“जिस दिन से चला हूँ, मेरी मंज़िल पर नज़र है,
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।”
जनाब बशीर बद्र का यह शेर जननायक चंद्रशेखर के व्यक्तित्व और जीवन-दर्शन का मानो सजीव परिचय है। उन्होंने केवल मील के पत्थरों को ही नहीं, बल्कि उबड़-खाबड़, आड़े-तिरछे रास्तों, पथरीले अवरोधों और राजनीतिक तूफानों की भी कभी परवाह नहीं की। उनकी दृष्टि सदैव उस मंज़िल पर टिकी रही, जिसे तत्कालीन राजनीति कल्पना और स्वप्न मानती थी। वे एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और मानवीय भारत के निर्माण के हिमायती थे। चंद्रशेखर को समतावादी समाज के निर्माण का पूरा भरोसा था, इसीलिए शायद मील के पत्थरों की अनदेखी करना उनकी प्रवृत्ति बन गई थी।
चंद्रशेखर उन विरले राजनेताओं में थे जिनके लिए राजनीति सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का विज्ञान और समाधान का शास्त्र था। उनका विश्वास था कि राजनीति अभिनय नहीं, बल्कि समय-समय पर कठोर और अलोकप्रिय निर्णय लेने का साहस है। इसलिए उन्होंने कभी भी भीड़ की पसंद के अनुसार अपने विचार नहीं बदले। वे मानते थे कि सच्चा नेता वही है, जो लाखों लोगों के सामने यह कहने का साहस रखे कि “तुम सब गलत हो।”
उनका जीवन संघर्ष, असफलताओं और निरंतर आत्ममंथन का पर्याय था। उनके व्यक्तित्व को ये पंक्तियाँ अत्यंत सार्थक ढंग से अभिव्यक्त करती हैं—
“बहुत बार टूटे, बहुत बार बिखरे,
बहुत बार साहिल से टकरा गए।
तलाश-ए-तलब में वो लज्ज़त मिली है,
दुआ कर रहा हूँ वो मंज़िल न आए।”
उनका मानना था कि राजनीति समस्याओं के समाधान का विज्ञान है। उन्होंने हर ऐसी उपजी परिस्थिति का डटकर मुकाबला किया। तमाम दुश्वारियों के बावजूद भी उन्होंने समस्याओं के समाधान के शोध और खोज को विराम नहीं दिया। समय-समय पर उन्होंने देश को आगाह करने के उद्देश्य से ऐसा करके दिखाया भी।
समाजवादी संस्कारों की पाठशाला
चंद्रशेखर की राजनीतिक यात्रा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रारंभ हुई। वहाँ उन्हें भारतीय समाजवाद के महान पुरोधा आचार्य नरेंद्र देव का सान्निध्य प्राप्त हुआ। आचार्य नरेंद्र देव ने 1934 में समाजवादी आंदोलन की नींव डाली थी। आचार्य जी ने अपने सभी समाजवादी साथियों को एकजुट करके, गांधी जी की सहमति से ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ की स्थापना कर भारतीय राजनीति को वैचारिक दिशा दी। उन्हीं की प्रेरणा से चंद्रशेखर ने अपना शोधकार्य छोड़कर संगठन निर्माण का मार्ग चुना और बलिया से लेकर उत्तर प्रदेश तक समाजवादी आंदोलन के प्रखर संगठनकर्ता बने। चंद्रशेखर जी आचार्य नरेंद्र देव जी से बनारस में मिले थे और वहीं से उनके जीवन को यह नई दिशा मिली। बाद में जब यह धारा कांग्रेस से अलग हुई, तो सोशलिस्ट पार्टी बनी। कालांतर में सोशलिस्ट पार्टी ने ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ का नाम धारण किया। आगे चलकर जब प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में बिखराव हुआ, तब डॉ. राममनोहर लोहिया ने पुनः एक पार्टी का गठन किया जिसका नाम ‘सोशलिस्ट पार्टी’ रखा। इस पूरे घटनाक्रम के बीच चंद्रशेखर जी ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में पहले इलाहाबाद और फिर बलिया जिले के मंत्री पद की जिम्मेदारी निभाई। चंद्रशेखर