लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान : महिला सहचिंतन रपट

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Democratic Nation-Building Campaign: Report on Women's Consultative Dialogue

लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान की ओर से आयोजित तीसरा महिला सहचिंतन शिविर 13 से 15 जून, 2026 तक जलगांव, महाराष्ट्र में सम्पन्न हुआ। इसका आयोजन लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान और गांधी तीर्थ द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। पहला सहचिन्तन शांतिनिकेतन, बोलपुर और दूसरा सहचिंतन मसूरी में हुआ था। शिविर का उद्घाटन 12 जून 2026 को सोनचाफा() के गमले में सहभागियों के द्वारा अपने स्थान से लाई हुई एक मुट्ठी मिट्टी डालकर हुआ।

उद्घाटन सत्र में सबसे पहले आतिथ्य का संयोजन कर रही वासंती दिघे ने सहचिंतन शिविर की पृष्ठभूमि और भूमिका रखी। इसके बाद ‘आम्ही आमच्या आरोग्यासाठी’ संस्था की संस्थापक शुभदा देशमुख, गांधी तीर्थ के साथी सुदर्शन अय्यंगर और लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान के जयंत दिवान ने अपनी बात रखी।

शुभदा देशमुख ने महिलाओं की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए गडचिरोली की जानकारी दी। 1984 में जब वे गडचिरोली गई थी तो उस समय वहां का माहौल शांतिपूर्ण था। बाबरी मस्जिद के पतन के बाद भी वहां शांति थी। गडचिरोली की जमीन उपजाऊ है और यह महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा हरा-भरा क्षेत्र है। आज वहां एयरपोर्ट एवं खनन के लिए एक लाख पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है। इस तरह से आज पर्यावरण पर आघात हो रहे हैं। इसका सीधा असर जंगल पर निर्भर रहने वाली महिलाओं पर पड़ने वाला है। आदिवासी महिलाओं का जंगल से नाता बड़ा घनिष्ठ होता है। उन्होंने गडचिरोली में फैल रहे जाति और धर्म के द्वेष पर ध्यान दिलाते हुए बताया कि इस जाल में महिलाएं भी फंस रही हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे सहचिंतन हर जगह करने की जरूरत है।

सुदर्शन अय्यंगर गांधी विद्यापीठ गुजरात के कुलपति रहे हैं और इन दिनों गांधी रिसर्च फाउंडेशन का हिस्सा हैं। उन्होंने 2002 के गुजरात के हालात को इन पंक्तियों में बयां किया: खौफ का बादल बामे हुनर तक छा गया – अबकी बारिश में सैलाब घर तक आ गया। शहर के आईन में यह सीख भी लिखी है – अब जिंदा रहने के लिए शैतान की इजाजत चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यष्टि, समष्टि और प्रकृति का एक दूसरे से घनिष्ठ संबंध है। एक गुजराती कहावत के साथ उन्होंने कहा कि आज सरकार और व्यापार का पापी गठबंधन हो गया है। इसका व्यक्ति और समष्टि पर आक्रमण हो रहा है। व्यक्ति के चरित्र के सुधार को उन्होंने अहम माना। व्यक्ति के चरित्र में सुधार के बिना कोई सुधार नहीं हो सकता, कोई क्रांति नहीं हो सकती। जैसे चरित्र का विकास और सामाजिक काम साथ चलना चाहिए, वैसे ही संघर्ष और रचना साथ में चलनी चाहिए। आत्मनिरीक्षण, आत्मशोधन और समर्पण इन तीनों के बिना कुछ नहीं हो सकता। ये काम पुरुष से महिलाएं ज्यादा अच्छी कर सकती हैं। पुरुष बाजार ले आया, महिलाओं ने बाजार नहीं लाया। व्यक्तिगत अधिकार की बात कॉरपोरेट मानसिकता लेकर आयी है।?(युवा से ही ये बात हो सकती है)

वासंती दिघे ने शिविर के पीछे का मनोदय रखा। लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान की बैठकों में महिलाओं के स्वतंत्र सहचिंतन की राय उभरी। गांधी तीर्थ में इस शिविर का आयोजन बहुत ही सटीक है, उचित है क्योंकि गांधी जी ने ही महिलाओं को चूल्हे चौके से बाहर सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय किया। संघर्ष वाहिनी के कई कार्यकर्ताओं ने देहात में संस्था स्थापित करके महत्वपूर्ण काम किया है। मनीषा गुप्ते की ‘मासूम’ संस्था महिलाओं के सर्वांगीण विकास का काम कर रही है। चेतना सिंहा का काम महिलाओं के संपूर्ण सबलीकरण का उदाहरण है। शुभदा और सतीश का मॉडल है – आम्ही आमच्या आरोग्यासाठी यानी हम ही हमारे स्वास्थ्य के लिए। यह नारा लेकर महिलाओं के आरोग्य को केंद्र से जोड़ लिया। मनीषा बनर्जी महिलाओं के लिए संघर्ष की बुलंद आवाज हैं। आज से आगे काम करने की जरूरत महसूस करती हुई उन्होंने कहा कि पहले किसने क्या किया इस बात को जाने दें, आज से आगे काम पर ध्यान दें।

उद्घाटन सत्र को आगे बढ़ते हुए लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान के साथी जयंत दिवान ने कहा कि आज के दौर में महिलाएं ही ज्यादा बड़ी लड़ाई लड़ने वाली हैं। उन्होंने ताकत के साथ लड़ने वाली आरफा खानम, इकरा हसन, महुआ मोइत्रा, सौम्या बिन्द जैसी महिलाओं का जिक्र किया। बताया कि कैसे आज खान सर के लिए छात्राएं ढाल बन रही हैं। महिलाएं ही आज की स्थिति से टक्कर ले सकती हैं, यह विश्वास उन्होंने जताया।

