— परिचय दास —
।। एक ।।
नागार्जुन एक भाषा के लेखक नहीं हैं; वे एक ही जीवन में अनेक बार जन्म लेने वाले साहित्यकार हैं। प्रत्येक भाषा ने उनका नया जन्म किया है। मैथिली ने उन्हें स्मृति दी, संस्कृत ने परंपरा दी, पालि ने करुणा दी, हिन्दी ने संघर्ष दिया और बांग्ला ने सांस्कृतिक आत्मीयता। इसलिए नागार्जुन का प्रश्न यह नहीं है कि उन्होंने कितनी भाषाओं में लिखा; वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वे प्रत्येक भाषा में वही मनुष्य बने रहे? यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो उनकी बहुभाषिकता केवल भाषिक दक्षता है; यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि नागार्जुन के भीतर पाँच अलग-अलग रचनात्मक व्यक्तित्व सह-अस्तित्व में थे।
मैथिली का नागार्जुन “घर” का कवि है।
हिन्दी का नागार्जुन “सड़क” का कवि है।
संस्कृत का नागार्जुन “स्मृति” का कवि है।
पालि का नागार्जुन “मौन” का कवि है।
बांग्ला का नागार्जुन “रस” का कवि है।
“नागार्जुन ने भाषाएँ नहीं बदलीं, उन्होंने अपना ‘मैं’ बदला।”
नागार्जुन ने भाषाएँ नहीं बदलीं, उन्होंने अपना ‘मैं’ बदला। यही उनके साहित्य की सबसे बड़ी घटना है और संभवतः भारतीय आलोचना की सबसे बड़ी अनदेखी भी। हम अब तक उनकी भाषाओं की गणना करते रहे, पर उनके भीतर जन्म लेने वाले मनुष्यों की गणना नहीं कर सके। हमने यह देखा कि वे मैथिली, हिन्दी, संस्कृत, पालि और बांग्ला में लिखते हैं; पर यह नहीं देखा कि प्रत्येक भाषा में लिखते समय उनकी आँखों का रंग बदल जाता है, उनकी निस्तब्धता का ताप बदल जाता है, यहाँ तक कि उनके भीतर धड़कता हुआ समय भी बदल जाता है। यह परिवर्तन केवल अभिव्यक्ति का नहीं, अस्तित्व का है।
रचनाकार का ‘मैं’ स्थिर नहीं होता। वह नदी की तरह है, जो प्रत्येक घाट पर अपना प्रतिबिंब बदलती है। किंतु अधिकांश लेखक अपनी एक ही नदी में जीवन भर बहते रहते हैं। नागार्जुन का आश्चर्य यह है कि उन्होंने पाँच नदियों का जल अपने भीतर प्रवाहित होने दिया। वे किसी भाषा में प्रवेश नहीं करते, वे उस भाषा के भीतर पुनर्जन्म लेते हैं। इसलिए उनकी बहुभाषिकता को केवल भाषाशास्त्र से नहीं समझा जा सकता; उसके लिए चेतना का एक नया व्याकरण निर्मित करना होगा।
मैथिली का नागार्जुन घर लौटता है। वहाँ भाषा किसी व्याकरण की नहीं, माँ की स्मृति की तरह खुलती है। मिट्टी का स्पर्श वहाँ शब्द बनने से पहले गंध बनता है। खेत, आँगन, पोखर, लोकगीत, ऋतुएँ और आत्मीय संबोधन, सब मिलकर उस कवि का निर्माण करते हैं, जो संसार से पहले अपने गाँव का नागरिक है। मैथिली में नागार्जुन प्रतिरोध भी करते हैं, तो उसमें घर की ऊष्मा बनी रहती है। वहाँ क्रोध की जड़ में भी अपनापन है। यह भाषा उन्हें इतिहास से पहले वंश, विचार से पहले स्मृति और राजनीति से पहले मनुष्य देती है। इसलिए मैथिली का नागार्जुन केवल घर का कवि नहीं है; वह घर के भीतर सुरक्षित मनुष्यत्व का अंतिम कवि है।
