जिस मौन में अज्ञेय रहते थे – परिचय दास

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अज्ञेय

Parichay Das

सुबह का एक ऐसा क्षण होता है जब हवा अभी पूरी तरह जागी नहीं होती। पेड़ों की पत्तियाँ हल्की-सी खनक के साथ हिलती हैं और आकाश में कहीं एक पतली-सी रोशनी उतरती रहती है। उसी धुँधलके में किसी पुराने लेखक का नाम अचानक मन में चमक उठता है। जैसे कोई पगडंडी हो, जिस पर चलते हुए अचानक सामने एक नदी आ जाए।

आज वही पगडंडी हमें ले आती है उस नाम तक जो हिन्दी साहित्य में एक साथ कई दिशाओं में फैलता है।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन

एक लेखक जो कभी पूरी तरह सामने नहीं आया। जैसे धुंध में खड़ा कोई आदमी, जिसकी आवाज़ साफ़ सुनाई देती है पर चेहरा हमेशा थोड़ा-सा रहस्य बना रहता है।

दृश्य एक।
एक छोटा-सा कमरा।
किताबें।
काग़ज़।

मेज़ पर झुका हुआ एक युवक।
बाहर शायद इलाहाबाद की हवा चल रही है या बनारस की गलियों में शाम उतर रही है। कमरे में बैठे उस युवक की आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी है। वह केवल लिखना नहीं चाहता। वह शब्दों को नए सिरे से जीना चाहता है।
उसका नाम है अज्ञेय।

कभी-कभी लगता है कि हिन्दी साहित्य में अज्ञेय का आना किसी साधारण घटना की तरह नहीं हुआ। यह थोड़ा-सा वैसा है जैसे अचानक नदी का रास्ता बदल जाए। पुरानी धारा बहती रहती है लेकिन एक नई धारा भी निकल पड़ती है।

उस समय का हिन्दी साहित्य भी किसी गाँव के मेले जैसा था।

कविता की दुकानों पर छायावाद के रंग थे।

कहानी की पगडंडियों पर यथार्थ की धूल उड़ती थी।

और उसी मेले में एक आदमी आया, जिसने कहा कि भाषा सिर्फ परंपरा नहीं, एक प्रयोग भी है।

दृश्य दो।

जेल की कोठरी।

लोहे की सलाखें।

एक कोना।

थोड़ी-सी धूप।

क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अज्ञेय जेल में हैं। बाहर देश में स्वतंत्रता की आँधी चल रही है और भीतर एक आदमी अपने भीतर की स्वतंत्रता को खोज रहा है।

यहीं कहीं बैठकर वह काग़ज़ पर कुछ लिखते हैं।

शायद शब्दों में नहीं, अपने अस्तित्व में।

बाद में वही अनुभव एक उपन्यास में बदल जाता है।

एक ऐसा उपन्यास जो हिन्दी कथा में एक नया दरवाज़ा खोलता है।

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यह सिर्फ एक कहानी नहीं है। यह एक मनुष्य के भीतर की यात्रा है। जैसे कोई आदमी अपने ही मन के जंगल में उतर गया हो।

रेणु होते तो शायद कहते, “अरे, यह आदमी कहानी नहीं लिख रहा, अपने भीतर का भूगोल बना रहा है।”

दृश्य तीन।

एक संपादकीय कक्ष।

काग़ज़ों का ढेर।

टाइपराइटर की खट-खट।

किसी युवा कवि की काँपती हुई पांडुलिपि।

अज्ञेय उन पन्नों को पढ़ रहे हैं।
और फिर अचानक एक किताब निकलती है, जो हिन्दी कविता के इतिहास में एक छोटे-से विस्फोट की तरह दर्ज होती है।

तार सप्तक।
सात कवि।
सात आवाज़ें।
सात दिशाएँ।

किसी गाँव के चौक की तरह, जहाँ सात रास्ते एक साथ मिलते हैं।

उस किताब ने हिन्दी कविता को यह बताया कि कविता सिर्फ एक शैली में नहीं रहती। वह कई आवाज़ों में बोलती है।

रेणु की भाषा में कहें तो यह कुछ ऐसा था जैसे मेले में अचानक सात अलग-अलग ढोल बज उठें और हर ढोल की थाप अलग हो।

दृश्य चार।

कहीं दूर एक नदी।

शायद गंगा।

शायद कोई और नदी।

नदी के किनारे चलते हुए अज्ञेय को देखना एक अजीब अनुभव होता। वह बहुत कम बोलते थे। उनकी आँखों में हमेशा कोई गहरा विचार तैरता रहता।

कई लोग कहते थे कि वह थोड़े संकोची हैं।

कुछ कहते थे कि वह भीतर से बहुत अकेले हैं।

पर सच यह है कि वह अपने भीतर एक विशाल संवाद में लगे रहते थे।

उनकी कविता भी उसी संवाद की तरह है।

कभी बहुत धीमी।

कभी बिल्कुल साफ़।

कभी इतनी गहरी कि शब्दों के नीचे भी एक और परत दिखाई देती है।

दृश्य पाँच।

एक रिपोर्टर की तरह हम किसी साहित्यिक सभा में पहुँचते हैं।

मंच पर कुछ कुर्सियाँ हैं।

दर्शकों में युवा कवि।

कुछ पुराने लेखक।

और बीच में बैठे अज्ञेय।

सभा में कोई पूछता है, “ प्रयोगधर्मी कविता क्या है?”