महिला प्रश्न और गांधी

पहले दिन के दूसरे सत्र में निशा शिवुरकर ने गांधी और महिला प्रश्न पर अपनी बातें रखीं। उन्होंने अपनी बात की शुरूआत आज के नफरत भरे माहौल में प्यार की जरूरत से की। कहा कि आज प्यार से नफरत करने वाले लोग सत्ता में हैं। आज इस देश की मिट्टी बिकी हुई है। इस बिक्री में कॉर्पोरेट के साथ किसान भी शामिल हैं। कस्तूरबा जी की डायरी का भाषांतर तुषार गांधी ने किया है। उसमें उन्होंने लिखा है की अहिंसा यदि अस्तित्व का नियम है तो भविष्य महिलाओं का है महिलाओं ने गांधी जी के विश्वास को सही ठहराया था। नोआखली में महिलाएं गांधी जी के साथ खड़ी हो गई थीं। स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध में जो हिंसा है, उसे गांधी जी ने सबसे ज्यादा समझा है। फूले और गांधी दोनों ने स्त्री पुरुष समता के लिए काम किया है। लेकिन गांधी जी का कार्य दुर्लक्षित रह गया। गांधी ने अस्पृश्यता निर्मूलन का काम किया। लेकिन हमने शाहू, फूले और अंबेडकर का नाम तो लिया और गांधी को छोड़ दिया। गांधी कहते थे कि धर्म की किताबों ने महिलाओं पर पाबंदियां लगाईं हैं। लेकिन धर्म ग्रंथ स्त्रियों ने नहीं लिखे हैं, इसलिए स्त्रियां उन्हें मानें, यह जरूरी नहीं। फूले कहते हैं कि पूरे विश्व में धर्मग्रंथ के माध्यम से महिलाओं को अबला माना गया है और उनको दोयम दर्जा दिया गया है। गांधी जब भारत में लौट कर आए तब दुर्गा बहन, निर्मला मेहता बहन उनसे मिलने गईं और पर्दा प्रथा के बारे में गांधीजी से बात की। तबसे गांधी सभाओं में महिलाओं से कहते थे कि पर्दा प्रथा स्त्रियों पर सबसे बड़ा जुल्म है, महिलाओं को उसे त्यागना चाहिए। गांधी जी कहते थे कि जब तक महिला सबल नहीं होती तब तक समाज सबल नहीं हो सकता। निर्भयता और धैर्य सिर्फ पुरुषों का गुण नहीं है। स्त्रियों को भय से मुक्त होने की बात महात्मा फुले ने कहते हैं। आगरकर और कर्वे का कार्य महिलाओं की पारिवारिक समस्या पर था। गांधी और फूले इससे आगे बढ़े। गांधी ने यह विचार दिया था कि स्त्री पुरुष संबंध मैत्रीपूर्ण होने चाहिए। गांधी के प्रभाव में एक आयरिश महिला भारत में आई और यहां की होकर रह गई। मार्गारेट ने कहा था कि हम पुरुष हैं या स्त्री, यह भूल गये। गांधी जी के सामने कई चुनौतियां थीं। वे सभी सवालों पर बोलते थे। उनका कहना था कि हमें समर्थ देश बनाना है। गांधी जी ने एक बार जेल में बच्चों के लिए एक बालपोथी लिखी। एक कहानी के माध्यम से उन्होंने पुरूषों को घर का काम करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनका कहना था कि खाना पकाना, घर का काम करना सिर्फ महिला का काम नहीं है। जब मणिलाल की शादी पर उन्होंने खत लिखकर मणिलाल कहा था, शादी का मतलब घर का काम करने के लिए किसी व्यक्ति को घर में लाना भर नहीं है। गांधी जी ने महिलाओं से कहा कि आप सामाजिक काम करो, गहने पहनना छोड़ दो और देश कार्य के लिए अपने गहने दे दो। गांधी का मानना था कि पत्नी को पति से ‘ना’ कहने का अधिकार है। एक बार इस्मत चुगताई ने गांधी जी से हस्ताक्षर की मांग की थी तो गांधी ने शर्त रखी कि तुम विलायती कपड़े पहनना छोड़ दो तो मैं अपना हस्ताक्षर दूंगा। तब इस्मत ने खादी की साड़ी खरीद कर पहनी और गांधी ने उन्हें अपने हस्ताक्षर दिए। गांधी कहते थे कि औरतों को देवदासी बनाना पुरुषों का सबसे बड़ा पाप है। एक देवदासी औरत जब गांधी जी को मिलने गई तो उन्होंने उस औरत को पहले चरखा चलाना सिखाया था। युद्ध और धार्मिक जातीय दंगों का सबसे बुरा असर महिलाओं पर ही पड़ता है। कट्टरता/रूढ़िवादिता का सबसे बड़ा असर महिलाओं पर पड़ता है। लेकिन दुखद है कि आज महिलाएं ही इसकी वाहक बन बैठी हैं। गांधी अंतर-धार्मिक विवाह के लिए धर्म बदलने की जरूरत नहीं मानते थे। गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन को मर्दानगी वाली पहचान या छवि से मुक्त किया। गांधी मानते थे कि समाज में मानवता का धर्म पनपना चाहिए, महिलाओं को चूड़ियां ओढ़नी पहनना छोड़ना चाहिए, माहवारी के समय की छुआछूत का रिवाज छोड़ना चाहिए, ऐसी बातें हमें बंधक बनाती हैं।

महिला राजनीति और महिला संस्कृति

अगला विचार सत्र राजनीति, संस्कृति और महिला पर था। इसकी वक्ता रजिया पटेल थीं। शैला सावंत ने रजिया पटेल का परिचय दिया। रजिया पटेल ने सबसे पहले शेखर सोनालकर को याद किया। जलगांव से जुड़ी पुरानी यादें बयान की। कहा, घर छोड़ने के बाद उनका छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथियों से परिचय हुआ। शेखर, रत्ना, वासंती, अरुणा सबकी माओं ने उन्हें प्यार दिया, बेटी की तरह संभाला।

