— अम्बेदकर कुमार साहु —
“शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं।” — नेल्सन मंडेला नेल्सन मंडेला का यह प्रसिद्ध कथन शिक्षा को सामाजिक समानता का सबसे बड़ा माध्यम मानता है। लेकिन जब हम समाजशास्त्रीय नजरिए से ग्रामीण भारत की जमीनी हकीकत को देखते हैं, तो यह ‘हथियार’ पूरी तरह बेअसर नजर आता है। बड़े-बड़े नीतिगत दावों और चुनावी भाषणों से दूर एक कड़वी सच्चाई यह है कि आर्थिक तंगी की वजह से पूरे के पूरे परिवार पूर्वी भारत के बिहार राज्य से दूर-दराज के औद्योगिक और कृषि केंद्रों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।
जब हम ‘यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन’ (UDISE+) के आधिकारिक ड्रॉप-आउट आंकड़ों को मिथिलांचल के ग्रामीण इलाकों के जमीनी अनुभवों के साथ जोड़कर देखते हैं, तो एक खौफनाक मंजर सामने आता है। आर्थिक तंगी के कारण होने वाला यह मौसमी पलायन बच्चों की स्कूली शिक्षा को बीच में ही तोड़ देता है। यह स्थिति अंततः ‘शिक्षा के अधिकार’ (RTE) को एक बुनियादी सवाल के दायरे में खड़ा करती है: आखिर इस व्यवस्था में रुकने और पढ़ने का विशेषाधिकार किसे हासिल है?
पलायन का बदलता ढर्रा: अकेले मजदूर से पूरे परिवार का सफर
दशकों तक बिहार से होने वाले पलायन को लेकर मुख्यधारा और अकादमिक बहसों में एक ही छवि हावी रही है— एक अकेला पुरुष मजदूर, जो महानगरों की फैक्ट्रियों में काम करने के लिए ट्रेनों के जनरल डिब्बों की भीड़ में सवार होता है। लेकिन अब मिथिलांचल के गांवों में इससे कहीं ज्यादा दर्दनाक और खामोश तब्दीली आ रही है। भारी आर्थिक तंगी, खेती-किसानी के संकट और कर्ज के जाल के कारण अब अकेले मजदूर नहीं, बल्कि पूरे के पूरे परिवार अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर अनिश्चित सफर पर निकल रहे हैं।
इस बदलाव का सबसे भयानक रूप सूबे के रेलवे स्टेशनों पर रात के वक्त देखने को मिलता है। सूरज ढलते ही दरभंगा, समस्तीपुर और पटना जैसे बड़े स्टेशनों के प्लेटफॉर्मों पर पैर रखने की जगह नहीं होती। जब बिहार संपर्क क्रांति एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें आती हैं, तो प्लेटफॉर्म पर उमड़ने वाला हुजूम सिर्फ अकेले कामगारों का नहीं, बल्कि पूरे परिवारों का होता है। इस सामूहिक विस्थापन में सबसे शांत और सबसे बड़े शिकार बच्चे होते हैं।
स्कूल सत्र के बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर इन बच्चों को पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के ईंट-भट्टों, खेतों और कंस्ट्रक्शन साइटों पर अपने माता-पिता के साथ हाथ बंटाना पड़ता है। कार्यस्थलों पर इन बच्चों की मजबूरी तब और बढ़ जाती है जब स्थानीय नियोक्ताओं द्वारा उनके साथ सामाजिक भेदभाव किया जाता है और उनके लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल होता है। यह उनकी मर्जी का फैसला नहीं है, बल्कि जिंदा रहने की एक ऐसी जंग है जहां पेट की आग बुझाने के लिए क्लासरूम के भविष्य को दांव पर लगा दिया जाता है।
आंकड़ों का आईना: बिहार की जनसांख्यिकी और गरीबी
रेलवे प्लेटफॉर्मों पर दिखने वाले इस मानवीय संकट की गहराई को समझने के लिए हमें राज्य की आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर नजर डालनी होगी:
• कुल आबादी: सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) और हालिया जनसांख्यिकीय सर्वेक्षणों के अनुसार राज्य की आबादी लगभग 13.07 करोड़ है।
• वंचित समुदाय: राज्य की आबादी में अनुसूचित जाति (SC) की हिस्सेदारी 19.7% और अनुसूचित जनजाति (ST) की हिस्सेदारी 1.7% है।
• गरीबी की मार: राज्य की 53.3% आबादी आधिकारिक तौर पर गरीबी रेखा के नीचे (BPL) जीवन यापन कर रही है, जिसका सबसे बड़ा हिस्सा भूमिहीन कृषि मजदूरों और कमजोर ग्रामीण समुदायों का है।
