
बीसवीं शताब्दी के भारतीय दार्शनिकों में अग्रणी स्थान रखने वाले प्रो. दयाकृष्ण की जन्मशती के अवसर पर जब मैं उनके अवदान पर दृष्टि डालता हूँ तो उनकी विशिष्टता स्पष्ट हो जाती है। उन्होंने अपने चिन्तन में समाज दर्शन को जो महत्वपूर्ण और केन्द्रीय स्थान दिया है, वह भारत की प्राचीन दार्शनिक परम्परा और वर्तमान में दुर्लभ है। उनकी पुस्तक सोशल फिलॉसोफी पास्ट एंड फ्यूचर (१९६९) और उसमें प्रकाशित लेख “टू प्रेडिकामेण्ट” समाज-दर्शन के अध्येताओं के लिए मील का पत्थर है। इसी सरोकार के चलते उन्होंने लगभग ५४ वर्षों के बाद ‘स्वतंत्रता’ के प्रत्यय के बारे में पुनर्विचार करते हुये दूसरा महत्वपूर्ण लेख लिखा। किन्तु प्रस्तुत लेख का उद्देश्य उक्त लेखों का विवेचन नहीं है, उनकी चर्चा केवल उनके सरोकारों की ओर इशारा है जिस कारण अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने अपना सभ्यता विमर्श प्रस्तुत किया। इस वास्ते उन्होंने इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ एडवान्सड स्टडीज़, शिमला में २००५ में ये तीन व्याख्यान “सिविलाइजेशन्स पास्ट एण्ड फ्यूचर थीम पर दिये जो बाद में उनकी पुस्तक सिविलाइजेशन: नोस्टालजिया एण्ड युटोपिआ” शीर्षक से प्रकाशित हुये। इस लेख का उद्देष्य उन्हीं लेखों का अनुशीलन और उस आधार पर दयाकृष्ण के सभ्यता विमर्श का विवेचन करना है।
जब भी हम सभ्यता विमर्श की चर्चा करते हैं तो कई महत्वपूर्ण सवाल हमारे मन में उपजते हैं। मनुष्य सभ्यता का निर्माण क्यों
करता है? हम सभ्यताओं को कैसे समझ सकते हैं? सभ्यता की विशेषता क्या है? सभ्यता और संस्कृति में क्या अंतर है? ऐतिहासिक रूप में विकसित हुयी भारतीय, पश्चिमी, अरबी आदि सभ्यताओं में क्या अंतर है? सभ्यताओं की पहचान में उनके आन्तरिक दमन का क्या स्थान है? क्या भारतीय सभ्यता मूल रूप से आध्यात्मिक है? पश्चिमी सभ्यता और भारतीय सभ्यता में क्या अंतर है? आज भारतीय सभ्यता और पश्चिमी सभ्यता का संकट क्या है, क्या वे एक ही है या भिन्न-भिन्न? सभ्यताओं का आमना-सामना किस तरह टकराव की समस्या को जन्म देता है और उनका हल क्या है? भविष्य की सभ्यता निर्माण का विजन क्या हो सकता है और उसके प्रमुख तत्व क्या होंगे? इन सभी प्रश्नों पर दयाकृष्ण ने अपने व्याख्यानों में समुचित रूप से विचार किया है और भविष्य के लिए एक दृष्टि विकसित करने का प्रयास किया है। लेख के पहले भाग में हम उस पर चर्चा करेंगे और दूसरे भाग में उसपर कुछ आलोचनात्मक टिप्पणी करने का प्रयास करेंगे।
सभ्यता विमर्श
दयाकृष्ण का सभ्यता विमर्श मुख्यतः उनके द्वारा भारतीय उच्चतर अध्ययन संस्थान, शिमला में दिये गये तीन भाषणों (१) सिविलाइजेशन पास्ट एण्ड फ्यूचर, (२) अण्डरस्टैंडिंग सिविलाइजेशन्स टू केस स्टडीज इण्डियन एण्ड वेस्टर्न और (३) सिबिलाइजेशन्स नोस्टालजिया एण्ड यूटोपिया में समाहित है। इसके अलावा इस विमर्श को समझने में उनका लेख “एनकाउन्टर्स बिटवीन सिविलाइजेशन्स : क्वेश्चन आफ द सेन्टर एण्ड पेरीफरी (१९९७)” भी महत्वपूर्ण है। अपने पहले ही लेख में दयाकृष्ण प्रारम्भ में ही मनुष्य की परिभाषा करते हुए कहते हैं कि मनुष्य वह है जो सभ्यताओं का निर्माण करता है। लेकिन फिर सवाल करते हैं कि सभ्यता क्या है, मनुष्य सभ्यता का निर्माण क्यों करता है? उनका उत्तर है कि जन्म से मृत्यु तक मनुष्य जैविक क्रियाओं में संलग्न रहता है, जो वह जानवरों से साझा करता है किन्तु वह लगातार उन जैविक क्रियाओं का अतिक्रमण करने में लगा रहता है। इसी तरह मनुष्य वाह्य प्राकृतिक जगत को भी जस का तस स्वीकार नहीं करता बल्कि उसे भी अपनी भावनाओं, आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप बनाना चाहता है। यह संसार ही मनुष्य को निर्मित करता है और मनुष्य उसे लगातार सृजित करता है। उन्हीं के शब्दों में:
