डॉ. मेनका गुरुस्वामी समकालीन भारत की उन दुर्लभ वकीलों में हैं, जिन्होंने अदालत, अकादमिक दुनिया और एलजीबीटीक्यू अधिकारों तीनों मोर्चों पर समान रूप से गहरा हस्तक्षेप किया है। वे सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को रद्द करवाने वाली ऐतिहासिक संविधान पीठ में याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस करने के कारण वैश्विक स्तर पर पहचानी गईं
मेनका का बचपन हैदराबाद में बीता, जहाँ उन्होंने हैदराबाद पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की; बाद में दिल्ली के सरदार पटेल विद्यालय से स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके बाद वे नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु पहुँचीं और 1997 में बी.ए. एलएल.बी. (ऑनर्स) की डिग्री के साथ स्नातक हुईं। उन्हें रोड्स स्कॉलरशिप मिली और वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय गईं, जहाँ उन्होंने बीसीएल और फिर “Constitutionalism in India, Pakistan and Nepal” पर डी.फिल (पीएचडी) की; बीच में हार्वर्ड लॉ स्कूल से एलएल.एम. किया, जिसके लिए गैमन फेलोशिप प्राप्त हुई। ऑक्सफोर्ड के रोड्स हाउस के मिलनर हॉल में उनकी पोर्ट्रेट लगी है वे वहाँ प्रदर्शित होने वाली पहली भारतीय और सिर्फ़ दूसरी महिला हैं
1997 में बार में दाख़िला लेने के बाद मेनका ने तत्कालीन अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के चैंबर में काम शुरू किया और जैन हवाला, चारा घोटाला जैसे मशहूर मामलों में जूनियर वकील के रूप में अनुभव हासिल किया। कुछ समय न्यूयॉर्क में डेविस पोल्क एंड वॉर्डवेल में काम करने के बाद वे भारत लौटीं और सुप्रीम कोर्ट में स्वतंत्र प्रैक्टिस शुरू की, जहाँ आज उनका काम संवैधानिक कानून, प्रशासनिक सुधार, वाणिज्यिक विवाद और व्हाइट–कालर क्राइम तक फैला है। वे टी.एस.आर. सुब्रमणियन मामला (नौकरशाहों के निश्चित कार्यकाल और राजनीतिक दखल पर रोक), राइट टू एजुकेशन के तहत निजी स्कूलों में वंचित वर्गों के 25% आरक्षण का बचाव, और मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ों की जाँच जैसे मामलों में भी केंद्रीय भूमिका निभा चुकी हैं; मणिपुर हत्याकांड प्रकरण में उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी नियुक्त किया
2018 के “नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ” (सेक्शन 377) केस ने मेनका गुरुस्वामी को भारतीय एलजीबीटीक्यू आंदोलन के चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया। 2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को बरकरार रखा था, तो सुनवाई के दौरान एक जज द्वारा “क्या आप किसी समलैंगिक व्यक्ति को जानते हैं” जैसा सवाल और उस पर सरकारी वकील की हँसी ने उन्हें झकझोर दिया बाद में उन्होंने कहा कि उन्हें महसूस हुआ कि न्यायालय की कल्पना में “भारतीय समलैंगिक” नाम की कोई प्राणी ही नहीं है और वे एलजीबीटी भारतीयों को अदृश्य नहीं रहने देंगे। 2016 में उन्होंने और उनकी टीम ने पाँच एलजीबीटी याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और 2018 में पाँच जजों की संविधान पीठ के सामने यह तर्क रखा कि सहमति से वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को अपराध बताना समानता, गरिमा, निजता और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और “संवैधानिक नैतिकता” सामाजिक नैतिकता से ऊपर है। इस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने धारा 377 के उस हिस्से को असंवैधानिक ठहराया, जो वयस्कों के सहमति–आधारित समलैंगिक संबंधों को अपराध बनाता था, और यह फैसला भारत में एलजीबीटीक्यू समुदाय के लिए बुनियादी नागरिक–मानव अधिकारों की दिशा में निर्णायक मोड़ माना गया
मेनका गुरुस्वामी की पहचान केवल एलजीबीटी अधिकारों की वकील के रूप में नहीं, बल्कि स्वयं एक खुलकर क्वीयर (LGBTQ+) व्यक्तित्व के रूप में भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने 2019 में एक इंटरव्यू में अपनी साथी और सह–वकील अरुंधति कट्जू के साथ सार्वजनिक रूप से सामने आते हुए बताया कि धारा 377 की जीत उनके लिए केवल पेशेवर नहीं, व्यक्तिगत विजय भी थी, क्योंकि यह उन जैसे जोड़ों के लिए भी आज़ादी की घोषणा थी, जो बिना अपराधी ठहराए प्यार करना चाहते हैं। मेनका और अरुंधति को उसी साल टाइम 100 की “Most Influential People” सूची में भी जगह मिली, और आज वे अदालत के भीतर–बाहर दोनों जगह एलजीबीटीक्यू समुदाय की दृश्यता, गरिमा और सुरक्षा की लड़ाई का चेहरा हैं। 2026 में तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया है; चुने जाने पर वे भारत की पहली खुले तौर पर LGBTQ+ सांसद बन सकती हैं
अदालत से बाहर मेनका गुरुस्वामी एक सक्रिय सार्वजनिक बुद्धिजीवी और शिक्षक के रूप में भी मौजूद हैं। वे कोलंबिया लॉ स्कूल में डॉ. भीमराव अंबेडकर रिसर्च स्कॉलर और लेक्चरर रह चुकी हैं, येल, एनवाईयू और टोरंटो जैसी यूनिवर्सिटीज़ में विज़िटिंग फैकल्टी के तौर पर कोर्स पढ़ा चुकी हैं और भारतीय संवैधानिक लोकतंत्र, अल्पसंख्यक अधिकारों और “संवैधानिक देशभक्ति” पर नियमित लेखन करती रही हैं। उनके लिए एलजीबीटीक्यू समुदाय का सवाल केवल “यौनिक अधिकार” नहीं, बल्कि संविधान द्वारा वादा की गई नागरिक–बराबरी, गरिमा और स्वतंत्रता का प्रश्न है यही कारण है कि धारा 377 से लेकर समान–लैंगिक विवाह और ट्रांस–अधिकारों तक, वे हर लड़ाई को “कानूनी तकनीकी विवाद” से आगे बढ़ाकर व्यापक लोकतांत्रिक–राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश करती है
बधाई डॉ. मेनका!
आभार – नेहरू पेज फेसबुक
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