जी ने आचार्य जी के कुशल नेतृत्व में काम करना स्वीकार किया, जो उनके जीवन का पहला और बड़ा राजनीतिक फैसला था। उनकी कार्यकुशलता को देखते हुए एक साल के भीतर ही उन्हें लखनऊ बुलाया गया और पार्टी के प्रदेश मंत्री की जिम्मेदारी सौंप दी गई। आचार्य नरेंद्र देव उनके केवल राजनीतिक गुरु ही नहीं थे, बल्कि जीवन-दृष्टि के निर्माता भी थे। चंद्रशेखर के भीतर जो वैचारिक स्पष्टता, त्याग, सादगी और संघर्षशीलता दिखाई देती है, वह उसी संस्कार की देन थी।
यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि मनुष्य कुछ जन्मजात गुणों के साथ पैदा होता है, लेकिन अनुकूल वातावरण मिलने पर ही वे गुण असाधारण प्रतिभा का रूप धारण करते हैं। चंद्रशेखर जैसी नैसर्गिक प्रतिभा को आचार्य नरेंद्र देव जैसा बौद्धिक और नैतिक वातावरण मिला, जिससे एक असाधारण जननेता का निर्माण हुआ। आज का आनुवंशिकी विज्ञान भी इस बात को सिद्ध करता है कि प्रतिभाएँ अपने अंदर की विशिष्टताओं को अंकुरित करने के लिए अनुकूल वातावरण की खोज करती हैं, और तदनुरूप परिवेश प्राप्त होने पर अपना विकास पथ तय करती हैं।
चंद्रशेखर जी ने आचार्य जी से प्रेरणा लेकर एक ‘मोहभग्न आदर्शवादी’ नेता की ख्याति अर्जित की। यह तय करना बड़ा मुश्किल है कि आचार्य जी ने चंद्रशेखर जी की खोज की या चंद्रशेखर जी ने आचार्य जी की प्रतिभा को अंगीकार किया, असल में ये दोनों ही तथ्य अपनी-अपनी जगह पूरी तरह तर्कसंगत हैं।
सिद्धांतों के प्रति समर्पण
चंद्रशेखर जी मानते थे कि समाजवाद केवल सत्ता परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि विचार परिवर्तन का आंदोलन है। इसलिए वे वैचारिक संघर्ष के माध्यम से समाजवादी धारा को मजबूत करने के पक्षधर रहे।
उनका मानना था कि वैचारिक प्रवाह मनुष्य के मस्तिष्क में हमेशा हिलोरें लेता रहता है। समय की आवश्यकता और काल की विवशता कभी-कभी वैचारिक धाराओं के प्रवाह को मोड़ने या अवरुद्ध करने का प्रयास करती है, लेकिन जैसे ही यह मजबूरी खत्म होती है, धाराएँ अपने दुगुने वेग से प्रवाहित होने लगती हैं। चंद्रशेखर जी का स्पष्ट मत था कि मानव चेतना को कभी बंदिनी नहीं बनाया जा सकता और इंसानी परिंदे को कभी कफ़स (पिंजरे) में कैद नहीं किया जा सकता।
चंद्रभानु गुप्ता की सलाह की अनदेखी
इतिहास बताता है कि उत्तर प्रदेश में आचार्य जी के परम शिष्य चंद्रभानु गुप्ता जी ने समाजवादी नेताओं को सलाह दी थी कि हम लोगों को कांग्रेस में रहकर ही काम करना चाहिए। उनका तर्क था कि कांग्रेस के साथ रहकर ही हम समाजवादियों ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी है और आज़ादी पाने का सारा श्रेय देश की जनता कांग्रेस को दे रही है। इसलिए हम अपना अस्तित्व तभी बचा और बढ़ा सकते हैं बशर्ते हम कांग्रेस के साथ मिलजुल कर काम करें। देखा जाए तो शायद वे अपनी जगह सही थे। उन्होंने यह संभावना भी व्यक्त की थी कि नेहरू युग के बाद देश में स्वाभाविक रूप से समाजवादी युग का आरंभ हो जाएगा। परंतु उस समय उनकी बात स्वीकार नहीं की गई। इस प्रसंग को चंद्रभानु गुप्ता जी ने अपनी जीवनी ‘मेरा सफर कभी रुका नहीं, कभी झुका नहीं’ में प्रमुखता से उद्धृत किया है।
समाजवादी आंदोलन के बिखराव में योगदान