“कोई भी सभ्यता अनिवार्य रूप से अर्थों की संरचनाएं, महत्व की संरचनाएं आदि से बनी होती है; ये संरचनाएं दुनिया को न केवल रहने योग्य और आरामदायक बनाने वाली होती हैं बल्कि उसे अर्थपूर्ण भी बनाती हैं। जन्म और मृत्यु के प्रश्नों से कोई व्यक्ति कैसे निपटता है, बुढ़ापे और बीमारी के प्रभाव से कोई कैसे निपटता है, जिम्मेदारियों के साथ ही सीखने के प्रभाव का कोई कैसे सामना करता है, जो हासिल किया गया है उसे कैसे बनाए रखा जाए, यह सब कुछ आसान नहीं है। जो कुछ भी हासिल किया गया है, उसे बनाए रखना आवश्यक है क्योंकि हिफाज़त किये बिना इसे अगली पीढ़ियों तक नहीं पहुंचाया जा सकता है।”‘… इसीलिये उनके अनुसार-“प्रत्येक समाज रूढ़िवादी होता है। लेकिन “मुख्य बात यह है कि संरक्षण और हस्तांतरण की प्रक्रिया में भी परिवर्तन एक अंतर्निहित और स्वाभाविक तत्व है। हम एक साथ संरक्षण और परिवर्तन कर रहे होते हैं। साथ ही नवाचार भी कर रहे होते हैं।”
दयाकृष्ण संस्कृति और सभ्यता में भेद करते हुए कहते हैं कि मनुष्य संस्कृति के बिना रह नहीं सकता किन्तु सभ्यतायें कुछ ही होती हैं। सभ्यतायें मौखिकता से लेखन और साक्षरता की ओर संक्रमण है। और इस भाषा को समझे बिना किसी सभ्यता को नहीं समझा जा सकता। हर सभ्यता किसी न किसी भाषा के वर्चस्व के चारों ओर सृजित होती है, फिर चाहे यह संस्कृत, चीनी, यूनानी, लैटिन कुछ भी हों। आज यह स्थान अंग्रेजी को प्राप्त है। भाषाओं की भिन्नता के बावजूद एक बात सभी सभ्यताओं में समान है, जिसकी ओर इतिहासकारों ने ध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि लगभग ईसा पूर्व छठी शताब्दी में मनुष्य की चेतना में कुछ ऐसा परिवर्तन घटित हुआ कि बिंब और प्रतीक को अवधारणा ने प्रतिस्थापित करना शुरू कर दिया।
मनुष्य आत्मचेतन होने लगा, जिसके परिणामस्वरूप उसने सभी क्षेत्रों के बारे में प्रश्न करना प्रारंभ कर दिया। तर्कशास्त्र और भाषाशास्त्र का विकास होने लगा। मनुष्य अपनी भावनाओं और कर्म पर आत्म चिन्तन करने लगा जिसका परिणाम यह हुआ कि उसके अंदर चेतना को परिवर्तित करने की मांग उठने लगी। मनुष्य ने आत्म-चेतना से आत्म-प्रेरणा तक की यात्रा पूरी की। उसने उचित/अनुचित कर्म पर विचार करना प्रारम्भ कर दिया और सभ्यतायें अपने परम लक्ष्य को निर्धारित करने लगी। यहीं से सभ्यताओं में अंतर स्पष्ट होने लगा।
अपने अगले ही लेख अण्डरस्टेंडिंग सिविलाइजेशन्स टू केस स्टडीज : इण्डियन एण्ड वेस्टर्न में दयाकृष्ण ने यह समझाने का प्रयास किया है कि सभ्यताओं को हम कैसे समझें। उनका उत्तर है कि सभ्यताओं की पहचान इससे होती है कि उन्होंने क्या बनाया और सृजित किया। यह बात राजनीति, धर्म, कला, दर्शन आदि सभी क्षेत्रों पर लागू होती है। सभ्यतायें केवल शांति और प्रेम से निर्मित नहीं होती अपितु ये घृणा, वैमनस्य, युद्ध और टकराव से भी निर्मित होती हैं। लेकिन इसके अलावा सभ्यताओं के निर्माण में यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उनकी खोज की दिशा और मंजिल क्या है? सभ्यतायें बहुआयामी होती है लेकिन