हिन्दी में प्रवेश करते ही वही कवि घर की चौखट लाँघकर सड़क पर आ जाता है। यहाँ उसकी दृष्टि एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की हो जाती है। वह जनता के बीच खड़ा है, धूल, पसीने, नारों, अन्याय और संघर्ष के बीच। उसकी कविता अब निजी स्मृति की धीमी लौ नहीं, सार्वजनिक विवेक की मशाल बन जाती है। हिन्दी का नागार्जुन व्यवस्था से टकराता है, सत्ता से प्रश्न करता है और भाषा को जनजीवन की खुली हवा में छोड़ देता है। यदि मैथिली में वे घर बचाते हैं, तो हिन्दी में वे समाज बचाने की बेचैनी से भर उठते हैं। यह वही मनुष्य है, पर उसका हृदय अब अकेले नहीं धड़कता; उसके साथ हजारों-लाखों लोगों की धड़कनें जुड़ जाती हैं।
संस्कृत का नागार्जुन एक तीसरा जन्म है। यहाँ वे सड़क के शोर से हटकर भारतीय स्मृति की उस दीर्घ नदी के तट पर पहुँचते हैं, जहाँ शब्द केवल अर्थ नहीं, सहस्राब्दियों का अनुभव लेकर चलते हैं। संस्कृत उन्हें परंपरा का बंदी नहीं बनाती; वह उन्हें परंपरा का सहयात्री बनाती है। वे अतीत के सामने सिर झुकाकर नहीं खड़े होते, उसके साथ संवाद करते हैं। संस्कृत में उनका ‘मैं’ अधिक संयमित है, अधिक धैर्यवान है, अधिक आत्मदर्शी है। यहाँ उनकी दृष्टि तत्काल की नहीं, काल की हो जाती है। इसीलिए संस्कृत का नागार्जुन स्मृति का कवि है; वह स्मृति जो मृत नहीं, निरंतर वर्तमान को भीतर से प्रकाशित करती रहती है।
और तभी पालि का द्वार खुलता है। यहाँ नागार्जुन के भीतर एक अद्भुत निस्तब्धता उतरती है। प्रतिरोध का स्वर करुणा में बदलने लगता है। भाषा मानो बोलने के लिए नहीं, मौन को सुनने के लिए बनी हो। पालि में उनका ‘मैं’ किसी विजय का आकांक्षी नहीं है; वह मनुष्य के दुःख को उसके सबसे शांत रूप में पहचानना चाहता है। यही कारण है कि पालि का नागार्जुन किसी विचारधारा का घोषक नहीं, करुणा का साधक प्रतीत होता है। यहाँ शब्दों की संख्या घटती नहीं, उनका अहंकार घटता है। भाषा पहली बार स्वयं अपने मौन को सुनती है।
बांग्ला में पहुँचकर यह यात्रा एक और रूप धारण करती है। यहाँ चेतना में संगीत का एक सूक्ष्म कंपन प्रवेश करता है। सौंदर्य विचार का विरोधी नहीं रह जाता, उसका स्वाभाविक विस्तार बन जाता है। बांग्ला का नागार्जुन जीवन को केवल संघर्ष और करुणा में नहीं, रस में भी अनुभव करता है। यहाँ भाषा अर्थ से अधिक लय बन जाती है, और लय से अर्थ की ओर लौटती है। यह रस विलास का नहीं, संस्कृति की दीर्घ साधना का रस है।
इस प्रकार नागार्जुन के भीतर पाँच भाषाएँ नहीं रहतीं, पाँच प्रकार के ‘मैं’ रहते हैं। वे एक-दूसरे का निषेध नहीं करते, एक-दूसरे को पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि नागार्जुन को पढ़ना पाँच अलग-अलग व्यक्तित्वों से मिलना नहीं, एक ही आत्मा के पाँच ऋतुचक्रों से होकर गुजरना है। भारतीय आलोचना ने अभी तक इन ऋतुओं का पृथक-पृथक मानचित्र नहीं बनाया। उसने वृक्ष देखा, पर उसकी अलग-अलग ऋतुओं को नहीं पढ़ा। नागार्जुन का भाषिक ब्रह्मांड हमें इसी नए आलोचनात्मक साहस की ओर बुलाता है, जहाँ भाषा केवल माध्यम नहीं रहती, बल्कि मनुष्य के पुनर्जन्म का प्रदेश बन जाती है।
।। दो ।।
