लोहिया के बारे में संस्मरण – परिचय दास

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Ram Manohar Lohiya

Parichay Das

(१) चप्पल और चरित्र

राम मनोहर लोहिया अक्सर साधारण चप्पल पहनते थे। एक बार किसी कार्यक्रम में उनके सहयोगियों ने कहा कि “डॉ. साहब, कम से कम मंच पर तो जूते पहन लिया कीजिए, लोग क्या कहेंगे?”
लोहिया ने शांत स्वर में जवाब दिया—
“लोग अगर मेरे जूतों से प्रभावित होते हैं, तो मेरे विचारों का क्या होगा?”
यह कोई भाषण का वाक्य नहीं था, बल्कि उनकी आदत थी—वे प्रभाव नहीं, असुविधा पैदा करते थे, ताकि लोग सोचें।

(२) होटल का कमरा और असहज ईमानदारी

दिल्ली में एक बार उन्हें एक अच्छे होटल में ठहराया गया। आयोजकों ने सोचा, “इतने बड़े नेता हैं, थोड़ा आराम मिलना चाहिए।”
कमरे में पहुँचते ही लोहिया ने पूछा—
“इसका किराया कितना है?”
जवाब मिला।
उन्होंने तुरंत कहा—
“मुझे यहाँ नहीं रहना। यह खर्च उस देश के अनुकूल नहीं है, जहाँ लोग दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाते।”
और सच में, वे वहाँ से निकलकर एक साधारण ठिकाने पर चले गए।
आज के नेता होते तो उसी कमरे से “गरीबी हटाओ” ट्वीट कर देते।

(३) भाषण नहीं, सवाल

लोहिया की सभाएँ अजीब होती थीं। वे लंबा भाषण देने से ज़्यादा लोगों से सवाल पूछते थे।
एक बार गाँव में सभा थी। उन्होंने पूछा—
“यहाँ कितनों के पास अपनी ज़मीन है?”
कम हाथ उठे।
फिर पूछा—
“और कितने लोग नेताओं पर भरोसा करते हैं?”
हाथ ज़्यादा उठे।
लोहिया ने कहा—
“तो समस्या ज़मीन की नहीं, भरोसे की है। तुम गलत जगह भरोसा कर रहे हो।”
सभाएँ खत्म होती थीं लेकिन लोगों के भीतर बहस शुरू हो जाती थी।

(४) संसद में असुविधाजनक आदमी

जब वे संसद में पहुँचे, तो वहाँ का माहौल उनके हिसाब से “बहुत आरामदेह” था।
एक बार उन्होंने सांसदों के खर्च और सुविधाओं पर सवाल उठाया। कई सांसद नाराज़ हो गए।
उन्होंने कहा—
“संसद जनता की गरीबी पर बैठकर अमीरी का अभ्यास करने की जगह नहीं है।”
यह वही समय था जब ज़्यादातर नेता सुविधाओं को अधिकार मानने लगे थे और लोहिया उन्हें असहज बना रहे थे।

(५) समय की पाबंदी और क्रोध

लोहिया समय को लेकर बेहद सख्त थे।
एक बार एक बैठक में कुछ नेता देर से पहुँचे।
उन्होंने बैठक ही रद्द कर दी।
कहा—
“जो व्यक्ति समय का सम्मान नहीं करता, वह जनता का क्या करेगा?”
यह वही देश है जहाँ “पाँच मिनट में आ रहा हूँ” का मतलब आधा घंटा होता है। लोहिया यहाँ फिट नहीं होते थे, इसलिए इतिहास में चले गए।

(६) अंग्रेज़ी बनाम भारतीय भाषाएँ

लोहिया अंग्रेज़ी के विरोधी नहीं थे, लेकिन उसके वर्चस्व के खिलाफ थे।
एक विश्वविद्यालय में उन्होंने कहा—
“जिस देश की शिक्षा उसकी भाषा में नहीं, वह देश अपने ही लोगों के खिलाफ साज़िश कर रहा है।”
उनका गुस्सा भाषा पर नहीं, सत्ता के उस ढांचे पर था जो भाषा के बहाने दूरी बनाता है।

(७) निजी जीवन की सादगी का एक और दृश्य

उनके एक सहयोगी ने बताया कि लोहिया के पास कपड़े बहुत कम होते थे।
एक बार उन्होंने कहा—
“इतने कम कपड़ों में कैसे काम चलता है?”
लोहिया ने हँसते हुए कहा—
“राजनीति में कपड़े ज़्यादा हो जाएँ, तो आदमी कम हो जाता है।”
सुनने में हल्का वाक्य है पर सीधे पेट में लगता है।

(८) विरोधियों के प्रति सम्मान

वे अपने विरोधियों की आलोचना करते थे, लेकिन निजी स्तर पर कटुता नहीं रखते थे।
जवाहरलाल नेहरू से उनके तीखे मतभेद थे, पर जब नेहरू बीमार पड़े, तो लोहिया ने चिंता व्यक्त की।
उनके लिए राजनीति युद्ध नहीं, बहस थी।
आज बहस गायब है, सिर्फ युद्ध बचा है।

(९) चुनाव और सिद्धांत

एक बार उनसे कहा गया—
“थोड़ा नरम बोलिए, चुनाव जीतना आसान होगा।”
उन्होंने जवाब दिया—
“अगर जीतने के लिए बदलना पड़े, तो जीत किस काम की?”
यह वही चीज़ है जो आज की राजनीति में सबसे पहले बेची जाती है—सिद्धांत।

(१०) अंतिम दिनों की जिद

बीमारी के बावजूद उन्होंने अपने इलाज के लिए किसी विशेष सुविधा का उपयोग नहीं किया।
उनका मानना था कि नेता अगर आम आदमी से अलग इलाज करवाएगा, तो वह कभी उसकी पीड़ा समझ ही नहीं पाएगा।
और यह जिद ही शायद उनकी जान ले गई।
कुछ लोग इसे मूर्खता कहेंगे, कुछ इसे चरित्र।


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