नियति सबसे अधिक ताकतवर होती है। केरल की थानु पिल्लई की कम्युनिस्ट सरकार से समर्थन वापसी के सवाल की आड़ में डॉ. राममनोहर लोहिया ने एक बार फिर पार्टी तोड़कर सोशलिस्ट पार्टी का पुनर्गठन किया, जबकि असली मतभेद ‘गैर-कांग्रेसवाद’ जैसी रणनीति को लेकर था। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के कुछ नेता अपने कार्यक्रमों के आधार पर संगठन को मजबूत कर वैचारिक विमर्श के ज़रिए सत्ता पर काबिज होने की परिकल्पना कर रहे थे,जबकि डॉ. लोहिया के समर्थक यह मानते थे कि हमें पूरे विपक्ष को एक न्यूनतम समयबद्ध कार्यक्रम के आधार पर एकजुट करना चाहिए, वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहिए और कांग्रेस को सत्ता से हटाकर समाजवादी कार्यक्रम चलाने का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। फिलहाल, दलों की मौलिक प्रकृति को इस अभियान से अलग रखा गया था।
चंद्रशेखर जी उन गिने-चुने लोगों में से थे जो अपने बल पर वैचारिक आंदोलन के ज़रिए या समान विचारधाराओं को ध्रुवीकृत कर समाजवादी धारा चलाने के पक्षधर थे। वे निरंतर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का संचालन करते रहे। इसी का परिणाम था कि 1962 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के 38 तथा सोशलिस्ट पार्टी के 24 विधायक चुनकर आए थे।
राज्यसभा से “युवा तुर्क” तक का सफर
1962 में राज्यसभा के लिए उनके चयन की कहानी भारतीय राजनीति की शुचिता और नैतिकता का एक दुर्लभ उदाहरण है। आज़मगढ़ के गांधी कहे जाने वाले बाबू विश्राम राय जी ने चंद्रशेखर जी की अद्भुत नेतृत्व क्षमता और उनकी वक्तृत्व कला (भाषण शैली) को देखते हुए स्वयं अपना नाम वापस ले लिया और चंद्रशेखर जी को राज्यसभा भेजने का प्रस्ताव रख दिया। आज के अवसरवादी राजनीतिक परिवेश में ऐसी कृत्य की कल्पना करना भी कठिन है, क्योंकि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने पहले बाबू विश्राम राय जी को ही राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया था। इस घटना के बाद चंद्रशेखर जी के राजनीतिक कद में बहुत बड़ा उछाल आया और उस दौर की सैद्धांतिक राजनीति की साफ झलक दिखाई पड़ी।
इसी दौरान पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने एक प्रस्ताव पारित कर संघीय सरकार से मांग की कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष का पद विपक्ष के हिस्से में रहना चाहिए, ताकि योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन में विपक्ष की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जा सके। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आचार्य जी के उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद पर समाजवादी नेता अशोक मेहता को नामित किया। मेहता जी ने नेहरू सरकार का यह प्रस्ताव स्वीकार कर पद ग्रहण कर लिया, जिसे पार्टी ने अनुशासनहीनता माना और उन्हें निष्कासित कर दिया। तब चंद्रशेखर जी ने सिद्धांतों के आधार पर अशोक मेहता का समर्थन किया, जिसके परिणामस्वरूप वे स्वयं भी पार्टी से निलंबित कर दिए गए। कुछ समय तक वे निर्दलीय सांसद रहे और अंततः 1964 में कांग्रेस में शामिल हो गए। 1967 में कांग्रेस ने चंद्रशेखर जी को पुनः राज्यसभा भेजा, जहाँ वे संसदीय दल के सर्वसम्मति से महासचिव बनाए गए।