उनकी पहचान इस बात से निर्धारित होती है कि उनका स्वप्न क्या है, आदर्श लक्ष्य क्या है जिसकी खोज और स्थापना का प्रयास वह हर क्षेत्र में करती है। और इसी से वे सभ्यताओं के बीच अंतर समझने का प्रयास करते हैं।
पश्चिमी, इस्लामी और भारतीय सभ्यता की तुलना करते हुए दयाकृष्ण एक खास बात की ओर ध्यान दिलाते हैं। पश्चिमी सभ्यता के इतिहास में ईसाई धर्म का आगमन एक ब्रेक की तरह है जो उसे पूर्व की ग्रीक रोमन सभ्यता से अलग करता है किंतु आज का पश्चिम स्वयं को उसी ग्रीक-रोमन सभ्यता के साथ जोड़कर देखता है, ईसाई अतीत को भूल जाना चाहता है। इसी तरह आज की इस्लामी सभ्यता, मोहम्मद साहब के आने से पूर्व की अरब सभ्यता / संस्कृति को नजरअंदाज करती है। किंतु भारतीय सभ्यता में ऐसा कोई व्यवधान नहीं है। वैदिक काल और उपनिषद् काल के अंतर और उन्हें बौद्ध, जैन धर्मों द्वारा दी गई चुनौती को स्वीकार करते हुए भी भारतीय सभ्यता में एक निरन्तरता दिखाई देती है जो सभी अन्तर्विरोधों को आत्मसात कर लेती है।
यहीं पर दयाकृष्ण यह प्रश्न उठाते हैं कि किसी सभ्यता की निरन्तरता का रहस्य क्या है, यह किस तरह कायम रहती है। उनके अनुसार, पश्चिमी सभ्यता ने यह कार्य दो तरीकों से किया है। इनमें पहला है ज्ञान की खोज, जो इस बात पर आधारित है कि मनुष्य तर्क की मदद से एक तरह का निश्चित, सार्वभौमिक ज्ञान प्राप्त कर सकता है। दूसरा है ग्रीक-रोमन सभ्यता से निरन्तरता के लिए तर्क, गणित और अरस्तु के तर्कशास्त्र को स्वीकार कर उन्हें पश्चिमी सभ्यता के आधारभूत तत्वों में स्थान देना। अतः उन्हीं के शब्दों में “पश्चिमी सभ्यता को समझने का कोई भी प्रयास तर्क के आधार पर होना चाहिए जिसमें सब कुछ
जानने और कर्म निर्धारण हेतु विवेक शक्ति को ध्यान में रखा जाए। “4
भारतीय सभ्यता की कहानी, पश्चिमी सभ्यता की उपरोक्त कहानी से एकदम भिन्न है। ऐसा नहीं है कि भारत की खगोल विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, भाषाशास्त्र आदि में उपलब्धियाँ नहीं रहीं। गणित के क्षेत्र में तो हमारी उपलब्धियाँ बेहद महत्वपूर्ण है। किन्तु फिर भी भारतीय सभ्यता ने कभी अपने आप को तर्क द्वारा प्राप्त इस तरह के ज्ञान को अपनी पहचान के साथ जोड़कर नहीं देखा। यहीं पर दयाकृष्ण एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं कि “मैं भारतीय सभ्यता में रुचि रखने वाले सभी लोगों से यह पूछना चाहूंगा कि जब हम अपनी सभ्यता के बारे में सोचते हैं तो मनुष्य, समाज या राजनीति को समझने के लिए कोई तर्कबुद्धि सम्मत वैचारिक नेटवर्क का अस्तित्व क्यों नहीं दिखाई देता है। “5
‘भारतीय सभ्यता एक आध्यात्मिक सभ्यता है,’ दयाकृष्ण इस प्रतिज्ञप्ति की सत्यता मानने से इनकार करते हैं। उनका मानना है कि हम अपनी सभ्यता के बारे में ठीक से नहीं जानते, उसकी आध्यात्मिक छवि झूठी है, पश्चिम के खिलाफ एक प्रतिक्रिया है जो मनोवैज्ञानिक रक्षा तंत्र की उपज है। इस छवि का निर्माण अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ जिसमें पश्चिम और भारत दोनों का योगदान है। इसके लिये वे राधाकृष्णन तक को दोषी मानते हैं जिन्होंने ‘ईस्टर्न रिलीजन्स एण्ड वेस्टर्न थॉट’ ऐसी पुस्तक लिखकर भारतीय धर्म और पश्चिमी दर्शन के बीच तुलनात्मक अध्ययन किया। जबकि होना यह चाहिए था कि भारतीय और पश्चिमी दर्शनों की तुलना की जाये। क्या पश्चिम में धर्म का लोप