“दादा धर्माधिकारी के जीवन-दर्शन में भारतीयता का बोध एवं गांधी-दर्शन”

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Acharya Dada Dharmadhikari

Priya Yadav

— प्रिया कुमारी —

भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रख्यात गांधीवादी चिंतक एवं गांधी-विचार के प्रमुख व्याख्याकार दादा धर्माधिकारी की जयंती के अवसर पर विश्वनिधन सेंटर फॉर एशियन ब्लॉसमिंग एवं समाजवादी समागम के तत्वाधान में एक विशेष ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन रणधीर कुमार गौतम ने किया।

अपने स्वागत उद्बोधन में रणधीर कुमार गौतम ने दादा धर्माधिकारी के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय देते हुए कहा कि वे केवल स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी ही नहीं, बल्कि गांधी-विचार को जन-जन तक पहुँचाने वाले अग्रणी विचारकों में थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक जेल यात्राओं तथा स्वतंत्रता के पश्चात गांधी की प्रेरणा से संचालित विभिन्न रचनात्मक एवं सामाजिक परिवर्तन आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि विनोबा भावे के पश्चात दादा धर्माधिकारी को गांधी-दर्शन का सबसे गंभीर एवं प्रामाणिक व्याख्याकार माना जाता है।

कार्यक्रम में अध्यक्ष के रूप में वरिष्ठ गांधीवादी कार्यकर्ता सुज्ञान मोदी उपस्थित रहे। उनका परिचय देते हुए संचालक ने कहा कि उनका संपूर्ण सार्वजनिक जीवन अहिसा दर्शन ,गांधी दर्शन और सर्वोदय समाजवादी धारा की वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित रहा है। वे श्रीमद राजचन्द्र और गांधी से प्राप्त जीवन-मूल्यों और रचनात्मक कार्यों के संवाहक हैं।

मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध गांधीवादी एवं सर्वोदय कार्यकर्ता शुभमूर्ति उपस्थित रहे। उनके परिचय में बताया गया कि वे जयप्रकाश आंदोलन के दौरान गठित ‘छात्र युवा संघर्ष वाहिनी’ के प्रथम संयोजक रहे हैं तथा विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण की वैचारिक परंपरा के अध्येता हैं। उन्होंने सर्वोदय और समाजवादी धारा के अंतर्संबंधों को गहराई से समझने और समझाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनका संपूर्ण जीवन रचनात्मक कार्यक्रमों, सामाजिक आंदोलनों तथा अहिंसक परिवर्तन के लिए समर्पित रहा है। वे बोधगया आंदोलन, बिहार आंदोलन तथा अनेक सामाजिक अभियानों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे और गांधीवादी मूल्यों के प्रसार में उनका विशिष्ट योगदान रहा है।

कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता के रूप में महाराष्ट्र के पूर्व न्याय मूर्ति सत्यरंजन धर्माधिकारी उपस्थित रहे। उनका परिचय देते हुए बताया गया कि वे न्यायिक एवं गांधी विचार परंपरा दोनों परंपराओं से से जुड़े रहे हैं। वे धर्माधिकारी परिवार की समृद्ध वैचारिक विरासत के संवाहक हैं तथा राष्ट्रीय आंदोलन, गांधी चिंतन और समकालीन सामाजिक प्रश्नों पर उनकी गहरी समझ है।

संचालक ने बताया कि कार्यक्रम में देशभर से अनेक गांधीवादी कार्यकर्ता, सर्वोदय परिवार के सदस्य, छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथी तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी एवं शोधार्थी ऑनलाइन जुड़े हुए थे। हजारों की संख्या में श्रोताओं ने फेसबुक लाइव के माध्यम से भी कार्यक्रम को लाइव देख रहे थे।

स्वागत भाषण के अंत में रणधीर कुमार गौतम ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का अभिनंदन करते हुए मुख्य वक्ता शुभमूर्ति जी से अनुरोध किया कि वे निर्धारित विषय “दादा धर्माधिकारी के जीवन-दर्शन में भारतीयता का बोध एवं गांधी-दर्शन” पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करें। इसी के साथ कार्यक्रम के व्याख्यान सत्र का औपचारिक शुभारंभ हुआ।