कांग्रेस में रहते हुए भी उन्होंने अपने समाजवादी अभियान को कभी नहीं छोड़ा। उनके प्रखर नेतृत्व और वैचारिक प्रभाव के कारण कांग्रेस के भीतर भी समाजवाद अंकुरित होने लगा था और पार्टी एक समाजवादी स्वरूप में ढलने लगी थी। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स की समाप्ति और औद्योगिक नीति में बदलाव जैसे ऐतिहासिक निर्णयों के पीछे चंद्रशेखर जी जैसे विचारशील नेताओं का ही महत्वपूर्ण योगदान था।
अखिल भारतीय कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार करने के बाद, जब उन्हें इंदिरा गांधी से व्यक्तिगत रूप से मिलने का निमंत्रण मिला, तो मुलाक़ात के दौरान इंदिरा जी ने बिना किसी संदर्भ के उनसे एक गंभीर प्रश्न पूछा—”आप समाजवादी होते हुए कांग्रेस में क्यों आए?” चंद्रशेखर जी ने अपने चिरपरिचित बेबाक अंदाज़ में कहा—”कांग्रेस को समाजवादी बनाने आया हूँ।” इंदिरा जी ने प्रतिप्रश्न किया—”और अगर कांग्रेस को समाजवादी नहीं बना पाए तो?” श्री शेखर ने बड़ी निडरता के साथ कहा था—”तो कांग्रेस को तोड़ दूँगा।” इंदिरा जी ने चकित होकर कहा—”ध्यान रहे, आप यह बात मुझसे कह रहे हैं।” इस पर चंद्रशेखर जी तपाक से बोले—”सवाल आपका है, तो जवाब भी तो आप ही को मिलेगा।” इसी दौर में वे और उनके समाजवादी साथी कांग्रेस में अपनी अमिट धाक जमा चुके थे और चंद्रशेखर जी पूरे देश में “युवा तुर्क” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
सत्ता से अधिक सिद्धांत
वे चाहते तो इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में बेहद महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकते थे, किंतु सत्ता उनकी महत्वाकांक्षा कभी नहीं रही। संगठन, विचार और जनसंवाद ही उनकी असली शक्ति थे। पार्टी संगठन पर उनके प्रभाव का आश्चर्यजनक प्रदर्शन तब हुआ, जब पूँजीपति बिड़ला घराने के प्रखर विरोध के कारण उन्हें प्रधानमंत्री की पसंदीदा सूची से बाहर कर दिया गया। इसके बावजूद, उन्होंने शिमला के राष्ट्रीय सम्मेलन में कांग्रेस के एक अत्यंत दिग्गज नेता को हराकर कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के सदस्य का चुनाव जीत लिया। यह कांग्रेस संगठन के भीतर उनके राष्ट्रव्यापी व्यक्तित्व और लोकप्रियता का प्रभाव था। संभवतः इसी स्वतंत्र प्रभाव के कारण इंदिरा जी उन्हें अपने लिए एक चुनौती मानने लगी थीं और धीरे-धीरे उनकी सलाह को दरकिनार करने लगीं। परंतु चंद्रशेखर जी का व्यक्तित्व निराला था,वे अपने विचार प्रकट करने में कभी संकोच नहीं करते थे, सामने वाला व्यक्ति कितना भी बड़ा हो, इसका उनके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।
जेपी आंदोलन और सत्ता के बीच सेतु
जब इंदिरा गांधी और जयप्रकाश नारायण (जेपी) के बीच टकराव चरम पर पहुँचा, तब चंद्रशेखर जी ने दोनों को अलग-अलग पत्र लिखकर समझौते और संवाद का आग्रह किया। इंदिरा गांधी से उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण देश की नैतिक शक्ति के प्रतीक हैं, वे लोकनेता और संत हैं, उनसे टकराव आत्मघाती होगा,सरकार को उनके सुझावों पर गौर करना चाहिए ताकि इस ऐतिहासिक टकराव को टाला जा सके और राष्ट्र निर्माण में ‘राज्य शक्ति’ व ‘लोक शक्ति’ का समन्वय हो सके।