व्यवस्था की मार और ‘मिथ्या चेतना’
आधी से अधिक आबादी का गरीबी रेखा के नीचे होना उस व्यवस्थागत नाकामी का सुबूत है जो परिवारों को पलायन के लिए मजबूर करती है। मिथिलांचल के किसी ग्रामीण बच्चे को अपनी पढ़ाई क्यों छोड़नी पड़ती है, इसे समझने के लिए हमें इस बुनियादी ढांचे की उपेक्षा को देखना होगा। यह क्षेत्र आज भी कम साक्षरता दर, जर्जर सामाजिक बुनियादी ढांचे, शिक्षा व्यवस्था में भाई-भतीजावाद और एक बेहद कमजोर प्रशासनिक तंत्र से जूझ रहा है।
हालांकि कृषि हमेशा से रोजगार का मुख्य साधन रही है, लेकिन दरभंगा और मधुबनी जैसे जिलों में गैर-कृषि क्षेत्रों का विकास बेहद सुस्त रहा है। पारंपरिक कुटीर उद्योग, हथकरघा और स्थानीय शिल्प लगभग दम तोड़ चुके हैं, जिससे पिरामिड के सबसे निचले पायदान पर मौजूद आबादी के पास कोई विकल्प नहीं बचा है। पिछले तीन दशकों में, जहां एक तरफ गरीब किसानों का राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ, वहीं दूसरी तरफ इस गंभीर आर्थिक संकट ने पलायन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का स्थायी हिस्सा बना दिया।
इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि इस संकट को राजनीतिक दलों ने महज एक चुनावी मुद्दा बनाकर रख दिया है, जिसे समाजशास्त्र की भाषा में ‘मिथ्या चेतना’ (False Consciousness) कहा जाता है। चुनाव आते ही राजनेता इस दर्द को वोट बैंक के लिए भुनाते हैं, क्षेत्रीय अस्मिता की दुहाई देते हैं या स्थानीय स्तर पर उद्योग लगाने के खोखले वादे करते हैं। लेकिन आजादी के करीब आठ दशकों बाद भी बुनियादी शिक्षा और स्थानीय रोजगार की स्थिति जस की तस बनी हुई है।
नीति बनाम जमीनी हकीकत का विरोधाभास
राजनीतिक नाकामी के कारण कागजी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच एक गहरी खाई बन चुकी है। हमारी शिक्षा व्यवस्था में एक अजीब विरोधाभास है: कागजों पर तो क्रांतिकारी बदलावों के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर स्कूल बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों से महरूम हैं। राजनीतिक बयानों और UDISE+ के आंकड़ों में यह अंतर साफ देखा जा सकता है। हालिया रिपोर्टों से पता चलता है कि शुरुआती कक्षाओं में बच्चों के दाखिले में सुधार के बावजूद, जैसे ही बच्चे उच्च कक्षाओं में पहुंचते हैं, स्कूल छोड़ने की दर तेजी से बढ़ती है।
आंकड़ों का खेल: ड्रॉप-आउट की स्थिति
• उच्च प्राथमिक स्तर (Upper Primary Level): स्कूल छोड़ने की दर 9.3% पर बनी हुई है।
• माध्यमिक स्तर (Secondary Level): यह आंकड़ा अचानक बढ़कर 20.86% तक पहुंच जाता है, जो इस बात का सुबूत है कि इतनी बड़ी संख्या में बच्चे औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो रहे हैं।
बिहार में पढ़ाई और पलायन का चक्र पूरी तरह आपस में जुड़ा हुआ है। जैसे ही खेती का सीजन बदलता है या बाढ़ का पानी उतरने के बाद स्थानीय स्तर पर काम खत्म हो जाता है, स्कूलों के हाजिरी रजिस्टर खाली होने लगते हैं। जब कोई बच्चा जनरल बोगी में बैठकर राज्य की सीमा पार करता है, तो एक लकीर के खिंचते ही उसका पूरा शैक्षणिक रिकॉर्ड खत्म हो जाता है। वह नई जगह पर एक अदृश्य, बिना पहचान का आश्रित बनकर रह जाता है, जिसका किसी सरकारी खाते में कोई वजूद नहीं होता।
ग्राउंड रिपोर्ट: दरभंगा से पंजाब तक बिखरते बचपन की कहानी
ड्रॉप-आउट के इन आंकड़ों का असली मानवीय दर्द फाइलों में नहीं, बल्कि हमारे आसपास रहने वाले बच्चों की टूटी हुई जिंदगियों में छिपा है। दरभंगा जिले के गांवों में यह कोई किताबी थ्योरी नहीं, बल्कि रोज की हकीकत है। जब पलायन का सीजन शुरू होता है, तो गांवों का माहौल ही बदल जाता है— कल तक जहां बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं वहां सन्नाटा पसर जाता है, खेल के मैदान सूने हो जाते हैं और घरों के दरवाजों पर ताले लटकने लगते हैं।
