— परिचय दास —
।। एक ।।
होली ऋतु का वह क्षण है जहाँ समय अपने अनुशासन से फिसलकर रस में बदल जाता है। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संवेदना का वह रंगीन विराम है जिसमें जीवन स्वयं को पुनः रचता है। शीत के जड़ मौन के बाद, जब धरती के रोम-रोम में हरियाली की हलचल लौटती है, तब मनुष्य भी अपने भीतर जमी हुई परतों को तोड़कर बाहर आता है। होली इसी बाहर आने की, अपने भीतर के अनकहे को रंगों में कह देने की उत्सवधर्मी प्रक्रिया है। यह पर्व प्रकृति और मनुष्य के बीच किसी अलिखित अनुबंध की तरह है—कि दु:ख स्थायी नहीं और आनंद अनुचित नहीं।
बसंत के साथ आई होली में एक प्रकार की उद्दामता है पर वह उद्दामता उच्छृंखल नहीं बल्कि जीवन-संघर्ष से उपजी हुई है। खेतों में बालियाँ पक रही होती हैं, वृक्षों पर नई कोपलें काँप रही होती हैं और हवा में आम्रमंजरियों की मादक गंध घुली होती है। यह वही समय है जब प्रकृति स्वयं रंगों से खेलती है—पीले सरसों के खेत, लाल पलाश, हरे पत्तों की नव्यता। मनुष्य इस प्राकृतिक रंगोत्सव में अपनी देह और मन को भी रंग देना चाहता है। होली, इसीलिए, प्रकृति का सामाजिक विस्तार है।
होली का रंग केवल बाहरी नहीं है। वह भीतर उतरता है, स्मृतियों को भिगोता है, संबंधों की धूल को धोता है। रंग लगाते समय जो संकोच टूटता है, वह केवल सामाजिक मर्यादा का नहीं, आत्मा के भय का भी टूटना है। शत्रु पर रंग डालना, अपरिचित को गले लगाना, बड़े-छोटे का भेद भूल जाना~यह सब होली की सहज क्रांति है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि समाज केवल नियमों से नहीं, रस से भी चलता है। जहाँ रस समाप्त होता है, वहाँ संबंध पत्थर हो जाते हैं।
भारतीय साहित्य में होली केवल एक उत्सव नहीं, एक “काव्यात्मक अवस्था” है। भक्तिकाल में यह ईश्वर और भक्त के बीच की लीला बनकर आती है। ब्रज में कृष्ण के हाथों का रंग राधा के आँचल में फैल जाता है और वह रंग देह से आगे बढ़कर चेतना में उतर जाता है। यहाँ रंग कामना का नहीं, समर्पण का प्रतीक है। सूर, नंददास, रसखान—सबके यहाँ होली प्रेम की उस अवस्था का नाम है जहाँ ‘मैं’ गलकर ‘तू’ में बदल जाता है। रंग वहाँ “भक्ति का व्याकरण” है।
लोक~परंपरा में होली की मस्ती कुछ और ही है। होली अपने भीतर एक गहरी सामाजिक भूमिका निभाती है।
फाग और जोगीरा के गीतों में जो वाचिक स्वच्छंदता है, वह दबे हुए समाज की भाप है। साल भर जिन बातों पर रोक होती है, वे होली के बहाने बाहर आती हैं। यह बाहर आना केवल कामुकता नहीं बल्कि एक प्रकार का सामाजिक शुद्धीकरण है। मनुष्य जब बोल लेता है, गा लेता है, हँस लेता है तब भीतर का जहर भी निकल जाता है। होली समाज का वह क्षण है जब वह स्वयं को थोड़ी देर के लिए ईमानदार होने की अनुमति देता है।
होली की अग्नि~होलिका दहन—केवल एक पौराणिक कथा का पुनरावर्तन नहीं है। वह भय के दहन का प्रतीक है। हर समाज में प्रह्लाद होते हैं और हर समय में हिरण्यकशिपु। सत्ता, अहंकार और दमन की आग में जलता हुआ सत्य जब भी बच निकलता है, तब होली सार्थक होती है। होलिका का जलना बाहरी घटना है; भीतर जलता है वह भय, जो हमें सत्य के साथ खड़े होने से रोकता है। अगले दिन रंग खेलना, इस दहन के बाद मिली मुक्ति का उत्सव है।