आगे बढ़ते हुए उन्होंने कहा कि राजनीति ने सभी को अपने घेरे में ले लिया है। राजनीति अक्सर गलत चीज समझी जाती है। लेकिन राजनीति तो हमारे जन्म से ही हमसे जुड़ जाती है। राजनीति सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहती। संस्कृति को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे पास जो अच्छी चीज है, उसे और अच्छा बनाकर अगली पीढ़ी को सौंपना ही संस्कृति है। मानवीय संस्कृति की नींव महिलाओं ने रखी। खेती, कपड़ा बनाना, पशुपालन आदि महिलाओं ने ही शुरू की। उन्होंने नंदुरबार के राजा की बेटी कंसरी का उदाहरण देते हुए बताया कि खेत में काम करने की चाह में वह खेती करने लगी थी। यह राजा को पसंद नहीं था। लेकिन उस जमाने में जब अकाल आया तो सिर्फ कंसारी के खेत में ही धान था। उसके साथ पशु पक्षी भी आए थे। जहां इंसान का इंसान से अच्छा संबंध है, वहां की संस्कृति उन्नत होती है। कृषि संस्कृति की स्थापना औरतों ने ही की। कृषि संस्कृति पर पशुपालक संस्कृति का हमला हुआ। और कृषि संस्कृति की हार के बाद से महिला की गुलामी का दौर शुरू हुआ। गार्गी, मैत्रेयी ने इस गुलामी का विरोध किया। स्त्रियों के विरोध का प्रमाण बौद्ध काल की थेरी गाथा में भी मिलता है। भक्ति पंथ और सूफी पंथ में जो महिलाएं थीं, उन्होंने मुक्ति की गाथा लिखी। इन्होंने माहवारी के समय होने वाली छुआछूत के खिलाफ गीतों के माध्यम से अपनी बातें रखीं। अक्कमा का नाम इस पंक्ति में आगे आता है। शासन प्रशासन के इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कल्याणकारी राज्य के दो बड़े उदाहरण हैं, जो महिलाओं के नाम हैं। एक रजिया सुल्तान और दूसरा अहिल्याबाई होलकर। दोनों ने आम जनता के हित में काम किया। सुधार आंदोलन में सावित्रीबाई फुले का बड़ा योगदान है। वे सिर्फ प्रथम शिक्षिका नहीं थीं, कवियित्री भी थीं, लेखिका भी थीं। मुक्ता सालवे ने अपने लेखों में धर्मनिरपेक्षता की बातें की है। मुक्ता साल्वे कहती हैं, वेद पढ़ने का अगर अधिकार नहीं है,तो यह धर्म हमारा नहीं है। रुक्कैया सलामत हुसैन ने पूरे नारीवाद को अपनी कलम दी। स्त्री अधिकार पर उसने लिखा,धरती से गुलामी का चलन खत्म हुआ लेकिन क्या महिलाएं आजाद हुई हैं। बेगम हजरत महल, रानी लक्ष्मीबाई के उदाहरण नारी के उत्तम योद्धा होने के उदाहरण हैं।

गांधी जी ने पौरुष्य की राजनीति को फेमिनिज्म की राजनीति में ढ़ाला। गांधी महिलाओं को विरासत का अधिकार मानते थे। महिला अपने घर में काम कर घर का खर्चा बचाती है इस कारण मर्द की कमाई पर उसका भी अधिकार है, ऐसा मानते थे। स्त्री और पुरुष के वेतन में समानता चाहते थे। गांधी संविधान सभा में सभी प्रांत की महिलाओं के प्रतिनिधि के प्रति आग्रही थे। अल्पसंख्यक और दलित महिलाओं का सहभाग भी संविधान सभा में चाहते थे। कस्तूरबा गांधी की छाया नहीं थीं। गांधी जब जेल में थे तब कस्तुरबा ने भाषण दिए थे। गांधी अपने कामों में हमेशा कस्तुरबा से परामर्श करते थे।

आरक्षण के माध्यम से कितनी महिलाएं संसद में जाती हैं यह जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह बात है कि किस विचारधारा की महिलाएं जाती हैं। हमें दुनिया को इंसानियत की ओर ले जाना जरूरी है। बहुसंख्यक फंडामेंटलिज्म की वजह से मुसलमानों में डर फैल गया है। महिलाएं तो अल्पसंख्यकों के अंदर अल्पसंख्यक हैं। बुर्का पहनने की तादाद बढ़ गई है, क्योंकि यह अस्मिता का सवाल बन गया है।

LGBTQ का प्रश्न

एलजीबीटी के के प्रश्न पर मुंबई से आई चयनिका शहा ने अपनी बात रखी। उनकी कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
एक से ज्यादा रिश्ता या एक से ज्यादा व्यक्ति के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है। इस मामले में चर्चा नहीं होती। समाज में सिर्फ दो जेंडर नहीं होते, अनेक जेंडर होते हैं। जो जेंडर शरीर के हिसाब से समाज ने दिया है, वह होगा ही जरूरी नहीं। ट्रांसजेंडर की पहचान करना आसान नहीं है। औरत का सेक्स रखने वाले भी कभी कहते हैं कि हम औरत नहीं, मर्द हैं। हिजड़ा या किन्नर ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जो पुरुष और स्त्री से अलग पहचान रखते हैं। उनकी जिंदगी के बारे में हम जानने की कोशिश नहीं करते। वे कहां रहते हैं, उनके किन से रिश्ते बनते हैं, कैसे बनते हैं? हमारे प्राचीन ग्रंथ में इनका उल्लेख है। हमारे इतिहास में ये लोग मौजूद हैं। लेकिन हमारे पौराणिक ग्रन्थों और उपनिवेशीकरण ने इस ज्ञान को मिटा दिया। कुछ नवजात बच्चों का जेंडर लिंग से पता नहीं चलता है। सेक्स और जेंडर दोनों भिन्न है। सेक्स बायोलॉजिकल है और जेंडर समाज ने बनाया है। कभी-कभी लिंग जो बाहर है, वैसा ही अंदर नहीं होता। ऐसे व्यक्ति के साथ अगर समाज निर्मल निश्छल व्यवहार करे तो उनके मनोबल पर दुष्परिणाम नहीं होगा।

