खास दर्जा तो बिहार को चाहिए – मोहन गुरुस्वामी

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Mohan Guruswamy

रस्तू की यह उक्ति मशहूर है कि दो समानों के बीच असमान व्यवहार की तरह ही दो असमानों के साथ समान व्यवहार अन्यायपूर्ण है। माना जाता है कि असमानता अन्यायपूर्ण तो है, पर इससे बचा नहीं जा सकता। फिर भी समुदायों और अंचलों के बीच असमानता है, तो इसे दूर करने की कोशिश भी की जाती रही है। संविधान में साफ-साफ न लिखा होने पर भी, समाजवादी तरीके के समाज और लोकतंत्र की माँग यही है।

लेकिन वास्तव में ऐसा हो नहीं पाया। बल्कि समुदायों और अंचलों के बीच की खाई चौड़ी होती गई। किसी भी राज्य को खास दर्जे की हैसियत (स्पेशल कैटिगरी स्टेटस यानी एससीएस) देना अंचलों के बीच समानता को खतरे में डालता है। फिर भी 1952 में यह फैसला पैदा हुआ था कि देश के प्रत्येक कोने तक इस्पात एक समान कीमत पर पहुँचाया जाए। इससे बिहार की स्थिति और खराब हो गई। आज राज्यों के बीच विषमता बहुत ज्यादा है। पंजाब और केरल की प्रति व्यक्ति आय बिहार के 34,000 रु. से छह गुना अधिक है।

आंध्र के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू मोदी सरकार से बहुत नाराज हैं कि उनके राज्य को एससीएस नहीं दिया जा रहा है। संविधान में एससीएस का प्रावधान नहीं है। लेकिन किसी विशेष अंचल, राज्य या उसके हिस्सों को, उनके पिछड़ेपन के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक पहलुओं को देखते हुए, पूर्व योजना आयोग तथा राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा विशेष कोष दिया जाता था। इस संदर्भ में अवशिष्ट आंध्र प्रदेश कहाँ ठहरता है?

आंध्र प्रदेश, संयुक्त राज्य हैदराबाद की दुधारू गाय से अलग होने के बाद भी, अपेक्षाकृत संपन्न राज्य रहा है। उसकी प्रति व्यक्ति आय है 1,42,054 रु., जब कि राष्ट्रीय औसत 1,12,764 रु. है। बिहार की प्रति व्यक्ति आय है 34,168 रु.। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद बिहार की भी दुधारू गाय छिन गई है। फिर भी बिहार का दावा वास्तविक आँकड़ों पर आधारित है, जब कि आंध्र के दावे का आधार तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा संसद में किया गया वादा है।

आज गरीबी और निराशा के महासागर के रूप में बिहार अकेला राज्य है। यहाँ से लोक सभा में 40 सांसद जाते हैं, जब कि आंध्र से सिर्फ 25। इसके बावजूद आंध्र संसद के शीतकालीन सत्र को ठप करने में सफल है, जब कि बिहार खास दर्जे के लिए गिड़गिड़ाता रहता है। हैदराबाद के ‘नुकसान’ के कारण खास दर्जे की माँग पर आंध्र ने प्रायः सभी राजनीतिक दलों की सहानुभूति जुटा ली है। लेकिन हैदराबादी होने के नाते यह विचार मेरे लिए असुविधाजनक है कि राजनेताओं का एक समूह हमें तेल के कुएँ या खदान की तरह देखता है, जिससे राजस्व मिलता है।

अन्य महानगरों की तरह, हैदराबाद में भी एक अपेक्षाकृत संपन्न तबका है। उसकी प्रति व्यक्ति आय 2.99 लाख रु. है, जब कि इससे सटे हुए शहरी जिले रंगा रेड्डी की प्रति व्यक्ति आय 2.88 लाख है। अन्य जिलों की हालत दक्षिण और पश्चिम भारत के मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों से बहुत अलग नहीं है। इस तरह के सभी जिलों, जैसे वारंगल, निजामाबाद, आदिलाबाद और महबूबनगर, की औसत आय 80,000 रु. से थोड़ा ही कम या ज्यादा है – फिर भी बिहार से ढाई गुना ज्यादा।

बिहार इस बुरी स्थिति में आया कैसे? केंद्र कितना आवंटन करता है, इसका सीधा असर राज्य की आर्थिक गतिविधियों और लोगों की खुशहाली पर पड़ता है। आँकड़े बताते हैं, पहली पंचवर्षीय योजना से ही बिहार और उत्तर प्रदेश में केंद्र की ओर से निवेश कमतर होता आया है। यदि प्रति व्यक्ति विकास व्यय की सूची बनाई जाए, तो बिहार सब से नीचे रहा है। इस कारण बिहार को 1,80,000 रु. की क्षति हुई है। पंचवर्षीय योजनाएँ दफन हैं, पर नीति तो बनी हुई है। प्रति व्यक्ति विकास व्यय और औद्योगिक तथा संरचनागत निवेश में बिहार अभी भी सब से पीछे है। केंद्रीय निवेश की दृष्टि से जिन राज्यों में सब से अधिक केंद्रीय निवेश हुआ है, उन्हें बिहार की तुलना में छह गुना धन मिला है।

स्पष्टतः पंजाब इसीलिए संपन्न हुआ, क्योंकि केंद्र ने वहाँ भारी निवेश किया। 1955 में सिंचाई पर कुल राष्ट्रीय परिव्यय था 29,106.30 लाख रु.। इसमें से पंजाब को मिला 10,952.1 लाख रु. (37.62 प्रतिशत) और बिहार को मात्र 1,323.3 लाख रु. (4.54 प्रतिशत)। 7,750 लाख रु. की लागत से बना भाखड़ा नांगल बाँध, जो नेहरू के आधुनिक भारत के भव्यतम मंदिरों में एक है, अकेले 14.41 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई करता है। यदि इसे छोड़ दें, तब भी सिंचाई योजनाओं के लिए पंजाब को बिहार का लगभग ढाई गुना धन मिला। नतीजा : बिहार में कृषि योग्य जमीन पंजाब से साढ़े तीन गुना ज्यादा है, पर उसके पास सिंचाई-युक्त जमीन लगभग उतनी ही है जितनी पंजाब के पास यानी 36 लाख हेक्टेयर।

बिहार देश का तीसरा बड़ा राज्य और कई दृष्टियों से भारत का हृदय है। यह भारतीय सभ्यता का पालना है, जो गंगा के तट पर विकसित हुई। बिहार को पीछे छोड़ कर भारत आगे नहीं जा सकता। लेकिन हो यही रहा है। न केवल राष्ट्रीय नेताओं ने बिहार को धोखा दिया है, बल्कि उन नेताओं ने भी, जो बिहार नई दिल्ली भेजता है। बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री वर्षों से माँग कर रहे हैं कि बिहार को खास दर्जा दिया जाए। उनकी माँग सिर्फ 60,000 करोड़ रु. की है, जो उस रकम का एक-तिहाई है, जो कायदे से बिहार को मिलनी चाहिए। लेकिन इसे भी ठुकरा दिया गया है। अब तो बिहार केंद्र का सगा हो गया है या यह केवल शेरो-शायरी है?


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