वहीं, दूसरी ओर उन्होंने अपने पत्र के ज़रिए जयप्रकाश नारायण जी को भी सावधान किया कि उनके आंदोलन में कुछ ऐसे लोग और दल भी शामिल हो गए हैं जिनकी निष्ठा “संपूर्ण क्रांति” के प्रति नहीं, बल्कि अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों के प्रति है। ऐसे लोग आपकी ओट में अपना स्वार्थ तो सिद्ध कर लेंगे, किंतु संपूर्ण क्रांति का महान मिशन अधूरा रह जाएगा, अतः आपको इंदिरा जी से समझौते का रास्ता अपनाना चाहिए। जयप्रकाश जी ने श्री शेखर के सुझावों पर गंभीरता से ध्यान दिया, पर इंदिरा गांधी ने अपने कुछ नजदीकी सलाहकारों के उकसावे में आकर जेपी के सुझावों को तिरस्कृत कर दिया और टकराव का रास्ता चुना।
इस बात का रहस्योद्घाटन खुद श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल समाप्त होने के बाद चंद्रशेखर जी से हुई अपनी पहली मुलाक़ात में किया था। जब चंद्रशेखर जी ने उनसे पूछा कि “आप इस सीमा तक क्यों चली गईं?”, तो उन्होंने स्वीकार किया था कि “मुझे कुछ लोगों ने गलत राय दे दी थी।”
आपातकाल के दौरान जयप्रकाश जी के साथ चंद्रशेखर जी को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। नियति का खेल देखिए जिन्हें चंद्रशेखर जी पसंद करते थे (यानी कांग्रेस नेतृत्व), वे उन्हें जेल में डाल रहे थे और जिनके वैचारिक तौर-तरीकों से वे सहमत नहीं थे (विपक्ष), उनके साथ वे जेल में गलबहियां करने को विवश थे। कहा जाता है कि उनकी गिरफ्तारी के बाद एक उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी द्वारा उन्हें एक गुप्त नंबर दिया गया और निवेदन किया गया कि आप इस नंबर पर बात कर लीजिए। फोन मिलाने पर पता चला कि दूसरी तरफ स्वयं इंदिरा गांधी बोल रही थीं। इंदिरा जी ने चंद्रशेखर जी के सामने आपातकाल का समर्थन करने और संपूर्ण क्रांति आंदोलन का विरोध करने का प्रस्ताव रखा, और बदले में अपनी कैबिनेट में दूसरे नंबर का स्थान देने की पेशकश की। यह सुनते ही चंद्रशेखर जी ने अत्यंत क्रोध में फोन रख दिया और सत्ता के शिखर के बजाय जेल की कोठरी को चुना। यदि वे चाहते तो अन्य अवसरवादी साथियों की तरह समझौता कर सकते थे, पर अब सवाल केवल पद का नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र को बचाने का था। तानाशाही लोकतंत्र को निगलने को बेताब थी और उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के कठिन मार्ग को चुना।
वे जब चाहते चाहे वह इंदिरा जी का दौर हो, मोरारजी भाई का समय हो या वी.पी. सिंह का प्रधानमंत्रित्व काल हो देश के मंत्रिमंडल में शामिल हो सकते थे, पर तत्कालीन राजनीति की विकृतियों से उपजा उनका ‘मोहभग्न आदर्शवादी चरित्र’ उनकी प्रकृति में ऐसा रच-बस गया था कि वे सिद्धांतों की बलि देकर सत्ता सुख भोगने के लिए कभी तैयार नहीं हुए। समय ने यह सिद्ध किया कि उनकी आशंकाएँ और उनके सिद्धांत पूरी तरह निराधार नहीं थे।
मोहभग्न आदर्शवाद की महान परंपरा
स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जिन्हें ‘मोहभग्न आदर्शवाद’ की सर्वोच्च श्रेणी में रखा जा सकता है:
सोशलिस्टों का सामूहिक इस्तीफा:
पहली घटना तब हुई जब आचार्य नरेंद्र देव के नेतृत्व में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के विधायकों ने नैतिक आधार पर विधानसभा से सामूहिक इस्तीफा दे दिया, महज़ इसलिए क्योंकि वे कांग्रेस के टिकट और उसके चुनाव निशान पर जीतकर आए थे और अब उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बना ली थी। उस समय देश में कोई दलबदल विरोधी कानून अस्तित्व में नहीं था और न ही कोई वैधानिक विवशता थी, फिर भी उन्होंने नैतिकता की एक अप्रतिम मिसाल कायम की।