हम लोग क्लीन और सेफ पॉलिटिक्स करते हैं क्या? औरत होने का दायरा बढ़ गया है, लेकिन मर्द होने का दायरा नहीं बढ़ा है। एलजीबीटीक्यू की भी राजनीति है और वेश्या होने की भी पॉलिटिक्स है। कई सेक्स वर्कर मजबूरी से वह काम करते हैं , लेकिन कई अपनी मर्जी से भी करती हैं। फर्टिलिटी या प्रजनन का बोझ औरत पर इतना है कि जो महिला बच्चे पैदा नहीं कर सकती, उसे समाज में काफी परेशानी झेलनी पड़ती है।

एलजीबीटीक्यू व्यक्ति के साथ सेक्सुअल हैरेसमेंट और हिंसा घर से ही शुरू होती है। लड़कों का भी कभी-कभी घर में, कभी बाहर, कभी पीयर ग्रुप में भी काफी सेक्सुअल हैरेसमेंट होता है। संविधान कहता है कि इस देश में सेक्स और जेंडर के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। कोई भी व्यक्ति किसी भी अन्य व्यक्ति के साथ अप्राकृतिक सेक्स करता है तो उस पर कानून में सजा का प्रावधान है। होमोसेक्सुअल में होने वाले सेक्स में अगर दोनों की मर्जी है तो वे सजा के पात्र नहीं हैं। हिजड़ा या किन्नर ऐसा समुदाय है जो किसी जाति धर्म के आधार पर नहीं बना है। ये लोग कोर्ट में भी गए कि हमें पहचान चाहिए। कोर्ट में गए और 2014 में नालसा जजमेंट आया। इसके अनुसार ‘मेरा जेन्डर मैं तय करूंगी/करूंगा, डॉक्टर या समाज नहीं करेगा’ की मान्यता मान्य हुई। 2019 में बने कानून ने ट्रांसजेंडर की परिभाषा बदल दी। ट्रांस कम्युनिटी और इंटरसेक्स लोगों को ट्रांस श्रेणी में ही डाल दिया गया।

एस आई आर

एस आई आर पर अपनी बात बोलपुर शांतिनिकेतन से आई मनीषा बनर्जी ने रखी। मनीषा बनर्जी का परिचय ज्योति पासवान ने कराया।

इस व्याख्यान की कुछ प्रमुख बातें:

बिहार और अन्य राज्यों में जो चुनाव हुए हैं उसमें एस आई आर का दुरुपयोग किया गया। नेहरू जी ने एक सभा में सवाल पूछा था कि भारत माता कौन है और इस सवाल के जवाब में भी खुद कहा था कि भारत माता सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि हमारे देश के लोग हैं। गांधी ने महिलाओं को नागरिक होने का अहसास और हक दिलाया। मताधिकार आंदोलन में अपनी जान गंवा कर अमेरिकी महिलाओं ने मत का अधिकार लिया। भारतीय नागरिकों को कभी यकीन था कि मेरा और प्रधानमंत्री का दोनों का एक वोट है।
एस आई आर का इस्तेमाल करके बिहार और बंगाल में सबसे ज्यादा वोट महिलाओं का ही काटा गया । अभी जो एस आई आर हो रहा है उसमें हमें ही सिद्ध करना होगा कि हम इस देश के नागरिक हैं। यह सिद्ध करने के लिए सुनवाई में जाना पड़ता है। शादी की वजह से सबसे ज्यादा माइग्रेशन महिलाओं का ही होता है। कभी गांव तो कभी राज्य भी छूट जाता है। उसे अपने मायके में जाकर अपनी पहचान का प्रमाण लाना पड़ता है। उसे यह भी पता नहीं होता कि उसे क्या प्रूफ देना है। वोटर कार्ड ?जमीन में नाम? पासपोर्ट? पिता का नाम किस तरह लिखना है?

कुछ बी एल ओ ने अच्छी तरह से मैपिंग किया। मुस्लिम लोगों ने अपने पास अपने कागज अच्छी तरह से संभाल के रखे हैं। मुर्शिदाबाद और मालदा में लोगों के पास सब कागज हैं। इसके बावजूद लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी का हवाला देकर उनके नाम काटे गए। अमर्त्य सेन के नाम पर भी आक्षेप किया गया कि आपके और आपकी मां की उम्र में सिर्फ 16 साल का फर्क है।

