चंद्रशेखर की यात्रा पर बुद्धिजीवी समाज में अभी तक कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं हुई है। हुई है तो उन बुद्धिजीवियों में, जिनमें से शायद बहुतों को अधिकृत बुद्धिजीवी माना भी न जाए, जिनकी गिनती प्रतिष्ठान के प्रिय लोगों में नहीं है और जो प्रायः स्थानीय हैं। संभव है, इन्होंने यात्रा में हिस्सा भी लिया हो। पर जैसा कि केंद्र की ओर देखने वालों को शोभा देता है, साहित्यकारों, विचारकों और कलाकारों आदि ने इस घटना की ओर इतना भी ध्यान नहीं दिया है कि बैठकर इसके प्रभाव पर विचार करें। शायद वे उस समय मुँह खोलें, जब या तो चंद्रशेखर के इर्द-गिर्द काफी सत्ता-राजनीति जमा दिखाई देने लगे, या वे पथ से विचलित हो जाएँ। जो आदमी सत्ता से मुकाबला करने की या स्वयं सत्तासीन होने की संभावना नहीं दिखाता, उससे आज के जड़ समाज में किसी को लगाव नहीं रहता। हाँ, एक बार किसी तरह के संघर्ष या गठबंधन से कोई शक्ति पाकर यदि कोई आगे नहीं बढ़ पाता, तब ज़रूर बुद्धिजीवियों में कुछ दिलचस्पी पैदा होती है, क्योंकि तब वे इसे राजनीति की व्यर्थता का उदाहरण बना सकते हैं।
ऐसे समाज में चंद्रशेखर पर बात होती, बशर्ते कि वे कहीं पहुँच गए होते। पर वे तो अभी बोल ही रहे हैं। मेरे लिए इस बात का कोई खास महत्त्व नहीं है कि वे कब, कितनी दूर और कहाँ मोटर में बैठ जाया करते हैं—दरअसल मुझे मालूम भी नहीं। महत्त्व इस बात का है कि कोई लेखक या राजनीतिक व्यक्ति लोगों के दिल-दिमाग में उतनी हलचल नहीं जगा पा रहा है, जितनी अखबारों को देखने से जान पड़ता है कि चंद्रशेखर जगा रहे हैं। वे बातें, जो सब लोग जानते हैं, चंद्रशेखर की सभाओं में कुछ नई सुनाई पड़ती हैं। इसका आधा कारण तो यही है कि त्रुटियाँ बताते समय वे दोषी की ओर उँगली भी उठाते हैं और यह भी बताते हैं कि इस त्रुटि का असर जनजीवन पर क्या पड़ रहा है; पर जनसाधारण को वे यह इशारा नहीं देते कि तुम्हारा काल निश्चित है। जो यथार्थ चंद्रशेखर अपने पथ पर भीड़ को बता रहे हैं, वह औरों से जानकर निराशा होती है; पर इस पथिक से वही जानकर आशा बँधती है और ताकत मिलती है।

चंद्रशेखर के आज के महत्त्व को समझने के लिए भक्ति की नहीं, लोकशक्ति की समझ की जरूरत है। लोकशक्ति को समझने के पैमाने संगठित राजनीति के बिखराव के साथ-साथ विकृत हो गए हैं। चुनाव, पार्टी-कार्यक्रमों और जाति-धर्म के आधार पर नेतृत्व के सौदों से लोकशक्ति नहीं पहचानी जा सकती। पर वह लुप्त नहीं हो गई है। चंद्रशेखर वातावरण में एक तोड़ डाल रहे हैं, जो एक रासायनिक प्रक्रिया शुरू कर सकता है, बशर्ते कि कर्मक्षेत्र के दूसरे हिस्सेदार—जिनमें रचनात्मक अभिव्यक्ति के अधिकारी लेखक भी शामिल हैं—अपना-अपना काम करें। अभी तो दक्षिण से उत्तर छोड़िए, महानगर से गाँव तक भी कोई जाना नहीं चाहता। ऐसा लगता है जैसे यथार्थ को देखने की हिम्मत चुक गई है। उसे देखना यह कहकर टाल दिया जाता है कि वह तो वैसे का वैसा ही है, आज़ादी के बाद से अब तक कुछ नहीं बदला। पर मानव-परिस्थिति को बदलने की शक्ति को छूना पड़ेगा, जो संभव है किसी राख में दबी रह गई हो। यथार्थ का वर्णन करने के साथ-साथ पाठकों या श्रोताओं में वह चिनगारी जगानी पड़ेगी।