शहरी जीवन में होली का स्वरूप बदला है पर उसका मूल अभी भी शेष है। अब रंग पिचकारियों से नहीं, मोबाइल कैमरों से उड़ते हैं। संगीत ढोलक से नहीं, स्पीकर से निकलता है। फिर भी, जब कोई अनजान चेहरा रंग लगाकर मुस्कुरा देता है, तब शहर की कठोरता थोड़ी देर को पिघल जाती है। यह पिघलन ही होली की जीत है। आधुनिकता के शोर में भी यदि कोई पर्व मनुष्य को मनुष्य से जोड़ सके तो वह केवल मनोरंजन नहीं, सांस्कृतिक आवश्यकता बन जाता है।
होली स्त्री~अनुभव में एक अलग अर्थ रखती है। लोकगीतों में स्त्री की आवाज़ अधिक मुखर होती है। वह हँसती है, छेड़ती है, उलाहना देती है। यह मुखरता किसी एक दिन की नहीं बल्कि उस दमन का प्रतिकार है जो साल भर उसके हिस्से आता है। होली उसे बोलने का अधिकार देती है~बिना दंड के, बिना सफाई के। इस अर्थ में होली स्त्री-स्मृति का भी उत्सव है।
रंगों का यह पर्व हमें सौंदर्य की पुनर्परिभाषा सिखाता है। यहाँ सौंदर्य सुव्यवस्थित नहीं, बिखरा हुआ है। चेहरे पर अनगढ़ रंग, कपड़ों पर असंगत छींटे, हँसी में फिसलन—सब मिलकर एक ऐसी छवि बनाते हैं जो शास्त्रीय नहीं, जीवन के अधिक निकट है। होली कहती है कि सुंदर वही है जो जीवित है, जो बह रहा है, जो स्थिर नहीं। यह सौंदर्य नियमों से नहीं, अनुभूति से उपजता है।
होली के बाद जो थकान आती है, वह भी मीठी होती है। रंग छुड़ाते हुए जो जिद बची रहती है, वह स्मृति बन जाती है। पानी में घुलता रंग जैसे समय में घुल जाता है पर उसकी छाप रह जाती है। यही छाप हमें अगले वर्ष फिर होली की प्रतीक्षा में रखती है। पर्व समाप्त हो जाता है पर उसका रस जीवन में फैल जाता है—बातों में, हँसी में, यादों में।
होली जीवन का स्वीकार है—उसके विरोधाभासों सहित। यह पर्व दुख को नकारता नहीं बल्कि उसके बीच आनंद का द्वार खोलता है। यह हमें सिखाता नहीं, उपदेश नहीं देता; बस रंग लगाता है और शायद इसी कारण वह इतना मानवीय है। जब संसार गंभीरता से बोझिल हो उठता है, तब होली उसे याद दिलाती है कि हल्का होना भी एक गहरी आवश्यकता है। जीवन केवल सहा जाने के लिए नहीं, जिया जाने के लिए है~रंगों सहित, रस सहित, पूरे मन से।
।। दो ।।
होली केवल लोक-पर्व या धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाती बल्कि एक सांस्कृतिक पाठ (cultural text) बन जाती है—ऐसा पाठ, जिसे पढ़ते हुए समाज, सत्ता, देह, भाषा और आनंद के जटिल अंतर्संबंध उजागर होते हैं। नृविज्ञान, सांस्कृतिक अध्ययन, मनोविश्लेषण और सौंदर्यशास्त्र आदि होली को एक वैकल्पिक सामाजिक संरचना मानते हैं।
बाख्तिन के अनुसार कार्निवल वह क्षण है जहाँ सत्ता का औपचारिक अनुशासन स्थगित हो जाता है, पदानुक्रम उलट जाते हैं और समाज स्वयं पर हँसने की क्षमता अर्जित करता है। होली में यही घटित होता है। राजा-रंक, गुरु-शिष्य, स्त्री-पुरुष, शुद्ध-अशुद्ध—सबके बीच की सीमाएँ अस्थायी रूप से ध्वस्त हो जाती हैं। रंग लगाना एक सांकेतिक बराबरी (symbolic equality) है। यह बराबरी स्थायी नहीं पर इसका क्षणिक होना ही इसकी शक्ति है; यह समाज को याद दिलाता है कि पदानुक्रम प्राकृतिक नहीं, निर्मित हैं।
होली को दबी हुई इच्छाओं के उन्मोचन (release of repressed desires) के रूप में देखा जा सकता है। सभ्य समाज, जैसा कि फ्रायड कहते हैं, इच्छाओं को दबाकर ही संभव होता है किंतु दमन का संचय यदि अनियंत्रित हो जाए तो वह विकृति बन जाता है। होली इस विकृति का उत्सवधर्मी उपचार है। फाग, जोगीरा, शारीरिक निकटता—ये सब सामाजिक अवचेतन में दबे हुए आवेगों को एक वैध मार्ग प्रदान करते हैं। यह वैधता ही होली को फूहड़पन से अलग करती है। यहाँ वर्जनाएं टूटती हैं पर नियम के भीतर।
