हमारे प्रेरणा स्रोत आईएएस डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा की कहानी

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The story of our source of inspiration, IAS Dr. Brahmadev Sharma

क्या आपने कभी किसी ऐसे आईएएस अधिकारी के बारे में सुना है, जिसने अपने करियर की ऊंचाइयों को ठुकराकर जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के लिए अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दी हो? क्या कोई अधिकारी इतना साहसी हो सकता है कि वह सरकार की नीतियों के खिलाफ खड़ा हो जाए, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे अपने लोगों के साथ अन्याय दिखाई दे रहा था?

डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा ऐसे ही दुर्लभ व्यक्तित्व थे। उन्हें लोग प्यार से डॉ. बी.डी. शर्मा भी कहते थे। वे केवल एक प्रशासनिक अधिकारी नहीं थे, बल्कि उन लाखों आदिवासियों की आवाज थे, जिनकी बातें अक्सर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती थीं। उनका मानना था कि भारत के संविधान में हर समस्या का समाधान मौजूद है। परेशानी संविधान में नहीं, बल्कि उसे लागू करने की इच्छाशक्ति में है। यही सोच उन्हें बाकी अधिकारियों से अलग बनाती थी।

जब एक कलेक्टर ने आदिवासियों के दर्द को अपना दर्द बना लिया

साल 1966 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा को बस्तर का कलेक्टर बनाकर भेजा गया था। उस समय बस्तर मध्य प्रदेश का हिस्सा था। वहां पहुंचकर उन्होंने वह देखा, जिसे देखकर उनका जीवन ही बदल गया।

बस्तर के जंगलों में रहने वाले आदिवासी वर्षों से शोषण, गरीबी और उपेक्षा का सामना कर रहे थे। सरकारी योजनाएं बनती थीं, लेकिन उनका लाभ जमीन तक नहीं पहुंचता था। ऐसे माहौल में डॉ. शर्मा ने केवल दफ्तर में बैठकर फाइलें नहीं निपटाईं। वे गांव-गांव गए। उन्होंने लोगों की समस्याएं सुनीं। उन्होंने समझा कि आदिवासियों की सबसे बड़ी लड़ाई गरीबी की नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकारों की है।

धीरे-धीरे आदिवासी समुदाय उन्हें अपना आदमी मानने लगा। उनके लिए वह केवल कलेक्टर नहीं थे, बल्कि भरोसे का दूसरा नाम बन गए थे।

बैलाडीला का वह मामला जिसने पूरे देश को चौंका दिया

डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा का नाम एक ऐसे फैसले से भी जुड़ा है, जिसकी चर्चा आज भी बस्तर में होती है। यह घटना 1968 के आसपास की है।

बैलाडीला की लौह अयस्क खदानों में काम करने आए कई बाहरी पुरुषों ने आदिवासी युवतियों को शादी का झांसा देकर उनका शोषण किया। बाद में वे उन्हें छोड़कर चले गए। कई युवतियां गर्भवती हो गईं। कुछ बच्चों को जन्म भी दे चुकी थीं।

जब यह मामला डॉ. शर्मा तक पहुंचा तो उन्होंने इसे केवल सामाजिक समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया। उन्होंने सर्वे कराया। दोषी लोगों की पहचान करवाई। उनमें कुछ प्रभावशाली अधिकारी भी शामिल थे।

फिर उन्होंने एक सख्त संदेश दिया। या तो इन महिलाओं को पत्नी के रूप में स्वीकार किया जाए, या फिर कानूनी कार्रवाई का सामना किया जाए। उनके इस दृढ़ रुख के आगे सबको झुकना पड़ा। परिणामस्वरूप 300 से अधिक आदिवासी युवतियों का विवाह करवाया गया।

यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था। यह उन महिलाओं को सम्मान लौटाने की कोशिश थी, जिन्हें समाज ने अकेला छोड़ दिया था।

जब विकास की योजना से खतरे में पड़ गए आदिवासी

समय के साथ डॉ. शर्मा केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे। वे गृह मंत्रालय में निदेशक और बाद में संयुक्त सचिव बने। लेकिन सत्ता के ऊंचे पद भी उनके विचारों को नहीं बदल सके।

सत्तर के दशक में सरकार ने विश्व बैंक की सहायता से बस्तर के जनजातीय इलाकों में बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट लगाने की योजना बनाई। योजना के तहत लगभग 200 करोड़ रुपये खर्च किए जाने थे।