चंद्रभानु गुप्ता का त्यागपत्र:
दूसरी घटना उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता से जुड़ी है। चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में ‘जन कांग्रेस’ (जो गुप्ता जी की सरकार का समर्थन कर रही थी) के सदस्य अचानक विधानसभा के अंदर सत्ता पक्ष की तरफ से उठकर विपक्ष के खेमे में जाकर बैठ गए। सदस्यों के केवल स्थान बदलने मात्र से खुद को अल्पमत में मानकर गुप्ता जी ने तुरंत मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। उस समय भी उन पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं थी, वह चाहते तो जोड़-तोड़ कर अपने लिए सदस्यों का समर्थन जुटा सकते थे और अपनी सरकार चला सकते थे, पर उन्होंने ऐसा करना उचित नहीं समझा। विपरीत परिस्थितियों में चंद्रभानु गुप्ता द्वारा मुख्यमंत्री पद छोड़ देना भी उसी उच्च नैतिक चरित्र को प्रदर्शित करता है।
प्रधानमंत्री पद का त्याग:
चंद्रशेखर जी के जीवन का सबसे बड़ा उदाहरण उनका प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा है। कांग्रेस ने औपचारिक रूप से समर्थन वापस नहीं लिया था, किंतु हरियाणा के दो पुलिसकर्मियों द्वारा राजीव गांधी की जासूसी के विवाद को लेकर सदन का बहिष्कार कर उन्हें झुकाने की कोशिश ज़रूर की थी। चंद्रशेखर जी झुके नहीं, उन्होंने बिना क्षण गँवाए प्रधानमंत्री पद का त्याग कर दिया। त्यागपत्र देने से ठीक पहले राजीव गांधी ने उन्हें सदन से बाहर आकर बातचीत करने का न्योता भी भेजा था और बाद में पुनः सरकार बनाने का प्रस्ताव भी दिया, किंतु चंद्रशेखर जी का ऐतिहासिक उत्तर था “चंद्रशेखर दिन में तीन बार अपना विचार नहीं बदलता।”
भारतीय राजनीति में सिद्धांतों के लिए देश के सर्वोच्च पद का इस तरह परित्याग करने वाले उदाहरण अत्यंत दुर्लभ हैं। ये घटनाएँ भारतीय राजनीति की नैतिक ऊँचाइयों के शाश्वत उदाहरण हैं।
स्पष्टवादिता ही उनका आभूषण थी
चंद्रशेखर जी राजनीति और कूटनीति की आड़ लेकर अपने विचारों को कभी छिपाते नहीं थे। वे जो सोचते थे, वही पूरी प्रखरता से कहते थे। इसी कारण उनके मित्र भी कभी-कभी असहज हो जाते थे, परंतु घोर विरोधी भी मन ही मन उनका अगाध सम्मान करते थे। आपातकाल से पूर्व कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की एक बैठक में जब उनके विचारों का तीखा विरोध हुआ, तब वरिष्ठ कांग्रेस नेता द्वारिका प्रसाद मिश्र ने कबीर के दोहे उद्धृत करते हुए चंद्रशेखर जी के व्यक्तित्व को सराहा था—
“चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जाको कछु न चाहिए, सोई शाहन के शाह॥”
और फिर—
“खुल खेलो संसार में, बाँधि सके न कोय।
घाट-जकाती क्या करे, जो सिर बोझ न होय॥”
इन दो पंक्तियों में चंद्रशेखर जी के समूचे फकीराना व्यक्तित्व का सार समाहित है। मिश्र जी ने कबीर के माध्यम से चंद्रशेखर जी के संपूर्ण चरित्र पर जो प्रकाश डाला, उससे बड़ी और सटीक व्याख्या कोई दूसरी नहीं हो सकती।
आज की राजनीति के लिए संदेश