बंगाल में बाद में पता चला कि बीजेपी की पिछले चुनाव में जितने अंतर से हार हुई थी, उतने ना एस आई आर से हटाये गये।
इलेक्शन कमीशन ने एक नया फॉर्म निकला, जिसमें अगर किसी भी व्यक्ति ने शिकायत की कि फलाना फलाना व्यक्ति इंडियन नहीं है तो इन शिकायत पर चुनाव आयोग ने तुरंत नाम हटा दिया। संविधान की आरंभिक प्रतियों के चित्रकार नंदलाल बोस के दो वंशजों का नाम भी काटा गया। नाम कटा एक बंदा ऐसा था जो कहता है कि मैंने तो देश स्वतंत्र होते देखा है, हम कैसे नागरिक नहीं हो सकते। लोगों को, खासकर महिलाओं को वोटर लिस्ट में नाम दर्ज करने के लिए पेपर वर्क करने के लिए अलग-अलग ऑफिस में जाना पड़ता है। दिल्ली के रोहिणी इलाका में कुछ लोग कचरा-कबाड़ बीनकर अपनी जिंदगी चलाते हैं। इसमें अधिकांश लोग बंगाल के एक खास जिले के हैं। उन्हें बांग्लादेशी बता कर परेशान किया गया। सोनाली एक ऐसी ही महिला है जिसे गर्भवती अवस्था में बांग्लादेश भेज दिया गया और बड़ी जद्दोजहद के बाद वह वापस आ सकी सोनाली की कहानी बहुत ही दर्दभरी है। नागरिकता के नाम पर एस आई आर के नाम पर बहुत अत्याचार हो रहा है। लोगों को घुसपैठिया बनाकर घर से, देश से निकाल रहे हैं। बुजुर्ग और बीमार महिला को भी दर-दर, ऑफिस दर ऑफिस भटकना पड़ रहा है। हिन्दू, मुस्लिम और अन्य समुदायों की, सभी महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है।

वेश्याएं(सेक्स वर्कर) और एलजीबीटी समुदाय के लोग, घूमंतु समुदाय के लोग कहां से पेपर लाएंगे?

पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी भंडार स्कीम के तहत महिलाओं को ₹1500 मिल रहे थे। अभी जो सरकार आई है, उसने अन्नपूर्णा स्कीम में दुगना पैसा देंगे कहकर लक्ष्मी भंडार स्कीम बंद कर दिया है। लक्ष्मी भंडार स्कीम में सिर्फ महिला होना पर्याप्त था। किसी कागज की जरूरत नहीं थी। लेकिन अभी नई स्कीम के लिए जो पेपर मांगे जा रहे हैं, जो सबके पास नहीं हैं।

अभी लोगों को बांग्लादेशी बनाकर होल्डिंग सेंटर में धकेला जा रहा है। बाद में उन्हें बांग्लादेश में सरहदी सुनसान में लुके छिपे छोड़ दिया जा रहा है। एक लड़की छठे क्लास में पढ़ रही थी। वह नो मेन्स लैंड में बैठी है, उसके बारे में गलत गलत बातें कही और लिखी जा रही हैं।

प्रश्न और उत्तर में भी कुछ बातें आयीं। जो जिस देश में जन्मा है, वह उस देश का नागरिक है, यह एक नैसर्गिक व्याख्या है। वोटर डिलिशन और वोटर एडिशन का काम चुनाव आयोग अपनी मनमर्जी से कर रहा है। अपने को नागरिक साबित करने की जिम्मेदारी नागरिकों पर डाली जा रही है। यह एस आई आर के नाम पर एक तरह से एन आर सी है। डीएम को टारगेट दिए जा रहे हैं। ऐसी परिघटनाएं पूरी दुनिया में हो रही हैं।

बनारस में जब बीजेपी को चुनाव में बांग्लाभाषी लोगों की जरूरत थी तो उन्हें बांग्लादेशी नहीं कहा गया। लेकिन अब उन्हें बांग्लादेशी कहके बुलडोज किया जा रहा है।

2024 चुनाव के बाद भाजपा ने बहुमत हासिल करने के लिए भयंकर तरीके से नाम कटवाए। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव के बीच की अवधि में नाम काटने का काम किया गया। प्रशासन और राज्य सारे गरीब और पिछड़े तबकों के खिलाफ है।
इसी चर्चा के क्रम में स्वाभाविक रूप से महाराष्ट्र में होने वाले एस आई आर पर भी चर्चा चली। यह सलाह आई कि महाराष्ट्र की विपक्षी पार्टी के नेताओं को इस पर गंभीरता से साथ काम करने का दबाव डालना चाहिए। उसके टाइमलाइन पर पूरी जानकारी हासिल करने की जरूरत महसूस की गयी। नागरिक पहलकदमी या सिटीजन इनिशिएटिव के तहत वोटर लिस्ट लेकर बीएलओ के साथ काम करना चाहिए। बीएलओ हमारा दोस्त है, यह मानकर उसके साथ काम करने की कोशिश की जाए।

महिला आरोग्य

इस विषय पर शुभदा देशमुख ने सम्बोधित किया आरोग्य खासकर महिलाओं के आरोग्य के बारे में बहुत कम ध्यान दिया जाता है। महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक की स्थिति क्या है, इस पर आज की स्थिति में महिलाओं का मानसिक और शारीरिक आरोग्य बहुत निर्भर होता है। महिलाओं में होमोग्लोबिन कम होने के कई कारण हैं। गरीबी, निरक्षरता, पोषण के बारे में जानकारी का अभाव। आदिवासी लोग पहले से जो खाना खाते आये हैं, जिसमें अपेक्षाकृत ज्यादा पोषण था, वह खाने की नई चीजों में उपलब्ध नहीं हैं। नए तरह का पौष्टिक खाना भी उन्हें मिलना मुश्किल होता है।लड़की को पोषण कम मिलता है, इस कारण उसके बच्चे भी कुपोषित होते हैं। नैसर्गिक परिस्थितियां भी एक कारण हैं। असमम बारिश की वजह से भी परेशानी होती है। घर में औरतों की थाली सबसे आखिर में लगती है। आरोग्य के लिए सरकारी बजट का हिस्सा मिनिमम 4% होना चाहिए, लेकिन यह महाराष्ट्र में 1% है। लिंग भेद का सामना महिलाओं को घर में भी करना होता है और बाहर भी करना होता है। असुरक्षित गर्भपात भी एक समस्या है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना का लाभ लेने के लिए उससे पति का आधार कार्ड मांगा जाता है। आदिवासियों में अविवाहित का गर्भवती होना बुरा नहीं माना जाता। लेकिन सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए पति का आधार कार्ड जरूरी होता है। यह तो अविवाहित गर्भवतियों के लिए संभव नहीं। कम उम्र में विवाह भी लड़कियों के लिए हानिकारक होता है। उनकी शारीरिक स्थिति गर्भधारण के लायक नहीं होती। घर में शारीरिक अत्याचार भी आरोग्य की एक समस्या है। सुरक्षित मातृत्व के इंतजाम काफी कम हैं। आईसीडीएस और स्वास्थ्य विभाग की तरफ से आने वाली जानकारी में काफी फर्क होता है। इसमें आशा वर्कर और आंगनबाड़ी सेविका को निशाना बनाया जाता है। भाषा के फर्क और यातायात की असुविधा के कारण भी दिक्कतें बढ़ जाती हैं। सरकार से निधि कम मिलने के कारण भी लोगों को सुविधाएं नहीं मिलती हैं।