यहाँ एक और प्रश्न जन्म लेता है, और शायद यही प्रश्न नागार्जुन के समूचे साहित्य की सबसे सूक्ष्म कुंजी है। क्या इन पाँचों नागार्जुनों का कोई एक स्थायी केंद्र है, या वे निरंतर एक-दूसरे में रूपांतरित होते रहते हैं? सामान्यतः हम किसी लेखक की एक पहचान खोजते हैं, क्योंकि आलोचना को स्थिर व्यक्तित्वों से सुविधा रहती है। किंतु नागार्जुन आलोचना की इस सुविधा को बार-बार अस्वीकार करते हैं। वे किसी एक परिभाषा में नहीं ठहरते। जैसे ही हम उन्हें जनकवि कहकर संतुष्ट होते हैं, वे संस्कृत के गंभीर अध्ययन में दिखाई देते हैं; जैसे ही उन्हें शास्त्र का मनुष्य समझते हैं, वे लोकगीत की मिट्टी पर नंगे पाँव चलते मिलते हैं; जैसे ही उन्हें विद्रोह का कवि घोषित करते हैं, वे करुणा की ऐसी निस्तब्ध भूमि पर पहुँच जाते हैं, जहाँ प्रतिरोध भी प्रार्थना की तरह सुनाई देने लगता है। उनके भीतर कोई एक नागार्जुन दूसरे को पराजित नहीं करता। प्रत्येक दूसरा नागार्जुन पहले की सीमाओं को विस्तृत करता है।
यहीं उनकी बहुभाषिकता का सबसे अप्रत्याशित सौन्दर्य प्रकट होता है। उन्होंने भाषाओं के बीच कोई सीमा-रेखा नहीं खींची। उनके भीतर मैथिली कभी हिन्दी से ईर्ष्या नहीं करती, संस्कृत कभी पालि का प्रतिवाद नहीं करती, बांग्ला कभी लोकभाषा को छोटा नहीं बनाती। वे भारतीय भाषाओं को किसी पदानुक्रम में नहीं रखते। उनके यहाँ भाषा सत्ता नहीं है, सहयात्रा है। यह दृष्टि अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि आधुनिक भारतीय साहित्य की अनेक बहसें भाषा को पहचान, वर्चस्व और प्रभुत्व के प्रश्नों में बाँध देती हैं। नागार्जुन इस संकीर्णता से बाहर खड़े दिखाई देते हैं। वे भाषाओं को जीतते नहीं, उनमें निवास करते हैं। वे किसी भाषा के स्वामी नहीं बनते, उसके आत्मीय हो जाते हैं।
इसीलिए उनके साहित्य में भाषा कभी प्रदर्शन नहीं बनती। विद्वत्ता की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह प्रायः स्वयं को दिखाना चाहती है। नागार्जुन इसके ठीक विपरीत चलते हैं। उनके यहाँ ज्ञान का प्रकाश आँखों को चकाचौंध नहीं करता; वह मिट्टी पर पड़ती हुई उस धूप की तरह है, जो दिखाई कम देती है, जीवन अधिक देती है। संस्कृत का गहन अध्ययन उनकी हिन्दी को बोझिल नहीं बनाता। पालि का दार्शनिक संस्कार उनकी कविता को दुर्बोध नहीं बनाता। मैथिली का लोक उनकी दृष्टि को सीमित नहीं करता। बांग्ला का रस उन्हें भावुकता में नहीं डुबोता। यह संतुलन साधारण उपलब्धि नहीं है। यह तभी संभव होता है, जब लेखक भाषा को अर्जित संपत्ति नहीं, आत्मानुभव की विनम्र भूमि मानता हो।
यहीं नागार्जुन अपने समय के अनेक बहुभाषी विद्वानों से अलग दिखाई देते हैं। उन्होंने भाषाओं का संग्रह नहीं किया, भाषाओं के बीच अपने अहंकार का विसर्जन किया। प्रत्येक नई भाषा के सामने उन्होंने स्वयं को पुनः विद्यार्थी बनने दिया। शायद इसी कारण उनकी रचनाओं में कहीं भी भाषिक दंभ नहीं मिलता। वे यह सिद्ध नहीं करते कि उन्हें कितना आता है; वे यह दिखाते हैं कि प्रत्येक भाषा उन्हें कितना बदल देती है। किसी लेखक के लिए इससे बड़ी साधना और क्या हो सकती है कि वह अपनी ही उपलब्धियों को छोड़कर बार-बार एक नई भाषा के सामने स्वयं को नया बना सके?
यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो नागार्जुन का साहित्य भारतीय बहुभाषिक संस्कृति का केवल प्रतिनिधित्व नहीं करता, उसका दार्शनिक प्रतिरूप भी निर्मित करता है। भारत की आत्मा किसी एक भाषा में कभी नहीं बोली। वह सदैव अनेक स्वरों के सामंजस्य से बनी। नागार्जुन का रचनात्मक व्यक्तित्व उसी सामंजस्य का जीवित रूप है। उनके भीतर भाषाएँ मिलती नहीं, संवाद करती हैं; संवाद करती हैं, इसलिए जीवित रहती हैं। शायद यही कारण है कि उन्हें पढ़ते समय बार-बार लगता है कि हम किसी लेखक को नहीं, भारतीय भाषाओं की परस्पर चलती हुई एक दीर्घ और अनवरत बातचीत को पढ़ रहे हैं। उस बातचीत में शब्द कम हैं, सभ्यता अधिक है; वाक्य कम हैं, सदियों की स्मृतियाँ अधिक हैं; और सबसे बढ़कर, वहाँ मनुष्य अपनी किसी एक भाषा में नहीं, अपने समूचे मानवीय विस्तार में उपस्थित है।
।। तीन।।
नागार्जुन की बहुभाषिकता का सबसे बड़ा चमत्कार यह नहीं है कि वे अनेक भाषाओं में लिखते हैं; सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि वे किसी भी भाषा को अपने व्यक्तित्व का अंतिम निवास नहीं बनने देते। प्रत्येक भाषा उनके लिए एक पड़ाव है, पर ठहराव नहीं। वे वहाँ रहते अवश्य हैं, किंतु उसी क्षण अगली यात्रा की तैयारी भी करते रहते हैं। मानो उनका वास्तविक घर किसी भाषा में नहीं, भाषाओं के बीच स्थित उस अदृश्य पुल पर हो, जहाँ एक शब्द दूसरी भाषा में प्रवेश करते ही अपना अर्थ नहीं खोता, बल्कि एक नया जीवन प्राप्त करता है।
यहीं नागार्जुन भारतीय साहित्य में एक अद्वितीय सांस्कृतिक रूपक बन जाते हैं। वे यह प्रमाणित करते हैं कि मनुष्य की पहचान एक भाषा में सुरक्षित नहीं रहती; वह अनेक भाषाओं के पारस्परिक आलोक में अधिक पूर्ण होती है। भाषा उनके लिए सीमा नहीं, क्षितिज है। एक क्षितिज से दूसरे क्षितिज तक चलते हुए वे अपने भीतर उस भारतीयता का निर्माण करते हैं, जो किसी संविधान, किसी भूगोल या किसी राजनीतिक नारे से नहीं बनती, बल्कि सहस्राब्दियों से एक-दूसरे को सुनती हुई भाषाओं से निर्मित होती है। इसीलिए नागार्जुन को पढ़ना केवल साहित्य पढ़ना नहीं, भारत के भाषिक आत्मबोध को पढ़ना भी है।
ध्यान से देखा जाए तो उनकी प्रत्येक भाषा दूसरे की आलोचना भी करती है और उसे समृद्ध भी करती है। मैथिली उन्हें स्मरण कराती है कि यदि भाषा में मिट्टी की गंध नहीं है, तो उसका वैभव निष्प्राण है। हिन्दी उन्हें याद दिलाती है कि यदि कविता सड़क तक नहीं पहुँची, तो उसकी करुणा अधूरी है। संस्कृत उन्हें सावधान करती है कि बिना परंपरा के कोई आधुनिकता स्थायी नहीं होती। पालि कहती है कि करुणा के बिना ज्ञान केवल बौद्धिक अहंकार है। बांग्ला उन्हें बताती है कि रस के बिना प्रतिरोध भी धीरे-धीरे कठोर हो जाता है। इस प्रकार प्रत्येक भाषा उनके भीतर दूसरी भाषा की अपूर्णता को पूरा करती है। यह संबंध प्रतियोगिता का नहीं, परिपूरकता का है। शायद भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संबंध को इससे अधिक सुंदर रूपक नहीं मिल सकता।
भारतीय आलोचना ने प्रायः नागार्जुन को भाषाओं में विभाजित करके पढ़ा है। हिन्दी का आलोचक उन्हें हिन्दी का कवि मानता रहा, मैथिली का अध्येता उन्हें मैथिली की परंपरा में खोजता रहा, संस्कृत का विद्वान उनके शास्त्रीय संस्कारों पर ठहर गया। किंतु नागार्जुन का वास्तविक व्यक्तित्व इन सबके बीच घटित होता है। वे वहाँ हैं जहाँ भाषाएँ एक-दूसरे की ओर खुलती हैं। यदि हम उन्हें अलग-अलग भाषाई खाँचों में रख देंगे, तो उनके साहित्य का सबसे जीवित तत्व हमारी दृष्टि से ओझल हो जाएगा। यह उसी प्रकार होगा जैसे इंद्रधनुष के रंगों को अलग-अलग सुरक्षित रख लिया जाए और फिर आश्चर्य किया जाए कि आकाश में इंद्रधनुष क्यों नहीं बन रहा।
