डॉ. लोहिया की एक नहीं, अनेक ऐसी बातें हैं जो प्रथम दृष्टया समझ में नहीं आतीं; लेकिन जैसे-जैसे घटनाएँ घटित होती हैं और उनसे जो अनुभूति बनती है, उनकी बातों का महत्व धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगता है।
जब एक लाख से अधिक किसानों ने लखनऊ विधानसभा पर प्रदर्शन करते हुए नारा लगाया था—
“यू.पी. का किसान जागा, पंत मिनिस्टर भागा”
और “सोशलिस्ट पार्टी का ऐलान, नहीं देंगे दस गुना लगान”,
तब उत्तर प्रदेश की पंत सरकार ने जमींदारी उन्मूलन कानून लागू कर दिया था। परंतु भूमि का स्वामित्व प्राप्त करने के लिए गरीब किसानों से दस गुना लगान वसूलने का प्रावधान उसमें रखा गया था। इसके विरोध में सोशलिस्ट पार्टी ने पूरे उत्तर प्रदेश में एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया। गोरखपुर में भी इस आंदोलन को खड़ा करने का प्रयास हुआ, पर देवरिया जिले में इसने विशेष रूप से व्यापक रूप धारण किया।
लखनऊ प्रदर्शन के लिए गोरखपुर से लगभग 60 कार्यकर्ता और किसान साइकिलों पर तथा पैदल लखनऊ गए थे। इसके अतिरिक्त रेलवे और अन्य साधनों से भी गोरखपुर-देवरिया जिले से काफी लोग प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लखनऊ पहुँचे थे। इस प्रदर्शन का नेतृत्व पार्टी के तीनों वरिष्ठ नेता—जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्र देव और डॉ. लोहिया—कर रहे थे। पूरे प्रदर्शन में चारों ओर लाल झंडे और लाल टोपियाँ ही दिखाई दे रही थीं; मानो लाल टोपियों का समुद्र उमड़ पड़ा हो।
लेकिन डॉ. लोहिया ने न केवल लाल टोपी पहनने से इंकार किया, बल्कि अपनी सफेद टोपी भी उतार कर फेंक दी। कार्यकर्ताओं के बीच अपने भाषण में उन्होंने कहा कि लाल टोपी या इस प्रकार के किसी भी निशान अथवा गणवेश से कार्यकर्ताओं की पहचान होना दल के लिए नुकसानदेह है।
डॉ. लोहिया वर्षों बाद घटने वाली घटनाओं को पहले ही देख लिया करते थे। जब उन्होंने भारत-पाकिस्तान के महासंघ की बात कही थी, तब लोगों ने उन्हें “यूटोपियन” कहा और इस विचार को मूर्खतापूर्ण बताकर टाल दिया। बाद में सोशलिस्ट पार्टी ने भारत-पाक महासंघ के पक्ष में जोर-शोर से आंदोलन चलाया, सम्मेलन किए, तब जाकर इसकी ओर लोगों का ध्यान गया। परंतु देश के अखबारों ने उसे महत्व देना तो दूर, पड़ोसी देश के साथ हमारे संबंध बिगाड़ने का आरोप तक लगा दिया।
वर्षों पहले ही डॉ. लोहिया ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि पूर्वी पाकिस्तान तीन मुख्य कारणों से पश्चिमी पाकिस्तान के साथ नहीं रह सकेगा और उसका पाकिस्तान से अलग होना लगभग निश्चित है। डॉ. लोहिया ने जो तीन कारण गिनाए थे, वही बाद में बांग्लादेश की आज़ादी के संघर्ष की बुनियाद बने—
• पूर्वी पाकिस्तान की भाषा, पश्चिमी पाकिस्तान की भाषा से एकदम भिन्न है।
• पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच लगभग 1500 किलोमीटर की दूरी है।
• पश्चिमी पाकिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान के शोषण पर जीवित है।
जिस समय डॉ. लोहिया ने यह बात कही थी, उस समय केवल पाकिस्तान ही नहीं, भारत सरकार ने भी उन्हें गैर-जिम्मेदार कहा था। लेकिन जब 1970-71 में परिस्थितियाँ बदलीं और बांग्लादेश में उग्र आंदोलन चला, तब उसी स्थिति का लाभ और श्रेय वे लोग उठाने लगे जिन्होंने डॉ. लोहिया को कभी पागल और गैर-जिम्मेदार कहा था।
पूर्वी बंगाल और नेपाल के संबंध में डॉ. लोहिया की जो आलोचना हुई थी, वही आलोचना गोमंतकों के स्वतंत्रता आंदोलन की नींव डालने और उनके संघर्ष में पुर्तगाली साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वयं भाग लेने पर भी हुई। गोवा को भारत का अविभाज्य अंग मानते हुए पुर्तगाली साम्राज्यवाद के विरुद्ध गोमंतकों के आंदोलन का समर्थन करना और गोवा वासियों को सालाज़ार की तानाशाही के नीचे नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाने का प्रयास करना—इन सबके लिए केवल सामान्य लोगों ने ही नहीं, बल्कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी उनकी आलोचना की थी।