हो चुका था? यहीं पर दयाकृष्ण हमें सभ्यताओं को समझने की एक महत्वपूर्ण अन्तर्दृष्टि प्रदान करते है। उनका मानना है कि सभ्यताओं को समझना, व्यक्तियों को समझने के समान है जिसमें हमें ध्यान रखना होता है कि व्यक्ति क्या दिखाना और क्या छुपाना चाहता है। दोनों ही आत्म-दमन का सहारा लेते हैं। सभ्यताओं ने कितना कुछ निर्मित किया है किंतु जब पीछे देखने की बात होती है तो हम अतीत को वैसे नहीं देखना चाहते जैसा कि वह था बल्कि कुछ के साथ तादात्म्य दिखाते हैं और कुछ को छोड़ देते हैं, बाकी को दमित कर देते हैं और इस तरह काट-छांट कर एक नकली छवि का निर्माण करते हैं। इसलिये वे इस निर्णय पर पहुंचते हैं :
“आध्यात्मिक खोज, भारतीय सभ्यता का केवल एक आयाम है, हम इसके अन्य आयामों को क्यों भूल जाते हैं जैसे कि ज्ञान की खोज, दार्शनिक खोज, सौंदर्यपरक खोज, और सैकड़ों अन्य खोजें जो समय और कालखंडों के साथ बदलती रही है।”
उपरोक्त दमन ने पश्चिम और भारत में अलग-अलग तरह की दुविधा को जन्म दिया है। जहां आज पश्चिम के सामने समस्या यह है कि अपनी ही अवधारणाओं, पुरानी कार्यप्रणाली और विशेषकर परम्परागत तर्क प्रणाली के प्रश्नांकित हो जाने से कैसे निपटे, वहीं भारत के सामने अपने अतीत के अन्तविरोधों से निपटने का प्रश्न प्रमुख है। वे हमसे पूछते हैं कि “महिलाओं के प्रति व्यवहार के मामले में भारतीय सभ्यता कहां खड़ी है।”
अपने तीसरे लेख, सिविलाइजेशन्स : नोस्टेल्जिया एण्ड यूटोपिया में दयाकृष्ण भारत और पश्चिम के बीच एक और विशेष अंतर की ओर ध्यान दिलाते हैं कि ऐसा नहीं है कि हम तर्क नहीं करते किंतु भारत में हमेशा अनुभव को तर्क पर वरीयता प्रदान की गई। इसीलिए तर्क और विश्वास के बीच संबंध भारत और पश्चिम में भिन्न है। पश्चिमी आधुनिकता के संदर्भ में दयाकृष्ण तीन भारतीय हस्तियों- अरविंद, टैगोर और गांधी का जिक्र करते हैं। उनके अवदान की महानता स्वीकार करते हुये भी वे तीनों की आलोचना इस बात को लेकर करते हैं कि उन्होंने विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अर्थशास्त्र की अवहेलना की, इसलिये वे हमारे भविष्य के लिए ज्यादा प्रासंगिक नहीं है।
दयाकृष्ण के अनुसार सभ्यता के रूप में आज हम अतीत मुग्धता से ग्रस्त हैं। हम स्वर्णिम अतीत में खोये रहना चाहते हैं जब ऋषि-मुनि ध्यान में रहकर आत्मा-परमात्मा के मिलन चेष्टा करते रहते थे, जब भक्त गण भजन-कीर्तन में व्यस्त रहते थे और साधारण जन शिव और शक्ति के बीच समरसता की बातें करते थे। जीवन के व्यावहारिक पक्ष की इस अवहेलना की दयाकृष्ण कटु आलोचना करते हुए कहते हैं: “केवल इस एक शब्द ‘व्यवहार’ से कोई (परमार्थतः) सब कुछ नकार सकता है। लेकिन अंततः ‘व्यवहार’ ही मायने रखता है। 8 जहां हम अतीत के मोह से ग्रस्त हैं, वहीं पश्चिमी सभ्यता केवल भविष्य के यूटोपिया को उपलब्ध करने का प्रयास कर रही है। इसके लिये वह अतीत को छोड़ने को तैयार है। भविष्य का यह स्वप्न मनुष्य और मनुष्य के बीच समानता और न्याय पर आधारित है जिसमें मनुष्य पहली बार गैर बराबरी से मुक्त मनुष्य होने का अनुभव कर सकेगा। जिसमें उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय अधिकारों की रक्षा होगी। उनके अनुसार यह सार्वभौमिक भविष्य दृष्टि है जिसे सबसे पहले मार्क्स ने अभिव्यक्त किया था। उन्हीं के शब्दों में:
“यह दृष्टिकोण सर्वप्रथम मार्क्स द्वारा व्यक्त किया गया था। मार्क्स भले ही असफल रहे हों लेकिन यह दृष्टिकोण असफल