अधिकांश अधिकारी इसे विकास का प्रतीक मान रहे थे। लेकिन डॉ. शर्मा ने इसके पीछे छिपे खतरे को देखा। उन्होंने चेतावनी दी कि इन परियोजनाओं के कारण हजारों आदिवासी अपनी जमीन और जंगल खो देंगे। उन्हें पलायन करना पड़ेगा। उनकी संस्कृति और पहचान खतरे में पड़ जाएगी।

The story of our source of inspiration, IAS Dr. Brahmadev Sharma

उन्होंने खुलकर विरोध किया। लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। तब उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया, जिसकी कल्पना भी कम लोग कर सकते हैं।

वह इस्तीफा जिसने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया

साल 1980 में डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा ने अपनी प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी छोड़ दी। यह फैसला केवल पद त्यागने का नहीं था। यह व्यवस्था के खिलाफ एक नैतिक विद्रोह था।

अधिकांश लोग सत्ता पाने के लिए संघर्ष करते हैं। लेकिन डॉ. शर्मा ने सत्ता छोड़कर संघर्ष का रास्ता चुना। उनका मानना था कि अगर पद पर रहते हुए वे आदिवासियों के हितों की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं, तो उस पद का कोई अर्थ नहीं है।

नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह आदिवासी, दलित और किसानों के अधिकारों की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया।

वह रिपोर्ट जिसने देश को आईना दिखाया

1986 से 1991 तक डॉ. शर्मा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के आयुक्त रहे। इस दौरान उन्होंने देशभर का दौरा किया और आदिवासियों की वास्तविक स्थिति को समझा।

उनकी रिपोर्ट को आज भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज माना जाता है। उसमें उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है। कैसे किसान सुनियोजित आर्थिक शोषण का शिकार बन रहे हैं।

उनकी सिफारिशें केवल कागजी सुझाव नहीं थीं। वे न्याय और संवैधानिक अधिकारों की मांग थीं।

नक्सलियों और सरकार के बीच भरोसे का नाम

डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा का आदिवासियों के बीच इतना सम्मान था कि जब 2012 में नक्सलियों ने तत्कालीन कलेक्टर अलेक्स पॉल मेनन का अपहरण कर लिया, तब सरकार ने उन्हें मध्यस्थ के रूप में चुना।

यह एक बेहद संवेदनशील मामला था। नक्सली सरकार की बात सुनने को तैयार नहीं थे। लेकिन डॉ. शर्मा पर उन्हें भरोसा था। उन्होंने संवाद की राह बनाई और अंततः कलेक्टर की रिहाई संभव हो सकी।

यह घटना बताती है कि उन्होंने केवल आदिवासियों के बीच ही नहीं, बल्कि संघर्ष के दोनों पक्षों के बीच भी विश्वास अर्जित किया था।

क्यों कहते थे कि संविधान ही समाधान है?

डॉ. शर्मा का एक कथन अक्सर याद किया जाता है। वे कहते थे कि यदि भारतीय संविधान को सही अर्थों में लागू कर दिया जाए, तो देश की अधिकांश समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।

उनकी पीड़ा यह थी कि संविधान किताबों में तो मौजूद है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ उन लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिनके लिए वह बनाया गया था।

उनकी सोच गांधीवादी थी। लेकिन उसमें जमीन की सच्चाई भी शामिल थी। शायद यही कारण था कि वे व्यवस्था के भीतर भी सम्मानित थे और व्यवस्था के आलोचक भी।

आखिरी सांस तक जारी रहा संघर्ष

जीवन के अंतिम वर्षों में उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी। उनकी याददाश्त भी कमजोर हो गई थी। फिर भी आदिवासियों और वंचित समाज के लिए उनकी चिंता कभी कम नहीं हुई।

ग्वालियर में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनके विचार जीवित हैं। आज भी जब आदिवासियों के अधिकार, जल-जंगल-जमीन और संविधान की बात होती है, तब डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा का नाम सम्मान से लिया जाता है।

उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि असली नेतृत्व कुर्सियों से नहीं, बल्कि लोगों के लिए खड़े होने के साहस से पैदा होता है। शायद इसी कारण उन्हें आज भी आदिवासियों का मसीहा कहा जाता है।


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