इसलिए नागार्जुन का पुनर्पाठ केवल उनकी कविताओं का पुनर्पाठ नहीं है; वह भारतीय साहित्य की आलोचना-पद्धति के पुनर्विचार का भी आग्रह है। अब समय आ गया है कि हम यह पूछें कि क्या किसी बहुभाषी रचनाकार का मूल्यांकन एकभाषिक आलोचना से संभव है? क्या हिन्दी की कसौटी मैथिली के नागार्जुन को पूरी तरह समझ सकती है? क्या संस्कृत की दृष्टि पालि की करुणा को पकड़ सकती है? और क्या लोक तथा शास्त्र के बीच निरंतर यात्रा करने वाले इस विराट व्यक्तित्व को किसी एक साहित्यिक अनुशासन में बाँधा जा सकता है? इन प्रश्नों के उत्तर सहज नहीं हैं, पर इन्हीं कठिन प्रश्नों में नागार्जुन की आलोचना का भविष्य छिपा हुआ है।
शायद इसी कारण नागार्जुन का साहित्य बार-बार यह अनुभव कराता है कि वे अपने समय के लेखक कम, भारतीय भाषाओं के बीच चलने वाली एक दीर्घ यात्रा के यात्री अधिक हैं। वे जहाँ भी जाते हैं, भाषा को अपने साथ नहीं ले जाते; भाषा उन्हें अपने भीतर ले लेती है। और जब वे उस भाषा से बाहर आते हैं, तो वही मनुष्य नहीं रहते जो भीतर गया था। उनके लौटने पर उनके भीतर एक नया ‘मैं’ जन्म ले चुका होता है। यही उनका रचनात्मक रहस्य है। यही उनकी बहुचेतना का सबसे विश्वसनीय प्रमाण है। और शायद यही वह बिंदु है, जहाँ नागार्जुन केवल बहुभाषी साहित्यकार नहीं रह जाते, बल्कि भारतीय भाषिक सभ्यता के सबसे जीवंत रूपकों में रूपांतरित हो जाते हैं।
।। चार ।।
नागार्जुन के संबंध में एक अंतिम बात और कही जानी चाहिए। यह बात जितनी साहित्य की है, उतनी ही भारतीय संस्कृति की भी है। सामान्यतः हम भाषा को मनुष्य की पहचान मानते हैं। नागार्जुन इस धारणा को उलट देते हैं। उनके यहाँ पहचान भाषा से निर्मित नहीं होती, बल्कि भाषा स्वयं एक बड़ी मानवीय पहचान की खोज का माध्यम बन जाती है। वे किसी भाषा के प्रतिनिधि लेखक नहीं हैं; वे उन दुर्लभ रचनाकारों में हैं जिनके भीतर भाषाएँ स्वयं अपना भविष्य खोजती हैं। इसलिए उन्हें पढ़ते समय यह अनुभव बार-बार होता है कि वे किसी भाषा का विस्तार नहीं कर रहे, वे मनुष्य होने के अर्थ का विस्तार कर रहे हैं।
यही कारण है कि नागार्जुन की बहुभाषिकता को केवल साहित्यिक घटना मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह भारतीय ज्ञान-परंपरा की उस प्राचीन अवधारणा का आधुनिक पुनर्जन्म है, जिसमें भाषा को सत्य तक पहुँचने के अनेक मार्गों में से एक माना गया था। सत्य किसी एक भाषा में कैद नहीं होता। वह संस्कृत की स्मृति में भी है, पालि की करुणा में भी, मैथिली की मिट्टी में भी, हिन्दी के जन-संघर्ष में भी और बांग्ला की सांस्कृतिक लय में भी। नागार्जुन ने इन सबको अलग-अलग द्वीप नहीं रहने दिया; उन्होंने इनके बीच ऐसे सेतु बनाए, जिन पर चलते हुए भारतीय साहित्य अपनी ही विविधता से परिचित होता है।
यहाँ उनकी रचनात्मकता एक गहरे सांस्कृतिक प्रतिरोध का भी रूप लेती है। आज की दुनिया मनुष्य को एक भाषा, एक पहचान, एक विचार और एक खेमे में सीमित कर देना चाहती है। नागार्जुन का समूचा साहित्य इस संकुचन के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है। वे मानो कहते हैं कि जो मनुष्य केवल एक भाषा में रहता है, वह अंततः एक ही प्रकार का मनुष्य बनकर रह जाता है; किंतु जो अनेक भाषाओं में स्वयं को पुनः रचता है, वह मनुष्य की संभावनाओं को भी अनेक गुना विस्तृत कर देता है। इस अर्थ में उनकी बहुभाषिकता साहित्यिक कौशल नहीं, मानवीय स्वतंत्रता का घोष है।
