जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है…

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Mothers marry comes to me

— डॉ. शुभीत कौशिक —

रुंधति रॉय द्वारा उनकी माँ मैरी रॉय और उनके इर्द-गिर्द फैले हुए जीवन-संसार के बारे में लिखी गई भावपूर्ण पुस्तक ‘मदर मैरी कम्स टु मी’ पढ़ी। विस्मित कर देने वाले सम्मोहक गद्य से रची हुई शानदार किताब। जो सिर्फ़ मैरी रॉय से ही नहीं बल्कि ऊटी, एमिनेम, कोट्टायम जैसी जगहों की चहल-पहल से भरी जिंदगी और वहां के लोगों को जीवंत कर देती है।

किताब की धुरी निश्चय ही मैरी रॉय हैं। उनके दो बच्चे, उनका स्कूल और वहाँ के शिक्षक-कर्मचारी और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे हैं, और कोट्टायम का वह रूढ़िवादी समाज है, जो मैरी रॉय से डरता भी है, उनका जीवट देखकर सम्मान भी करता है, मगर उनसे लड़ने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ता।

मैरी रॉय अपने उस परिवार, माँ और भाई से भी अपने आत्म-सम्मान को बचाने के लिए संघर्षरत हैं, जिस परिवार ने उन्हें पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा देने से इनकार कर दिया और क्रूरतापूर्वक दो छोटे बच्चों के साथ उनके पैतृक मकान को ख़ाली करने लिए विवश करना चाहा। यहीं से न्याय की उस ऐतिहासिक लड़ाई की पटकथा लिखी जाती है, जिसमें वे सीरियाई क्रिश्चियन समुदाय के उत्तराधिकार क़ानून को चुनौती देती हैं और आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट भी उनके पक्ष में फ़ैसला देकर उनके साथ बरसों पहले हुए अन्याय के लिए उन्हें इंसाफ़ देता है।

अपनी मां की जितनी बहुरंगी छवियां अरुंधति ने इस किताब में पेश की है, वह अद्भुत हैं। एक ओर समाज से लड़ने वाली निर्भीक, साहसी, प्रतिबद्ध और जीवट वाली मैरी रॉय हैं, तो दूसरी तरफ वही मैरी रॉय अपने बच्चों और मातहतों के साथ क्रूरता की हद तक जाने वाली निर्मम भी हैं। इतना कि हम उनसे भय खाते हैं, ग़ुस्सा करते हैं, चिढ़ते हैं, मगर उन्हें बेइंतहा प्यार भी करते हैं।

और सिर्फ़ मैरी रॉय ही नहीं जी. आइज़क, कुरसम्मल, कोचु मारिया, लॉरी बेकर, गोलक, कार्ला बुलद्रिनी, प्रदीप, जॉन बर्ज़र, फूलन देवी जैसे तमाम लोग जो इस किताब की दुनिया में आवाजाही करते हैं, वे सब ऐसे ही हैं, अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व के मालिक और अपनी बहुरंगी तेवरों के साथ। किताब में अरुंधति के पिता मिकी राय भी हैं, अधिकांशतः अनुपस्थित लेकिन विभिन्न प्रसंगों में अपनी मौजूदगी को बनाए हुए, ठीक वैसे ही जैसे वे फ़ैमिली एल्बम की तस्वीर में मौजूद हैं।

यादों की इस किताब में एक नदी भी है, मीनाक्षील। जो अरुंधति के जीवन और उनकी स्मृति-संसार में अपनी मछलियों और प्रवाह के साथ कल-कल बहती रहती है। इसमें भाषा का वह दुस्साहसी आखेट भी है, जिसमें अरुंधति जैसी साहित्यकार भाषा को नियंत्रण में लेने की कोशिश करती हैं, बजाय कि ख़ुद भाषा से नियंत्रित होने के।

मां के साथ अपने तनावपूर्ण रिश्तों, घर से भागने और उसके बाद दिल्ली के जीवन के बारे में जिस साहस और बेबाक़ी से अरुंधति ने लिखा है, वह अपनी मिसाल आप है। अकारण नहीं है कि किताब के सबसे मर्मस्पर्शी और भावुक करने वाले हिस्से वे हैं, जहां अरुंधति सबसे ज्यादा वलनरेबल हैं। यह उनके निजी और सार्वजनिक जीवन में आवाजाही की भी कहानी है। जिसमें नर्मदा बचाओ आंदोलन और तमाम दूसरे राजनीतिक आंदोलनों में उनकी हिस्सेदारी के अनुभव और विगत आधी सदी में देश की बदलती हुई राजनीतिक तस्वीर पर उनके विचार, उन पर चले मुक़दमे भी शामिल हैं।

साथ ही इसमें रुपहले पर्दे पर उनकी उपस्थिति, पटकथा लेखन और फ़िल्म-निर्माण से उनके जुड़ाव की भी चर्चा है। अरुंधति के लेखकीय जीवन, उनके पहले उपन्यास के लिखे जाने से लेकर बाद की पुस्तकों और उनके कथेतर लेखन की चर्चा तो इसमें है ही। लेखक की सामाजिक भूमिका और उसके उत्तरदायित्व पर उनकी मानीखेज टिप्पणियां भी दर्ज हैं।


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