अपने व्याख्यान के प्रारम्भ में शूभमूर्ति जी ने दादा धर्माधिकारी से अपनी पहली मुलाकात का संस्मरण साझा किया। उन्होंने बताया कि जयप्रकाश नारायण द्वारा गठित तरुण शांति सेना के एक प्रशिक्षण शिविर में उन्हें दादा धर्माधिकारी के व्याख्यान का विवरण लिखने का दायित्व मिला था। उन्होंने कहा कि दादा धर्माधिकारी का प्रत्येक वाक्य अपने आप में एक सूत्र-वाक्य होता था, जिसकी स्वतंत्र व्याख्या की जा सकती थी। उनके भाषण की गहराई ने उन्हें पहली ही भेंट में अत्यंत प्रभावित किया।

शुभमूर्ति जी ने कहा कि दादा धर्माधिकारी के व्यक्तित्व के दो सबसे महत्वपूर्ण आधार मानव-निष्ठा और विचार-निष्ठा थे। उनके अनुसार दादा का विश्वास था कि केवल मनुष्य होना ही सम्मान और समानता का पर्याप्त आधार है। व्यक्ति अमीर हो या गरीब, स्त्री हो या पुरुष, शिक्षित हो या अशिक्षित—प्रत्येक मनुष्य समान आदर और गरिमा का अधिकारी है। यही मानवीय दृष्टि उनके संपूर्ण चिंतन और व्यवहार का मूल आधार थी।

उन्होंने दादा धर्माधिकारी की अद्भुत सरलता और सादगी का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी सादगी किसी प्रकार का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि उनके जीवन-दर्शन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। उनका व्यक्तित्व पूर्णतः पारदर्शी, सहज और आत्मीय था। उनके साथ संवाद करते समय कभी औपचारिकता का अनुभव नहीं होता था। वे प्रत्येक व्यक्ति से मित्रवत व्यवहार करते थे और यही कारण था कि वे विभिन्न आयु, वर्ग और पृष्ठभूमि के लोगों के प्रिय बने रहे।

व्याख्यान का एक महत्वपूर्ण भाग ‘मैत्री’ की अवधारणा पर केन्द्रित रहा। शुभमूर्ति जी ने बताया कि दादा धर्माधिकारी का मानना था कि समाज में वास्तविक समानता तभी स्थापित होगी जब स्त्री और पुरुष के बीच मित्रता का संबंध सामाजिक रूप से स्वीकृत होगा। केवल पारिवारिक संबंधों के आधार पर स्त्री-पुरुष संबंधों को परिभाषित करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने इस विचार को भारतीय समाज में लैंगिक समानता की दिशा में अत्यंत प्रगतिशील दृष्टिकोण बताया। उन्होंने उल्लेख किया कि दादा के व्यक्तित्व से प्रेरित होकर अनेक महिला कार्यकर्ता, विशेषकर विमला ठक्कर, स्वतंत्र वैचारिक पहचान स्थापित करने में सफल हुईं।

शुभमूर्ति जी ने स्पष्ट किया कि दादा धर्माधिकारी को केवल गांधी या विनोबा भावे का व्याख्याकार मानना उचित नहीं होगा। वे स्वयं एक स्वतंत्र चिंतक थे। यद्यपि उनके विचार गांधी और विनोबा के विचारों से अनेक स्तरों पर मेल खाते थे, परन्तु यह समानता अहिंसा और मानवीय मूल्यों के साझा आधार के कारण थी, न कि किसी वैचारिक अनुकरण के कारण। उन्होंने सर्वोदय को किसी संकीर्ण ‘वाद’ में बदलने का सदैव विरोध किया और स्वतंत्र चिंतन को महत्व दिया।

उन्होंने कहा कि दादा धर्माधिकारी विचारों की शक्ति में गहरा विश्वास रखते थे। उनका आग्रह था कि सर्वोदय आंदोलन का प्रत्येक कार्यकर्ता किसी भी रचनात्मक कार्यक्रम—जैसे भूदान, पदयात्रा या ग्राम निर्माण—में भाग लेने से पहले उसके दार्शनिक आधार को समझे। वे स्वयं विनोदपूर्वक कहते थे कि वे ‘कर्मवीर’ नहीं, बल्कि ‘बातवीर’ हैं, क्योंकि उनके अनुसार विचार ही समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली माध्यम है।

लोकतंत्र पर अपने विचार रखते हुए शुभमूर्ति जी ने बताया कि दादा धर्माधिकारी लोकतंत्र को केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मूल्य मानते थे। उनके अनुसार प्रत्येक नागरिक को समान मताधिकार मिलना इस बात का प्रतीक है कि प्रत्येक मनुष्य समान गरिमा का अधिकारी है। उन्होंने लोकनीति को भी आध्यात्मिक आधार पर स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया तथा कहा कि प्रेम, करुणा और नैतिकता के बिना लोकतंत्र जीवंत नहीं रह सकता।

