पुस्तक का नाम : संस्कृति

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संस्कृति

— नीरज कुमार पाण्डेय —

मानव अपने जीवन में प्रायः अनेक प्रश्नों तथा समस्याओं से टक राता है और उसका समाधान तलाशता है। यद्यपि इस प्रक्रिया में सोच-विचार की भूमिका अवश्य होती है, तथापि वह उसे गहन चिन्तन के लिए बाध्य करे, ऐसा आवश्यक नहीं है। जगत् तथा उसमें अपनी स्थिति के सन्दर्भ में जब मनुष्य गहन तथा विशद् स्तर परजिज्ञासा करता है, तब उसका चिन्तन दार्शनिक रूप ग्रहण कर लेता है। वस्तुतः यह जिज्ञासा ही अनेक गूढ़ प्रश्नों के रूप में उपस्थित होकर दार्शनिक चिन्तन को एक विस्तृत आयाम तथा नवीन दृष्टि प्रदान करती है। पुनश्व, कोई भी चिंतक बिना समस्याओं को उठाये उनका समाधान खोज नहीं सकता। डॉ. आलोक टण्डन द्वारा प्रणीत संस्कृति इन्हीं समस्याओं की पूर्ति की दिशा में एक सफल एवं स्तुत्य प्रयास है।

आलोच्य पुस्तक में डॉ. टण्डन द्वारा संस्कृत संबंधित कुल 32 समस्याओं पर विचार किया गया है तथा पुस्तक के अंत में एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ-सूची भी दी गई है। इन समस्याओं का सम्यक विवेचन करने के लिए उन्हें पाँच भागों संस्कृति को आखिर कैसे समझे, आधुनिकता और संस्कृति, संस्कृति और भूमंडलीकरण, सांस्कृतिक अन्य की समस्या तथा और अंत में वर्गीकृत किया गया है।

प्रथम भाग मे संस्कृति शब्द विश्लेषणके साथ संस्कृति और सभ्यता, संस्कृति और परंपरा, संस्कृति और धर्म, संस्कृति और सत्ता के साथ ही सांस्कृतिक वर्चस्व और सांस्कृतिक अस्मिता के साथ ही आंतरिक उपनिवेशीकरण के अंतर्गत बाह्यर्थवाद समस्याओं का विवेचन किया गया है। द्वितीय भाग में आधुनिकता औरसंस्कृति के बीच जो विरोध दिखाई देता है उनमें से क्या आधुनिकता के उदय के साथ-साथ प्राचीन संस्कृतियों के अस्तित्व या संस्कृति की आंतरिक शक्ति आधुनिकता के साथ तालमेल बैठाने में साक्षमता की बात हो जिसमें मूलतत्ववाद, पुनरुत्थानवाद एवं धार्मिक आतंकवाद तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद आदि जैसी समस्याओं को प्रमुखता से उद्घटित किया गया है। तृतीय भाग में संस्कृति औरभूमंडलीकरण के अंतर्संबंधों के प्रत्ययों को समझने तथा भूमंडलीकरण और हमारी सांस्कृतिक अस्मिता के खतरों की समस्या को उजागर कर नव-संस्कृति उपनिवेशवाद की समस्या के साथ लेखक ने विश्व संस्कृति बाजार और संचार के साथ स्थानीयअस्मिताओं की समस्याओं का विवेचन एवं विश्लेषण किया गया है। चतुर्थ भाग में सांस्कृतिक अन्य की समस्या के अंतर्गत भौतिक संसाधनों से समृद्ध भूमंडलीकरण के अनेक सिद्धांतों जैसे सर्व समावेशीवाद, बहुसंस्कृतिवाद, अंतरसंस्कृतिवाद, पारसंस्कृतिवाद जैसे व्यवहारिक सिद्धांतों के साथ परमार्थिक सिद्धांतों की भी चर्चा की गई है। पंचम भाग में लेखक ने भारतीय संस्कृति को समझने के लिए वेद, उपनिषद, बौद्ध जैन मनुस्मृति, पुराण आदि के साथ की क्या भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक है? इसके सनातन स्वरूप को समझने के लिए सनातनता बनाम ऐतिहासिकता, भौतिकवाद की परंपरा, रामायण महाभारत में सांस्कृतिक चेतना, तुलसीदास के रामचरितमानस, इस्लाम का प्रभाव भक्ति आंदोलन, भारतीय नवजागरण के साथ वर्तमान सांस्कृतिक संकट आदि प्रकार के समस्याओं का विश्लेषण किया गया है। इसके अंत में लेखक ने लिखा “और अंत में” गांधी के एक वक्तव्य से की अंत में मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों तर से ऊंची दीवारों से घिरा हो और मेरी खिड़कियां बंद रहे। मैं चाहता हूं कि सभी देशों की संस्कृतियाँ, जितना संभव हो मेरे घर के आसपास से उन्मुक्त होकर गुजरती रहें। लेकिन किसी की आँधी में मेरे पैर उखड़ जाए, यह मुझे मंजूर नहीं। वर्तमान स्थिति में किसी भी संस्कृति को समझना और उनकी चुनौतियों का सामना करने के लिए यह पुस्तक हमें एक सक्षम दृष्टि देने का प्रयास करती है। संस्कृति वह नहीं है जो सिर्फ हमें सिखाएं बल्कि वह भी होती है जो आने वाले भविष्य को भी सिखाती है।

भाषा की सहजता एवं प्राज्जलता पुस्तक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता है। अत्यंत दुरूह एवं सम्प्रत्ययात्मक समस्याओं को सुबोध शैली में प्रस्तुत करना निश्चित रूप से उनकी असाधारण सफलता है। मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक छात्रों, शोधार्थियों तथा दर्शन के सुधी पाठकों के लिए समान रूप से उपादेय एवं मार्गदर्शक सिद्ध होगी।


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