नहीं हुआ है। मार्क्सवादी विश्लेषण भले ही गलत हो गया हो लेकिन यह दृष्टिकोण गलत नहीं हुआ है। आदर्श आज भी कायम है। यह आदर्श आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।” और अंत में वे लिखते हैं कि “वह दृष्टि जो आज मानवता को मुग्ध कर रही है वही वास्तव में सार्वभौमिक दृष्टि है। हम किसी भी प्रकार की असमानता नहीं चाहते और हम सन्यासी नहीं बनना चाहते, हम धन, सुख-सुविधाएँ सामान और सेवाएं चाहते हैं। हम सबके लिए अस्पताल चाहते हैं। हम सबके लिए स्वास्थ्य चाहते हैं। हम शूद्रों को शिक्षा से वंचित नहीं करना चाहते। हम किसी भी वर्ग को वंचित नहीं करना चाहते। हम महिलाओं को वंचित नहीं करना चाहते। पहली बार एक नई सभ्यता का उदय हो रहा है। सभी सभ्यताओं को अब इस उभरती हुई नई सभ्यता की चुनौतियों का सामना करना होगा और हमें अपनी सभ्यता के प्रति आत्ममुग्धता से भी बचना होगा। आइये, हम आदर्शवादी बनें और भविष्य के बारे में सोचें।
सभ्यतागत संघर्ष और समाधान
कुछ वर्ष पूर्व सैमुअल हंटिंग्टन (१९९३) का एक लेख फॉरिन अफेयर मैगजीन में प्रकाशित हुआ था जिसने बौद्धिक जगत में एक भूचाल सा पैदा कर दिया। शीत युद्ध के बाद के विश्व पर विचार करते हुये हंटिंग्टन ने यह संकल्पना दी कि भविष्य के युद्ध अब विभिन्न सभ्यताओं के बीच होंगे। सभ्यताओं के बीच संघर्ष की इस थीसिस से दयाकृष्ण भी अछूते नहीं रहे और उन्होंने अपने लेख “एनकाउन्टर्स बिटवीन सिविलाइजेशन्स : क्वेश्चन आफ द सेन्टर एण्ड पेरीफरी में इस समस्या पर अपने ढंग से इस पर विचार किया। उनकी मान्यता है कि सभ्यताओं को समझने के लिये हमें धन और शक्ति अर्थात अर्थ और राजनीति से अलग हटकर विचार करना चाहिये क्योंकि ये सभ्यताओं की समझ में प्रासंगिक नहीं है। बड़े-बड़े शक्तिशाली, वैभवपूर्ण साम्राज्य भी इतिहास की गर्त में समा गये लेकिन सभ्यताओं का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है। उन्होंने हंटिंग्टन की मुख्य अवधारणा, सभ्यताओं के बीच संघर्ष को अन्तर्विरोधी बताया, हालांकि सभ्यताओं के बीच आमना-सामना होने की बात स्वीकार की। टकराव और संघर्ष की घटना सैन्य, व्यापार और कभी-कभी धार्मिक सम्प्रदायों के बीच देखी जा सकती है किंतु ज्ञान के क्षेत्र में सामान्यतः ऐसा नहीं दिखता। अतः सभ्यताओं के आमने-सामने होने की घटना को इनसे अलग करके देखना चाहिये। उनके अनुसार, सभ्यताओं को खोज की एक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिये, जिसे हम उस सभ्यता का पुरुषार्थ कह सकते हैं। किंतु यह पुरुषार्थ कभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता, यह विभिन्न क्षेत्रों में पीढ़ियों तक चलने वाली प्रक्रिया के अन्तर्गत ही सामने आता है। अतः इस तरह से देखने पर हम संघर्ष नहीं सभ्यताओं के पुरुषार्थों के बीच आदान-प्रदान की चर्चा कर सकते हैं।
‘केन्द्र और परिधि’ की अवधारणा को प्रश्नांकित करते हुये दयाकृष्ण का स्पष्ट मत है कि सभ्यताओं के मध्य आपसी लेनदेन अतीत में भी होता रहा है और आज भी जारी है। एक सभ्यता दूसरी सभ्यता से किन क्षेत्रों में ग्रहण करेगी यह उसकी अपनी कमजोरी और मजबूती पर निर्भर करता है। जिन क्षेत्रों में एक सभ्यता पिछड़ी हुयी है, वह आसानी से उन क्षेत्रों में अधिक विकसित सभ्यता से ग्रहण करती है। लेकिन यह आदान-प्रदान, सैन्य विजय के संदर्भ में बदल जाता है। उदाहरण के लिये लगभग चार