होली को Collective Unconscious के रंगीन विस्फोट की तरह समझा जा सकता है। रंग केवल पदार्थ नहीं, आर्केटाइप हैं—पीला उर्वरता का, लाल ऊर्जा का, हरा पुनर्जन्म का। होली में व्यक्ति अपने निजी अहं (ego) से बाहर निकलकर सामूहिक चेतना में प्रवेश करता है। यही कारण है कि अकेले होली नहीं खेली जाती; यह अनिवार्यतः सामूहिक है। युंग के अनुसार, ऐसा क्षण मनुष्य को मानसिक संतुलन देता है—वह स्वयं से बड़ा कुछ अनुभव करता है।
होली को Collective Effervescence के रूप में देखा जा सकता है—वह क्षण जब समाज एक साथ भावनात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है। ढोल, नृत्य, रंग, भीड़—सब मिलकर एक उन्मत्त सामाजिक स्पंदन रचते हैं। इस स्पंदन में व्यक्ति अपने अकेलेपन से मुक्त होता है। आधुनिक जीवन में जहाँ व्यक्ति निरंतर अलग-थलग पड़ता जा रहा है, होली सामूहिकता का स्मरण कराती है। यह स्मरण केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक है।
रंग को Symbolic Order से बाहर निकलने का माध्यम कहा जा सकता है। सामान्य जीवन भाषा, नियम और संकेतों से संचालित होता है। होली में भाषा भी बदल जाती है—अशिष्टता स्वीकार्य हो जाती है, व्याकरण ढीला पड़ जाता है। यह लैकान के उस क्षण जैसा है जहाँ व्यक्ति प्रतीकात्मक व्यवस्था से फिसलकर Imaginary में प्रवेश करता है—जहाँ देह, स्पर्श और दृश्य प्रधान हो जाते हैं।
होली एक heterotopia है—एक ऐसा स्थान/समय जो सामान्य सामाजिक व्यवस्था के भीतर रहते हुए भी उससे भिन्न होता है। होली का दिन सामान्य दिन नहीं होता। यहाँ नियम हैं पर वे उल्टे हैं। यह उलटाव सत्ता के प्रति प्रतिरोध नहीं बल्कि सत्ता को आईना दिखाने की प्रक्रिया है। ऐसे स्थान समाज को स्वस्थ रखते हैं, क्योंकि वे व्यवस्था को पूर्ण जड़ता से बचाते हैं।
होली को सिमोन द बोउवा के संदर्भ में देखें तो होली वह क्षण है जब स्त्री “दूसरा” (Other) न रहकर उत्सव की सक्रिय सहभागी बनती है। लोकगीतों में उसकी आवाज़, उसकी हँसी, उसकी छेड़छाड़—सब पितृसत्तात्मक मौन को अस्थायी ही सही पर तोड़ते हैं। यह अस्थायित्व ही यहाँ निर्णायक है क्योंकि यह दिखाता है कि दमन शाश्वत नहीं।
होली को सांस्कृतिक प्रतिरोध के रूप में पढ़ा जा सकता है। औपनिवेशिक सत्ता ने भारतीय पर्वों को अव्यवस्थित, अराजक और असभ्य कहा। होली इस आरोप को स्वीकारते हुए उसे उलट देती है। यह कहती है—हाँ, हम अव्यवस्थित हैं क्योंकि जीवन स्वयं अव्यवस्थित है। इस प्रकार होली पश्चिमी तर्कप्रधान सभ्यता के विरुद्ध एक रसात्मक सभ्यता-बोध प्रस्तुत करती है।
सौंदर्यशास्त्र की दृष्टि से, कांट के ‘disinterested pleasure’ के विपरीत होली interested pleasure का उत्सव है—यह देह से जुड़ा है~ गंध से, स्पर्श से। यहाँ सौंदर्य दूरी से नहीं, निकटता से उपजता है। यह सौंदर्य खंडित है, असंतुलित है पर इसी में उसकी सच्चाई है। आधुनिक कला-सिद्धांत, विशेषतः परफॉर्मेंस आर्ट, होली के निकट आकर खड़ा हो जाता है—जहाँ दर्शक और कलाकार का भेद मिट जाता है।