व्याख्यान में बिहार आंदोलन और आपातकाल का भी उल्लेख किया गया। शिवमूर्ति जी ने बताया कि दादा धर्माधिकारी, जयप्रकाश नारायण और विनोबा भावे—दोनों के अत्यंत निकट थे, किन्तु उन्होंने अपनी वैचारिक स्वतंत्रता कभी नहीं छोड़ी। जब आपातकाल के दौरान विनोबा भावे के ‘अनुशासन पर्व’ कथन का राजनीतिक दुरुपयोग किया गया, तब दादा धर्माधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह ‘अनुशासन पर्व नहीं, बल्कि आतंक पर्व’ है। इस साहसिक हस्तक्षेप ने लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर अनेक लोगों को नई वैचारिक स्पष्टता प्रदान की।

शुभमूर्ति जी ने अनेक संस्मरणों के माध्यम से दादा धर्माधिकारी की संवेदनशीलता, विनम्रता और आत्मीयता को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि रेल यात्रा के दौरान प्रथम श्रेणी में बैठने के बावजूद दादा बार-बार अपने साथियों का हालचाल लेने के लिए सामान्य डिब्बे तक चले आते थे। वे अपने व्यवहार से समानता और आत्मीयता का संदेश देते थे।

उन्होंने यह भी बताया कि दादा धर्माधिकारी ने महात्मा गांधी के आग्रह पर संविधान सभा के लिए चुनाव अवश्य लड़ा, किन्तु उसके बाद उन्होंने कभी सत्ता की राजनीति का मार्ग नहीं अपनाया। उनका विश्वास था कि वास्तविक परिवर्तन जनता को संगठित और सशक्त बनाने से आएगा। इस संदर्भ में उन्होंने गांधीजी की अंतिम इच्छा—’लोक सेवक संघ’—का उल्लेख करते हुए कहा कि दादा धर्माधिकारी ने अपने पूरे जीवन में इसी आदर्श को व्यवहार में उतारा।

अपने व्याख्यान के अंतिम भाग में शुभमूर्ति जी ने दादा धर्माधिकारी से अपनी अंतिम मुलाकात का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जीवन के अंतिम दिनों में भी दादा भारतीय युवाओं के भविष्य, नैतिक नेतृत्व और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर अत्यंत चिंतित थे। उनका विश्वास था कि विचारों के प्रति निष्ठा और मनुष्य के प्रति करुणा ही भारत के भविष्य का आधार बन सकती है।

अंत में शुभमूर्ति जी ने कहा कि दादा धर्माधिकारी आज भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु उनके विचार, उनका साहित्य और उनका जीवन-दर्शन आज भी सामाजिक कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों और शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर रहा है। उन्होंने सभी से दादा धर्माधिकारी के साहित्य का अध्ययन करने तथा उनके मानवीय, लोकतांत्रिक और अहिंसक जीवन-दर्शन को अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में अपनाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम का समापन अध्यक्षीय उद्बोधन तथा सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। यह व्याख्यान दादा धर्माधिकारी के व्यक्तित्व और विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी पहल सिद्ध हुआ।

सत्यरंजन धर्माधिकारी का उद्बोधन : दादा धर्माधिकारी का मानवीय जीवन-दर्शन और समकालीन प्रासंगिकता

मुख्य वक्तव्य के उपरांत कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता सत्यरंजन धर्माधिकारी ने दादा धर्माधिकारी के व्यक्तित्व और विचारों पर अत्यंत आत्मीय एवं प्रेरक उद्बोधन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शुभमूर्ति जी जैसे अनेक सर्वोदय कार्यकर्ताओं को दादा धर्माधिकारी अपने विस्तारित परिवार का सदस्य मानते थे। यही कारण है कि दादा धर्माधिकारी के निधन के चार दशक से अधिक समय बीत जाने तथा उनकी जयंती मनाए जाने के बावजूद आज भी देशभर के लोग उनके विचारों को जानने और समझने के लिए उत्सुक रहते हैं। यह उनके जीवन और विचारों की स्थायी प्रासंगिकता का प्रमाण है।