द्वितीय महिला धोरण (नीति)-2001 और राष्ट्रीय शहरी आरोग्य अभियान-2013 के अनुसार गांव को दी गई निधि अगर इस्तेमाल नहीं हो पाती तो उसे वापस ले लिया जाता है। बाल आरोग्य पोषण योजना भी ठीक ढंग से नहीं चल पाई है।
तृतीय महिला नीति 2014

महाराष्ट्र में जब तक बच्चा मां के दूध पर निर्भर होता है तब तक मां को एक टाइम का भोजन देने की योजना है। भोजन की यह योजना भी ठीक ढंग से नहीं चल पाई। पीने का शुद्ध पानी भी उपलब्ध नहीं! बच्ची पर होने वाले अत्याचार भी मानसिक आरोग्य पर दुष्प्रभाव डालते हैं। औरतों को डायन सिद्ध करने की प्रथा के पीछे भघ आर्थिक कारण होते हैं।

मलेरिया का फैलाव होने पर उसको रोकने के लिए हमारे यहां गांव के लोगों ने खुद प्रति व्यक्ति एक मच्छरदानी का इंतजाम किया। सरकार ढाई लोगों के लिए एक मच्छरदानी का प्रावधान करती है। सिकल सेल और जानलेवा मलेरिया के लिए जो दवाइयां दी जाती है, उनकी निरंतर उपलब्धता नहीं होती! स्वास्थ्य योजना में सरकार के बजट में जरूरत के हिसाब से राशि का प्रावधान नहीं है। एंबुलेंस योजना में पेट्रोल के लिए बजट कम है। डॉक्टर और नर्सों की संख्या भी काफी सीमित रखी गई है। इंश्योरेंस बेस्ड मॉडल आए हैं, इसकी वजह से सरकार का पैसा बीमा कंपनियों को चला जाता है, सीधे मरीज के लिए उसका इस्तेमाल नहीं होता। हीमोग्लोबिन की समस्या को दूर करने के लिए एचएसजी ने कुपोषण को दूर करने के लिए अपने आंगन में सब्जियां उगाने का काम किया है।

*बजट और महिला*

निखिल ने इस विषय पर अपनी बातें रखीं। संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों और मोदी सरकार की नीतियों में बड़ा फर्क है। संविधान में मौलिक अधिकार के प्रावधान हैं, जिनको लेकर कोर्ट जाया जा सकता है। और धारा 36 से 51 तक दिशानिर्देशक तत्व हैं, जिनको लेकर कोर्ट नहीं जाया जा सकता।

सरकार को जीएसटी से 75 लाख करोड़ रुपए मिलते हैं। पेट्रोल पर टैक्स से 33 लाख करोड़ रुपए मिलते हैं। जीएसटी केंद्रीकृत है। इससे राज्यों को सीधे आमदनी का अवसर नहीं मिला। Cess और surcharge पहले 8.6% था, उसे 28% कर दिया गया।

मोदी सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स को 30% से घटाकर 22% कर दिया। नई कंपनियों के लिए यह 15% है। लेकिन कंपनियां इतना भी नहीं देतीं। कॉरपोरेट टैक्स के मामले में डेढ़ लाख करोड़ रुपए का नुकसान है। अन्य देशों में कॉरपोरेट टैक्स यहां से ज्यादा हैं।

भारत में कॉर्पोरेट कंपनियों को 5 लाख करोड़ रुपए के टैक्स माफ किए गए हैं। 30 लाख करोड़ रुपए के कर्ज माफ किए गए हैं। कुछ लाख करोड़ का ब्याज माफ किया गया है। देश के जल, जंगल और जमीन कौड़ियों के दाम नीलाम कर दिए गए हैं। सीमेंट कंपनी पर अडानी का प्रभुत्व बनाया जा रहा है। सभी सरकारी नवरत्न कंपनियों को धीरे-धीरे बड़े कॉर्पोरेट ग्रामीणों को दिया जा रहा है। सरकारी राजस्व काम होता जा रहा है। और इसका सीधा परिणाम हो रहा है कि सरकार पर शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर खर्च कम करने की मजबूरी बनी है।

आनंद कुमार का वीडियो संदेश

इसके बाद लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान के राष्ट्रीय संयोजक आनंद कुमार का वीडियो संदेश दिखाया-सुनाया गया। उन्होंने कहा कि महिलाओं की हिस्सेदारी और अन्य कई कमजोर तबकों की हिस्सेदारी के मामले में हमारा राष्ट्रनिर्माण काफी अधूरा रहा है। इस शिविर में महिलाओं की तीन पीढ़ियां साथ मिलकर अपने प्रश्नों के बारे में विचार कर रही हैं। देश की राजनीति में महिलाओं का एक विशेष महत्व है। महिला सहचिंतन को शुभकामना देते हुए उन्होंने अपनी बात समाप्त की।