अज्ञेय हल्की-सी मुस्कान के साथ जवाब देते हैं। प्रयोगधर्मी कविता कोई नारा नहीं है। यह मनुष्य की नई संवेदना है।
सभा में थोड़ी खामोशी फैल जाती है।
क्योंकि यह उत्तर सरल भी है और कठिन भी।

कभी-कभी हिन्दी साहित्य का इतिहास पढ़ते हुए लगता है कि अज्ञेय एक साथ कई भूमिकाओं में मौजूद थे।

कवि।

उपन्यासकार।

संपादक।

विचारक।

लेकिन इन सबके भीतर एक चीज़ लगातार दिखाई देती है।
स्वतंत्रता।

वह साहित्य को किसी बंद कमरे में नहीं रखना चाहते थे। उनके लिए साहित्य एक खुली खिड़की था, जहाँ से हवा आती है, रोशनी आती है और कभी-कभी तूफ़ान भी।

रेणु की शैली में अगर इस पूरे दृश्य को देखें तो लगता है कि अज्ञेय हिन्दी साहित्य के उस यात्री की तरह थे जो हमेशा रास्ते पर रहता है।

कभी पहाड़ों की तरफ़ जाता हुआ।

कभी शहर की गलियों में घूमता हुआ।

कभी किसी नदी के किनारे बैठा हुआ।

और हर जगह से कुछ शब्द उठा लेता।

एक और दृश्य।

रात का समय।

किसी पत्रिका का दफ्तर।

अज्ञेय पांडुलिपियाँ देख रहे हैं। बाहर शायद हल्की बारिश हो रही है।
किसी युवा लेखक की कहानी उन्हें पसंद आ जाती है।

वह उसे छाप देते हैं।

शायद उस समय उन्हें भी अंदाज़ा नहीं होता कि वही युवा लेखक आगे चलकर हिन्दी साहित्य का एक बड़ा नाम बन जाएगा।

संपादन उनके लिए सिर्फ तकनीकी काम नहीं था। यह एक सांस्कृतिक जिम्मेदारी थी।

कभी-कभी लगता है कि अज्ञेय की सबसे बड़ी पहचान उनका प्रयोग है।
वह परंपरा को तोड़ते नहीं थे, लेकिन उसे नए ढंग से पढ़ते थे।

उनकी भाषा में एक अजीब-सी स्वच्छता है। जैसे किसी पहाड़ी झरने का पानी।

और उसी पानी में कई बार गहरी चुप्पियाँ भी बहती रहती हैं।
एक दिन का दृश्य और।
दिल्ली।

साहित्यिक गोष्ठी खत्म हो चुकी है।
लोग बाहर निकल रहे हैं। कोई बहस कर रहा है, कोई हँस रहा है।

अज्ञेय धीरे-धीरे बाहर आते हैं।

उनके चेहरे पर वही शांत भाव है।

जैसे किसी ने बहुत लंबी यात्रा तय की हो और अब थोड़ी देर के लिए सड़क के किनारे बैठ गया हो।

जयंती का दिन दरअसल सिर्फ एक स्मरण नहीं होता।

यह उस रास्ते को फिर से देखने का अवसर होता है, जिस पर कोई लेखक चला था।

अज्ञेय का रास्ता सीधा नहीं था। उसमें मोड़ थे, प्रयोग थे, और कभी-कभी अकेलापन भी।

लेकिन उसी रास्ते ने हिन्दी साहित्य को एक नई दृष्टि दी।

अगर रेणु इस पूरे प्रसंग को लिखते, तो शायद आख़िर में इतना ही कहते।

“देखिए भइया, हिन्दी साहित्य की यह सड़क बहुत पुरानी है। इस पर कबीर चले, तुलसी चले, प्रेमचंद चले। फिर एक दिन एक आदमी आया।

चुप-चाप। बिना शोर के। और उसने सड़क के किनारे एक नई पगडंडी बना दी। लोग पहले हिचके, फिर धीरे-धीरे उस पगडंडी पर भी चलने लगे।”

वह आदमी था~

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन
और वह पगडंडी आज भी हिन्दी साहित्य के जंगल में कहीं न कहीं दिखाई देती है।

कभी कविता में।

कभी कहानी में।

कभी किसी युवा लेखक की बेचैन भाषा में।

यही उसकी असली जयंती है।

किसी कैलेंडर की तारीख़ नहीं, बल्कि वह क्षण जब कोई नया लेखक अपने शब्दों को पहली बार स्वतंत्र हवा में छोड़ देता है।


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