उन्होंने कहा कि दादा धर्माधिकारी का चिंतन किसी संस्था, संगठन या विचारधारा तक सीमित नहीं था। उनके चिंतन का केंद्र केवल मनुष्य और मनुष्यता थी। वे मानते थे कि किसी भी समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है जब सामान्य नागरिक को सम्मान और गरिमा का स्थान मिले। इसी कारण वे स्वयं को किसी विशेष उपाधि या पहचान से नहीं जोड़ते थे। वे केवल “दादा धर्माधिकारी” के रूप में पहचाने जाना चाहते थे। उनका विश्वास था कि भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में ” जागरूक नागरिक” होना ही सबसे बड़ा सम्मान है।

सत्यरंजन धर्माधिकारी ने कहा कि दादा धर्माधिकारी ने महात्मा गांधी के उस मूल संदेश को जीवनभर आगे बढ़ाया, जिसमें सामान्य व्यक्ति की शक्ति और उसकी भागीदारी को स्वराज का आधार माना गया है। गांधीजी का विश्वास था कि स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब समाज का साधारण व्यक्ति उसके केंद्र में होगा। दादा धर्माधिकारी ने इसी विचार को अपने सार्वजनिक जीवन और सामाजिक कार्यों में निरंतर अभिव्यक्ति दी।

उन्होंने वर्तमान समय के युवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी प्रायः “पोस्ट, पे और पैकेज” जैसी उपलब्धियों को ही सफलता का मानदंड मानती है, जबकि दादा धर्माधिकारी का जीवन इस धारणा का सशक्त प्रतिवाद प्रस्तुत करता है। उनके पास न कोई पद था, न आर्थिक संपन्नता और न ही किसी प्रकार का वैभव; फिर भी समाज उन्हें आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण करता है। इससे स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके चरित्र, विचार और मानवीय मूल्यों से निर्मित होती है।

अपने पारिवारिक संस्मरणों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि दादा धर्माधिकारी का जीवन अत्यंत सादा, पारदर्शी और अपरिग्रही था। वे धन, संपत्ति अथवा सुविधाओं का संचय नहीं करते थे। यात्रा के दौरान भी वे आवश्यकता से अधिक धन अपने पास नहीं रखते थे और जो राशि किसी ने उनकी सुविधा के लिए रख दी होती, उसे लौटाना अपना नैतिक दायित्व समझते थे। सार्वजनिक परिवहन से यात्रा करना, साधारण जीवन जीना तथा प्रत्येक व्यक्ति के प्रति समान स्नेह रखना उनके स्वभाव का अभिन्न अंग था।

उन्होंने दादा धर्माधिकारी के वैचारिक दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए कहा कि दादा किसी भी विचार पर व्यक्तिगत स्वामित्व के पक्षधर नहीं थे। उनका स्पष्ट मत था कि विचार न गांधी के हैं, न विनोबा के, न जयप्रकाश के और न ही किसी अन्य व्यक्ति के। विचार सार्वभौमिक होते हैं; कोई व्यक्ति उन्हें केवल अभिव्यक्त करता है। यदि किसी विचार को किसी व्यक्ति के नाम से जोड़कर संप्रदाय बना दिया जाए, तो उसकी जीवंतता समाप्त हो जाती है। इसलिए वे विचारों को सदैव प्रवाहमान और संवादशील बनाए रखने पर बल देते थे।

सत्यरंजन धर्माधिकारी ने बताया कि दादा धर्माधिकारी ने जीवनभर जाति, धर्म, लिंग और जन्म पर आधारित भेदभाव का विरोध किया। उन्होंने स्वयं अपने परिवार में जातिगत प्रतीकों को आगे नहीं बढ़ाया और नई पीढ़ी को समानता तथा मानवीय गरिमा के मूल्यों के साथ विकसित करने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि प्रत्येक मनुष्य को केवल मनुष्य के रूप में देखना ही वास्तविक धर्म और मानवता है।

उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि दादा धर्माधिकारी को नई पीढ़ी से अत्यधिक आशा थी। उनका मानना था कि सच्चा युवा वही है जो कठिन परिस्थितियों और अंधकार के बीच भी आशा, साहस और रचनात्मकता बनाए रखे। युवाओं को निराशा, अविश्वास और नकारात्मकता से ऊपर उठकर समाज की चुनौतियों को अवसर के रूप में स्वीकार करना चाहिए। दादा का विश्वास था कि राष्ट्र की समस्याओं का समाधान दोषारोपण से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, सहानुभूति और रचनात्मक पुरुषार्थ से संभव है।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण के विचारों को समझने के लिए देशभर से अनेक लोग दादा धर्माधिकारी के पास मार्गदर्शन प्राप्त करने आते थे। दादा ने इन सभी महान व्यक्तित्वों के विचारों की अत्यंत स्पष्ट, निष्पक्ष और सरल व्याख्या की। उन्होंने कभी स्वयं को “गांधीवादी” कहकर किसी विचारधारा का प्रचारक नहीं माना, बल्कि स्वयं को गांधी के विचारों का विनम्र व्याख्याकार माना।