आज राजनीति का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल सत्ता प्रबंधन, जनसंपर्क, आत्मप्रचार, जोड़-तोड़ और नग्न अवसरवाद तक सीमित दिखाई देता है। ऐसे तिमिर काल में चंद्रशेखर जैसे राजनेता यह याद दिलाते हैं कि राजनीति मूलतः समाज की विसंगतियों और बुराइयों से संघर्ष करने, मानवीय मूल्यों की रक्षा करने और आम इंसान को एक बेहतर भविष्य देने का माध्यम है।
लोकतंत्र में सबकी राय महत्वपूर्ण होती है, जिसे सुना और समझा जाना चाहिए। नेता का अनुभव, व्यावहारिक ज्ञान और राजनीतिक समझ सामान्य से भिन्न होती है, और अंततः थोड़े-बहुत समन्वय के साथ सभी संगठनों में नेता के प्रस्ताव को सर्वानुमति मिल ही जाती है, चंद्रशेखर जी के साथ भी ऐसा ही था। पर उन्होंने कभी भी ‘राजनीतिक विवशता’ या ‘समय की मांग’ जैसे शब्दों की आड़ में अपने विचारों के औचित्य को सिद्ध करने का कपटपूर्ण प्रयास नहीं किया। वे साफ-साफ बात करने के आदी थे, उनकी बातचीत में कोई लाग-लपेट या छल नहीं होता था। यही स्पष्टवादिता उनके व्यक्तित्व की वह खासियत थी, जो समय के साथ उसे और निखारती चली गई।
आजकल अधिकांश राजनेताओं और आम जनता की नज़र में भी राजनीति केवल सत्ता हासिल करने की एक अंधी दौड़ मात्र रह गई है। इसके लिए समाज में निम्नतम दर्जे का व्यवहार, पैंतरेबाज़ी, हेर-फेर करने की क्षमता, झूठ बोलना और जनता को भ्रमित करना ही मुख्य योग्यता मान ली गई है। ऐसे नेता आलोचनाओं और निंदा की परवाह किए बिना किसी भी हद तक जाने से नहीं चूकते।
लेकिन चंद्रशेखर जी जैसे महापुरुषों के लिए राजनीति जीवन में मौजूद सभी सामाजिक बुराइयों से लड़कर सद्गुणों की शक्तियों को बढ़ावा देने का एक पवित्र माध्यम थी। बुराई और अच्छाई के बीच का यह अनवरत संघर्ष ही उन्हें जीवन के सभी कष्टों, उतार-चढ़ावों और असुविधाओं को हँसते-हँसते सहन करने का दृढ़ संकल्प देता था। यह एक निरंतर चलने वाला आत्म-संघर्ष है, जो मनुष्य में पदलिप्सा के बजाय परम संतोष की भावना पैदा करता है। साथ ही, यह एक निश्चित विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता, नैतिक मूल्यों का पालन और बदतर से बदतर परिस्थितियों में भी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने की शक्ति देता है।
चंद्रशेखर जी के लिए राजनीति आत्म-संघर्ष थी, आत्मप्रचार नहीं; जनसेवा थी, पदलोलुपता नहीं; विचार था, व्यापार नहीं।जननायक चंद्रशेखर भारतीय लोकतंत्र के उन दुर्लभ नक्षत्रों में से थे जिनके लिए सिद्धांत, नैतिकता और जनहित सत्ता के सुख से कहीं ऊपर थे। वे एक ऐसे सच्चे “मोहभग्न आदर्शवादी” थे, जिन्होंने जीवनभर समझौतों की सहूलियत भरी राजनीति नहीं, बल्कि मूल्यों की तपस्या वाली राजनीति की। उनकी जन्मशती के अवसर पर उन्हें स्मरण करना केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस विलुप्त होती नैतिक परंपरा को पुनर्जीवित करने का संकल्प है, जिसकी आज देश को पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है। राजनीति की नई फसल को चंद्रशेखर जी के इन गौरवशाली वैचारिक प्रसंगों से गहरी सीख लेनी चाहिए।
यही मेरे प्रिय नेता, जननायक चंद्रशेखर के प्रति सच्ची और साधिकार श्रद्धांजलि है।
लेखक परिचय:
सूर्य कुमार
चंद्र शेखर जी के बेहद करीबी गांधीनिष्ठ समाजवादी एवं लोकतंत्र सेनानी हैं।
(आप वर्ष 1977 से लेकर चंद्रशेखर जी के जीवन के अंतिम समय तक निरंतर उनके साथ रहे और उनके राजनीतिक व सामाजिक सफर के साक्षी रहे।)
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