माण का प्रतीक बन गया। वहीं राजेंद्र प्रसाद का व्यक्तित्व अधिक शांत, संयमी और परंपरागत था—वे प्रतिरोध के नायक से अधिक संस्थागत मर्यादा के संरक्षक रहे। समाज प्रायः उग्र परिवर्तन के प्रतीकों को अधिक मुखर सम्मान देता है; संयम का मूल्यांकन अक्सर दीर्घकाल में होता है।

भारतीय संविधान का निर्माण सामूहिक प्रयास था। अम्बेडकर ने उसकी वैचारिक और विधिक संरचना को दृढ़ आधार दिया; राजेंद्र प्रसाद ने उस संरचना को राष्ट्रीय सहमति और संस्थागत गरिमा में रूपांतरित किया।

राजेंद्र प्रसाद की महानता इस तथ्य में है कि उन्होंने पद की शक्ति को मर्यादा में बदला। उन्होंने सिद्ध किया कि संस्थाएँ व्यक्तित्व से बड़ी होती हैं, पर व्यक्तित्व की नैतिकता से ही संस्थाएँ स्थायित्व पाती हैं। संविधान-सभा की अध्यक्षता से लेकर राष्ट्रपति पद तक उनका आचरण इस निरंतरता का प्रमाण है।

उन्हें स्मरण करना संविधान के उस शांत स्वर को स्मरण करना है जो ऊँचे नारों के बीच भी स्थिर रहता है। वे किसी क्रांति के उद्घोषक नहीं थे पर क्रांति के बाद की व्यवस्था के विश्वसनीय संरक्षक अवश्य थे। उनके हस्ताक्षर केवल औपचारिकता नहीं, उस युग की सामूहिक चेतना की स्वीकृति थे।

भारतीय संविधान की कथा में राजेंद्र प्रसाद एक केंद्रीय नैतिक धुरी हैं—ऐसी धुरी, जिसके बिना बहसें दिशा खो सकती थीं। वे सांविधानिक शब्दों को राष्ट्र की प्रतिष्ठा में परिणत करने वाले प्रमुख व्यक्तित्व थे। यह उनका विशिष्ट और स्थायी योगदान है। भारतीय संविधान-निर्माण सामूहिक बुद्धि, संघर्ष और सहमति का परिणाम था। इस व्यापक प्रक्रिया में राजेंद्र प्रसाद की भूमिका उस नैतिक केंद्र की तरह थी, जिसने समूचे विमर्श को संतुलन और गरिमा दी। यदि प्रारूप-निर्माण ने संविधान को विचार दिया तो उनकी अध्यक्षता ने उसे विश्वसनीयता और संस्थागत प्रतिष्ठा प्रदान की।

उनका योगदान शोर में नहीं, संयम में था; वाक्-कौशल में नहीं, मर्यादा में था। उन्होंने यह स्थापित किया कि सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति यदि आत्मसंयम, निष्पक्षता और संवैधानिक निष्ठा का पालन करे तो वही आचरण भविष्य की परंपरा बन जाता है। इस दृष्टि से उनका महत्त्व केवल ऐतिहासिक नहीं, मानकात्मक है—वे एक उदाहरण हैं कि लोकतंत्र की स्थिरता नियमों से उतनी नहीं बनती, जितनी उन व्यक्तियों से जो नियमों के पीछे की नैतिकता को जीते हैं।

संविधान-निर्माण में विविध प्रतिभाओं की साझेदारी थी पर राजेंद्र प्रसाद उस साझेदारी के विश्वासी संरक्षक रहे। उन्होंने राष्ट्रपति पद को शक्ति की नहीं, मर्यादा की संस्था बनाया और संविधान को विधिक दस्तावेज़ से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय चरित्र का दर्पण सिद्ध किया। यही उनकी सबसे स्थायी और गहन संवैधानिक उपलब्धि है।


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