इस त्रासदी को 12 साल की सोनी कुमारी और उसके 8 साल के छोटे भाई रोहन की कहानी से समझा जा सकता है। सोनी दरभंगा के एक सरकारी स्कूल में सातवीं कक्षा की एक होनहार छात्रा है और रोहन ने अभी दूसरी कक्षा में कदम ही रखा था। लेकिन जब स्थानीय स्तर पर कमाई का कोई जरिया न हो और साहूकार के कर्ज का दबाव बढ़ने लगे, तो पूरे परिवार को रातों-रात अपना गांव छोड़ना पड़ता है।
यह पलायन उनकी मर्जी से नहीं हुआ, बल्कि यह कल्याणकारी राज्य की नीतियों की नाकामी का नतीजा है। उत्तर भारत की ओर जाने वाली ट्रेनों के जनरल डिब्बों में सोनी और रोहन की मौजूदगी इस बात का सुबूत है कि सरकार न तो गांवों में साहूकारों के शोषण को रोक पाई, न न्यूनतम मजदूरी की गारंटी दे सकी और न ही ऐसी मजबूत शिक्षा व्यवस्था बना सकी जो एक गरीब बच्चे की तकदीर बदल सके।
जब कड़कती धूप के बाद मॉनसून की पहली बारिश होती है, तो कायदे से खेतों में बच्चों की खिलखिलाहट और स्कूलों में नए सत्र की पढ़ाई की गूंज होनी चाहिए। लेकिन उत्तर बिहार के इस अंचल में यह बारिश एक बिल्कुल अलग और त्रासद चक्र की शुरुआत करती है— यानी ‘धान की रोपाई का सीजन’। इस सीजन की शुरुआत होते ही अत्यधिक गरीबी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अभाव के कारण माता-पिता को एक बार फिर बिहार से बाहर पलायन करने पर मजबूर होना पड़ता है, और बच्चे भी उनके साथ बाल मजदूर के रूप में इस विस्थापन की वेदी पर चढ़ा दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप, जिन मासूम हाथों में पेंसिल होनी चाहिए थी, वे जल्द ही दूसरे राज्यों के अनजान खेतों में घुटनों तक कीचड़ और पानी में डूबे नजर आते हैं; वे हाथ जो अपना भविष्य लिख सकते थे, वहां धान की पौध लगा रहे होते हैं।
यह सालाना चक्र एक ऐसा असहज समाजशास्त्रीय सवाल खड़ा करता है जिससे हमारी सरकारें हमेशा बचती रही हैं: जब बुनियादी आर्थिक सुरक्षा न होने के कारण पूरे के पूरे गांव खाली हो रहे हों, तो बड़ी-बड़ी शिक्षा नीतियां एक बेहतर भविष्य का निर्माण कैसे कर सकती हैं?
समाजशास्त्रीय विश्लेषण: सोनी और इस व्यवस्था का सच
दरभंगा के खेतों से पंजाब की मंडियों तक सोनी और रोहन का यह सफर इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने की कमजोरी बच्चों के भविष्य को कैसे निगल लेती है। समाजशास्त्र के नजरिए से देखें तो यह स्थिति सीधे तौर पर ‘शैक्षणिक वंचना के सिद्धांत’ (Theory of Educational Deprivation) और पियरे बोर्दियू के ‘सांस्कृतिक पूंजी के सिद्धांत’ (Cultural Capital Theory) की पुष्टि करती है:
• ढांचागत और संस्थागत बहिष्कार (Structural Exclusion): शैक्षणिक वंचना का सिद्धांत यह बताता है कि पढ़ाई में नाकामी सिर्फ बच्चे की व्यक्तिगत कमजोरी या उसकी कम समझ का नतीजा नहीं होती; बल्कि इसे पूरी व्यवस्था मिलकर तैयार करती है। सोनी कोई कमजोर छात्रा नहीं है, वह होनहार है। लेकिन राज्य की नीतियां, स्कूल का ढांचा और सामाजिक सुरक्षा तंत्र उसके परिवार को भूख और कर्ज से बचाने में नाकाम रहे। जब स्कूल व्यवस्था बच्चे की बुनियादी भौतिक जरूरतों के प्रति उदासीन हो जाती है, तो वह अनजाने में ही उसे बाहर का रास्ता दिखा देती है।
• पूंजी का टकराव (Conflict of Capitals): समाजशास्त्री पियरे बोर्दियू का मानना था कि आधुनिक शैक्षणिक संस्थान इस तरह बने हैं जो उन बच्चों को फायदा पहुंचाते हैं जिनके पास पहले से ‘सांस्कृतिक पूंजी’ (यानी सामाजिक स्थिरता, आर्थिक सुरक्षा और पढ़ाई-लिखाई का पारिवारिक माहौल) होती है। सोनी के परिवार के पास इसमें से कुछ भी नहीं है। जब साहूकारों के शोषण के कारण परिवार की आर्थिक पूंजी शून्य हो जाती है, तो किताबों और क्लासरूम का कोई मतलब नहीं रह जाता। ईंट-भट्टों या खेतों से मिलने वाली तुरंत की मजदूरी (नकद पैसे और रोटी) स्कूल के डेस्क के दूरगामी वादों पर हावी हो जाती है।