सिद्धांतों की रोशनी में होली एक ऐसा पर्व है जो यह सिद्ध करता है कि संस्कृति केवल अनुशासन नहीं, उल्लंघन का सौंदर्य भी है। होली हमें यह समझने में मदद करती है कि समाज को जीवित रखने के लिए कभी-कभी नियमों को रंग में डुबो देना आवश्यक होता है। यह पर्व जीवन को गंभीरता से नहीं, संपूर्णता से देखने का आग्रह है।
होली इसीलिए टिकाऊ है—क्योंकि वह मनुष्य को थोड़ी देर के लिए सही नहीं, सच्चा होने देती है और शायद यही किसी भी संस्कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
।। तीन ।।
होली केवल उत्सव नहीं बल्कि समाज के आत्मपरीक्षण का क्षण है। रंग जब धुल जाते हैं तब जो श्वेत शेष रहता है, वह निष्कलुष नहीं—वह स्मृति से भरा होता है। होली एक अस्थायी विघटन है किंतु उसी विघटन से व्यवस्था का पुनर्निर्माण संभव होता है। कार्निवल समाप्त होते ही सत्ता लौट आती है, नियम फिर स्थापित हो जाते हैं पर अब वे पहले जैसे निर्दोष नहीं रह जाते; उन पर रंगों की हल्की छाया बनी रहती है।
होली यह संकेत देती है कि मनुष्य केवल अनुशासन से नहीं, उल्लास से भी गढ़ा जाता है। जो समाज अपने नागरिकों को हँसने, छूने, गाने और सीमाएँ लाँघने का अवसर नहीं देता, वह भीतर से सूखने लगता है। होली इस सूखेपन के विरुद्ध एक सामूहिक प्रतिज्ञा है—कि जीवन को केवल तर्क से नहीं, रस से भी जिया जाएगा।
यही कारण है कि होली के बाद थकान नहीं, एक विचित्र शांति आती है। यह शांति किसी नैतिक उपदेश की नहीं, बल्कि साझा अनुभव की देन होती है। व्यक्ति लौटता है अपने दैनिक जीवन में किंतु थोड़ा कम कठोर, थोड़ा अधिक मानवीय होकर। होली का अंत इसीलिए समाप्ति नहीं, पुनःआरंभ है—एक ऐसा पुनःआरंभ, जिसमें समाज अपनी कठोरता को याद रखता है पर उसकी अनिवार्यता पर प्रश्न भी करता है।
होली हमें सिखाती नहीं बल्कि चुपचाप यह जता देती है कि संस्कृति वही जीवित रहती है जो उल्लंघन और अनुशासन—दोनों को एक ही सांस में साध सके।
।। चार ।।
होली का अंतःपक्ष किसी परंपरा का पर्दा गिरना नहीं बल्कि अनुभूति का गाढ़ा ठहराव है। रंग उतरते हैं पर देह से नहीं—वे स्मृति में रिसते हैं, जैसे शाम के बाद भी आकाश में बची रहती है~ दिन की हल्की गरमी। यह वह क्षण है जब शोर का संगीत मौन में बदलता है और मौन स्वयं एक गहन राग बन जाता है। होली क्षणिक विघटन है; पर यही विघटन व्यवस्था को मानवीय बनाता है—कठोर नियमों के बीच एक नरम दरार, जिससे जीवन सांस ले सके।
होली के बाद लौटता हुआ समाज अपने अनुशासन को पुनः पहनता है किंतु वह वस्त्र अब नया नहीं रहता~ उस पर हँसी के छींटे, स्पर्श की धूप और उल्लंघन की महीन राख चिपकी रहती है। सत्ता की भाषा फिर स्पष्ट होती है पर उसकी आवाज़ में अनकहा कंपन रह जाता है। यही कंपन मनुष्य को मनुष्य बनाए रखता है। यहाँ उल्लास कोई अपराध नहीं बल्कि जीवन की वैधता है—एक ऐसी वैधता, जो नियमों को तोड़कर नहीं, उन्हें मनुष्य के योग्य बनाकर सिद्ध होती है।
होली इसीलिए थकान नहीं, शांति देती है—वह शांति जो साझा होने से जन्म लेती है। व्यक्ति अपने दैनिक संसार में लौटता है किंतु भीतर एक हल्की ढील के साथ; जैसे कठोरता ने स्वयं को क्षण भर के लिए माफ़ कर दिया हो। होली समाप्त नहीं होती—वह स्मृति में बदल जाती है और स्मृति होकर संस्कृति बनती है। इसी गाढ़े लालित्य में होली अपना सत्य छोड़ जाती है कि जीवन का सौंदर्य अनुशासन और उल्लंघन के बीच बहती उसी नदी में है, जहाँ रंग धुलते नहीं, अर्थ गहराते हैं।
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