महिला किसान और एकल महिला

माधुरी खडसे ने इस विषय पर अपनी बात रखी। उन्हें दिल्ली का सुब्रह्मण्यम पुरस्कार मिला है। मैं सुसाइड ग्रस्त यवतमाल जिल्हे से आई हूं। कळंब तालुका(प्रखंड ) के एक ही गांव में 55 किसानों ने आत्महत्या की है। मैं उन जिल्हों मे जाती हूं और उनका दुःख बांटती हूं।

किसानों की आत्महत्या के मामले में जिम्मेदारी महिला पर डाल दी जाती है और उन्हें मायके भेज दिया जाता है। मायके में भाई लोग भी उसे घर में नहीं रखते हैं। बड़ी मुश्किल से गाय के गोठे में उसे जगह मिलती हैं। और मजदूरी करके वो अपने बच्चे को पालती है। अगर मृत किसान की पत्नी ससुराल में ही रहना चाहती है तो कभी कभी ससुराल वाले उसे गांव में भी रहने में परेशान करते हैं। उन्हे ससुराल वाले जरूरी कागजात भी नहीं देते हैं। समाज में भी सिंगल वूमन(एकल महिला) को इज्जत से नहीं रखते है.

आदमी के मरने पर स्त्री के कुंकुम पोछते हैं, चुडि़यां तोड़ते हैं। सारे समाज के सामने यह कृत्य करना अपमानजनक लगता है। सभी महिलाओं को मिलकर इस प्रथा के खिलाफ गांव में बात की। एक एकल महिला ने गुलाब का फूल लगाया तब बाकी महिलाओं ने उसे ताने मारे। तो उस साल हमने हल्दी कुंकुम के प्रोग्राम में इन महिलाओं को गजरा लगाया। हमने 26 जनवरी के प्रोग्राम में पांच ग्राम पंचायतों का राष्ट्रीय झंडा इन महिलाओं के हाथ से फहरवाया. अभी ये महिलायें शासकीय योजना के कागज पत्र खुद जमा करती हैं।

किसान के घर में 90% काम महिलायें करती हैं, लेकिन उन्हें किसान नहीं माना जाता। उन्हें किसान की पहचान मिले, इसलिये लगातार काम किया। तीन साल बाद इसमें सफलता मिली।

महिलायें खेती में काम करती हैं, लेकिन इस मामले में फैसले लेने में उन्हें कोई पूछता नहीं है। हमने सोचा विचार के आधा एकड़ जमीन इन स्त्रियों के लिये मांगी। यह जमीन उन्हें मिली। अब ये महिलायें अपने घर के लिये अनाज और सब्जियां उगाती हैं। इसे बेचने वे बाजार जाती हैं।

अगर पत्नी मर जाती है तो कई पत्नी के तेरहवें दिन ही शादी कर लेते हैं। कुछ विधवा महिलाओं ने पुनर्विवाह की इच्छा व्यक्त की तो ऐसी महिलाओं के विवाह के प्रयास हमने किए। ऐसी आठ महिलाओं की दूसरी शादी करवाई। अभी हमने शिवार() मैत्री कंपनी स्थापित की है। जिसके नाम पर खेती है, जिनके नाम पर 7/12 (जमीन के कागजात) है, वो ऐसी कंपनी की स्थापना कर सकते हैं। लेकिन अधिकारी ने आदिवासी महिलाओं को नकार दिया।

अभी घरों का सड़ने गड़ने वाला कचरा जमा करके कम लागत में खेती करने के लिये प्रयास कर रहे हैं। हमारा कहना है कि खेती से जुड़कर काम करने वाली महिला को भी किसान कहा जाये। ये हमारी मांग है। ईख तोड़ने वाली कामगार महिलाओं की काफी समस्यायें है। मैं मछलीमार महिलाओं के साथ भी काम करती हूं। महिलायें स्वयंपूर्ण तरीके से काम करने में सक्षम बनें, इस दिशा में हम काम कर रहे हैं। महिलाओं को कर्ज नहीं मिलता। महिलाओं का खेती से बहुत गहरा रिश्ता है।

चर्चा में शामिल होते हुए शुभदा ने कहा कि जिन आदिवासी क्षेत्रों में पहले महिलाएं हल चलाती थीं, वहां अब हिंदू संस्कृति के थोपे जाने के बाद औरतों का हल चलाने पर पाबंदी लगा दी गयी है। जिस महिला पर इल्जाम होता है वह न्याय पंचायत के सामने अकेली बैठती है। यह देखकर मांग की गई कि पंचायत समिति में महिला होनी चाहिए।

नूतन ने बताया कि खेती क्षेत्र में सबसे ज्यादा कंबर वाकून () करने का काम महिलाओं को दी जाती है। महिला हमाल (मजदूर) को मातेर स्त्री कहा जाता है। उन्हें एक रुपया मजूरी मिलती है। कोर्ट में केस जितने के बावजूद उन्हें हमाल का बिल्ला नहीं दिया जा रहा है।

महिला के नाम पे खेती नहीं की जाती है. पति के आत्महत्या से प्रभावित महिला को सरकारी स्कीम के लाभ नहीं दिये जाते हैं।
माधुरी खडसे ने बताया कि जाति का भेदभाव था, लेकिन हमारी महिलाओं के पास बीज थे। इस कारण उनसे लेन देन हुए। इस लेन देन की वजह से जाति की समस्या कम हुई है।

समापन निवेदन

वासंती दिघे ने समापन वक्तव्य के साथ डिलिमिटेशन पर भी अपनी बात रखी। वासंती दिघे अंतरजातीय विवाह की पुरस्कर्ती हैं। जळगांव कौटुंबिक न्यायालय (पारिवारिक अदालत) की स्थापना के लिए इन्होंने प्रयत्न किया। महाराष्ट्र स्त्री मुक्ती परिषद में सहभागी है। इन्हें केशव स्मारक ट्रस्ट पुरस्कार मिला है।  जळगांव मे गर्भ लिंग निदान को पकड़ने के स्टिंग ऑपरेशन चलाये।