सौ वर्षों के इस्लाम के शासन के बावजूद भारतीय दार्शनिक ग्रन्थों पर उसका प्रभाव नगण्य सा दिखाई देता है, यद्यपि औषधिशास्त्र, खगोलशास्त्र और गणित पर उसका प्रभाव जरूर है। इसके विपरीत, पश्चिम से सामना होने के बाद, उसका शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो जो पश्चिम के प्रभाव में नहीं आया हो। उनके अनुसार प्राकृतिक विज्ञानों में पश्चिम की श्रेष्ठता पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता, और उस क्षेत्र में अपनी परम्पराओं की ओर लौटने का आग्रह करना बेवकूफी होगी। लेकिन समाज विज्ञान और मानविकी में स्थिति भिन्न है। समाज विज्ञान में वस्तुनिष्ठता का स्तर प्राकृतिक विज्ञानों जैसा नहीं होता। मानविकी तो समाज विज्ञान से भी ज्यादा संस्कृति सापेक्ष होती है। समाज विज्ञान और मानविकी के क्षेत्रों में हम अपनी परम्पराओं से अवधारणाओं को वर्तमान के अनुरूप गढ़ने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन कला और आध्यात्मिकता के क्षेत्रों में बहुलता को बढ़ावा दिया जाता है बल्कि उसको मूल्यवान माना जाता है। संगीत, कला, नृत्य और आध्यात्मिकता के क्षेत्रों में हमारे अपने प्रतिमान है, हमें बाहर से किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। इन्हीं कारणों से दयाकृष्ण केन्द्र और परिधि की अवधारणा का विरोध करते हैं। उनके अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों के केन्द्र भी अलग-अलग होते हैं।
अंत में दयाकृष्ण पश्चिमी बुद्धिजीवियों की संकीर्णता की ओर इशारा करते हैं जो यह मानते हैं कि पश्चिम ही श्रेष्ठ हैं और हमें पश्चिम बनाम अन्य सभ्यताओं की बात करनी चाहिये। उनका सुझाव है कि हमें उनकी तरह संकीर्ण मानसिकता को स्वीकार नहीं करना चाहिये। यह कितना सुन्दर होगा कि हम सभी एक दूसरे से सीख सकें और अब तक की विकसित सभ्यताओं की नींव में कुछ नया जोड़ सकें। इसके लिये वे हंटिंग्टन जैसे विचारकों से सहमत नहीं हैं और जोर देकर कहते हैं कि :
“हमें एक अंतर साभ्यतिक बुद्धि या चेतना का निर्माण करने का प्रयास करना चाहिए जो अपने स्वयं के प्रयासों को महत्व देती है और दूसरों से वह ग्रहण करती है जिसे वह मूल्यवान समझती है व उसे आत्मसात करती है। उसे एक ऐसा रूप देती है जो विशेष
रूप से उसका अपना ही हो। ”
लेकिन क्या यह संभव होगा? क्या कोई वैश्विक सभ्यता की सम्भावना है, वे प्रश्न करते हैं? किंतु फिर भी वे इस चुनौती को स्वीकार करते हुये कहते हैं:
“लेकिन फिर भी यह हम सभी के लिए एक चुनौती है ताकि एक बेहतर भविष्य का निर्माण सभ्यताओं के टकराव के परिणाम स्वरूप नहीं बल्कि सभी सभ्यताओं के एक साझा प्रयास के परिणाम स्वरूप संभव हो सके, इस तरह से कि प्रत्येक सभ्यता अपनी पहचान को संरक्षित रखे और भविष्य में उभरने वाली नई सभ्यता को खतरे में ना डाले। “
उपसंहार
आज जब विश्व संकीर्णताओं की दीवारों में कैद होता जा रहा है, दयाकृष्ण का उपरोक्त सभ्यता विमर्श, उम्मीद की एक किरण की तरह है जो बढ़ते अंधेरे को भेद कर नयी सुबह का आगाज कर सकता है। किंतु इसका मतलब यह नहीं है कि हम उस पर आलोचनात्मक दृष्टि न डालें। कई विद्वानों जैसे आरिफ डिर्लिक 13 ने दयाकृष्ण के सभ्यता विमर्श पर यह आरोप लगाया है कि वह अनावश्यक रूप से सभ्यता विमर्श को महत्व प्रदान कर रहे हैं जबकि विश्लेषण का यह तरीका आज अपना महत्व खो चुका है। वहीं दूसरे विद्वानों की मान्यता है