आज देश के व्याकुल जीवन की तुलना में दलों और व्यक्तियों की जड़ता जितनी अनुत्पादक है, उतनी आज़ादी के बाद से अब तक किसी समय नहीं थी। ऐसे में यह निरा भौगोलिक सत्य कि चंद्रशेखर दक्षिण से उत्तर तक चल रहे हैं, महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इस यात्रा से आज की स्थिति में कुछ सकारात्मक तत्त्व प्रकट हुए हैं। एक तो यही कि एक सार्वदेशिक व्यक्तित्व की फिर से पहचान बनी है। दूसरा यह कि पार्टियों को सुधारने के प्रायः एक दशक पुराने आह्वान को एक नई शक्ल में ही सही, एक मर्यादा फिर से मिली है, भले ही साझेदारी और समझौते की कतर-ब्योंत भी चल रही हो। तीसरा यह कि प्रगतिशील परिवर्तन के लिए स्फूर्ति जागी है, यद्यपि किसी संगठित कार्यक्रम द्वारा उसकी कोई योजना नहीं दिखाई देती।
पिछले दशक की भारतीय राजनीति में सत्ता के केंद्रीकरण, नेतृत्व के विघटन और दलीय संगठनों के अवमूल्यन को देखते हुए यह बात अब उभरकर सामने आती है कि जयप्रकाश नारायण के लोकशक्ति-अभियान और इस अभियान में कितना बड़ा अंतर है। दोनों को एक-सा मानना निरी रोमानी कविता होगी। जयप्रकाश नारायण ने गांधी की शैली से सीख लेकर आरंभ एक बिंदु—बिहार—से किया था। वे मानते थे कि जैसा स्वाधीनता संग्राम के दिनों में हुआ था, वैसा ही एक जनजागरण आंदोलन को देश में फैला देगा। पर सत्याग्रह और संगठन दोनों को एक साथ चलाने की कठिनाइयों से, और इस असंगठित जनजागरण को खड़ा कर देने की जोखिमों से निपटने के लिए उन्हें समय नहीं मिला। लगातार हर परिवर्तनकारी सरकार की छवि बनाए रखने में जो घातक बाधा जनता सरकार को आई, वह भी इसलिए कि उसने एक बड़े परिवर्तन का बीड़ा उठा लिया था, पर अपने राजनीतिक तरीकों और प्रशासन के साधनों को बदलने, अर्थात् दोनों का विकेंद्रीकरण करने के लिए वह तैयार नहीं थी। उस पार्टी का संगठन यह काम करने में उतना ही सक्षम था, जितना कांग्रेस पार्टी का।
चंद्रशेखर की जनता पार्टी को चंद्रशेखर के कारण भी लोकप्रियता मिलेगी और चुनाव के कारण भी। वे लोकशक्ति और चुनाव, दोनों को साथ लेकर चल रहे हैं। शायद संयुक्त मोर्चे की युक्ति भी वे किसी समय इस रणनीति में शामिल कर लें। पर उनके आगे के कार्यक्रम फिलहाल इतना ही दिखाते हैं कि वे अपनी सार्वदेशिकता को और गहरे उतारते हुए उसे आयाम देंगे, जैसे पंजाब, असम आदि में वे दे सकते हैं। आज की राजनीति में एक सर्वमान्य व्यक्ति की छवि, छोटी हो या बड़ी, अंकित हो जाएगी, जो आगे की लड़ाइयों में दूसरे नेताओं की तुलना में अधिक कारगर हो सकती है। पर पथ यहीं समाप्त नहीं होता। हाँ, यदि वे चलते-चलते हिमालय में चले जाने का इरादा कर बैठें, तो और बात है।
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