वासंती दिघे के वक्तव्य की मुख्य बातें इस प्रकार हैं: महिलाओं को राजनीति में लाने के मामले में हमारा नजरिया औरों से अलग है। पुरुषसत्तात्मक में जब राजशाही थी, उसमें कुछ स्त्रियां राजकाज में आईं। उन स्त्रियों का काम, उनका नजरिया अलग रहा।
पुरुषसत्ता और राजसत्ता जब मिल जाती है तो महिलाओं का दमन बढ़ जाता है।

1931 में दो महिलाओं ने आरक्षण की मांग की थी और 1935 में आरक्षण का प्रावधान प्रावधान मिला। 15 महिलाएं संविधान सभा में थीं। वो सभी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थीं। उस समय उन्होंने महिला आरक्षण की जरुरत नहीं समझी। उस समय पुरुषों ने यही समझा कि राजनीति दिमाग का खेल है। और महिलायें भावना से काम लेती हैं, इसलिये राजनीति में उनका क्या काम। इंदिरा गांधी का जमाना समता की ओर बढ़ने का दौर रहा ।

सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति ठीक नहीं रही। कालांतर मे महिलाओं ने आरक्षण की मांग शुरू की।
महिलाओं को सम्पत्ति में समान अधिकार की बात की गई। महिला आंदोलन महिलाओं के ऊपर होने वाले अत्याचार के सवालों में ही उलझा रहा। आरंभ में अपने लिए आरक्षण का सवाल नहीं उठाया।

महिला आरक्षण बिल के संसदीय इतिहास को देखें। 2010 में महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पास हुआ ।लेकिन राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, समाजवादी पार्टी जैसे सत्ता सहयोगी पार्टियों ने विरोध किया। इस कारण इस विधेयक को लोक सभा में रखा नहीं गया। 2014 से विरोधी पक्षों ने मांग की लेकीन बिल रखा गया 2023 में। उसमें भी दो शर्तें डाली गयीं।।
जनगणना हर दस साल में होनी चाहिए। लेकिन 2021 में कोविड के कारण नहीं हो सका। अब इसे बेवजह टाला जा रहा है।

एक व्यक्ति, एक अधिकार:

परिसिमन का काम जनगणना के बाद होता है। जनसंख्या के अनुसार मतदारसंघ की पुनर्रचना की जाती है। इसी में मे SC ST निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण भी होता है। परिसीमन अधिकारी का निर्णय अंतिम होता है। पहली जनगणना 1951 में होती हैऔर 489 लोकसभा की सीट तय की जाती है। 1961की जनगणना के बाद 494 लोकसभा सीट बनती है।

1971 की जनगणना के बाद 543 लोकसभा सीट बनायी गयी। उत्तरी राज्यों की लोकसंख्या ज्यादा होने , इस कारण हारी संख्या में वहां संसदीय सीटें बढ़ने तथा उत्तर और दक्षिण के प्रतिनिधित्व में भारी असंतुलन बनने के मद्देनजर पच्चीस साल के लिये परिसीमन रोक दिया गया। बाद में भाजप ने भी इसी वजह से इसी वजह से परिसीमन का स्थगन जारी रखा। लेकिन अब उसने जनगणना और परिसीमन का निर्णय ले लिया है।

भाजपा सरकार महिला आरक्षण बिल लाती है और कहती है 2023 की लोकसंख्या के आधार पर आरक्षण देंगे। वह लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करनै चाहती है और उसमें महिला आरक्षण देना चाहती है। इसमें दक्षिणी प्रांतों की सीटें आनुपातिक रूप से काफी कम होने का आकलन है। यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है।

जम्मू कश्मीर और असम में हुए परिसीमन से यह आशंका गहरी होती है। वहां कश्मीर की सीटें घटीं और जम्मू में बढ़ीं।
असम में अनेक जगहों पर बेतुकी कांट छांट मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को कम करने की योजना के साथ हुई है। मसलन बारपेटा के मुस्लिम बहुल एरिया से कुछ विभाग काट कर धुबरी मे जोड़ दिया। नौगांव करिमगंज में एकदम अलग हिस्सा जोड़ दिया गया। इस तरह मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व कम कर दिया गया।

झारखंड में भी चालाकी से सीट पुनर्निर्धारण करण कर आदिवासी सीटें कम करने की संभावना है। भाजपा सरकार अल्पसंख्यकों, SC और ST का प्रतिनिधित्व कम करने के उद्देश्य से परिसीमन का खाका बना रही है। महिला अत्याचार के विषय पर लोकप्रतिनिधि महिलाओं ने पक्ष-निरपेक्ष भूमिका नहीं ली।

आज मॉब लिंचिंग का माहौल है। बिहार UP की तरह ही डान्स प्रोग्राम महाराष्ट्र में होने लगे हैं। मोबाइल के माध्यम से बच्चों और युवकों को भडकाया जा रहा है। प्रवक्त FB पर बहुत ही भद्दी बातें कर के शाब्दिक हिंसा की जा रही हैं। इन तरीकों से माहौल हिंसक और डरावना बनाया जा रहा है। महिलायें भयभीत हो रही हैं।

एक सुखद और सफल सहचिन्तन

बोलपुर(पश्चिम बंगाल) और कांडीखाल(मसूरी, उत्तराखंड) के बाद हुआ यह महिला सहचिन्तन परिवेश, सहभाग और चिंतन की गुणवत्ता – हर मामले में सुखद सफलता का अहसास दे गया।
इस शिविर के आयोजन में किरण(रांची), वासंती दिघे, मनीषा बनर्जी (बोलपुर) और गुड्डी (मुंबई) की विशेष सामूहिक संयोजनकारी भूमिका रही।


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