• अदृश्यता और लगातार बढ़ती असमानता: यह वंचना समय के साथ गहरी होती जाती है। स्कूल छोड़ने के बाद सोनी सिर्फ एक आंकड़ा बनकर नहीं रह जाती, बल्कि वह उस अदृश्य श्रम शक्ति का हिस्सा बन जाती है जिसे कानूनन होना ही नहीं चाहिए था। हमारी प्रशासनिक व्यवस्था इस बदलाव को देख ही नहीं पाती। राज्य की सीमा पार करते ही उसकी शैक्षणिक पहचान खत्म हो जाती है। यह सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी अशिक्षा के एक अंतहीन चक्र को जन्म देता है।
स्थायी नुकसान और सुधार का रास्ता
इस ढांचागत कमी का खामियाजा इन बच्चों को जिंदगी भर भुगतना पड़ता है। बीच सत्र में स्कूल छोड़ने के कारण पढ़ाई में जो अंतर आता है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती। जब सोनी और रोहन महीनों बाद अपने गांव लौटते हैं, तो वे खुद को क्लास के बाकी बच्चों से बहुत पीछे पाते हैं। सिलेबस आगे बढ़ चुका होता है, जिससे वे पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाते हैं और अंततः हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ देते हैं।
यह स्थिति भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के उन बड़े लक्ष्यों को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है जो सार्वभौमिक साक्षरता और बच्चों को स्कूल में रोके रखने की बात करते हैं। इसके साथ ही, ये बच्चे सरकारी स्कूलों में मिलने वाले मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) जैसी पोषण योजनाओं और नियमित टीकाकरण अभियानों से भी वंचित हो जाते हैं, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास दोनों प्रभावित होता है।
अगर इन बच्चों के भविष्य को बचाना है, तो हमारी नीतियों को इस हकीकत को स्वीकार करना होगा कि ग्रामीण आबादी अब एक जगह स्थिर नहीं है। छात्र को एक ही स्कूल कोड से बांधकर रखने का मौजूदा मॉडल अब पुराना और बेकार हो चुका है।
• पोर्टेबल डिजिटल एजुकेशनल आईडी: सबसे पहले, उन राज्यों (जहां से पलायन होता है) और उन राज्यों (जहां लोग काम के लिए जाते हैं) के बीच प्रशासनिक समन्वय होना चाहिए ताकि बच्चों के लिए एक डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम बनाया जा सके। इससे बच्चे का शैक्षणिक रिकॉर्ड राज्य की सीमा पार करते ही खत्म नहीं होगा।
• मौसमी शिक्षण केंद्र: पंजाब, हरियाणा और अन्य गंतव्य राज्यों के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे ईंट-भट्टों और बड़े कृषि क्षेत्रों के पास मौसमी स्कूल खोलें, जहां इन प्रवासी बच्चों को तुरंत दाखिला मिले।
लेकिन ये तमाम प्रशासनिक उपाय तब तक सिर्फ एक पट्टी की तरह ही काम करेंगे जब तक हम इस बीमारी की असली जड़ पर वार नहीं करते। इसके लिए मिथिलांचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा। स्थानीय स्तर पर गैर-कृषि रोजगार बढ़ाने होंगे, मखाना और फलों जैसे स्थानीय उत्पादों पर आधारित एग्रो-प्रोसेसिंग यूनिट्स लगानी होंगी और छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना होगा ताकि कर्ज के कारण होने वाले इस मजबूर पलायन को इसके उद्गम स्थल पर ही रोका जा सके।
जब तक हम शिक्षा को भौगोलिक बंधनों से आजाद नहीं करेंगे और सरकारी स्कूलों को इतनी ताकत नहीं देंगे कि वे हर संकट में बच्चे के साथ खड़े हो सकें, तब तक जयनगर और दरभंगा से खुलने वाली ट्रेनें सिर्फ सस्ता श्रम ही नहीं, बल्कि इस पूरे इलाके के भविष्य को भी अपने साथ ढोकर ले जाती रहेंगी। और इन क्लासरूमों में खाली पड़े बेंच हमेशा उस कल्याणकारी राज्य की खामोश गवाही देते रहेंगे जो अपने सबसे कमजोर नागरिकों की सुरक्षा करने में नाकाम रहा।
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