बहुत पुरानी बात है। वर्ष 1967 की। बिहार में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी थी। केवल बिहार ही नहीं, देश के कई राज्यों में कांग्रेस पराजित हुई थी और गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ था। उस समय राजनीतिक माहौल में यह चर्चा थी कि क्या भारतीय राजनीति अब किसी नए दौर में प्रवेश कर रही है।
उन्हीं दिनों धर्मवीर भाई एक अंग्रेजी अख़बार में स्पोर्ट्स रिपोर्टिंग किया करते थे। धर्मवीर सिन्हा, जो आगे चलकर भारत सरकार में मंत्री भी बने, उनके पिता देवसरन बाबू बिहार कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में गिने जाते थे। धर्मवीर भाई स्वयं अत्यंत मिलनसार और जीवंत व्यक्तित्व थे। इंडिया किंग सिगरेट पीते थे, अख़बार में खेल का स्तंभ लिखते थे. पटना के डाकबंगला चौराहे पर मद्रासी लोगों द्वारा संचालित कॉफी हाउस उनका नियमित अड्डा था।
उन्होंने मुझसे कहा, “सरकार बदल गई है, कांग्रेस हार गई है। क्या भारतीय राजनीति में किसी नए ढंग के ध्रुवीकरण की शुरुआत हो रही है? इस विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन कीजिए।”
उनके सुझाव पर मैंने विधायक क्लब के हॉल में एक गोष्ठी आयोजित की। उसमें डॉ. चेतकर झा,डा. विश्वनाथ प्रसाद वर्मा सहित अनेक बौद्धिक और राजनीतिक कार्यकर्ता उपस्थित हुए। सबका नाम आज स्मरण नहीं है। लेकिन उस गोष्ठी की एक घटना आज भी बिल्कुल स्पष्ट याद है।
अचानक वहाँ समाजवादी आंदोलन के वरिष्ठ नेता रामनंदन मिश्र पहुँच गए। वे तब सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके थे। मैंने उन्हें पहली बार देखा था। नाम पहले से सुन रखा था। किसी ने परिचय कराया। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ इतना भारी और प्रभावशाली था कि मुझे लगा, यदि थोड़ा और ज़ोर से दबा दें तो मैं वहीं बैठ जाऊँ।
उन्होंने बहुत छोटी, लेकिन जीवन भर याद रहने वाली बात कही। उन्होंने कहा—
“हमारे देश की मिट्टी सड़ गई है। ऐसी मिट्टी में कोई भी बीज डालिए, वह उगेगा ही नहीं। फलने-फूलने की बात तो बहुत दूर है। इसलिए सबसे पहले इस देश की मिट्टी को ठीक करना होगा। अन्यथा कोई भी उपक्रम सफल नहीं होगा।”
उनकी यह बात आज भी मेरे मन में अंकित है।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि उनकी बात कितनी दूरदर्शी थी। मैं स्वयं लोहिया विचार मंच जैसे छोटे से संगठन में रहा। वह कोई बहुत बड़ा संगठन नहीं था, लेकिन वहाँ भी आपसी खींचतान, वर्चस्व की लड़ाई और टूट-फूट से हम मुक्त नहीं रह सके। बाद के वर्षों में भी अनेक समूह बने और बिखरे। योगेंद्र यादव और सुनील गुप्त जैसे लोग भी लंबे समय तक साथ नहीं चल सके। संगठन टूटते रहे।
यही शायद हमारे लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट है। हम एक उद्देश्य और एक विचार के लिए लंबे समय तक एक साथ चल नहीं पाते। एक-दूसरे को पीछे खींचना, आगे बढ़ने के लिए दूसरे की टांग खींचना, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को सामूहिक उद्देश्य पर भारी कर देना—यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती गई है।
सिद्धांत, समाज और देश की चिंता पीछे छूटती जाती है, जबकि जाति की राजनीति सबसे आगे आ जाती है। कोई व्यक्ति कितना भी अयोग्य क्यों न हो, यदि वह किसी जाति का नेता है, तो उसके पीछे पूरी जमात खड़ी दिखाई देती है।
ऐसी स्थिति में बार-बार रामनंदन मिश्र की वही बात याद आती है—देश की मिट्टी को बदले बिना कोई बीज नहीं उगेगा। यदि समाज का चरित्र, राजनीतिक संस्कृति और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता नहीं बदलेगी, तो कोई भी महान विचार, कोई भी आंदोलन और कोई भी सुधार अंततः उसी मिट्टी में सड़ जाएगा।
आज के दौर को देखकर मुझे रामनंदन मिश्र की वह बात बार-बार याद आती है। उसी स्मृति को साझा कर रहा हूँ।
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