गांधी और आइंस्टीन की नजर में इजराइल – अरुण कुमार त्रिपाठी

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Arun Kumar Tripathi
पिछले महीने ब्रिटेन की मशहूर पत्रिका ‘द इकानमिस्ट’ की संपादक जैनी मिल्टन बेडोज़ के एक इंटरव्यू पर काफी विवाद हुआ। वे अमेरिकी पोडकास्टर टकर कार्लसन से पूछ रही थीं कि क्या वे यह मानते हैं कि इजराइल को राजनीतिक रूप से अपना अस्तित्व कायम रखने का अधिकार है? क्या ऐसा मानने से वे यहूदीवादी नहीं हो जाएंगे? कार्लसन आरंभ में इस सवाल को टालते रहे और बाद में इसके पीछे के सोच पर ही सवाल उठाते रहे। आखिर में उन्होंने यह कह कर बात को खत्म किया कि वे किसी भी देश का सर्वनाश नहीं चाहते। लेकिन मुश्किल यही है कि युरोप, अमेरिका और भारत तक के मीडिया में गाज़ा पर हुए इजराइली हमले से लेकर ईरान पर अमेरिका के साथ किए गए हमले में भी इसी प्रकार के पूर्वाग्रह वाले सवाल पूछे जा रहे हैं।

तमाम पत्रकार यही पूछ रहे हैं और लिख रहे हैं कि अगर ईरान को नष्ट नहीं किया गया तो क्या इजराइल या अरब देश बच पाएंगे? यह आख्यान भी चलाया जा रहा है कि अगर ईरान शक्तिशाली बना रहा तो वह क्या सऊदी अरब स्थित मक्का मदीना पर कब्जा नहीं कर लेगा। लेकिन यह सवाल नहीं पूछे जा रहे हैं कि क्या हजारों साल पुराने देश ईरान को इस धरती पर अपना राजनीतिक अस्तित्व कायम करने का हक है? उसी के साथ यह सवाल भी अहम है कि क्या फिलस्तीन को अपने अस्तित्व का अधिकार है? लेकिन जब साम्राज्यवाद सवाल पूछने के तरीकों को बदल देता है तो ऐसे ही विकृत सवाल पूछे जाते हैं कि क्या इजराइल को जीने का हक नहीं है? दरअसल इस सवाल के माध्यम से एक ओर फिलस्तीन के सवाल को ही लोगों की स्मृति से गायब कर दिया गया है और अब ईरान के दीर्घकालिक इतिहास और सभ्यता के रूप में उसके अस्तित्व को भी मिटाने की कोशिशें चल रही हैं। कई पत्रकार तो यह आख्यान भी चला रहे हैं जल्दी ही हार्मुज जलडमरूमध्य का नाम ट्रंप स्ट्रेट होने वाला है।

महात्मा गांधी यहूदियों के साथ पूरी सहानुभूति जताते हुए फिलस्तीन पर उन्हें थोपे जाने को अनुचित मानते हैं। वे जुलाई 1946 में हरिजन में लिखते हैं, “ मैं अब तक यहूदी-अरब विवाद पर कुछ कहने से बचता रहा हूं। लेकिन मेरी नजर में उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से और अब आतंकवाद का नग्न रूप में सहारा लेकर फिलस्तीन पर अपने को थोप कर गलती की है। वे जिस प्रकार के विश्व नागरिक रहे हैं उस लिहाज से वे किसी भी देश के सम्माननीय अतिथि हो सकते थे। उनकी मितव्ययिता, प्रतिभा और उद्यमशीलता के कारण सभी जगहों पर उनका स्वागत होता। ईसाइयों के जगत पर यह एक कलंक है कि न्यू टेस्टामेंट(नई गवाही) के गलत पाठ के कारण उनके प्रति पूर्वाग्रह पैदा हुआ।” वे कहते हैं “ अगर कोई व्यक्ति गलत करता है तो पूरे यहूदी समुदाय को इसका दोष दिया जाता है।” अगर आइंस्टीन जैसा कोई यहूदी कोई महान आविष्कार करता है या कोई असाधारण संगीत तैयार करता है तो उसका श्रेय उस आविष्कर्ता को ही जाता है न कि पूरे समुदाय को।…. उनकी जो अवांछनीय दुर्दशा हुई है उसके लिए यहूदियों के प्रति मेरी सहानुभूति है। लेकिन कोई सोच सकता है कि प्रतिकूल स्थितियों के कारण उन्होंने शांति का पाठ सीखा होगा। ऐसे में वे अमेरिकी धन और ब्रिटिश सेना के सहारे क्यों एक बेगानी धरती पर अपने को थोप रहे हैं? फिलस्तीन पर जबरदस्ती कब्जा करने के काम को टिकाऊ बनाने के लिए वे आतंकवाद का सहारा क्यों ले रहे हैं? अगर वे अहिंसा के बेजोड़ हथियार का सहारा लेते जिसे कि उनके पैगंबरों ने सिखाया है और जीसस जो कि स्वयं यहूदी थे और जिन्होंने पाप से कराहती हुई दुनिया का दुख दूर करने के लिए कांटों का ताज खुशी खुशी पहन लिया, तो यह विकल्प श्रेष्ठ और गौरवशाली होता।”

गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत को अपना आदर्श बताने वाले महान वैज्ञानिक और यहूदी अल्बर्ट आइंस्टीन की उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई। लेकिन वे अपने हृदय से गांधी के बेहद करीब थे। वे यहूदियों के समर्थक थे लेकिन जब 1952 में आइंस्टीन को इजराइल का राष्ट्रपति बनाए जाने का प्रस्ताव आया तो उन्होंने मना कर दिया। वास्तव में उनके सोच की दिशा न तो आतंकवाद की ओर थी और न ही युद्ध की ओर। वे शांति संबंधी तमाम वैश्विक प्रस्तावों के समर्थक थे और समर्थक थे संयुक्त राष्ट्र, विश्व सरकार और एटमी निरस्त्रीकरण और नागरिक अधिकारों के। 18 अप्रैल 1955 को जब अस्पताल में उनकी मृत्यु हुई तो उनकी मेज पर 14 मई को पड़ने वाले इजराइल दिवस के लिए एक संदेश पड़ा था। उस संदेश में लिखा था, “ मैं आप से न तो एक अमेरिकी नागरिक के रूप में बात कर रहा हूं और न ही एक यहूदी के तौर पर। मैं आप से एक ऐसे मानव के रूप में बात कर रहा हूं जो कि अधिक गंभीरता के साथ चीजों को वस्तुनिष्ठ रूप में देखना चाहता है। अपनी इस कमजोर क्षमता के बावजूद मैं जिस मकसद के लिए काम करना चाहता हूं वह है शांति और न्याय। भले कोई इससे नाराज हो या खुश।”

यह विडंबना है कि जिस यहूदी समुदाय और इजराइल के लिए आइंस्टीन भरपूर सहानुभूति रखते थे और हिब्रू भाषा को प्रोत्साहित करने के लिए जिन्होंने चंदा जमा किया वह इजराइल आज आइंस्टीन के शांतिवाद को ही आग लगा रहा है। वे जबरदस्त रूप से युद्ध विरोधी थे और उसके लिए कम से कम तीन दशक तक अभियान चलाया। वे लिखते हैं, “ युद्ध कोई खेल नहीं है। हमारी लड़ाई युद्ध के विरुद्ध ही होनी चाहिए। जन समुदाय शांति के समय ऐसा संगठन बनाकर युद्ध की संस्था से लड़ सकता है जो सैन्य सेवा से पूरी तरह इंकार कर दे।(4 जनवरी 1928 वूमेन इंटरनेशनल लीग फार पीस को संदेश)। वे आगे कहते हैं , “ अतरराष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान तभी संभव है जब हर प्रकार की सेनाओं और हर प्रकार की सैन्य सेवाओं को समाप्त कर दिया जाए।(26 दिसंबर, 1928) ”

आइंस्टीन कहते हैं, “ मेरे लिए किसी मनुष्य को मारना हत्या है। वह तब भी हत्या है जब वह बड़े पैमाने पर राज्य की नीति के तहत किया जाए।” उनकी जो बात आज के अमेरिका-इजराइल के ईरान पर किए गए हमले के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है वो यह है कि, “किसी को भी अपने को यहूदी या ईसाई कहलवाने का हक नहीं है अगर वह किसी अधिकारी के कहने पर किसी की हत्या करे। या वह परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से अपने को इस अपराध के लिए प्रयुक्त होने की इजाजत दे।”

वे युद्ध रोकने के दावे और युद्ध की तैयारी करते जाने के पाखंड पर टिप्पणी करते हुए कहते थे कि आप युद्ध की तैयारी करते हुए युद्ध नहीं रोक सकते। युद्ध नामक संस्था को एकदम नकार देने के जोखिम से भी वे परिचित थे इसलिए उन्होंने इस बारे में भी टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह सौदा बुरा नहीं है। आइंस्टीन कहते हैं, “ मैं मानता हूं कि जो देश अपनी रक्षा न करने का फैसला करता है उसके साथ भारी जोखिम खड़ा हो जाता है। लेकिन उसके जोखिम को पूरा समाज मानव की प्रगति का उपाय मानकर स्वीकार करता है। हालांकि यह जोखिम बड़ा है लेकिन वह आवश्यक रूप से अधिक घातक नहीं है। जो देश युद्ध में शामिल नहीं होते वे उतना नुकसान नहीं उठाते जितना जर्मनी ने वास्तव में किया।”

आइंस्टीन मानते थे कि मानव कल्याण किसी राष्ट्र के प्रति वफादारी से बड़ा है बल्कि वह किसी भी चीज बल्कि हर चीज से बड़ा है।

आइंस्टीन मानते थे कि उनका युद्ध विरोध तार्किकता से अधिक भावना पर आधारित है। जबकि गांधी के युद्ध विरोध को हम ठोस रणनीति और तार्किक आधार पर देख सकते हैं। गांधी का कहना है कि युद्ध रोकने के लिए सारे प्रयास तब तक व्यर्थ जाएंगे जब तक युद्ध के कारणों को समझा नहीं जाता और उनसे मौलिक रूप से निपटा नहीं जाता। आज पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध और उसके प्रभावों में हो रही तबाही और आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए बीसवीं सदी की यह दो महान विभूतियों के संदेशों पर विचार करना हमारी सभ्यता की आवश्यकता है। आज हम भले एआई और कम्युटर से हो रहे इस युद्ध की प्रौद्योगिकी के चमत्कार पर रीझे रहें लेकिन आइंस्टीन के उस कथन पर ध्यान देना जरूरी है जिसमें उन्होंने कहा है कि मुझे नहीं मालूम कि तीसरा युद्ध किस हथियार से लड़ा जाएगा लेकिन चौथा विश्व युद्ध डंडों और पत्थरों से लड़ा जाएगा। कहने का मतलब यह है कि तीसरा विश्व युद्ध हमारी सारी तरक्की को समाप्त कर देगा, जिसे हम प्रत्यक्ष देख भी रहे हैं।


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