शायद इसी कारण उनकी रचनाओं में कहीं भी भाषाई अहंकार नहीं मिलता। उन्होंने कभी यह सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं किया कि कौन-सी भाषा श्रेष्ठ है। वे जानते थे कि श्रेष्ठता भाषा की नहीं, मनुष्य की होती है। भाषा तो केवल वह जल है जिसमें मनुष्य अपनी आत्मा का चेहरा देखता है। यदि जल निर्मल है, तो चेहरा भी निर्मल दिखाई देगा। यदि चेतना निर्मल है, तो प्रत्येक भाषा उसके भीतर अपना सबसे सुंदर स्वर प्रकट करेगी। नागार्जुन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने भाषाओं को सत्ता की सीढ़ियाँ नहीं बनने दिया; उन्हें आत्मीयता की नदियाँ बना दिया।
संभव है कि भविष्य की भारतीय आलोचना नागार्जुन को एक नए नाम से पुकारे। जनकवि, लोककवि, विद्रोही कवि, बहुभाषी साहित्यकार जैसे सभी परिचित विशेषणों के साथ एक और विशेषण जुड़ना चाहिए, जो शायद अब तक अनुपस्थित रहा है। उन्हें ‘बहुचेतस साहित्यकार’ कहा जाना चाहिए। क्योंकि उनका वैभव भाषाओं की संख्या में नहीं, चेतनाओं की विविधता में है। उन्होंने पाँच भाषाओं में साहित्य नहीं लिखा; उन्होंने पाँच अलग-अलग चेतनाओं में मनुष्य को जिया। यही उनके साहित्य का सबसे मौलिक सत्य है, और शायद यही वह आलोचनात्मक दृष्टि है जिसके बिना नागार्जुन का समग्र मूल्यांकन कभी पूरा नहीं हो सकेगा।
तब यह कहना अधिक उचित होगा कि नागार्जुन अनेक भाषाओं के लेखक नहीं थे। वे अनेक बार जन्म लेने वाले साहित्यकार थे। प्रत्येक भाषा उनका एक नया जन्म थी, प्रत्येक जन्म उनका एक नया ‘मैं’ था, और उन सभी ‘मैं’ के बीच जो अदृश्य मनुष्य निरंतर जीवित रहा, वही भारतीय साहित्य का वह विराट नागार्जुन है, जिसे किसी एक भाषा, किसी एक परंपरा, किसी एक विचारधारा या किसी एक आलोचनात्मक प्रतिमान में समेट पाना संभव नहीं। उनका वास्तविक निवास शब्दों में नहीं, उन शब्दों के बीच फैले हुए उस अनंत मौन में है, जहाँ भारत की सभी भाषाएँ एक-दूसरे को सुनती हैं, पहचानती हैं और अंततः एक-दूसरे में अपना भविष्य खोज लेती हैं।
।। पांच।।
नागार्जुन की बहुभाषिकता का अर्थ केवल अनेक भाषाओं में लेखन नहीं है। उनकी प्रत्येक भाषा उनके व्यक्तित्व का एक नया जन्म है। मैथिली में वे घर, स्मृति और लोक के कवि हैं; हिन्दी में जनजीवन, संघर्ष और प्रतिरोध के; संस्कृत में सांस्कृतिक स्मृति और दार्शनिक परंपरा के; पालि में करुणा और मौन के; तथा बांग्ला में रस और सांस्कृतिक आत्मीयता के। इस प्रकार उन्होंने केवल भाषाएँ नहीं बदलीं, बल्कि प्रत्येक भाषा के साथ अपना रचनात्मक ‘मैं’ भी बदल लिया।
यही कारण है कि नागार्जुन को केवल बहुभाषी साहित्यकार कहना उनके साहित्य का अपूर्ण मूल्यांकन है। वे मूलतः बहुचेतस साहित्यकार हैं। उनके भीतर अनेक भाषाएँ सह-अस्तित्व में नहीं रहतीं, बल्कि एक-दूसरे को निरंतर रूपांतरित करती हैं। उनकी बहुभाषिकता भाषिक दक्षता नहीं, चेतना की बहुलता का सौन्दर्यशास्त्र है। इसलिए नागार्जुन का साहित्य भारतीय भाषाओं के सहअस्तित्व, संवाद और सांस्कृतिक एकात्मता का अद्वितीय उदाहरण है। उन्हें किसी एक भाषा के लेखक के रूप में नहीं, बल्कि अनेक भाषाओं में अनेक बार जन्म लेने वाले रचनाकार के रूप में पढ़ना ही उनकी साहित्यिक विराटता को समझने का सबसे उपयुक्त आलोचनात्मक दृष्टिकोण है।