अपने उद्बोधन के अंतिम चरण में सत्येंद्र धर्माधिकारी ने कहा कि दादा धर्माधिकारी का व्यक्तित्व अत्यंत विनम्र, सौम्य और प्रेमपूर्ण था। वे कभी क्रोधित नहीं होते थे तथा साहित्य, कविता और गीतों में निहित मानवीय संवेदनाओं की सराहना करते थे। उनका विश्वास था कि विचारों का सतत प्रवाह ही समाज को जीवंत बनाए रखता है। इसलिए उन्होंने सभी प्रतिभागियों, विशेषकर युवाओं से आह्वान किया कि वे किसी भी प्रकार की वैचारिक जड़ता से बचें, स्वतंत्र चिंतन को विकसित करें और संवाद की परंपरा को आगे बढ़ाएँ।

अंत में उन्होंने कहा कि दादा धर्माधिकारी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि समाज में विचारों का मुक्त प्रवाह बना रहे, मनुष्यता सर्वोच्च मूल्य बनी रहे और प्रत्येक नागरिक अपने संवैधानिक कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाए। उन्होंने आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे कार्यक्रम नई पीढ़ी को गांधी, दादा धर्माधिकारी तथा भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा के मानवीय मूल्यों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।

कार्यक्रम के अगले चरण में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सत्यरंजन. धर्माधिकारी के प्रेरक वक्तव्य के पश्चात संयोजक डॉ. रणधीर कुमार गौतम ने उनके विचारों पर संक्षिप्त टिप्पणी प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि दादा धर्माधिकारी का संपूर्ण जीवन अनासक्ति और अहं के लोप की गांधीवादी साधना का सजीव उदाहरण था। उन्होंने गांधीजी के आध्यात्मिक चिंतन का उल्लेख करते हुए कहा कि वास्तविक अध्यात्म ‘मैं’ के विलय और संकीर्ण विचारधाराओं से मुक्ति में निहित है। उनके अनुसार दादा धर्माधिकारी इसी वैचारिक मुक्ति को सामाजिक परिवर्तन और क्रांति का आधार मानते थे।

डॉ. रणधीर गौतम ने यह भी बताया कि दादा धर्माधिकारी के महत्वपूर्ण व्याख्यानों एवं उन पर आधारित एक वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) में देशभर के अनेक विद्वानों के विचार संकलित हैं, जिन्हें शीघ्र ही प्रतिभागियों के साथ साझा किया जाएगा। उन्होंने कहा कि दादा धर्माधिकारी ने सत्तर के दशक में जिन सामाजिक, नैतिक और वैचारिक संकटों की ओर संकेत किया था, वे इक्कीसवीं सदी में और अधिक प्रासंगिक तथा गंभीर रूप में सामने आए हैं।

इसके पश्चात कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ गांधीवादी कार्यकर्ता सुज्ञान मोदी ने अध्यक्षीय उद्बोधन प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने छात्र जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए बताया कि उन्हें 1958 से 1960 के बीच दादा धर्माधिकारी के अनेक शिविरों में सहभागी बनने का अवसर प्राप्त हुआ था। उन्होंने कहा कि दादा धर्माधिकारी के लिए भारतीयता कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि उनके जीवन, चिंतन, साधना और व्यवहार का स्वाभाविक स्वरूप थी। उनके अनुसार भारतीयता का वास्तविक आधार सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम, करुणा, सहिष्णुता और समस्त मानवता के प्रति आत्मीयता है।

सुज्ञान मोदी ने स्पष्ट किया कि दादा धर्माधिकारी ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक विश्वदृष्टि के साथ समन्वित किया। उन्होंने उपनिषद, गीता और वेदांत से प्रेरणा ग्रहण करते हुए वैश्विक चिंतकों का भी गंभीर अध्ययन किया, किंतु उनकी वैचारिक जड़ें सदैव भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में प्रतिष्ठित रहीं। उन्होंने कहा कि दादा के लिए किसी भी सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति के आत्मशुद्धि और सात्विक जीवन से होती थी। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान और विनम्रता का अद्भुत संतु


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