कि सभ्यता विमर्श, भूमंडलीकरण और बहुसंस्कृतिवाद का एक विकल्प हो सकता है यदि उसे यूरो-केन्द्रिकता और उससे जुड़ी विकास और पिछड़ेपन की सैद्धांतिकता से मुक्त किया जा सके। उदाहरण के लिये शमुअल एन ईसेनस्टैड 14 ने ‘संस्कृति’ के स्थान पर ‘सभ्यता’ की कोटि का प्रयोग सभ्यताओं में होने वाले बाहरी और भीतरी परिवर्तनों के अध्ययन के लिये किया है। हमारे यहां भी अक्सर यह बात उठती रहती है कि भारत कोई देश या राष्ट्र बनने से पहले एक सभ्यता है और उसका अध्ययन इसी दृष्टि से करना चाहिये। दयाकृष्ण का यह प्रयत्न भारतीय सभ्यता विमर्श के लिये प्रस्तावना का कार्य कर सकता है।
दयाकृष्ण सभ्यता और संस्कृति में सूक्ष्म भेद करते हैं। उनके अनुसार संस्कृति की पहचान शिल्प, हुनर, स्मृति से होती है किंतु संस्कृति तब सभ्यता में बदल जाती है जब आत्मचेतना, चेतना पर हावी हो जाती है और अनुभव के स्थान पर चिन्तन को वरीयता मिलने लगती है साथ ही एक अभिजात वर्ग का उदय होता है जो शास्त्रों की रचना करता है और विभिन्न क्षेत्रों के लिये प्रतिमान स्थिर करता है। इस तरह किसी संस्कृति के पुरुषार्थ का रूपान्तरण हो जाता है। वह आत्मचिंतन और आलोचनात्मक मूल्यांकन का विषय बन जाता है। यह बात कहने में जितनी सीधी-सादी लगती है, व्यवहारिक जीवन में है नहीं। वहां सभ्यता और संस्कृति में ऐसा आत्यान्तिक भेद करना अधिकतर सम्भव नहीं होता। शायद इसीलिये अधिकांश विद्वान दोनों का अपने विवेचन में अदल-बदल कर इस्तेमाल करते हैं या दोनों पदों को एकसाथ प्रयोग करते हैं।
आज जब चारों ओर वि-उपनिवेशीकरण के नाम पर भारतीय ज्ञान परम्परा का महिमा मंडन किया जा रहा है, दयाकृष्ण द्वारा अतीत-मुग्धता (Nostalgia) से मुक्त होने की बात कहना कुछ अटपटा सा लग सकता है। किन्तु वे हमें आगाह कर रहे हैं कि प्राकृतिक विज्ञान में पश्चिम की श्रेष्ठता से इनकार नहीं किया जा सकता, उसको हमें स्वीकार करना ही होगा, भारतीय ज्ञान परम्परा उसका स्थान नहीं ले सकती। यद्यपि वे समाजविज्ञान के क्षेत्र में विशेष सांस्कृतिक सन्दर्भ की सापेक्षता को स्वीकारते हैं और अपनी सांस्कृतिक अवधारणा के प्रयोग की वकालत करते हैं किन्तु साथ ही वे यह भी कहते हैं कि हमारी ज्ञान परम्परा में मनुष्य, समाज और राजनीति के लिये कोई सैद्धांतिक ढांचा मौजूद नहीं है। यह बात कुछ अन्तर्विरोधी भी है। वास्तव में आधुनिक विश्व को समझने लायक सैद्धान्तिक अवधारणाओं का गढ़न हम नहीं कर पाए हैं और इसके लिये हमारे पास पश्चिम से आये सैद्धान्तिक ज्ञान पर निर्भर रहने का अभी कोई विकल्प नहीं है।
दयाकृष्ण जब अतीत की मोह ग्रस्तता से मुक्त होने की बात करते हैं तो उनका मतलब सारे अतीत का तिरस्कार नहीं है। दरअसल वे हमें अतीत को देखने की एक परिपक्व आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान करते हैं। उन्हीं के शब्दों में:
“हमें अतीत की कैद से बाहर निकलना चाहिए। हमें अतीत से सीखना चाहिए, उससे प्रेरणा लेनी चाहिए, अतीत का उपयोग करना चाहिए, उसका महत्व समझना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए। पश्चिम की तरह उसे नकारना नहीं चाहिए। लेकिन हमें अतीत से खुद की पहचान को जोड़ना नहीं चाहिए। हमें यह नहीं कहना चाहिए कि चेतना के क्षेत्र में जो कुछ भी हासिल करना था वह पहले ही हासिल हो चुका है। भविष्य खुला है; हमें अतीत से बंधे नहीं रहना चाहिए। “