नागार्जुन का साहित्य हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि किसी लेखक की वास्तविक पहचान उसकी भाषाओं की संख्या में नहीं, बल्कि उन चेतनाओं की संख्या में निहित होती है, जिनमें वह स्वयं को पुनः रचता है। उन्हें केवल बहुभाषी साहित्यकार कहना उनके रचनात्मक व्यक्तित्व का अत्यधिक सरलीकरण है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि उन्होंने मैथिली, हिन्दी, संस्कृत, पालि और बांग्ला में लिखा; बल्कि यह है कि प्रत्येक भाषा में उन्होंने अपने भीतर एक नया साहित्यिक व्यक्तित्व जन्म लेने दिया। उन्होंने भाषाओं का विस्तार नहीं किया, अपने ‘मैं’ का विस्तार किया। यही उनकी रचनात्मकता का सबसे मौलिक और सबसे कम चर्चित पक्ष है।
मैथिली का नागार्जुन स्मृति, आत्मीयता और लोकजीवन की आंतरिक ऊष्मा से निर्मित होता है। वहाँ मिट्टी केवल भूगोल नहीं, आत्मा का निवास है। हिन्दी में आते ही वही कवि घर की चौखट पार कर जनता की सड़क पर खड़ा हो जाता है। उसकी कविता सामाजिक अन्याय, राजनीतिक विडंबना और जनप्रतिरोध की आवाज़ बन जाती है। संस्कृत में उनका व्यक्तित्व भारतीय सांस्कृतिक स्मृति और दार्शनिक परंपरा से संवाद करता है। पालि में वही चेतना करुणा, मौन और मानवीय समत्व की ओर उन्मुख हो जाती है। बांग्ला में प्रवेश करते ही उसमें सांस्कृतिक लय, रस और सौंदर्य का एक नया आयाम जुड़ जाता है। इस प्रकार नागार्जुन के भीतर पाँच भाषाएँ नहीं, पाँच रचनात्मक व्यक्तित्व सक्रिय दिखाई देते हैं।
भारतीय आलोचना ने प्रायः नागार्जुन को जनकवि, विद्रोही कवि, लोककवि अथवा बहुभाषी साहित्यकार के रूप में पढ़ा है, किंतु उनके व्यक्तित्व के इस बहुचेतस स्वरूप पर अपेक्षित गंभीरता से विचार नहीं किया गया। आलोचना ने भाषाओं को अलग-अलग देखा, पर यह नहीं देखा कि वे एक-दूसरे को भीतर से कैसे बदलती हैं। वस्तुतः नागार्जुन की प्रत्येक भाषा दूसरी भाषा की पूरक है। मैथिली उन्हें लोक का स्पर्श देती है, हिन्दी सामाजिक विस्तार, संस्कृत सांस्कृतिक गहराई, पालि करुणा और बांग्ला सौंदर्य की सूक्ष्म लय। इन सबके सम्मिलन से ही उनका समग्र साहित्यिक व्यक्तित्व निर्मित होता है। यदि इनमें से किसी एक भाषा को अलग कर दिया जाए, तो नागार्जुन का व्यक्तित्व भी अधूरा हो जाएगा।
नागार्जुन की सबसे बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि यह है कि उन्होंने भारतीय भाषाओं को प्रतिस्पर्धा का नहीं, संवाद का क्षेत्र बनाया। उनके यहाँ कोई भाषा दूसरी पर अधिकार नहीं जमाती। सभी भाषाएँ एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं। यही भारतीय सांस्कृतिक चेतना का मूल स्वभाव भी है। वे सिद्ध करते हैं कि भाषा का वैभव उसके प्रभुत्व में नहीं, उसके आत्मीय सहअस्तित्व में निहित है। इसीलिए उनकी बहुभाषिकता किसी विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारतीय बहुलता की रचनात्मक अभिव्यक्ति है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि नागार्जुन ने भाषाओं का उपयोग नहीं किया; भाषाओं ने उनके व्यक्तित्व का पुनर्निर्माण किया। वे प्रत्येक भाषा में स्वयं को पुनः सीखते हैं, पुनः देखते हैं और पुनः रचते हैं। उनकी बहुभाषिकता स्थिर ज्ञान नहीं, निरंतर आत्म-परिवर्तन की प्रक्रिया है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में कहीं भी भाषाई अहंकार नहीं मिलता। वे किसी भाषा के स्वामी नहीं, प्रत्येक भाषा के विनम्र सहयात्री हैं। यह विनम्रता ही उनकी रचनात्मक शक्ति का सबसे गहरा स्रोत है।