10 जून 1946 को डॉ. लोहिया असोलना गाँव में जूलियो मैनेंजेस के यहाँ गए थे और वहीं साथियों के साथ मिलकर गोवा स्वतंत्रता आंदोलन की नींव डाली थी। यह बात दावानल की तरह पूरे गोवा में फैल गई कि 1942 का नेता गोमांतक जैसे गुलाम प्रदेश में आया है। पुरुषोत्तम काकोडकर जैसे रचनात्मक कार्यकर्ताओं ने भी डॉ. लोहिया का साथ दिया और 18 जून को मडगांव से गोवा की स्वतंत्रता का जयघोष कर दिया गया।
डॉ. लोहिया को गिरफ्तार कर एक बहुत छोटी-सी कोठरी में बंद किया गया और उन्हें साधारण कैदियों को दी जाने वाली सुविधाओं से भी वंचित रखा गया। 11 अगस्त 1946 को महात्मा गांधी ने हरिजन में लेख लिखकर और वायसराय को पत्र भेजकर डॉ. लोहिया की रिहाई की मांग की। तब जाकर डॉ. लोहिया जेल से मुक्त हुए। लगभग 7-8 वर्षों बाद भारत ने गोवा मुक्ति का कार्य पूरा किया और आज गोवा भारत का अभिन्न अंग है। यह डॉ. लोहिया के संघर्षों का भी फल है—इसे देशवासियों को नहीं भूलना चाहिए।
जब भारत-विभाजन को कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया, तब समाजवादियों ने न तो उसका समर्थन किया और न ही उसका प्रत्यक्ष विरोध। लेकिन जब भारत-विभाजन के संबंध में कांग्रेस वर्किंग कमेटी में प्रस्ताव का प्रारूप नेहरूजी ने रखा, तब डॉ. लोहिया ने उसमें एक संशोधन प्रस्तुत किया। उसका आशय यह था कि भारत-विभाजन के बाद भी हम अपनी दृष्टि से भारत का सम्पूर्ण मानचित्र ओझल नहीं होने देंगे।
सार्क और जी-15 जैसी अवधारणाओं के पीछे भी कहीं न कहीं डॉ. लोहिया की सोच को देखा जा सकता है, जिसे उन्होंने कांग्रेस के विदेश विभाग के संयोजक के रूप में व्यक्त किया था। भारत, नेपाल, बर्मा, लंका, तिब्बत आदि देशों को मिलाकर एक महासंघ की कल्पना उनकी दृष्टि में थी। इसी क्रम में पाकिस्तान बनने के बाद भी उन्होंने यह सपना जीवित रखा कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का एक महासंघ बनना चाहिए, ताकि इस क्षेत्र के विपन्न लोगों को बेहतर जीवन मिल सके।
डॉ. लोहिया ने यह भी स्पष्ट किया कि पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं, क्योंकि दोनों की उत्पादन-पद्धति में मूलभूत समानता है। उन्होंने दुनिया को दो हिस्सों में बाँटकर देखा—एक हिस्सा वह जो सम्पन्न है, और दूसरा वह जो गरीबी, उपनिवेशवाद और शोषण से ग्रस्त है। पश्चिम के देश सम्पन्न हैं, जबकि अफ्रो-एशियाई देश गरीब, गुलाम या उपनिवेशित रहे हैं। रोम से होनोलूलू तक और टोक्यो से काहिरा तक फैली दुनिया में उन्होंने यह देखा कि मार्क्सवाद और पूंजीवाद—दोनों ही एशिया और अफ्रीका के उन हिस्सों को, जो गरीबी के दलदल में फँसे हैं, उबारने का पर्याप्त उपाय नहीं दे सके।
आज भी दुनिया मूलतः इसी प्रकार बंटी हुई दिखाई देती है। पंचमढ़ी के बाद भारत के समाजवादियों को एक ठोस वैचारिक आधार मिला, जिसने आगे चलकर उस समय भी महत्व प्राप्त किया जब रूस में साम्यवाद विफल हुआ। डॉ. लोहिया का समता और सम्पन्नता पर आधारित विश्व-दर्शन आज भी एक ठोस वैकल्पिक आधार प्रस्तुत करता है।
डॉ. लोहिया ने कहा था—
“मेरी बात सुनी जाएगी, शायद मेरे मरने के बाद।”
आज जब हम अपने समय की राजनीति, समाज, असमानता, राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय तनाव, भाषाई प्रश्न, किसान संकट और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को देखते हैं, तो लगता है कि लोहिया के अनेक सपने अब हमारी हक़ीक़त बनकर सामने खड़े हैं।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.