दयाकृष्ण का उपरोक्त कथन तब और प्रासंगिक जान पड़ता है जब हम वर्तमान विश्व में व्याप्त हिंसा पर नजर डालते हैं। आधुनिकता ने परम्परागत समाजों के सामने जिस अस्मिता-संकट की चुनौती पेश की है उससे निपटने के लिये कई बार हम, सुरक्षा तंत्र के रूप में, अतीत की ओर देखने लगते हैं और फिर धार्मिक कट्टरता, पुनरुत्थानवाद, मूलतत्ववाद के विकार हो जाते हैं। हम अतीत की धार्मिक पहचान को आत्मरक्षा के लिये अपनी प्रधान पहचान बना लेते हैं। जैसा की अमर्त्य सेन ने अपनी पुस्तक ‘आइडेन्टिटी एण्ड वायलेंस’ में दर्शाया है कि यही पहचान जहां एक और जोड़ती है तो दूसरी ओर दूसरी पहचानों से अलग भी करती है। उपयुक्त परिस्थितियों में यही टकराव, घृणा और
वैमनस्य को जन्म देकर हिंसा को बढ़ावा देता है। इसलिये अपनी सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान की मोहग्रस्तता से मुक्त होना विश्व शान्ति के लिये जरूरी है। अपने समय में इस समस्या की विकरालता से दो-चार न होते हुये भी, प्रकारान्तर से दयाकृष्ण भी तो यही कह रहे हैं और उसका हल भी सुझा रहे हैं।
सांस्कृतिक-धार्मिक अस्मिताओं के टकराव जनित हिंसा का हल दयाकृष्ण परा-सभ्यतागत दृष्टिकोण (Trans-civilizational intellect) के विकास में देखते हैं जिससे हम अपनी संस्कृति/सभ्यता की श्रेष्ठता की भावना से मुक्त होकर दूसरी सभ्यता से संवाद करने और उसमें जो श्रेष्ठ है उसे अपनाने के लिये तैयार रहते हैं। यह तभी सम्भव है जब हम सभी सभ्यताओं के प्रति आलोचनात्मक और खुला दृष्टिकोण अपनाने और अपने भीतर चुनाव का विवेक जगा सकें। यहां दयाकृष्ण की अन्तर्दृष्टि और उसे अपनाये जाने के प्रति शंकालु होने का समर्थन किया जाना चाहिए। लेकिन हमें मनुष्यता के बेहतर भविष्य के लिये इस चुनौती को स्वीकार करना ही होगा।
उत्तर-आधुनिकता के दौर में दयाकृष्ण हमें नये ढंग से सोचने का आवाहन करते हैं लेकिन रॉर्टी और देरिदा की तरह नहीं। यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया जा सकता है कि दयाकृष्ण जीवन पर उदारवादी रहने के बावजूद मार्क्स के विजन को मानव जाति के लिये भविष्य का विजन क्यों स्वीकार करते हैं जबकि वह साफ-साफ कहते हैं कि मार्क्सवादी सिद्धान्त असफल हो चुका है? ऐसा नहीं है कि वे पर्यावरण के वैश्विक संकट से परिचित नहीं हैं लेकिन जो बात उन्हें मार्क्स के विजन से जोड़ती है वह है- बराबरी और सामाजिक न्याय का सवाल। भले ही मार्क्स ने इसे पहले जोरदार ढंग से उठाया हो किंतु अनेक उदारवादी चिन्तकों का योगदान भी इसमें कम नहीं है। लेकिन यदि हम मार्क्सवादी सिद्धान्त को न मानें तो फिर उक्त लक्ष्य का पाने का तरीका क्या होगा, इस पर दयाकृष्ण ने विचार नहीं किया है और न कोई सुझाव दिया है। इसलिये यह मात्र एक यूटोपिया ही रह जाता है। फिर भी यदि हम भारतीय समाज में स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों के प्रति हो रहे अन्याय पर नजर डालें तो यह यूटोपिया सार्थक जान पड़ता है। इसमें हमें अतीत मुग्धता से मुक्त होकर नये सुन्दर भविष्य के निर्माण में मदद मिल सकती है और हम एक अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक सभ्यता के कर्णधार बन सकते हैं। यही दयाकृष्ण के सभ्यता विमर्श का महत्वपूर्ण योगदान है।
यह लेख Journal of Darśana (Vols. XVII–XXIII, ISSN: 2348-0122), एक Peer-Reviewed Journal, में प्रकाशित हो चुका है।
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