आज जब भाषा को प्रायः पहचान, राजनीति और वर्चस्व के प्रश्नों से जोड़कर देखा जाता है, तब नागार्जुन का साहित्य एक व्यापक मानवीय दृष्टि प्रस्तुत करता है। वे बताते हैं कि भाषा मनुष्य को सीमित नहीं करती, यदि वह उसे आत्मसात् करने की क्षमता रखता हो। अनेक भाषाओं में जीना अनेक मनुष्यों में जीना है; अनेक संस्कृतियों में जीना है; अनेक अनुभवों में स्वयं को विस्तृत करना है। इस अर्थ में नागार्जुन की बहुभाषिकता साहित्यिक उपलब्धि से अधिक मानवीय उपलब्धि है।
नागार्जुन का मूल्यांकन केवल बहुभाषी साहित्यकार के रूप में नहीं, बल्कि बहुचेतस साहित्यकार के रूप में किया जाना चाहिए। उनका साहित्य भारतीय भाषाओं के सहअस्तित्व का जीवंत मानचित्र है। उन्होंने पाँच भाषाओं में रचना नहीं की; पाँच चेतनाओं में मनुष्य को जिया। उनकी प्रत्येक भाषा उनके व्यक्तित्व का एक नया जन्म है और उन सभी जन्मों का समवेत आलोक ही नागार्जुन की वास्तविक साहित्यिक पहचान है। यही उनकी विशिष्टता है, यही उनकी सांस्कृतिक विराटता है और यही भारतीय साहित्य को उनकी सबसे बड़ी देन भी।
नागार्जुन किसी एक भाषा के लेखक नहीं, भारतीय भाषाओं के बीच निरंतर चलने वाली उस प्राचीन पदयात्रा का नाम हैं, जो कभी समाप्त नहीं होती। वे जहाँ भी गए, भाषा उनके पीछे नहीं चली; वे स्वयं भाषा के भीतर उतरते चले गए। वे शब्दों को नहीं जीतते थे, शब्द उन्हें अपना लेते थे। शायद इसी कारण उनकी रचनाओं में कहीं भी भाषाओं का अहंकार नहीं, केवल मनुष्य का स्पंदन सुनाई देता है।
आज जब उनकी ओर लौटकर देखते हैं, तो वे किसी पुस्तकालय की अलमारी में रखे हुए साहित्यकार नहीं दिखाई देते। वे कभी मिथिला की भीगी हुई मिट्टी से उठती गंध हैं, कभी किसी गाँव की पगडंडी पर अकेले चलते हुए यात्री, कभी सड़क के बीच खड़ा हुआ निर्भीक प्रतिरोध, कभी किसी प्राचीन विहार में ध्यानरत करुणा तो कभी पूर्व दिशा से आती हुई किसी अनाम लोकधुन का मद्धिम कंपन। वे एक व्यक्ति नहीं लगते, भारतीय भाषाओं की सामूहिक स्मृति का चलता-फिरता रूप प्रतीत होते हैं।
उनका साहित्य पढ़ना मानो पाँच नदियों का जल एक ही अंजलि में ग्रहण करना है। प्रत्येक नदी का स्वाद अलग है, उसका रंग अलग है, उसका संगीत अलग है; पर अंजलि में आते ही वे एक ही जीवन का जल बन जाती हैं। यही नागार्जुन हैं। वे अनेक होकर भी एक हैं और एक होकर भी अनेक। उनकी सबसे बड़ी कविता शायद वही है, जिसे उन्होंने किसी भाषा में नहीं लिखा; जिसे उन्होंने अपने समूचे जीवन से जिया।
नागार्जुन का स्मरण किसी जयंती का औपचारिक कर्म नहीं, भारतीय भाषाओं के उस विराट वृक्ष के सामने विनम्र होकर खड़े होने का क्षण है, जिसकी जड़ों में मिथिला की मिट्टी है, तने में भारतीय परंपरा का धैर्य, शाखाओं में जनजीवन का विस्तार, पत्तियों में करुणा की हरियाली और फूलों में अनेक भाषाओं का अनश्वर पराग। उस वृक्ष के नीचे खड़े होकर पहली बार अनुभव होता है कि भाषा अंततः शब्द नहीं, मनुष्य का सबसे दीर्घ और सबसे विश्वसनीय घर है और उस घर के सबसे विरल निवासियों में नागार्जुन का नाम बहुत देर तक, बहुत दूर तक, एक धीमी, उजली और आत्मीय प्रतिध्वनि की तरह सुनाई देता रहेगा।
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